बहस में डाक्यूमेंट्री

सुधा अरोड़ा/  अरविन्द जैन

( ' इंडियाज डॉटर' डाक्यूमेंट्री के विवाद के दौरान स्त्रीकाल का अपडेट रुका था . उन्हीं दिनों लेखिका सुधा अरोड़ा और स्त्रीवादी कानूनविद  अरविन्द जैन के अपने -अपने मंतव्य सोशल मीडिया में आये . सुधा अरोड़ा के मंतव्य पर अरुण माहेश्वरी, मृदुला गर्ग आदि लेखकों -विचारकों के मंतव्य भी आये . स्त्रीकाल के पाठकों के लिए हम इन चर्चाओं को यहाँ लेकर आ रहे हैं और यू ट्यूब की मदद भी ली है . )

फिल्म 'India's.daughter' को लेकर फेमिनिस्ट कार्यकर्ताएं बहुत हाइपर हो रही हैं ! फिल्म बेहद असंवेदनशील है, पीड़िता का पक्ष ठीक से उभर कर आ ही नहीं पाया, बलात्कारी को कॉर्नर नहीं किया गया , उसे इतने कम्फर्टेबल ज़ोन में क्यों रखा गया कि उसे अब तक इस बात का एहसास नहीं कि उसने इतना वीभत्स काण्ड किया। फिल्म में फेमिनिस्ट एंगल है ही नहीं।  पूरी फिल्म एक व्यावसायिक दृष्टिकोण से बनायीं गयी है यहाँ तक कि एडिटिंग में भी रोचक और मनोरंजक होने का ख्याल रक्खा गया है ! बहुत से सवाल हैं जो  फेमिनिस्ट की तरह या एक शुद्ध कला फिल्म समीक्षक की तरह उठाये जा सकते हैं ! लेकिन मैंने इस फिल्म को  दर्शक की तरह ही देखा और बतौर एक सामान्य दर्शक अपनी प्रतिक्रिया दे रही हूँ !



मैंने पूरी फिल्म देखी ! ऐसा कुछ भी नहीं है इस फिल्म में जो बलात्कारियों के लिए हमारे मन में दया या करुणा उपजाये या उनका महिमा मंडन करे ! मुकेश नामक अपराधी का सख्त और संवेदनहीन चेहरा देख कर हिकारत और गुस्सा ही उपजता है ! वह एक बे पढ़ा- लिखा अपराधी है,  जो जेल की सलाखों के पीछे है और अपने बचाव के वकीलों की सिखाई तोता रटंत भाव विहीन चेहरे से सुना रहा है ! सवाल यह है कि जो पढ़े लिखे, कानून विद् सलाखों से बाहर रहकर उसी की भाषा बोल रहे हैं, वे क्या बोल रहे हैं और उन्हें क्या स्वीकृति दी जानी चाहिए !
दोषी पक्ष के ये वकील ज़्यादा खतरनाक हैं ! जस्टिस ए पी सिंह कहते हैं - अगर मेरे घर की बेटी  शादी से पहले किसी अनजान के साथ घूमे फिरे , संबंध बनाये तो मैं अपने फार्म हाउस में सबके सामने उस पर पेट्रोल डालकर उसे ज़िंदा जला दूंगा !  एम एल शर्मा कहते हैं - लड़कियां फूल होती हैं, वे हीरे की तरह हैं, यह आप पर है कि  आप उन्हें कितना संभाल कर रखते हैं। उन्हें सड़क पर रख दो तो उन्हें कुत्ते छोड़ेंगे नहीं ! दोनों जज के पास आपत्तिजनक जुमलों की भरमार है ! सजा तय करनेवाले ये जज खुद सज़ा पाने के लायक हैं ! उनका कब नोटिस लिया जायेगा या उन्हें कब नोटिस इशू किया जायेगा कि उन्होंने यह सब क्यों कहा ?उनकी मानसिकता बदलने के लिए क्या किया जाना चाहिए, यह सोचने की ज़रूरत है ! 1972 में यानी बयालीस साल पहले 14 वर्षीय लड़की मथुरा का लॉक अप में पुलिसकर्मियों द्वारा रेप हुआ तब भी मथुरा के ही चरित्रहीन होने की दलीलें देकर गनपत और तुकाराम छूट गए थे ! आज चार दशकों के बाद भी, जिस लड़की ने रेप का प्रतिवाद किया, उसके किसी लड़के के साथ फिल्म देख कर रात को देर से (रात के आठ बजे) लौटने को लड़की की गलती बताया जा रहा है ! भले घर की लड़कियां रात आठ बजे तक घर के बाहर नहीं रहतीं !ए पी सिंह और एम एल शर्मा जैसे न्यायविद लड़कियों के लिए जैसी भाषा इस्तेमाल कर रहे हैं, सज़ा तो उन्हें मिलनी चाहिए! ये दोनों अकेले नहीं हैं ! ऐसे जस्टिस और वकील भरे पड़े हैं !

