वेद का काल निर्धारण , एक नए परिप्रेक्ष्य में : दूसरी क़िस्त

रति सक्सेना 
(वेदों के काल निर्धारण प्रसंग से रति सक्सेना का यह विद्वतापूर्ण लेख वेदकालीन भारत को समझने में मदद करता है - स्त्रीकाल में पढ़ें दो किस्तों में)



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ए घोष ने १९५२ में सरस्वती की घाटी मे हनुमानगढ़ और सूरत गढ़ के बीच २५ हड़प्पाई स्थानों का पता लगाया। हड़प्पा काल का ह्रास सरस्वती का सूखना भी एक महत्वपूर्ण कारण है। इस बात पर रामविलास शर्मा जी का तर्क विचारणीय है ऋ्गवेद में सरस्वती का वर्णन विशाल तीव्रगामी नदी के रूप में किया गया है। इससे यह सिद्ध होता है कि वैदिक आर्य ापने जनपदों में पहले ही बस गए होंगे, हड़प्पा सभ्यता का ह्रास बाद में सरस्वती के क्षेत्र परिवर्तन के कारण  हुआ होगा, न कि आर्यों के आक्रमण से़ । शर्मा जी का यह तर्क बहुत महत्वपूर्ण है क्यों कि ना केवल ऋ्गवेद में अपितु अथर्ववेद में भी सिन्धु की स्तुति जलयु्कत नदी में रूप में हुई है।

हड़्प्पा सभ्यता मूलतः सारस्वत सभ्यता है। हड़प्पा सभ्यता का ह्रास हुआ है, नाश नहीं। पृ १४५
जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है कि सूती कपड़ों और कपास का निर्यात होता था। जल की कमी से यह निर्यात बन्द हुआ होगा और अन्न की कमी हो गई होगी। क्रैमर मानते हैं कि अक्लदी दस्तावेजों का दिलमुन भारत है। असीरिया के राजा हम्मुरबी के पुत्र समसुइलुना के भवन के फर्श के नीचे सिन्धु लिपि में अभिलेख भी मिलता है। इसी तरह जलप्रलय की घटना के बारे में मैक्डोनल की राय महत्वपूर्ण है , १ अथर्ववेद की रचना बाइबिल से पहले हुई थी, दूसरा ऋग्वेद में जल प्रलय का उल्लेख नहीं है। अथर्ववेद में प्रलय के संकेत मात्र हैं, सही तौर से जल प्रलय की कथा शथपथ ब्राह्मण में मिलती है।

अतः यह हो सकता है कि जल प्रलय की कथा हड़प्पा से सुमेर की ओर गई हो, और वहाँ अलग रूप लेकर बाइबिल में उतरी हो। अतः शर्मा जी इस बात को मानते हैं कि ऋग्वेद की रचना का अन्तिम काल हड़प्पाई सभ्यता का आरम्भीक दौर हो सकता है। इन स्थापनाओं के अनुसार रामविलास जी ये निष्कर्ष निकालते हैं कि अधिकांश ऋग्वेद की रचना सारस्वत क्षेत्र में ३००० ईस्वी पूर्व हुई। इसके बाद सरस्वती प्रदेश के वासी पूरब की ओर गए। भरतों का विलय कुरुओं में हो गया। इन्द्र मरुत वरुण आदि सुमेर आदि से होते हुए यूरोप गए, ना कि यूरोप से भारत आए।

रामविलास जी हरप्पा और उस से पहले की सभ्यता के लिए एक सटीक शब्द का प्रयोग करते हैं-- सारस्वत सभ्यता, और उनके अनुसार इस सारस्वत सभ्यता में आर्यजनों को दो बार विस्थापित होना पड़ा था, एक बार ऋग्वेद और यजुर्वेद की रचना के बाद, जल प्रलय के कारण, और दूसरी बार अथर्ववेद की रचना से पहले।

जैसा कि मैं पहले ही कह चुकी हूँ कि वैदिक साहित्य को  एक सीधी रेखा में रचित मानना भी एक भूल हो सकती है। यानी कि यह मानना कि एक बाद एक वेद रचे जाते गए, और फिर ब्राह्मण ग्रन्थ रचे जाने लगे। वैदिक कर्मकाण्ड रीति को देखते हुए यह मानना असंभव है। यही नहीं , ऋग्वेद में भी चारों वेदों का उल्लेख है। सबसे महत्वपूर्ण बात, अंगिरसो, गणौ की उपस्थिति अथर्ववेद का सूत्र ऋग्वेद काल में ही बताती है। यही नहीं कि यज्ञ क्रिया का आरम्भ ऋचाओं की रचना के साथ नहीं तो उनके आसपास हो ही गया होगा। और ऋचाओं के गायन में सामवेद, याज्ञिक विधि में यजुर्वेद कि उपस्थित आवश्यक है। अतः ब्राह्मणिक कर्मकाण्डों को रीतिबद्ध ना किया हो तो भी संस्कारित करना आरम्भ हो गया होगा। अथवा ऋग्वेद में परवर्ती वेदों का उल्लेख कैसे होता।

