स्त्री आत्मकथा - अस्मिता संघर्ष तथा आत्मनिर्भर स्त्री

कुमारी ज्योति गुप्ता
कुमारी ज्योति गुप्ता भारत रत्न डा.अम्बेडकर विश्वविद्यालय ,दिल्ली में हिन्दी विभाग में शोधरत हैं सम्पर्क: jyotigupta1999@rediffmail.com
संदर्भ-प्रभा खेतान और मैत्रेयी पुष्पा 

हिंदी जगत में प्रभा खेतान एक ऐसा नाम है जो अपनी पहचान कई स्तर पर दर्ज कर चुका है। स्त्री सशक्तिकरण तथा स्त्री अस्मिता की लड़ाई लड़ने वाली लेखिका के रुप में हिंदी जगत उन्हें जानता है साथ ही एक सफल उद्योगपति महिला के रुप में उन्होंने देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी अपनी उपस्थिति दर्ज की। डा0 प्रभा खेतान ने समकालीन कथा-साहित्य में यदि अपनी पहचान कथा-लेखन तथा स्त्री विमर्श के क्षेत्र में बनाई तो दूसरी तरफ सीमोन द बोउवार की प्रसिद्ध पुस्तक ‘द सेकेण्ड सेक्स’ के अनुवाद के साथ सात्र्र और कामू के जीवन दर्शन पर चिंतन से। प्रभा खेतान का अधिकांश लेखन आत्मकथात्मक है, मारवाड़ी समाज की दकियानूसी पारंपरिक संकीर्णता के बीच उनका नारी मन जिस तरह विद्रोह करता है, अपनी अस्मिता और आजादी की लड़ाई लड़ता है हिंदी जगत में विलक्षण है।

इनकी आत्मकथा ‘अन्या से अनन्या’ सन् 2007 में प्रकाशित हुई। हंस में धारावाहिक रुप में प्रकाशित इस आत्मकथा को जहां एक तरफ अकुंठ प्रशंसाएँ मिली वहीं दूसरी तरफ अपने साहस या यूँ कहे अपने दुस्साहस के कारण पितृसत्तात्मक मारवाड़ी समाज की घोर निंदा भी सहनी पड़ी। पूरी आत्मकथा के दौरान हमने देखा कि इस महिला में एक जिद्द थी, जो साधारणतः बहुत कम देखने को मिलती है, जिसके कारण ये न सिर्फ मारवाड़ी पुरुषों की दुनिया में कदम रखती हैं बल्कि कलकत्ता चेम्बर आॅफ कामर्स की अध्यक्ष भी बनती हैं। इस आत्मकथा में एक सफल उद्योगपति बनने की कथा-यात्रा में एक ऐसी बोल्ड स्त्री सामने आती है, जो न केवल परिवार बल्कि पूरे समाज को चुनौती देते हुए अपनी अस्मिता की लड़ाई लड़ती है। लेखिका कहती हैं ‘‘मैं अपनी पहचान चाहती थी, एक ऐसा जीवन जो स्थानीयता के साथ वैश्विक हो। जीवन, रोमांस, सेक्स, सम्बन्ध सबके अलग-अलग कोड होते हैं। इन चिन्हों के अर्थ अलग होते हैं। बंगाली और पंजाबी समाज से हमारा मारवाड़ी समाज भिन्न था। प्रगतिशीलता के सन्दर्भ में मैं किसी समाज को कम ज्यादा कहकर नहीं तौलना चाहती। लेकिन यही सोचती हूँ कि आखिर कौन इन्हें निर्मित करता है? व्यक्ति ही ना। इनमें से बहुतेरे कोड हैं,  जिन्हें तर्क के सरौते से मैं काटना चाहती हूँ। बादाम की गिरी जैसी इनकी भी कोई अलग गिरी होगी और कैसा होगा उसका स्वाद? किन्तु यह भी जानती हूँ कि इसे इतनी आसानी से तोड़ा नहीं जा सकता। बड़ा सख्त है इनका छिलका।’’1  इन पंक्तियों के माध्यम से लेखिका यह बताना चाहती हैं कि इस तरह की जिंदगी की शुरुआत करना आसान नहीं था क्योंकि दिन भर की मेहनत, संघर्श जोखिम और जिम्मेदारी का रास्ता बिल्कुल अलग और नया था बावजूद इसके प्रभा खेतान इस संघर्ष को स्वीकार करती हैं और फिर शुरु होता है एक और सफर। पहले एक लेखिका के रुप में और फिर एक स्वतंत्र उद्यमी के रुप में। दोनों ही स्तर पर वे सफल रहीं। बतौर लेखिका वे हिंदी की चर्चित उपन्यासकार और कई वैचारिक पुस्तकों की लेखिका रहीं और बतौर उद्यमी उन्होंने निर्यात के व्यवसाय में अपनी जगह बनाई। इसलिए यह आत्मकथा एक स्तर पर प्रेम की अवसादमय गाथा है और साथ-साथ एक औरत के व्यक्तित्व के रुपांतरण और संघर्ष की कहानी भी।