तीन साल पहले महिला दिवस पर जब सुबह के अखबार में मध्य प्रदेश के एक गाँव में एक आठ वर्षीय बच्ची से उसके नाना द्वारा बलात्कार कर उसकी क्षत विक्षत देह को दो हिस्सों में काट कर जंगल में फेंक देने की खबर आई (उस नाना की पीठ पर गोदना था - 'मैं मर्द हूँ '), भोपाल में आयोजित महिलादिवस के कार्यक्रम में मंच पर जस्टिस गुलाब शर्मा (भूल नहीं रही तो यही नाम था) लड़कियों के पहरावे की खिल्ली उड़ाते हुए उन्हें ही दोषी ठहराने लगे ! सभागार में शोर होने के बाद उन्होंने बीच में ही अपनी गलती महसूस की और माफ़ी मांगी ! दो साल पहले शक्ति मिल कम्पाउंड में हुए एक फोटो जर्नलिस्ट के रेप पर मुंबई महिला आयोग की एक सदस्य दूरदर्शन पर लड़कियों को शाम के बाद घर रहने की सलाह देने लगीं ! मजलिस की संचालिका और मुंबई की फैमिली कोर्ट की जानी मानी एडवोकेट फ्लेविया एग्नेस ने हाईकोर्ट के एक जज का बयान उद्धृत किया, जिन्होंने कहा - 'शादी के बाद लड़कियां माँ बाप के घर में मेहमान की तरह होती हैं ! ससुराल ही उनका घर है !' ऐसे बयानों की एक लंबी लिस्ट है, जिन्हें न्यायालय के प्रतिष्ठित ओहदों पर आसीन इन जज और वकीलों का बाकायदा नाम लेकर बताया जा सकता है !

ए पी सिंह और एम एल शर्मा की जड़ सोच और मानसिकता के बरक्स ज्योति सिंह के माँ और पिता हैं जो उसी दकियानूसीपरंपरा से आये हैं पर बदलाव को समझ पा रहे हैं . जो सवाल कर रहे हैं कि उनकी बेटी का रात को आठ बजे लौटना इतना बड़ा गुनाह हो गया और उन लड़कों का कोई दोष नहीं जिनकी हैवानियत जहाँ तक पहुंची उसकी कल्पना भी भयानक है .उसे बताते हुए एक बलात्कारी इतना निर्लिप्त और इतना निर्भीक कैसे हो गया ? उसके सख्त और आश्वस्त चेहरे के पीछे की दुरभिसंधियों को पहचानने की ज़रूरत है ! ज्योति के एक परिचित छात्र ने बताया - कैसे एक बार ज्योति का पर्स किसी लड़के ने छीन लिया और पुलिस जब उस लड़के को पकड़ कर मारने लगी तो ज्योति ने पुलिस को रोक दिया और उस लड़के से बात की, उससे पूछा कि पर्स क्यों चुराया ,क्या लेना चाहते थे और उसे वे सारी चीज़ें खरीद कर दीं जो वह पैसे चुरा कर पाना चाहता था ! बदले में उससे वायदा लिया कि अब वह ऐसा काम कभी नहीं करेगा ! यह थी ज्योति की मानवीयता और उसका संवेदनशील पक्ष !