लेकिन जैसे कि मैंने अथर्ववेद के व्रात्य देव का उल्लेख किया है, अथर्ववेद में हड़प्पाई संस्कृति की अमिट छाप देखी  गई है। इस वेद में राजतन्त्र , समाज तन्त्र के साथ समाजज की अच्छाइयाँ बुराइयाँ एक साथ दिखाई दे जाती हैं. यहाँ हमे एक और पृथ्वी सूक्त, सभा और समीति सूक्त दिखाई देते हैं तो जुआरियों, शराबियों ही नहीं वैश्याओं की उपस्थिति भि दिखाई देती है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अथर्ववेद में घर परिवार के साथ सामाजिक सामन्जस्य की बात ऋग्वेद से कहीं ज्यादा दिखाई देती है। निसन्देह एकता सदैव आपद की स्थिति या स्मृति से ज्यादा मजबूत होती है इसलिए यह तो माना जा सकता है कि सरस्वती के प्लावन नें समाज को प्रकृति और घर के साथ समाज और राज्य के बारे में सोचने को मजबूर किया है। अतः यह मानना असम्भव नहीं की अथर्ववेद के महत्वपूर्ण हिस्से मूल हड़प्पाई संस्कृति के रचना काल के हैं।

साथ में यह भी एक तर्क हो है सकता है कि ऋग्वेद आदि आरम्भ में मात्र ऋचाएँ या प्रार्थनाएँ थे, लेकिन उनका याज्ञक रूप काफी बाद में आया। लेकिन याज्ञिक रूप को आने में सदियों का वक्त नहीं लगा होगा, यह तो तय है। और यह भी तय है कि आरण्यक और उपनिषद याज्ञिक कर्मकाण्ड की अति का परिणाम भी माना जा सकता है। समाज में इस तरह का अन्तर्विरोध हर काल में दिखाई देता है जैसे  ज्यादा शिक्षित समाज में अँधविश्वास की अति, और अल्प शिक्षित समाज में कुछ अधिक खुलापन। हम समकालीन समाज में इसी स्थिति  का अनुभव कर रहे हैं। इसी तरह जब कर्मकाण्ड ज्यादा जकड़ लेता है तो उसे काट फैंकने की चाह भी बलवती हो जाती है। संभव यही कारण होगा कि अथर्ववेद में जहाँ उँचे दर्जे के दार्शनिक मंत्र हैं, और सामाजिक और पारीवारिक सन्तुलन की चाह है, दूसरी ओर वहीं काफीटोने टोटके वाले मन्त्र हैं जो इच्छा पूर्ति के लिए समान्य जन द्वारा किए जाते हो्गे। विद्वानों की दृष्टि में ये टोने टोटके जान  पड़े और अथर्ववेद को निकृष्ट कोटी  का मानते हुए एक तरह से बहिष्कार ही कर दिया गया।

दरअसल अपनी अगली पुस्तक भारतीय नवजागरण और यूरोप में इसी के पक्ष में तर्क दिए हैं। आर्य आक्रमण के  वैचारिक तत्व का महत्व इसलिए भी है कि वैचारिक तत्व ने भारतीय साहित्य, दर्शन और चिन्तन के पक्ष को बेहद संकीर्ण क्षेत्र में स्थापित कर दिया है।यूरोप में जब नव जागरण की बात होती है तो वे ऐसे युग की बात करते हैं, जो बर्बरता के युग से बाहर निकल कर कला, दर्शन और विज्ञान के क्षेत्र में कुछ नवीन रूप से चिन्तन करने लगे।लेकिन इस नवजागरण का यूरोपीयों की दृष्टि से क्या अर्थ हो सकता है, इस बारे में देखे तो  Renaissance जिसका इटेलियन भाषा में अर्थ है पुनर्जन्म । सांस्कृतिक रूप में इस शब्द का अर्थ है, सांस्कृतिक पुनर्जन्म। लेकिन भारतीय भाषाओं में विशेष रूप से हिन्दी में इसे नवजागरण कहा गया है। दरअसल शब्द को अर्थ की दृष्टि से देखा जाए तो दोनों मे काफी अन्तर है। पुनर्जन्म का अर्थ यह होता है कि एक जन्म पूर्ण होने के उपरान्त नया जन्म पूरी तरह नए चोले में होता है, ऐसी स्थिति में पूर्वजन्म की स्मृति का होना या ना होना आवश्यक नहीं है। लेकिन जब हम अपनी भाषा में इसे नवजागरण  कहते हैं तो मष्य में मात्र सुप्तावस्था होती हैजो स्मृतियों का पूरी तरह से विलोप नहीं करती है। यूरोपीय नवजागरण के बारे में कहा जाता है कि पाँचवी सदी के उत्रार्ध में रोमन राज्य ध्वस्त हो गया था, और करीब एक हजार वर्ष तक यह मध्य युग ही माना जाता रहा। हालाँकि यूरोप में आर्थिक विकास की दृष्टि से काफी अन्तर था, जब इटली सभ्यता का केन्द्र बना तब भी जर्मनी और ब्रिटेन में लोग अभी गण वाला जीवन बिता रहे थे। मध्यकाल में नागरी सब्यता का ह्रास हो गया और केन्द्र बने गाँव । लेकिन पन्द्रहवी सदी में नागरी सभ्यता का उत्थान शुरु हुआ, मशीनी उत्पादनों का दौर आरम्भ हुआ।