आर्थिक आत्मनिर्भरता प्रभा खेतान के जीवन की महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। निर्यात व्यापार की आर्थिक सलता ने उनके व्यक्तित्व को ऊँचाई प्रदान की। डाॅ0 सर्राफ के परिवार में वे ‘अन्या’ थीं, वे कहती भी हैं ‘‘मैं वह अन्य थी जिसे निरन्तर निर्मित किया जा रहा था। क्योंकि महज मेरा होना पत्नीत्व नामक संस्था को चुनौती दे रहा था। सहमति की खोज में मैं बुरी तरह थकने लगी थी। मैं बस पति-पत्नी के बीच ‘एक वह’ थी। एक बाहरी तत्व, अनचाही स्वीकृति।’’2 लेकिन सुदृढ़ आर्थिक आधार ने धीरे-धीरे उन्हें अनन्या बना दिया जो मारवाड़ी समाज उन्हें मंचासीन नहीं देखना चाहता था और कहता था ‘‘इस औरत को हम मंच पर कैसे बैठाएँ? माना कि पढ़ी-लिखी, आत्मनिर्भर स्त्री है पर ऐसी स्त्री समाज की नाक नहीं हो सकती।’’3  उसीने उन्हें कलकत्ता चेम्बर आॅफ कामर्स की प्रथम महिला अध्यक्षा का पद प्रदान किया।

स्त्री मुक्ति की पहली शर्त आर्थिक आजादी है। प्रभा खेतान ने अपने निजी जीवन में इस सच को शिद्दत से महसूस किया। आर्थिक आजादी को महत्व देते हुए उन्होंने अपने एक साक्षात्कार में कहा भी है ‘‘औरत समाज में दोयम स्तर पर है, मैं खुद एक दोयम दर्जे की जिंदगी जी रही थी, जिससे निकलने को छटपटा भी रही थी और सीमोन के इस कथन को आत्मसात कर लिया-फ्रीडम स्टार्टस फ्राॅम पर्स ,  मुक्ति की पहली शर्त है कि स्त्री आर्थिक रुप से स्वावलंबी हो। यदि इस एक शर्त को कोई औरत पूरा कर ले तो वह अपनी जिंदगी की आधी से अधिक लड़ाई जीत लेगी।’’4 प्रभा खेतान मानती हैं कि विवाह, पति, बच्चे आदि से परे भी औरत का अस्तित्व है औरत की जिन्दगी सिर्फ पुरुष की तलाश नहीं उसकी अपनी सार्थकता भी है। इसीलिए पितृसत्तात्मक समाज द्वारा स्त्रियों की तय नियति को वे स्वीकार नहीं करती। क्योंकि इस समाज ने सारे अधिकार पुरुषों को दिए हैं वे कहती भी हैं ‘‘पितृसतात्मक परंपरा ने निश्चित कर रखा है कि अधिक से अधिक शिक्षा पुरुष को मिलनी चाहिए, क्योंकि उसे कमाना है। उसे पौष्टिक भोजन मिलना चाहिए क्यांेकि उसके श्रम की कीमत है। पुरुष को इसलिए राजनीतिक चुनाव का अधिकार दिया गया है क्योंकि भेद-भाव करने और दूसरों का शोषण करने के मामले में वह ज्यादा ताकतवर साबित होता है साथ ही वह से भिन्न को नियंत्रित करने की क्षमता भी रखता है। यहाँ तक कि विरोध और विद्रोह की उपेक्षा भी पुरुष से अधिक की जाती है।’’5  अतः हम कह सकते हैं कि पहचान का आत्मसंघर्ष हर नारीवादी लेखिका में दिखता है लेकिन स्त्री नियति तथा पितृसत्ता के दुष्प्रभाव  पर इतनी बारीकी दृष्टि प्रभा खेतान के पास ही है,  इनकी आत्मकथा हो या वैचारिक पुस्तकें, अपने-अपने स्तर स्त्री नियति तथा आत्मसंघर्ष का नया पाठ पढ़ाते हैं।