ज्योति सिंह के आखिरी शब्द थे - सॉरी माँ, मैंने आपको बहुत परेशान किया ! प्रीति राठी जो बांद्रा टर्मिनस पर एसिड अटैक का शिकार हुई , अपने आखिरी होशो हवास तक इसकी चिंता करती रही कि उसके इलाज़ पर बहुत खर्च हो रहा है ! निम्नमध्यवर्गीय परिवारों की ये नयी लड़कियां हैं, जो अपने परिवार को एक बेहतर जीवन दे पाने का जज़्बा लिए आगे आ रही हैं  और समाज की संकीर्ण मानसिकता की बलि चढ़ाई जा रही हैं ! '' इंडियाज़ डॉटर'' फिल्म में एक बलात्कारी की पत्नी मांग भर सिन्दूर लगाये, गोद में एक मासूम सा बच्चा लिए अपने पति की रिहाई के लिए गुहार लगा रही है कि पति के बिना वह कैसे जी पायेगी। क्या यह सिर्फ एक अपढ़ हिंदुस्तानी पत्नी का पति प्रेम है ? इसे भी वैश्विक संदर्भों में देखा जाना चाहिए ! ब्रिटेन में एक कॉर्पोरेटर पर जब अनैतिक संबंध बनाने का आरोप लगा और उसके ओहदे पर बन आई तो उसकी कानूनी पत्नी जो जीवनभर उसकी करतूतों से त्रस्त रही थी , अचानक मंच पर प्रकट हो उसके हाथ में हाथ डाल कर उसके चरित्र को बेदाग़ बताते हुए उसकी वफ़ादारी के कशीदे पढ़ने लगी ! फिल्म अभिनेता शाइनी आहूजा पर, अपने घर में काम करने वाली 19 साल की लड़की से रेप का आरोप लगा तो उसे बेगुनाह साबित करने के लिए, उसकी पत्नी ने भी आगे बढ़ कर एक के बाद एक प्रेस आयोजन कर डाले ! दिल्ली रेप काण्ड के उस आरोपी की पत्नी और इन आधुनिक, आत्मनिर्भर पत्नियों में कितना फ़र्क़ है,सोच कर देखें ! इसके भी आकलन की ज़रूरत है !

फिल्म निर्माता को तिहाड़ जेल में जाने की अनुमति क्यों दी गयी जब मामला विचाराधीन था , वह एक अलग मुद्दा है ! इसफिल्म पर प्रतिबंध लगाकर बहुत अक्लमंदी का परिचय नहीं दिया गया है ! फिल्म जिन सवालों को उठाती है, उन पर बगैर किसी पूर्वाग्रह के बात होनी चाहिए और बलात्कारियों को सही और ज़रूरी सज़ा दिलवाने के हथियार के रूप में ही इस फिल्म को देखा जाना चाहिए !


अरुण माहेश्वरी:  इस फ़िल्म को दिखाना नहीं, न दिखाना अपराध है । हमने इसे देखी और शेयर भी की है । फ़िल्म पूरी होने के पहले ही अपनी रुलाई को रोक नहीं पाया था । काफी देर तक फफक कर रोता रहा । ज़ुल्म के प्रतिवाद में दिल्ली की सड़कों पर नौजवानों का आक्रोश किसी भी संवेदनशील आदमी की आत्मा को अंदर तक हिला देगा । इसपर पाबंदी बलात्कार के खिलाफ प्रतिवाद पर पाबंदी है । भारत में हर सुबुद्धिसंपन्न व्यक्ति को इस पाबंदी के विरुद्ध :खुल कर आवाज़ उठानी चाहिये । बलात्कारी की और स्त्रियों के प्रति रूढ़िवादियों की सोच में कितनी समानता है, इस फ़िल्म से जाहिर होती है । इसके प्रदर्शन से नहीं, प्रदर्शन पर रोक से दुनिया के सामने भारत की भद हो रही है ।