जैसा कि अनेक इतिहासकार मानते हैं कि यूरोप के मध्य काल में किसान खेतीहर थे। और उनका कृषि कौशल ज्यादा विकसित नहीं था। शहर और गाँव दोनों स्थानो पर  परिस्थितियाँ अस्वास्थ्यकारक थीं। जब गाँवों की समस्या से बचने के लिए लोग शहरों की पलायन करते तो शहरों की स््ित और बदतर हो जाती? दूषित जल, अन्न संकट  के अतिरिक्त अनेक समस्याएँ सिर उठाने लगीं थी। युद्धों के कारण महामारी आदि भी फैलने लगी। यहीं पर पूंजी को छिपाने , जमा करने का भाव आ गया। जब इटली में इसे पुनर्जन्म कहा गया तो उसके पीछे उनकी यह भावना रही होगी कि तीसरी चौथी, और माँचवीं सदी में जर्मन हमलावरों ने उनकी संस्कृति का नाश कर दिया था, वही संस्कृति अब पुनः जन्म ले रही है। लेकिन यदि हम भाषा की दृष्टि से देखें तो इसे नवजागरण कहना ज्यादा सही होगा।

इटली में अनेक यूरोपीय कुस्तुन्तुनिया आदि से भाग कर आए तो वे अपने साथ दर्शन और साहित्य भी लाए. इस तरह एशिया का साहित्य और दशन उनके पास पहुँचा और इस नयी प्रवृत्ति को व्यापाी वर्ग ने ही नहीं अपितु पोप ने भी संरक्षण दिया। इस तरह से एक अभूतपूर्व कला साहित्य का उद्भव हुआ। कऔनार्दो दा विंची. मिकेल आंजेलो, विल ड्यूरेन्ट , दाँते, मिलट्न आदि ना जाने कितने नाम हैं जो आज भी दुनिया में प्रसिद्ध हैं।
इस नवजागरण ने पूरे यूरोप पर प्रसार किया। फ्रान्स , ब्रटेन, जर्मनी आदि अनेक देशों में इस नवजागरण की लहर को महसूसा गया। लेकिन इस नवजागरण में अनत्र्विरोध भी शामिल है। जैसे कि जैसे ही कारीगर संघटित हुए, पूंजीपतियों ने उनका दमन किया। फ्लेरेंस ने पोप के विरुद्ध लाल झण्डा लहराया, जिस पर स्वतंत्रता लिखा हुआ था। १३७५ में चौंसठ नगर पोप को दुनिया का धार्मिक गुरु मानते थे. १३७६ में केवलऔर  किन्तु, और ोुनः सत्तापलटी गई, जिसमें व्यवसायी वर्ग को सत्ता मिली। लेकिन यह कम्यून सर्वहारा वर्ग का नहीं यह क्म्यून उसी तरह दबा दिया गया, जिस तरह कि पेरिस आदि अन्य यूरोपीय देशों में दबाया गया।  जिस समय कला साहित्य आदि उत्तम शास्त्र उन्नति पर थे, उसी समय दांते को अपने देश को छोरने को बाध्य होना पड़ा, शेली और बायरन के साथ भी यही स्थित पैदा हुई। यही वह वक्त था जब यूरोप में अन्धविश्वास , बुराइयाँ बीमारियाँ भी फैली। अतः नवजागरण का क्या अर्् और यह कैसा नव जागरण, इस विषय मतभेद की कई संभावनाएँ हैं।