निस्संदेह  ‘अन्या से अनन्या’ डा0 सर्राफ के जिंदगी में अनन्या न बन पाई प्रभा जी की पीड़ा को व्यक्त करता है साथ ही इस विवाहेतर संबंध को स्वीकार करने का साहस तथा पितृसत्तात्मक समाज की चुनौतियों को स्वीकारते हुए अपनी पहचान दर्ज करने वाली महिला का अदम्य तथा असाधारण रुप भी व्यक्त करता है। प्रभा जी कहती हैं ‘‘हम औरतें प्रेम के जितनी गंभीरता से लेती हैं उतनी ही गंभीरता से यदि अपना काम लेती तो अच्छा रहता जितने आंसू डाक्टर साहब के लिए गिरते हैं उससे बहुत कम पसीनों भी यदि बहा सकूं तो पूरी दुनिया जीत लूंगी।’’6 अतः प्रभा खेतान यह जानती थी कि प्रेम उनके जीवन का अहम हिस्सा है डा0 सर्राफ से अलग जीवन की कल्पना भी वे नहीं कर सकती,  लेकिन सम्मान प्राप्त करने के लिए अपने पैरों पर खड़ा होना जरुरी है तथा एक सफल उद्योगपति बनने में अपनी सारी उर्जा झोंक देती हैं वे कहती हैं ‘‘कुछ लोगों की नजर में यह एक छोटी विजय है, मेरी दृष्टि में यह आजादी की लड़ाई से कम नहीं। नियति उद्योग कितनी शहादत और कितनी कुर्बानियाँ माँगता है इसे हर निर्यातक जानता है। चार डाॅलर बचाने के लिए भूखे पेट बक्सा उठाए न जाने कहाँ-कहाँ फिरती रहती हूँ।’’7  उद्योग जगत में अपनी पहचान बनाने के लिए लेखिका को बहुत संघर्ष का सामना करना पड़ा। पितृसत्तात्मक समाज एक औरत को आगे बढ़ते नहीं देखना चाहता लेकिन प्रभा खेतान की जिद्द ऐसी थी जिसके कारण वे न सिर्फ मारवाड़ी पुरुषों की दुनिया में घुसपैठ करती हैं बल्कि अपनी अस्मिता की नींव भी रखती हैं वे कहती हैं ‘‘औरतपने का हीनभाव पुरुषों की दुनिया में बार-बार अपना औचित्य स्थापित करना चाहता रहा है। क्या मैं औरत हूँ इसलिए यह काम नहीं करुँगी? करके दिखा दूंगी। दिखाया भी पर देखा भी कम नहीं।’’8 अतः औरतपने की हीन भावना से निकलना तथा अपने को स्थापित करने का जज्बा ही प्रभा खेतान को प्रसिद्धि और सफलता प्रदान करता है। सात्र्र तथा सीमोन के जीवन से प्रभावित प्रभा खेतान पूरी भारतीय समाज का प्रतिनिधित्व करती हुई तथा पितृसत्तात्मक चुनौतियों को स्वीकारते हुए अपने जीवन को नई दृष्टि प्रदान करती हैं।

