स्त्री देह का मर्दवादी विमर्श

पूनम सिंह
कथाकार , कवि और आलोचक पूनम सिंह की कहानी , कविता और आलोचाना की कई किताबें प्रकाशित हैं . सम्पर्क : मो॰ 9431281949
समकालीन कविता की प्रगतिशील धारा को कुछ लोग धूमिल की धारदार विद्रोही कविता और 1967 के नक्सलबाड़ी आंदोलन से जोड़ कर देखते हैं लेकिन गंभीर पड़ताल करने के बाद प्रगतिशील धारा और विद्रोही कविता के बीच एक विभाजक रेखा साफ दिखाई देती है । प्रगतिशील धारा यथार्थोन्मुख और संवेदनशील होती है । इसमें जनता और उसका नेतृत्व प्रमुख होता है । इसमें जीवन के विराट चित्र , मानव के परस्पर संलग्न दुःख और स्वप्न तथा आधुनिक भावबोध की वैचारिक चेतना होती है । दूसरी ओर विद्रोही कविता और अकविता अमानवीय तंत्र के विरूद्ध भीषण दबाब से फूटा एक विस्फोट है जिसमें लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति एक नकार का भाव है । विद्रोही कविता और अकविता दोनों साठोत्तरी मानसिकता की उपज हैं ।

हिन्दी साहित्य के साठोत्तरी दौर में भारतीय समाज में पूंजीवादी सामंतवाद की  स्थापना के साथ शोषक और शोषित के बीच एक बड़ी खाई बन गई थी । जनवादी लोकतंत्र की स्थापना का स्वप्न खंडित हो चुका था । भारतीय व्यवस्था इजारेदारों के हाथ के रिमोट से संचालित हो रही थी । स्वतंत्र देश के जनगण की त्रासदी का वह एक नया दौर था । शोषण व्यवस्था के द्वारा उत्पन्न किए गये विविध संकट और त्रासदी से इस दशक के रचनाकारों का मानस उद्वेलित हो रहा था । प्रगतिशील आंदोलन विघटित हो चुका था और उससे जुड़े अधिकतर लेखक आधुनिकतावादी साहित्य के गहरे दबाब में आ चुके थे । विचारधारात्मक नेतृत्व के बिखर जाने के कारण साहित्य में एक अराजकता की स्थिति पनपने लगी थी । दिशाहीन होकर कविता साम्राज्यवादी संस्कृति की ओर उन्मुख हो गई । इसी समय पाश्चात्य काव्य शैली ‘बीटनिक’ से प्रभावित रचनाकार यौनमुक्ति और देह की राजनीति में अपनी सर्जना को होम करने लगे । यह नई कविता से अकविता तक का एक अराजक और द्वन्द्वात्मक रचनात्मकता का दौर था जो समय के विकर्षण से उत्पन्न हुआ था । कई युवा रचनाकार विक्षोभ और आक्रोश के कारण विकल्पहीन विद्रोह और सर्वनिषेधवाद की ओर उन्मुख हो  गये थे ।धूमिल नई कविता और अकविता के बीच से निकले स्वतंत्रचेता रचनाकार थे ,जिनके भीतर वाम और जनवादी तत्व थे किन्तु मानसिकता में निषेधवाद का स्वर ही प्रबल था । उनका निषेधवाद जितना व्यवस्था के विरूद्ध था उतना ही स्त्री के विरूद्ध भी ।