इस दृष्टि से अरबिन्दों के लेख बहुत महत्वपूर्ण हैं। उनका यह कथन कई मुद्दों को खोलता है कि..भारत में नवजागरण के बारे में जो चर्चा चल रही है, उसके बारे में सबसे पहले हमे यह जानने की जरूरत है कि भारत में नवजागरण का अर्थ क्या है? क्या यूरोप के नवजागरण के तुलनीय हो सकता है, जो स्वयम में नवजागरण मात्र नहीं अपितु धार्मिकता ****जब  रामविलास शर्मा जी  भारतीय नवजागरण और यूरोप के बारे में विवेचन करते हैं तो उनके मन में भी कुछ ऐसे ही विचार है रहे लगते हैं।

यूरोपीय विचारकों ने तो भारतीय संस्कृति को ही नकार दिया, और   उसे बर्बर आर्यों की देन के रूप में प्रस्तुत किया, अतः उनसे भारतीय परिपेक्ष्य मेंनवजागरण पर सही दिशा में विचार करने की अपेक्षा नहीं की जाती। क्यो कि भारतीय संस्कृति में किसी खास ध्रामिक विचारधारा की अपेक्षा एक अन्तर्निहित अध्यात्मिकता है जो बाह्य धार्मिक विचारधारा से कहीं बड़ी है। विदेशी विचारकों ने वेदकालीन आध्यात्मिकता को इस लिए नकार दिया कि वे ईसाई धर्म की तरह किसी एक  देव पर विश्वास नहीं करते। उन्हे वेदों में अनेक देव दिखाई देते हैं जो उन्हें सीधे सीधे प्रकृति से जुड़ी लगती हैं। और ये विविधता यूरोपीय की दृष्टि में आदिम संस्कृति है। जब कि भारतीय संस्कृति जिस तरह से वैविध्यता को समेटे हुए एक विशिष्ट अध्यात्मिकता के सूत्र को लेकर चलती है, वह अपने में विशिष्ट है। यही कारण है कि वे भारतीय नवजागरन को सीधे सीधे ऋग्वेद से जोड़ते हैं। - यहूदी ईसाई परम्परा से प्रभावित कुछ पाश्चात्य विद्वान ऋग्वेद में विश्व प्रकृति से परे , उसके निर्माता, परम पिता परमेश्वर को ना पाकर उसे पिछड़े हुए आदिम समाज कि रचना मान लेता है। उन्हे यूरोप के, विशेष रूप से इंग्लैण्ड के काव्य. साहित्य के विकास पर ध्यान देना चाहिये। जब तक वहाँ समाज विश्व प्रकृति से परे, उसके निर्माता परम पिता की कल्पना से बँधे रहे, तब तक वहाँ का साहित्य मध्यकालिन जड़ता में फँसा रहा। पुनर्जागरण काल में यूनानी संस्कृति की हवा लगने पर यह जरता पहली बार टूटी है।...
भारतीय नवजागरण और यूरोप
पृ २६।

रामविलास जी ऋग्वेद के दर्शन, प्राकृतिक सन्दर्शन और दर्शन की विवेचना करते हुए भारतीय नवजागरण और  ऋग्वेद  के सम्बन्ध को खोजते हैं। उनका मानना है कि ऋग्वेद सा दार्शनिक वैभव यूनानी साहित्य में नहीं है। इसलिए साहित्य में जो आकर्षक देवकथाएँ है ,उन्हें ऋग्वेद में खोजना व्यर्थ है। वे इस बात को भी गलत मानते हैं कि हग्वेद काल तक इन  देवकथाओं का विकास नहीं हुआ था। वास्तब में ऋग्वेद देवकथाओं के विकास के बाद की रचना है, उन ऋषियों की रचना है जो देवकथाओं की भुमि से आगे निकल कर दार्शनिक काव्य के क्षेत्र में प्रवेश कर रहे थे। ...ऋग्वेद का एकम प्रकृति से परे नहीं है, वह उसके प्रपंचों में व्याप्त एकता का सूचक है। यह एकता कर्मकाण्ड का खंडन है। कर्मकाण्ड देवता के पृ्थक अस्तित्व से जुड़ा हुआ है। ऋग्वेद के बाद, शथपथ ब्राह्मण के रचना काल से लेकर आज तक, कर्मकाण्ड के साथ देवता के पृथक अस्तित्व का सम्बन्ध चला आया है। ऋग्वेद की रचना से पहले ऐसा ही सम्बन्ध अवश्य रहा होगा। कवियों ने जैसे देवकथाओं को नया रूप दिया , वैसे उन्होंने कर्मकाण्ड को नया रूप दिया। देवतन्त्र के खोल में उन्होने यथार्थ दर्शन के नए तत्व भर दिए, वैसे ही उन्होंने कर्मकाण्ड के खोल में नए यथार्थवादी चित्रण और भक्ति के नए तत्व भरे। (भारतीय नवजागरण और यूरोप,पृ 26-27)