अर्थ जीवन की बुनियादी जरुरत है जिसकी ओर महादेवी वर्मा ने भी इशारा किया है ‘‘अर्थ सामाजिक प्राणी के जीवन में कितना महत्व रखता है, यह कहने की आवश्यकता नहीं। इसकी उच्श्रृंखला बहुलता में कितने दोष हैं वे अस्वीकार नहीं किए जा सकते, परंतु इसके नितांत अभाव में जो अभिशाप है वे भी उपेक्षणीय नहीं। विवश आर्थिक पराधीनता अज्ञात रुप से व्यक्ति के मानसिक तथा अन्य विकास पर ऐसा प्रभाव डालती रहती है, जो सूक्ष्म होने पर भी व्यापक तथा परिणामतः आत्मविश्वास के लिए विष के समान है। दीर्घकाल का दासत्व जैसे जीवन की स्फूर्तिमती स्वच्छन्दता नष्ट करके उसे बोझिल बना देता है, निरंतर आर्थिक परवशता भी जीवन में उसी प्रकार प्रेरणा शून्यता उत्पन्न कर देती है। किसी भी सामाजिक प्राणी के लिए ऐसी स्थिति अभिशाप है,  जिसमें वह स्वावलंबन का भाव भूलने लगे,  क्योंकि इसके अभाव में वह अपने सामाजिक व्यक्तित्व की रक्षा नहीं कर सकता।’’9 मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा के दोनों खंड महादेवी वर्मा की इन बातों को पूरी तरह चरितार्थ करते हैं। ‘कस्तूरी कुंडल बसै’ में कस्तूरी स्त्रियों पर थोपी नियति को अस्वीकार कर अपनी नियति खुद गढ़ती है।

‘‘माँ का मानना है कि संसार में औरत के मुकाबले कोई सख्तजान नहीं। बेटों को रोग-धोग व्यापे, इसे कभी छींक तक न आई। अरे... गाय मरे अभागे की, बेटी मरे सुभागे की। मगर बेटी मरे तो सही।’’10 अतः कस्तूरी एक ऐसे समाज में जन्मी थी जहाँ बेटी को अभिशाप माना जाता है लेकिन कस्तूरी इस समाज की मान्यता को तोड़ना चाहती है कलम, खडि़या, तख्ती और पोथी की फिराक में वह दिन-भर घूमा करती है, जिसके कारण माँ और भाई के कोप का भाजन उसे बनना पड़ता है। इस तरह के समाज में लड़कियों का पढ़ना-लिखना मान्य नहीं है इसलिए मैत्रेयी कहती हैं ‘‘पढाई के कलम-खडि़या जैसे साधन प्राप्त करना कस्तूरी जैसी लड़की के न भाग्य में है, न बस में।’’11 अतः हम कह सकते हैं कि कस्तूरी जिस ग्राम-समाज में है वहां बिकने वाली चीजों में गाय, बैल, भैंस, अनाज और लड़कियाँ हैं। लगान के रुपये जूटाने के लिए भाई बहन को बेचता है। रुग्ण बेटे को ब्याहने के बदले में माँ अपनी बेटी को बूढ़े से ब्याहने का सौदा करती है। आठ सौ चाँदी के सिक्कों में बिककर पति के घरवालों द्वारा ‘खरीदी हुई घोड़ी’ का दर्जा दिए जाने के बाद स्वयं कस्तूरी को असमय वैधव्य की यातना से गुजरना पड़ता है। विवाह संस्था के इस दंश को झेलती कस्तूरी पारंपरिक विधवा की भूमिका का परित्याग कर नौकरीपेशा स्वावलंबी स्त्री की भूमिका में उपस्थित होती हैं। वह गांव की विधवा की परंपरागत छवि को तोड़कर अपनी नई पहचान बनाने का निश्चय करती है। परदे को त्यागकर वह अपने ससुर को आश्वस्त करते हुए कहती है ‘‘मेरा भरोसा करो दादाजी। मैं अपनी बेटी को पढ़ा-लिखाकर बड़ा करुँगी कि मेरे तुम्हारे बाद वह अपने दुश्मनों का मुकाबला करें।’’12 अतः गांव का विरोध कर वह मैत्रेयी को शिक्षा प्रदान कराने के लिए तत्पर हो जाती है और खुद भी अपने अस्तित्व के राह पर निकल पड़ती है इसलिए उसे समाज के ताने सुनने पड़ते हैं ‘‘यह रांड क्या सांड हो गई। न छोरी पर ममता, न बूढ़े ससुर का रहम। ‘पढ़ाई-लिखाई’ का भजन करती हुई दोनों को रौंद रही है। अरे तू डाॅव-डाॅव डोलेगी तो बच्चा की ऐसी ही गत बनेगी। बनी है महात्मा गाँधी की चेली।’’13 अतः गांव की वे स्त्रियाँ, जो अपने जीवन में कुछ नहीं कर पाई वे ही कस्तूरी पर इस तरह का व्यंग्य करती है। कस्तूरी पारंपरिक विधवा विवाह की भूमिका का परित्याग कर नौकरी पेशा स्वावलंबी स्त्री के रुप में उपस्थिति होती है। वह अपनी बेटी मैत्रेयी को भी इसी भूमिका में ढालना चाहती है। पुरुष वर्चस्व का विरोध कर वह अपनी नियति खुद गढ़ना चाहती है, अपने स्तर पर इस तरह के विद्रोह की शुरुआत भी करती है। अपने अस्तित्व तथा होने वाली बच्ची के भविश्य के लिए वह पितृसत्तात्मक समाज के खिलाफ खड़ी होती है तथा यह संकल्प लेती है ‘‘अब मेरी बेटी का मामला है मेरी कोख में जन्म लेने वाली मैत्रेयी का। मैं इसको उस खड्ड में नहीं गिरने दूंगी, जिसमें गिरकर औरत जीवन-भर निकलने को छटपटाती रहती है और एक दिन खत्म हो जाती है।’’14 अपनी कोख पर हाथ रखकर लिया गया यह निर्णय कस्तूरी को गहरी सोंच, उसके साहस और अस्तित्व का ही सूचक है। कस्तूरी अपनी अस्मिता के लिए पूरे पितृसत्तात्मक समाज का सामना करने को तैयार है। वह सिर्फ अपने विषय में नहीं सोचती बल्कि एक समाज सेविका बनकर पूरे गांव की औरतों का कल्याण करना चाहती है तथा पारंपरिक, रुढ़ और जर्जर सोंच से गांव की औरतों को मुक्त करना चाहती है।