सुधा अरोड़ा : तीन दिन से लगातार इस फिल्म के विरोध में विस्तृत कमेंट्स पढ़ कर समझ नहीं पा रही हूँ कि फेमिनिस्ट फिल्म निर्माता महिलाओं की परेशानी क्या है ? क्या यह कि एक विदेशी महिला को अनुमति क्यों दी गयी ? उसने अपने भारतीय सह निर्देशक को पर्याप्त श्रेय नहीं दिया ? ये सब दीगर मुद्दे हैं ! फिल्म की इतनी बारीकी से छीछालेदर की जा रही है कि उसका मुख्य उद्देश्य ही छिप गया लगता है !

अरुण माहेश्वरी : ऐसा कर रहे लोग कुछ इतर इरादों से, एक सरकार के अविवेकपूर्ण निर्णय पर लीपापोती में लगे हुए है । फ़िल्म की गुणवत्ता या इसके संदेश से इनका कुछ लेना-देना नहीं है । एक महोदय कह रहे थे कि बलात्कारी को इतना स्थिर दिखा कर उसके प्रति सहानुभूति दिखाई गयी है । अब पूछिये उनसे कि बलात्कारी को रोता हुआ या काफी बेचैन दिखा कर क्या उसके प्रति नफ़रत पैदा होती । ये सब मूर्खतापूर्ण, बदइरादों से प्रेरित बातें हैं । इस फ़िल्म की जितनी तारीफ़ की जाय, कम है

अनुराग आर्य :  जो चीज़ मुझे भयभीत कर रही है वो है हम अपराधी को तो फांसी पर चढ़ा देगे पर उस " विचार"को ज़िंदा रखे हुए है जो "अमर" प्रतीत होता है और इंडेमिक की तरह फैला हुआ है ।इस मेल मेन्टल कंडीशनिंग को मैंने एक डी एम् लेवल के व्यक्ति के मुंह से सुना है जिसने बलात्कार के केस के बाद कहा था " रात को गर लड़की खेत में मिलेगी तो यही होगा "i was shocked .तब मैंने यही कहा था तो आपके जिले के आदमी इतने हिंसक है के स्त्री को अँधेरा देख अकेला देख बेकाबू हो जाते है ?


प्रभात  समीर : फ़िल्म मैंने भी देखी यद्यपि बहुत clear नहीं थी।मैं फ़िल्म के प्रतिबंध के पक्ष में नहीं लेकिन देखने वालों में एक व्यक्ति के कमेंट ने मुझे काफ़ी विचलित किया।आरोपी के माँ-बाप,पत्नी को देख कहने लगे'न निकलती वह बच्ची घर से तो इतने घर तो न उजड़ते'बहस होनी थी,हुई लेकिन एक बात मन में ज़रूर आयी कि ऐसे विषय समाज में प्रस्तुत करने से अगर बचा जाए तो हानि क्या?इस documentary से समाज में सुधार का तो कोई रास्ता दिखाई नहीं देता।


मृदुला गर्ग :  कम अज़ कम सब पुरुषों को तो देखनी ही चाहिए। जिससे वे यह प्रण ले सकें कि जहाँ तक उनके वश में है, वे अगली पीढ़ी में ऐसे पुरुषों को पनपने नहीं देंगे। अपने बेटों और छात्रों को बचपन से ऐसी संकीर्ण और हिंसक मानसिकता से परहेज़ ही नहीं, उसका विरोध करना सिखलायेंगे। बात-बात पर प्रतिबन्ध माँगने वालों का भी, चाहे वे नारीवादी क्यों न हों, जो सोचती हैं कि वे और उन जैसी कुछ महिलायें ही सोच-विचार करने का माद्दा रखती हैं, बाक़ी की सब औरतें कमज़ोर और बेवकूफ