यहाँ रामविलास शर्मा जी भारतीय संस्कृति को ऋग्वेद से कहीं पहले ले जा रहे हैं, उनका विचार है कि ऋग्वेद भारत में पहले नवजागरण का प्रतीक है।रामविलास जी के इस विचार के पीछे यह भी करण हो सकता है कि वैदिक साहित्य के दो चरण महत्वपूर्ण माने जाते है, एक ऋग्वेद और दूसरा उपनिषदें। विशेष रूप से इतिहासकारों ०र दार्शनिकों की दृष्टि में।इसका कारण यह भी है कि  ऋग्वेद को वैदिक पण्डितों और परवर्ती विचारकों द्वारा बड़ा महत्व दिया गया है। ऋग्वेद और उपनिषदें एक तरह के रोमन्टिज्म का शिकार भी है। कारण यही है कि अन्य वेदों के बारे में जो विचार छठी सातवीं सदी से ही एक निश्चित आकार में ढ़ाल दिए गए। सायण ने सभी वेदों पर विचार किया , किन्त वे आधार ऋग्वेद को बनाते हैं। शंकराचार्य ने वेद के रूप में संहिताओं को लगभग छोड़ते हुए, उपनिषदनिक साहित्य को आधार बनाया। यह स्थिति निसन्देह वैदिक साहित्य की रचना के काफी बाद की स्थिति  है। वेदरचना प्रक्रिया या रचना काल में स्थितियाँ भिन्न भी हो सकती हैं। सबसे पहली बात तो यह है कि ववैदिक संहिताओं को एक दूसरे से पूर्णतया भिन्न मानना असम्भव है। यदि ऐसा होता तो ऋगवेद में सामवेद, यजुर्वेद का उल्लेख संभव नहीं होता़। अधिकतर स्थनों में ऋक् , यजु साम का उल्लेख एक साथ किया गया है। अथर्ववेद शब्द का उपयोग कम है और उसके लिए छन्दसि शब्द का प्रयोग किया गया है।  ऋग्वेद में न केवल अथर्ववेद के प्रधान ऋषियों जैसे अथर्वा और अंगिरसों का ना केवल उल्लेख है, बल्कि वे पणियों द्वारा पुजित भी हैं। इन्द्र जब पणियों के पास अपनी गायों को छुड़वाने के लिए जाती है तो वह उन्हें अंगिरसों का हवाला देती है। निरुक्त में यास्क ने उन्हे अग्नि का पुत्र माना है। याग में भी उन्हे महत्व दिया गया है। (R.V. 1.83.4,R.V-1.83.5).



इसमें कोई सन्देह नहीं कि यजुर्वेद और सामवेद के अधिकतर मन्त्र ऋग्वेद से लिए गए है, लेकिन उनके रचना काल में भोगोलिक विभिन्नता  होते हुए भी कहीं ना कहीं तारतम्य है। ये तीनों वेद एक दूसरे के पूरक हैं। संभव है कि ऋचाओं के रचना काल में याज्ञिक क्रिया उस रूप में प्रचलित ना  हो जैसी कि  परवर्ती काल में थी, लेकिन तीनों वेद ऋचाओं कें उपयोग के लिए एक दूसरे के पूरक थे। इसलिए ऋग्वेद को सबसे अलग कर लेना भी उचित नहीं हैं। जहाँ तक अथर्ववेद का विषय है तो यह वेद अपने पूर्ववर्ती वेदों से कहीं भिन्न है, क्यों कि इसमें परिवार , समाज, शासन और देश के विभिन्न तत्व हैं, सबसे बड़ी बात है कि अधर्ववेद में स्वास्थय और औषध सम्बन्धी अनेक मन्त्र हैं। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात है कि दर्शन के क्षेत्र में जो  ऊँचाई अथर्ववेद के कुछ मन्त्रों में दिखाई देती है, वह बारतीय दर्शन शास्त्र का आधार मानी जा सकती है। कई जगह तो यहाँ दर्शन अध्यात्म के ऊँचे स्तर पर पहुँच गया है़। जैसे कि नासदीय सूक्त को ऋग्वेद का सबसे महत्वपूर्ण दार्शनिक सूक्त माना जाता है, लेकिन इसी सूक्त की व्यख्या अधर्ववेद में काल सूक्त के रूप में हुई है।( अवे. का. १९. सूक्त ५३)

काल को अश्व के रूप में मानते हुए , उसे सप्त रश्मियों से युक्त चक्र की कल्पना परिपक्व दार्शनिक सोच का परिणाम है। काल के गूढता इस बात से भी व्यक्त होती है कि काल एक ऐसे पूर्ण कुम्भ के समान है जिसका मुँह ढका है, विद्वत जन बस यही अन्दाजा लगाते रहते हैं कि इसके भीतर क्या होगा , क्या नहीं होगा। यही पिता है, यही पुत्र है...