‘गुडि़या भीतर गुडि़या’ मैत्रेयी की आत्मकथा का दूसरा खंड है,  जिसका रहस्य इस बात में है कि ऊपर से आम जिन्दगी जीने वाली औरत के मन में क्या बात थी जिसने उसे हिंदी जगत की सर्वोपरि लेखिका सिद्ध कर दिया। मैत्रेयी विवाह करना चाहती थी , आम औरत की तरह उसके मन ने भी चूड़ी, सिन्दूर, बिन्दी से सजे गृहणी के सपने देखे ये। पति को ही अपना सुहाग भाग मानने वाली मैत्रेयी एक वक्त के बाद अपनी अस्मिता के लिए इतनी सजग हो जाती है कि पति से तलाक लेना चाहती है . वह कहती है ‘‘मैं इस आदमी से अलग ही है? जाऊँ...। विवाह का गठबंधन चाहत का गला घोंट रहा है, छुड़ाने वाला यहाँ कोई नहीं,... मैं इस आदमी को छोड़ ही दूँ... मेरे भीतर हूक उठी।’’15 अतः कहने का तात्पर्य यह है कि पहले तो मैत्रेयी माँ के सपनों को रौंदती हुई वैवाहिक जीवन चुनकर खुद उनसे अलग हुई थी। उनकी तो बस यही आकांक्षा थी कि पुरुष साथी मिलने से मेरे रात दिन सुरक्षित हो जाएँगे। आखिर ऐसी क्या बात थी कि विवाह को ही अपनी मुक्ति मानने वाली मैत्रेयी इस संबंध से अलग हो जाना चाहती थी। वह उसका स्वाभिमान, स्त्री का स्वाभिमान जो हर पल पुरुष सत्ता के अधीन समर्पित होने से इनकार कर रहा था। पति द्वारा मैत्रेयी पर थोपी गई आधुनिकता के खिलाफ उनका स्त्री मन विद्रोह करता है.  डा0 सिद्धार्थ उन्हें दीक्षंत समारोह में नहीं ले जाते घर पर आए यू.पी.एस. के चेयरमैन से पत्नी को अभिवादन करने का भी अवसर नहीं दिया गया, रसोई में सिकुड़े रहने को कहा गया। हिंदी में एम.ए. उपाधि प्राप्त कर मैत्रेयी ने पी.एच.डी. करने की सोची। इस चक्कर में उन्होंने बहुत कुछ सहा तथा अपनी रचनात्मक विकसित करने में अपने को झोंक दिया। घर गृहस्थी के बंधे दायरे को तोड़कर अपनी रचनात्मकता (साहित्य लंखन) को विकसित करती हैं। मैत्रेयी ने साहस पूर्वक पुरुषद्वारा निर्धारित नियमों का उल्ंलघन किया तभी साहित्य जगत में अपनी पहचान दर्ज कर पाईं। वे लिखती भी हैं ‘‘यदि मैंने अपने भीतर सुकुमारता को तोड़ न दिया होता तो सचमुच मैं आज मन-मोहिनी गुडि़या का अनुपम रुप होती... लेकिन मैं सोचकर आश्वस्त होती हूँ कि गुडि़या की छवि तोड़ डालने से ज्यादा मुझे कहीं मुक्ति नहीं।’’16 अतः यह स्पष्ट है कि अपने अंदर बैठी पारंपरिक स्त्री की छवि को तोड़कर ही मैत्रेयी अपनी पहचान हासिल करती हैं।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि हिंदी की स्त्री आत्मकथाएँ सिर्फ व्यथा कथाएँ नहीं हैं बल्कि तमाम तरह की पितृसत्तात्मक चुनौतियों को स्वीकार करते हुए स्त्री के बनने की कथाएँ हैं। इस बनने के क्रम में बहुत कुछ जर्जर मान्यताएँ टूटती हैं लेकिन जो बनती है उसे या उसके अस्तित्व को पूरी दुनिया स्वीकार करती है। प्रभा खेतान तथा मैत्रेयी का जीवन कुछ इसी तरह की स्त्री अस्मिता की कथा है।