'इंडियाज़ डॉटर': वाद-विवाद-संवाद
 अरविंद जैन                    
अदालत के निषेधाज्ञा आदेश और गृह-मंत्रालय के सरकारी आदेशों के बावजूद, बी. बी.सी. ने 'इंडियाज़ डॉटर' तय समय (विश्व महिला दिवस, आठ मार्च) से चार दिन पहले ही दिखा दी. निर्माता भारत छोड़ इंग्लैंड चली गई. ‘यू ट्यूब’ से लेकर अधिकाँश सोशल साइट्स पर विडियो उपलब्ध है. मीडिया सरकार और अदालत से भी ज्यादा शक्तिशाली हो गया. 'इंडियाज़ डॉटर' का साफ़ सन्देश है कि, अपराधी गरीब-अनपढ़ थे. लड़कियों को ऐसी विकट स्थिति में विरोध-प्रतिरोध नहीं करना चाहिए. कसूर लड़कों का नहीं है. इस बार भी वकीलों के बयान तो और अधिक खतरनाक हैं. निसंदेह यह फिल्म  दुनिया भर की आम स्त्रियों को निरंतर भय और आतंक की मानसिकता में रखने में, महत्वपूर्ण भूमिका निभाने में सफल होगी.

'इंडियाज़ डॉटर' पर हर कोई (पक्ष-विपक्ष में) इतना लिख-बोल रहा (चुका) है कि चीखने को मन करता है....चुप हो जाओ 'ब..ला..ओ’...चुप हो जाओ. निर्भया काण्ड के बाद, जो कानून भारतीय संसद द्वारा बना-बनाया गया है-पढ़ा है कभी! पढ़ लो फिर बोलना (ब...ह...स करना). जानते हो ना! कि ‘बलात्कार’ (भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 375) का दायरा बढाने के लिए गढ़ी भाषा-परिभाषा में, जो ‘यौन कार्य’ (यहाँ लिखना अशोभनीय होगा) शामिल किये गए हैं, उनमे से कोई या सब ‘यौन कार्य’ ‘बिना सहमति’ के करना अपराध है. इसका मतलब यह हुआ कि उनमे से कोई या सब ‘यौन कार्य’, सहमति से करना अपराध नहीं है. मालूम है ना कि अब पति को अपनी 15 साल से बड़ी उम्र की विवाहिता पत्नी के साथ, सम्भोग ही नहीं, उपरोक्त ‘यौन कार्य’ करने का भी ‘कानूनी लाइसेंस’ दे दिया गया है. (पढ़ें- भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 375 का अपवाद) संशोधन से पहले पति को अपनी 15 साल से बड़ी उम्र की विवाहिता पत्नी के साथ, सिर्फ ‘सम्भोग’ करने का ही कानूनी अधिकार था. अब अन्य ‘यौन कार्य’ करने की भी, कानूनी मंज़ूरी मिल गई. बताने की जरूरत नहीं कि इसी प्रावधान में सहमति से सम्भोग की उम्र (जो संशोधन से पहले 16 साल थी) अब 18 साल तय की गई है. शायद इसलिए कि विवाह कानूनों के अनुसार, विवाह के लिए लड़की कि उम्र 18 साल और लड़के कि उम्र 21 साल होनी चाहिए. (हालांकि 18 साल से कम उम्र का लड़का, अगर 18 साल से कम उम्र कि लड़की से भी विवाह करे, तो कानूनन कोई जुर्म नहीं है.)

हमारे ‘महान’ देश का कानून-विधान-संविधान इसे गलत नहीं मानता. भाइयो-बहनों! बहस शुरू करने से पहले इस संदर्भ में (वैवाहिक बलात्कार) पिछले दिनों आये, सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले भी देख-पढ़ लो. पूर्ण रूप से असंवैधानिक, अंतर्विरोधी, विसंगतिपूर्ण और स्त्री विरोधी कानूनों और ‘बलात्कार की संस्कृति’ पर, ‘सभ्य समाज’ की चुप्पी का षड्यंत्र, हमारी  समझदार बहस से बाहर क्यों है? गुस्सा आ रहा है....रक्तचाप बढ़ रहा है....या यह हमारी पवित्र और अटूट विवाह संस्था पर हमला लग रहा है?