कालो अश्वों वहति सप्तरश्मिः सहस्राक्षो अजरो भुरिरेताः। अवे. का. १९.सूक्त ५३. म. १

पूर्ण कुम्भोSधि काल आहितस्तं वै पश्यामो बहुधा नु सन्तः। अवे. का. १९.सूक्त ५३. म.३

पिता सन्नभवतं पुत्र एषां तस्मादं वै नान्यत् परमस्त तेजः। अवे. का. १९.सूक्त ५३. म.४

इसी तरह अथर्ववेद का प्रण सूक्त परवर्ती दर्शन की भावभूमि को उर्वर करता है। प्राण हंस के समान एक पाँव उठाता है और एक जीवन रूपी सलिल पर रखे रहता है। यदि वह दोनों पाँव उठा ले तो न कल होगा ना दिन और रात। यहाँ प्राण को सामान्य दैहिक प्राण से ऊपर  जीवन शक्ति से जोड़ा है , जो तदेक की वह शक्ति है जिससे सांसार में जीवन चलता है।

एकं पादं नोत्खिदति सलिलाध्देस उच्चरन।
यदंग स तमुत्खिदेन्नैवाद्ध न श्वः स्यान्न रात्री नाहः स्यान्न व्युच्छेत् कदा चन।।


ध्यातव्य है कि चारों संहिता अपने मंत्रो  मे यज्ञ , तप, कर्म आदि का उपयोग करती रही हैं. अतः यज्ञ को कर्मकाण्ड मानते हुए संहिताओं से अलग सोचने की स्थिति भी सही नहीं है। यही नहीं कि ऋग्वेद रचना काल में नहीं तो परवर्ती संहिताओं के रचना काल में ब्राह्मण ग्रन्थों की रचना आरम्भ हो गई थी। इसी तरह उपनिषस साहित्य को भी याज्ञिक कर्मकाण्ड से अलग माना ही नहीं जा सकता। छान्दोग्य उपनिषद में उशति नामक ब्राह्मण की कथा है जिसे कुरु प्रदेश में अकाल पड़ने के कारण रथवान के झूठे उड़द खाने पड़े, यह ऋषिकुमार झूठे उड़दों को खाकर दूसरे दिन राजा के दरबार में पहुँचता है और यज्ञ में सामगान द्वारा काफी धन कमा लेता है।

अतः उपनिषद काल से काफी पहले ही यागादि कर्मकाण्ड बड़े पैमाने में किए जाने लगे थे।लेकिन अथर्ववेद में अनेक मन्त्र ऐसे हैं जो हमें ग्रामीण टोने टोटकों की स्मृति दिलाते हैं।  इतनी उच्च दार्शनिकता और वैज्णानिक सोच के साथ कर्मकाण्ड और टौने टोटके जैसे एहिक कर्मकाण्ड का सम्मिलित रूप किस तरह की व्यवस्था को द्यौतित करता है।

पूर्ण सतयुग की कल्पना निराधार होती है। उन्नत्ति के साथ साथ विघटन के लक्षण साथ साथ दिखाई देते हैं।

जैसा कि हम यूरोपीय नवजागरण की स्थिति में देखते हैं, सिन्धुघाटी और हड़प्पा की सांस्कृतिक भूमि ही नहीं, द्रविड़ प्रदेशों में भी सांस्कृतिक सम्मिश्रण उतना ही वैविध्यतापूर्ण रहा है, जितना की भारत में आज भी दिखाई देता है।


1.
 It is from his bitter experience that EMS talks of the Rig Veda as something learnt only by rote traditionally and recited by persons without understanding a word of it. He recalls the six years (from the age of eight to 14) when he “was learning to repeat it, rik (verse) by rik,” as was “the practice for the Namboodiri boys of those days after their upanayanam [sacred-thread ceremony].”


2

“Sankara was one of the tallest of India's (and the world's) idealist philosophers; his Advaita Vedanta is one of the richest contributions India has made to the treasury of human knowledge.”