संदर्भ सूची
1. खेतान प्रभा: अन्या से अनन्या, पहला संस्करण-2007ए राजकमल प्रकाशन प्रा0 लि0, नई दिल्ली-110002ए प्र0 सं0 210
2.  वही ... पृ0 सं0-175
3.  वही ... पृ0 सं0-98
4.  खेतान प्रभा - साधना अग्रवाल द्वारा प्रभा खेतान का लिया गया साक्शात्कार, वागर्य, सित्मबर - 2003 भारतीय भाशा परिशद, कोलकाता-700017ए पृ0 सं0-37
5.  खेतान प्रभा - उपनिवेश में स्त्री, पहला संस्करण-2003ए तीसरी आवृत्ति-2010ए राजकमल प्रकाशन प्रा0 लि0 नई दिल्ली-110002ए पृ0 सं0-14.15
6.  खेतान प्रभा - अन्या से अनन्या, पहला संस्करण-2007ए राजकमल प्रकाशन प्रा0 लि0, नई दिल्ली-110002ए प्र0 सं0 15
7.  वही ... पृ0 सं0-226
8.  वही ... पृ0 सं0-226
9.  वर्मा महादेवी - श्रृंखला की कडि़याँ, चतुर्थ लोकभारती संस्करण-2004ए लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद-1 पृ0 सं0-102.103
10. पुष्पा मैत्रेयी - कस्तूरी कुंडल बसै, पहला संस्करण-2009ए राजकमल प्रकाशन प्रा0 लि0 नई दिल्ली-110002,  पृ0 सं0-13
11.  वही ... पृ0 सं0-12
12.  वही ... पृ0 सं0-29
13.    वही ... पृ0 सं0-42
14.  वही ... पृ0 सं0-62
15.  पुष्पा मैत्रेयी - गुडि़या भीतर गुडि़या, पहला संस्करण-2009ए राजकमल प्रकाशन प्रा0 लि0 नई दिल्ली-110002,  पृ0 सं0-293.294
16.  वही ... पृ0 सं0-246

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