एक क्रांतिचेता मानस का स्त्री विरोधी होना उसकी संपूर्ण सर्जना को कहीं बहुत कमजोर और झूठा साबित करता है । दूसरी तरफ हमारे आस्वादन प्रक्रिया को भी प्रभावित करता है ।‘संसद से सड़क तक’ जैसी रचना के क्रांतिकारी निहितार्थों के बीच धूमिल की स्त्री दृष्टि का पाठ एक भिन्न प्रकार की अवधारणा को जन्म देता है , ठीक मध्यकाल के विद्रोही कवि कबीर की स्त्री दृष्टि की तरह । कबीर मध्यकाल की प्रगतिशील  चेतना के सबसे महत्त्वपूर्ण कवि है । उनका स्त्री विरोध उनकी काव्य प्रकृति से सर्वथा भिन्न है । कबीर के पदों में सामाजिक सांस्कृतिक और वैचारिक संघर्ष के प्रखर स्वर हैं परन्तु स्त्री के विरूद्ध हर जगह नकार का भाव है । उन्होंने नारी को विष का खान और नरक का कुण्ड कहा है । नारी के सानिध्य में बुद्धि विवेक भ्रष्ट हो जाती है । किसी कार्य की सिद्धि नहीं होती । रूढि़गत मान्यताओं की धज्जियाँ उड़ाने वाला कबीर स्त्री को लेकर इतना रूढि़ग्रस्त और संकीर्णतावादी कैसे है - यह प्रश्न जिस तरह मन को झकझोरता है उसी तरह धूमिल के विद्रोही स्वर की सीमा उनकी स्त्री दृष्टि की संकीर्णता से परिभाषित होती है ।

वैसे तो हर युग के समय और समाज में दलितों और स्त्रियों के प्रति घोर उपेक्षा का भाव रहा है परन्तु ं  मध्यकाल के कवियों ने दलितों के पक्ष में अपनी भूमिका तय की है यद्धपिे स्त्री को लेकर उनकी सोच में कोई बदलाव नहीं दिखलाई देता । भक्तिकाल में स्त्री का विरह पुरूषों की काव्य चेतना का वण्र्य विषय बना लेकिन उसकी सामाजिक स्थिति और नियति पर किसी कवि की दृष्टि नहीं गई । भक्तिकाल में कबीर , तुलसी सब ने स्त्री की उपेक्षा की है । श्रृंगार काल में वह केवल दैहिक काया बन कर रह गई । उस काल के नख शिख  वर्णन में स्त्री के अंग प्रत्यंग विवेचित हुए । हिन्दी साहित्य के आधुनिक काल में नवयुग की चेतना के प्रसार के साथ स्त्री स्वातंत्र एवं समानता की भावना का विकास हुआ । अयोध्या सिंह उपाध्याय के काव्य में पहली बार स्त्री देश प्रेमिका , जाति प्रेमिका , लोक सेविका के नवीन रूपों की उद्भावना के साथ चित्रित हुई । प्रिय प्रवास की नायिका राधा लोकहित के लिए प्रिय के सापीप्य का त्याग करती है - ‘‘प्यारे जीवें जगहित करें / गेह चाहे न आवें ’’। मैथिलीशरण गुप्त की उर्मिला , यशोधरा , द्वापर की  विधुता आदि ऐसी ही नारी हैं जो नवयुग की चेतना का प्रतिनिधित्व करती हैं । छायावाद में स्त्री प्रेम और सौंदर्य की प्रतिमान बनी तो प्रगतिवाद में ‘तोड़ती पत्थर’ के रूप में श्रमसौंदर्य का एक नया दृष्टांत । लेकिन ‘जीभ और जाँघ’ के बीच स्त्री अकविता के दौर में ही दिखाई देती है ।