3

According to Marx, religion is an expression of material realities and economic injustice. Thus, problems in religion are ultimately problems in society. Religion is not the disease, but merely a symptom. It is used by oppressors to make people feel better about the distress they experience due to being poor and exploited. This is the origin of his comment that religion is the “opium of the masses” - but as shall see, his thoughts are much more complex than commonly portrayed.


Marx as social theorist is pretty narrowly read today by most sociologists who don’t specialize in Marxist criticism, focusing mostly on his analysis of capitalism as a social system. In cultural studies, 20th century dialogues with Marx’s ghost is practically a rite of passage. The obvious critiques of Marx have been made over and over, particularly his historical materialism, which so often devolves into a kind of gross determinism in Marx’s writings as to make you want to throw the whole thing out. But starting with his writings on the 18th Brummaire and culminating in Kapital, Marx had shifted to a depth of analysis of how capitalism functions to mix ideologies and social relations together (his notion of the fetishism of the commodity is fucking brilliant, and more salient today than he could have imagined). That contradiction between the irritating determinism and the powerful insights has plagued my relationship with Marx for years.

As a sociologist who sometimes studies religious cultures, I instantly felt the resonance of thinking of marxism as a religion. Anyone with the most cursory knowledge of religion knows that all religious systems are morally conflicted and internally inconsistent in their morals. The same religious system can produce massive violence and suffering in one context, and on another occasion be the source of humanity’s shining moments of compassion and healing. This contradiction makes religious cultures (that is, their symbolic contents) difficult to deal with empirically, because their effects in the social world are mixed and contradictory. Further, most world religions as they have survived today rely on texts and often on founders. Again, these founders are often the source of contradictory ideas: Jesus taught both “love they neighbor” and that his religion would tear apart families and bring violence (“the sword”); Mohamed taught both that the diversity of humans was divine, and that Arabs were god’s only people; the buddha taught that enlightenment lies within and is available to alll, but forbade women to practice or learn his methods. Of course I’m being overly simplistic here to illustrate a point, that religious systems are ethically and ideologically mixed and that the mixture can be traced back to its founders.


Man makes religion, religion does not make man.” (41)

* इन्द्रमहं वणिजं चोदयामि सन ऐतु पुरएता नो अस्तु।
नुदन्नरातिं परपन्थिनं मृगं स ईशानो धनदा अस्तु मह्यम्।। १।।
ये पन्थानो बहवो देवयाना अन्तरा द्यावा पृथवीं संचरन्ति।
ते मा जुषन्तां पयसा गषतेन यथा क्रीत्वा धनमा हराणि।।२।।
इध्मेनाग्न इच्छमानो धृतेन जुहोमि हव्यं तरसे बलाय।
यावदीशे ब्रह्मणा वन्दमान इमां धियं शतसेयाय देवीम्।।३।।
इमामग्ने शरणिं मीमृषो नो यमध्वानमगाम दूरम्।
शुनं नो अस्तु प्रपणो विक्यश्च प्रतिपणः फलिनं मा कृणोतु।
इदं हव्यं संविदानौ जुषेथां शुनं नो अस्तु चरितमुत्थितं च ।।४
येन धनेन प्रपणं चरामि धनेन देवा धनमिच्छमानः।
तन्मे भूयो भवतु मा कनीयोSग्म्ने सातध्नो देवान् हविषा निषेध।। ५   (काण्ड३,अध्याय३,  सूक्त १५औ

**

सीरा युज्जन्ति कवयों युगा वि तुन्वते पृथक्
धीरा देवेषुग्नयौ।।१
युनक्तु सीरा वि युगा तनोत कृते योनौ वपतेह बीजम।
विराजः श्नुष्टिः सभरा असन्नौ नेदीय इतं सृण्यः पक्वमा यवम्। (का.३, अ ४, सू १८) अवं सूक्त के अन्य मन्त्र।

***
शं नो आपो धन्वन्याः शमु सन्त्वनूप्याः शंनः खनितरिमा आपः
शमु याः कुम्भ आभृताः शिवा सन्तु वार्षिकी।। (का.१. अ.२. सू ६)

****

यददः संप्रयतीरहावनदता हते।
तस्मादा नद्यो नाम स्थ ता वो नामानि सिन्धवः।।
यतं प्रेषिता वरुणेनाच्छीबं समवल्गत।
तदाप्नोदिन्द्रो वो यतीस्तस्मादापो अनुष्ठन।।
अपकामं स्यन्दमाना अवीवरत वो हिकम्।
इन्द्रो वः अक्तिभिर्देवीस्तस्मादवार्नाम वो हितम।।
एको वो देवोSप्यतिष्ठत्, स्यन्दमाना यथावशम्।
उदानिषुर्महीरिति तस्मादुदकमुच्यते। अवे. का.३, अ. ३. सू. १३