खैर! ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ की दुहाई देने वाले या विकृत मर्द मानसिकता को उजागर होने दो का नारा लगाने वाले, कृपया यह ना भूले कि निर्भया काण्ड के दोषियों की अपील पर, अभी सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शेष है और फाँसी की सजा पर रोक लगी-लगाईं हुई है. पहले ही मामला ‘फ़ास्ट ट्रैक’ से ‘स्लो ट्रैक’ में चला गया है. क्या जाने-अनजाने मीडिया, इसे ‘नो ट्रैक’ तक पहुँचाना चाहता है! लगता है कि सुप्रीम कोर्ट में होने वाली बहस को, स्त्री के विरुद्ध बढती यौन हिंसा के सामजिक-आर्थिक परिप्रेक्ष्य और सजा-ए-मौत के मानवीय पक्ष की तरफ मोड़ा जा सकता है. कल फैसले में देरी पर बहस होगी...कहेंगे फाँसी की सज़ा (या देरी) अमानवीय...असंवैधानिक...न्यायिक पूर्वाग्रह-दुराग्रह...राष्ट्रपति को रहम की अपील...फाँसी की सज़ा माफ़ करो. अपराधियों की मानसिक सेहत ठीक नहीं.....देखो..देखो....डॉक्युमेंटरी 'इंडियाज़ डॉटर'. आखिर एक ‘स्त्री’ द्वारा किया गया गंभीर शोध है....देसी मीडिया की नहीं मानते तो कोई बात नहीं, बी.बी.सी. तो दुनिया भर में सबसे ज्यादा विश्वसनीय मीडिया हाउस है.

सुप्रसिद्ध लेखिका सुधा अरोड़ा ने समझाया कि “इस फिल्म को लेकर आप बहुत हाइपर हो रहे हैं, जबकि इसमें ऐसा कुछ नहीं है जो बलात्कारियों के लिए हमारे मन में दया या करुणा उपजाये ! मुकेश नामक अपराधी के सख्त और संवेदनहीन चेहरे को देख कर हिकारत और गुस्सा ही उपजता है! वह तो एक बे पढ़ा लिखा अपराधी है जो जेल की सलाखों के पीछे है ! जो पढ़े लिखे, कानूनविद् सलाखों से बाहर रहकर उसी की भाषा बोल रहे हैं, वे ज़्यादा खतरनाक हैं, उन्हें कब सुधरने का नोटिस दिया जायेगा?”

अरुण महेश्वरी (कलकत्ता) ने लिखा “ये एक वक़ील की टिपिकल दलीलें हैं । पेशे का तर्क भूत की तरह सवार है । क़ानून की अदालत में ही सब कुछ तय नहीं होता कि उसी पर सोचते रहे और वर्तमान के अपने कर्त्तव्यों से आँख मूँद लें! क्या गारंटी है कि दुनिया चुप्पी साध लें तो तत्काल न्याय हो जायेगा? दूसरी किसी भी चीज़ से ज्यादा महत्वपूर्ण है सामाजिक मानसिकता को बदलना. इस शानदार फ़िल्म ने हमारे सामने एक आईना पेश किया है जिसमें अपने समाज की यह जघन्य असहनीय सूरत देखकर आदमी वह नहीं रह सकता जैसा है. यह किसी भी मनुष्य, जानवर को नहीं, को अंदर तक झकझोर देने के लिये काफी है. इसीलिये, सुप्रीम कोर्ट का फैसला आए न आए, इस फ़िल्म का अधिक से अधिक प्रदर्शन किसी भी दूसरी चीज़ से ज्यादा ज़रूरी है. जो इसके प्रदर्शन मंो बलात्कारी का प्रचार देखते हैं वे संभवत: खुद को ही सारी मानवीय संवेदनाओं और ज्ञान के अकेले अधिकारी माने हुए हैं और यह मानते हैं कि जो बलात्कारी और उसके पक्ष के वक़ील की घृणित बातों को सुनेगा, उससे प्रभावित हो जायेगा. जबकि सचाई बिल्कुल उल्टी है. बौद्धिकता का जामा पहन कर बैठे काठ के उल्लू का ही इसे देखकर दिल नहीं काँपेगा, आम आदमी तो हत्यारों और रूढ़िवादियों के इस अमानवीय गंठजोड़ से दहल जायेगा, उन्हें हृदय की अंतिम गहराई तक से कोसेगा और उनकी बर्बादी की प्रार्थना करेगा.“