धूमिल सातवें दशक की प्रतिरोधी चेतना के एक महत्वपूर्ण कवि हैं जहाँ से जनवादी कविता की एक नई परम्परा की शुरूआत होती है । सन 1967 से 74 के बीच की जो युवा आक्रोश वाली कविता है जिसे लोग नक्सल प्रभावित कविता कहते हैं उसके केन्द्र में धूमिल हैं । धूमिल का कवि एक दुर्घर्ष व्यक्तित्व लेकर अराजक समय पर वार करता है । लेकिन यह कैसी विडम्बना है कि उसके  भीतर का विक्षोभ , असंतोष , तनाव और विद्रोह स्त्री के गर्भाधान की क्रिया से गुजर कर कविता के पाठ तक पहुँचता है - ‘‘एक संपूर्ण स्त्री होने के पहले ही / गर्भाधान की क्रिया से गुजरते हुए / उसने जाना कि प्यार / घनी आबादी वाली बस्तियों में मकान की तलाश है / उसने जाना कि हर लड़की / तीसरे गर्भपात के बाद / धर्मशाला हो जाती है और कविता / हर तीसरे पाठ के बाद ---’’
अपने समय की बर्बरता और लंपटता को धूमिल स्त्री के रूपक द्वारा जिस तरह कविता में विवेचित करते हैं , वह एक जटिल मनःस्थिति है परन्तु स्त्री अस्मिता के संदर्भ में अनुभूति और संवेदना की एक कुत्सित दृष्टि  । धूमिल की कविता में स्त्री अनेक अशुभ और वीभत्स रूपों में बिम्ब और प्रतीकों में ढ़लकर आकार पाती है ।
धूमिल के कवि ने अपने कथ्य को विस्फोटक ढ़ंग से प्रस्तुत करने के लिए अभिव्यक्ति की निजता में स्त्री देह को शर्मसार किया है ।

कवि को पता है कि सत्ता की गुलामी पालतू बन कर ही की जा सकती हैं इसलिए वह खानाबदोश औरत की जाँघों में घुस कर खुद को पालतू होने से बचा लेता है । धूमिल की कविता ‘मकान’ की पंक्तियाँ हैं - ‘‘यह सन 1960 की बात है /जब मैं अपनी कविताओं की हद फाँद रहा था / अचानक मुझे इस बात का पता चल गया / और मैंने उस खानाबदोश औरत की जाँघों में घुस कर / खुद को पालतू हाने से बचा लिया ।’’ इस कविता में एक तीर से दो निशाने किये गये हैं - एक निशाना बर्चस्वशाली पुरूष सत्ता की ओर है तो दूसरा स्त्री की ओर । कवि यहाँ मकान के प्रतीक के रूप में दो भिन्न स्त्रियों की छवि को सचेतता से चिन्हित करता है । ‘‘मकानों की आड़ में छिपे होते हैं मकान’’ यहाँ एक मकान धंधा करने वाली एक स्त्री का प्रतीक है जो पुरूष की स्वतंत्रता को आबाद रखता है जिसकी जाँघों के बीच घुस कर पुरूष पालतू होने से बच जाता है । दूसरा मकान घर के भीतर रहने वाली घरेलू  स्त्री का प्रतीक है जो पुरूष को पहले पालतू बनाता है फिर उसके भीतर के सारे नमक को चाट कर उसके दिमाग की सबसे समझदार नस को मुर्दा बना डालता है । यहाँ यौनमुक्ति की तरफदारी करता हुआ कवि स्त्री को मुक्ति का द्वार भी कहता है और गर्दन में पट्टा डालकर पालतू बनाने वाली अराजक सत्ता के प्रतिरूप में भी देखता है ।
साहित्य में स्त्री देह को सदैव कल्पना सुख और विलास के लिए अनूठे उपमानों प्रतीकों से सजाया गया है लेकिन पुरूष की क्रांतिकारी अभिव्यक्ति में अगर यह प्रवृति स्थायी भाव ग्रहण कर ले तो बड़ा कवि भी अपनी रचना के प्रति नाकारात्मक अहसास कराता है । इन उद्धरणों में धूमिल की स्त्री दृष्टि यौन कुण्ठा से आक्रांत दीखती है ।
फ्रायड प्रतीक में काम वासना (लिबिडो) की उपस्थिति अनिवार्य मानते हैं । उनके अनुसार प्रतीक यौन कुण्ठाओं में उत्थित होते हैं । ये मन के गुपित रहस्यों का वहन करते हैं और कला साहित्य में अपने उत्सर्जन का मार्ग प्रशस्त करते हैं ।  स्त्री के प्रति धूमिल का यह नजरिया फ्रायड के काम सिद्धान्त का पोषक है  जो  धूमिल के क्रांतिचेता मानस पर प्रश्न चिन्ह लगाता है । धूमिल की स्त्री दृष्टि की पड़ताल करने के लिए उस दौर के साहित्यिक सांस्कृतिक परिदृश्य को समझना जरूरी है । अकविता के उस दौर में रचनाकारों के मानस में पश्चिम की भोगवादी संस्कृति और भारतीय वर्जनाओं से पैदा हुई यौन कुण्ठाओं का ऐसा द्वन्द्व था जो उन्हें अनियंत्रित वैयक्तिकता की ओर ले जा रहा था । उस समय अमेरिकी ‘बीटनिक काव्य शैली’ का प्रभाव अकविता के विद्रोही कवियों पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पड़ा । इस प्रभाव को फैशनपरस्त स्वीकार के रूप में शमशेर बहादुर सिंह ,राजकमल चैधरी जगदीश चतुर्वेदी , श्याम परमार से लेकर क्रांतिचेता कवि धूमिल तक सभी ने ग्रहण किया था ।  प्रभाकर  माचवे के शब्दों में बीट कविता - ‘‘अति लक्ष्मी , अति विज्ञान , अति विलास , अति यौन स्वातंत्रय से एक तरह की उब और क्लांति है ---।’’ (बीटनिक हिन्दी के संदर्भ में - अभिव्यक्ति 1 पृ॰ 136)