Now these tales are mythical/ and tradition becomes mythical
when it reaches back to origins, yet such mythical tales can hardly
have sprung from pure imagination, and must have been developed
from some germ of reality. They certainly suggest that Pururavas^s
origin was in that north region ; and this agrees with and explains
the fact that that region, the countries in and beyond the middle of
the Himalayas, has always been the sacred land of the Indians.
Indian tradition knows nothing of any Aila or Aryan invasion of
India from Afghanistan, nor of any gradual advance from thence
eastwards. On the other hand it distinctly asserts that there
was an Aila outflow of the Druhyus through the north-west
into the countries beyond, where they founded various kingdoms
and so introduced their own Indian religion among those
nations.^
The north-west frontier never had any ancient sacred memories,
and was never regarded with reverence. All ancient Indian belief
and veneration were directed to the mid-Himalayan region, the only
original sacred outside land ; * and it was thither that rishis and
kings turned their steps in devotion, never to the north-west. The
list of rivers in Rigveda x, 75 is in regular order from the east to
the north-west^-not the order of entrance from the north-west,
but the reverse. If the iiryans entered India from the north-west,
and had advanced eastward through the Panjab only as far as the
Sarasvati or Jumna when the Rigvedic hymns were composed, it is
very surprising that the hymn arranges the rivers, not according
to their progress, but reversely from the Ganges which they had
hardly reached.^ This agrees better with the course of the Aila
expansion and its outflow beyond the north-west.'' It was, however,
a route for any one travelling from the Ganges to the north-west.

Ma.tl3, 14. Pad V, 8, 119.
'
Other mythical details; MBh i, 75, 3144 : Va 3, 15 : Bd i, 3, 15.
"
P. 264. JEAS, 1919, pp. 358-61.
*
See the eulogy of the Noi'thern region, !MBk v, 110 : vi, 12.
"
So Sir M. A. Stein, JEAS, 1917, p. 91.
'
Macdonell, Sansk Lit. pp. 143, 145.
''
Perhaps the arguments used to prove the advance of the Aryans
from Afghanistan into the Panjab might simply be reversed.

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There is a first question, whether at all there is really a
Renaissance in India. That depends a good deal on what we
mean by the word; it depends also on the future, for the thing
itself is only in its infancy and it is too early to say to what
it may lead. The word carries the mind back to the turningpoint
of European culture to which it was first applied; that
was not so much a reawakening as an overturn and reversal, a
seizure of Christianised, Teutonised, feudalised Europe by the
old Graeco-Latin spirit and form with all the complex and
momentous results which came from it. That is certainly not
a type of renaissance that is at all possible in India. There is
4 The Renaissance in India
a closer resemblance to the recent Celtic movement in Ireland,
the attempt of a reawakened national spirit to find a new impulse
of self-expression which shall give the spiritual force for
a great reshaping and rebuilding: in Ireland this was discovered
by a return to the Celtic spirit and culture after a long period
of eclipsing English influences, and in India something of the
same kind of movement is appearing and has especially taken a
pronounced turn since the political outburst of 1905. But even
here the analogy does not give the whole truth.
The Renaissance in India
with
A Defence of Indian Culture

पिगोट हड़प्पा की नगर योजना पर भी प्रकाश डालते हैं, जिसके अनुसार नगर की हर सुविधा का विशेष ध्यान रखा गया।

प्रति यदस्य वज्रं बाह्वोर्धुर्हत्वी दस्यून पुर आयसीर्नि तारीत्। ङज्. .२.२०, ८,
इन्द्राग्नि नवतिं पुरो दासपत्नीरधनुतम् साकमेकेन कर्मणा॥ ङज् ३.१२.६,
प्र ते वोचाम वीर्याइया मन्दसान  अरुज। पुरो दासीरमीत्य॥
ङज् ४.३२.४
   पुनमैत्विन्द्रियं पुनरात्मा द्रविणं ब्राह्मणं च। पुनरग्नयो धिष्ण्या यथास्थाम कल्पयन्तामिहैव।ठ्ठ.ध्. ७.६७.१

  यज्ञैरथवा र्प्रथम पथस्तते तत सूर्यों व्रतपा वेन  ाजनि।  ा गा  ाजदुशना     काव्य सचा यमस्य जातमतृतं यजामहे॥  ङ.ज्१.८३.५).


 D.K Chakravarti captures this perspective with such statements as: “
सबसे पहले हम"
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