हम सब जानते हैं कि साल भर से निर्भया मामले की अपील, माननीय सर्वोच्च न्यायालय में बहस के लिए विचाराधीन है. फाँसी की सजा पर रोक लगी है. दिल्ली की एक अदालत ने प्रसारण पर रोक भी लगा रखी है. विचाराधीन मामले के रहते और निषेधाज्ञा के विरुद्ध, फिल्म का प्रसारण स्पष्ट तौर पर अदालत की अवमानना है. फिल्म ‘दया या करुणा उपजाये’ या ‘हिकारत और गुस्सा’, दोनों ही स्थितियों में न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप है. बचाव पक्ष के वकीलों को ‘खतरनाक’ बयान पर, महिला संघठनों के विरोध को देखते हुए बार कौंसिल ऑफ़ इंडिया ने कारण बताओ नोटिस जारी किया है. ‘शानदार फिल्म’ के अधिकांश हिस्से (सिवा मुकेश के बयान) और वकीलों के ‘खतरनाक’ बयान, भारतीय मीडिया पहले ही (दिसम्बर 2012 से दिसम्बर 2013 में) दिखा-सुना चुका है. तब से अब तक, क्या सब सो रहे थे? विरोध किया तो क्या कानूनी कार्यवाही हुई? पुरानी खबरों की इस ‘कतर-ब्योंत’ में, आखिर नया क्या है? क्या मीडिया और बुद्धिजीवियों का भी ‘न्यायिक प्रक्रिया’ से विश्वास उठ गया है?

स्त्री के विरुद्ध हिंसा (यौन-हिंसा) सम्बन्धी कानूनी प्रावधान और प्रक्रिया नाकाफी हैं. सिर्फ ‘फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट’ इसका समाधान नहीं. अपील दर अपील दर अपील में ही उम्र बीत जाती है. छोटे-बड़े पर्दे पर उन्मुक्त सेक्स का ‘आनन्द बाज़ार’, अपराध और विशेषकर यौन हिंसा का प्रदर्शन लगातार बढ़ रहा है. बढ़ रहा है, क्योंकि बिक रहा है. स्त्री देह को देखते ही ‘मर्दों’ (मीडिया)  की लार टपकने  लगती  है  और  दिमाग  में हिंसक घोड़े  हिनहिनाने  लगते हैं. आम सामाजिक चेतना, इससे निष्प्रभावी रह नहीं सकती.

युवा पीढ़ी खासकर दिशाहीन, कुंठित, निर्धन और बेरोज़गार, नशे और अपराध के मायाजाल में फँसते जा रहे है. सुनियोजित अपराधों में सफेदपोश माफिया सक्रिय है. देशभर में राजनीति का अपराधीकरण और अपराधियों का राजनीतिकरण फल-फूल रहा है. आर्थिक दबाव और मानसिक तनाव भी, यौन विकृतियों, बर्बरता और पाशविकता को ही बढ़ावा देता है. निर्भया उर्फ़ ज्योति बलात्कार-हत्या काण्ड की विवेकहीन प्रतिध्वनियाँ, रह रह कर सुनाई पड़ती रहती हैं. कभी रोहतक और कभी गुजरात. व्यक्तिगत से सामूहिक और राजकीय होती जा रही हिंसा के इस दहशतज़दा माहौल में गंभीर चिंता की नहीं, बल्कि गंभीर चिंतन और आमूलचूल बदलाव (सामाजिक-मानसिक) की जरूरत है. स्थितियां निरंतर बेकाबू और विष्फोटक होती जा रही है. ‘नागपुर’ से लेकर ‘दीमापुर’ तक फैली अराजकता हमारे सामने है. 
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