उस समय नई कविता से अकविता के दौर में पुरूष रचनाकारों की दृष्टि आधुनिकतावादी साहित्य के प्रभाव में मैनेरिज्म को तोड़ने के क्रम में अति यथार्थवादी हो गई थी । गैर रोमांटिक होने के लिए कवियों ने स्त्री देह के लिए विद्रूप और अश्लील प्रतीकों का एक ऐसा अतिवाद गढ़ा जो कहीं से भी स्वस्थ मानस की रचना यातना का उद्धरण नहीं कहा जा सकता । उस समय धूमिल का कवि दो विरोधी तत्वों ‘क्रांति’ और ‘स्त्री’ को अपने भीतर घुलाकर एक नया रसायन तैयार करता है और यथास्थिति के विरूद्ध तीब्र और आक्रामक विद्रोह दर्ज करता है । आधुनिक काल के सातवें दशक में धूमिल की चेतना में स्त्री समय के विचलन और क्षरण के बीच काम और क्रांति की धधकती ज्वाला बनकर उतरती है । काम और क्रांति की अग्नि से निर्मित स्त्री को जब वह अपनी बगल में लेकर सोता है तो व्यवस्था के नंगापन के खिलाफ आग उगलता हुआ वह सब कुछ कह सकता है जो लिबास पहन कर नहीं कह सकता - ‘‘मैंने पहली बार महसूस किया / कि नंगापन / अंधा होने के खिलाफ एक सख्त कारवाई है ----उस औरत की बगल में लेटकर / मुझे लगा कि नफरत / और मोमबत्तियाँ जहाँ बेकार / साबित हो चुकी हैं और / पिघले हुए शब्दों की परछाईं / किसी खौफनाक जानवर के चेहरे में  बदल गई हैं / मेरी कविताएँ / अंधेरा और कीचड़ और गोश्त की खुराक पर जिंदा हैं ’’यूं तो ‘उस औरत की बगल में लेट कर’ कविता अपने निहितार्थ में सत्ता और व्यवस्था से असहमति और अस्वीकार का एक बड़ा साहस है पर जब कवि कहता है कि उसकी कविताएँ सीलन भरी कोठरी के अंधकार और कीचड़ में स्त्री देह की खुराक पर जिंदा है तो प्रश्न लाजिमी है कि क्या उसके भीतर रचनात्मक आग पैदा करने वाली स्त्री उसके लिए महज गोश्त का एक टुकड़ा भर है ?

इसी तरह ‘‘तीसरे गर्भपात के बाद धर्मशाला होती लड़की और तीसरे पाठ के बाद निरर्थक होती कविता’’ को अपनी अनुभूति में एक साथ जीता हुआ कवि जब अपने बगल से गुजरते हुए आदमी से कहता है कि - ‘‘लो ,यह रहा तुम्हारा चेहरा / यह जुलूस के पीछे गिर पड़ा था --- ’’ तो एक बार गौर से उसकी ओर देखना पड़ता है कि यह कोई क्रांतिकारी है या लड़की को धर्मशाला बनाने वाला व्यभिचारी ? क्या धूमिल की ऐसी कविताएँ स्त्री देह का भोगवादी अनुष्ठान नहीं है ? ‘एकांत कथा’ का कवि विक्षिप्त अर्द्धचेतना में आत्मालाप करता हुआ ईमानदारी से स्वीकार करता है कि - ‘‘बलात्कार के बाद की आत्मीयता / मुझे शोक से भर गई है / मेरी शालीनता मेरी जरूरत है / जो अक्सर मुझे नंगा कर गई है ’’ आगे वह कहता है ---‘‘भट्ठियाँ सब जगह हैं / सभी जगह लोग सेकते हैं शील ’’ पुरूष के भोगवादी चरित्र की यह आत्मपरक अनुभूति एक ओर समय की कुरूपता और विद्रुपता को दर्शाती है दूसरी ओर स्त्री देह को सरेआम उघाड़ती है । स्त्री देह में भोक्ता की तरह प्रवीष्ट होकर समय के विघटन को द्रष्टा की तरह देखना धूमिल की रचना प्रक्रिया का एक अजीबोगरीब मिजाज है । ‘अकालदर्शन’ में कवि सत्ता के प्रजातांत्रिक नुस्खों को आत्मचेतस होकर देखने और दिखाने का काम करता है । आजादी और गाँधी के नाम पर जनता के हित में चल रहे अभियानों को देखने के क्रम में उसके सामने फिर वह स्त्री व्यवस्था की तीसरी आँख बन कर आ ही जाती है -
‘--- वह कौन सा प्रजातांत्रिक नुस्खा है / कि जिस उम्र में / मेरी माँ का चेहरा / झुर्रियों की झोली बन गया / उसी उम्र की मेरे पड़ोस की महिला /  के चेहरे पर / मेरी प्रेमिका के चेहरे सा लोच है ’’ शासक और शोषित के दो चेहरे इस तरह भी देखे और दिखाये जा सकते हैं - यह धूमिल की स्त्री दृष्टि ने संभव किया है ।

धूमिल की कविताओं में स्त्री को देखना स्त्री देह का मर्सिया पाठ करना है । राजकमल चैधरी की मृत्यु पर लिखी धूमिल की कविता में यह मर्सिया पाठ अपने चरम पर है - ‘‘कहीं कुछ भी नहीं है सिर्फ / उसका मरना है , इस भ्रम के साथ साथ / जिसे मैंने अपनी कविता का गवाह कर लिया है ’’ और गवाह के रूप में कवि जिन औरतों को सामने लाता है वे -‘‘औरतें योनि की सफलता के बाद / गंगा का गीत गा रही हैं ---’’ राजकमल चैधरी स्त्री देह की कब्र में शब्द साधना करने वाले अपने समय के सबसे बड़े साधक थे । यह कविता राजकमल की स्त्री दृष्टि की जटिल प्रक्रिया की पड़ताल है जिसमें धूमिल का कवि एक रचनाकार को समग्रता में समझने और उसकी रचनात्मकता के हर परत में मौजूद समय और रचना के अंतर्सबंद्ध को देखने की कोशिश करता है परन्तु यह देखना स्त्री की ‘योनि’ से शुरू होकर राजकमल की हर उस ‘आदत’ तक जाती है जो ‘दुनिया के व्याकरण के खिलाफ थी’ ।

अपने मित्र राजकमल को कवि इस रूप में चित्रित करता है - ‘‘अपनी वासनाओं के अंधेरे में / वह खोया हुआ देश था ’’ कविता की संरचना के स्तर पर इसे अप्रतिम प्रयोग कहा जा सकता है परन्तु लिंग
आधारित कवि की दृष्टि यहाँ पुरूष सत्ता के अनुकूलन द्वारा ही निर्मित है । धूमिल का कवि एक ओर तो अपने समय के जटिल और भीषण प्रश्नों से टकराता है दूसरी ओर  ‘‘सहुवाईन की जाँध पर अपनी जुबान भूल आता है ’’। काम और क्रांति का यह कैसा घालमेल है ?

धूमिल की एक महत्वपूर्ण कविता है ‘पटकथा’ । जनतंत्र की पटकथा लिखने के क्रम में कवि जिस तरह व्यवस्था की चीर फाड़ करता है , वह यथास्थिति के विरूद्ध विद्रोह का पंचम स्वर है  परन्तु इस स्वर के नीचे स्त्री हर जगह कुंठित और अपमानित हुई है । यहाँ कवि ‘शब्द और स्वाद के बीच / अपनी भूख को जिन्दा रखने के लिए / स्त्री को कभी ‘जीभ और जाँघ’ के भूगोल से बाहर नहीं निकाल पाता ।

धूमिल का कवि देश के लोकतंत्र का चेहरा तलाश करने के क्रम में हिमालय से लेकर हिन्द महासागर तक भटकता है । इस तलाश में उसे हर जगह हताश और निराश जनता ‘कथा केलि’ की एक अमूत्र्त मुद्रा में दिखाई देती है । कवि इस वीभत्स और कुत्सित लोकतंत्र के विरोध में प्रतिरोध की आवाज को एकजुट करने के लिए हरेक को आवाज देता है , हरेक का दरवाजा खटखटाता है मगर सब व्यर्थ ---। तब धूमिल का कवि इस जड़ समय की निष्क्रियता और तटस्तता को स्त्री देह से परिभाषित करता हुआ कहता है - ‘‘मैंने जिसकी पूँछ उठायी है / उसको मादा पाया है ’’ । इस कथन में स्त्री अस्मिता को पूरी तरह नकार देने का भाव है ।  यह समग्र पितृसत्तात्मक व्यवस्था का एक अहंकारी चेहरा दर्शाता है । स्त्री को उसकी दैहिकता में कैद करके पुरूष सत्ता ने हमेशा उसको अपने द्वारा आरोपित भूमिकाओं में जीवन जीने को विवश किया है । केवल परिवार और समाज ही नहीं राज्य व्यवस्था भी अपने दृष्टिकोण में पुरूष प्रधान ही है इसलिए लोकतंत्र की पटकथा में स्त्री एक स्वतंत्र इकाई नहीं , महज मादा भर है ।  धूमिल का यह वाक्य वेद वेदांत से लेकर माक्र्स तक की पुरूष दृष्टि को उजागर करता है ।


स्त्री अस्मिता के संदर्भ में धूमिल का कवि कर्म हर जगह पुरूष सत्ता के रूप में खड़ा है । मादा काया पर खड़ी धूमिल की रचनात्मकता भाषा की सांस्कृतिक सीमाओं को तोड़कर कवि की अपरिहार्य इच्छा और दमित आकांक्षा का एक नया स्त्री पाठ गढ़ती है । कामशास्त्रीय और भाषाशास्त्रीय दोनों ही प्रकार के अध्ययनों के लिए यह एक जरूरी विमर्श है कि इस तरह की कविताओ का पाठ किस तरह किया जाय ?  कविता में स्त्री देह का उत्सव मनाते हुए क्रांति की बातें करना और भोग में आकंठ डूब कर योग की बातें करना - क्या ये दोनों परस्पर विरोधी प्रवृतियाँ एक साथ एक ही समय में  घटित हो सकती हैं ? स्त्री अस्मिता के परिप्रेक्ष्य में धूमिल का कवि कर्म हर जगह पुरूष सत्ता के रूप में खड़ा दीखता है । उनकी कविताओं में स्त्री पाठ स्त्री देह का मर्दवादी विमर्श है । धूमिल के रचनात्मक मानस की बिडम्बना को इस दृष्टि से समझने की जरूरत है ।

( फॉरवर्ड प्रेस और संजीव चंदन द्वारा संपादित पुस्तक ' चौखट पर स्त्री' से साभार ) 
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