सरोज की डायरी के कुछ पन्ने

वीणा वत्सल सिंह
युवा रचनाकार वीणा वत्सल सिंह दो सालों तक दुमका में पढ़ाने के बाद आजकल लखनउ रहती हैं. संपर्क :veenavatsalsingh19libra@gmail.com>
१६ सितम्बर -, आज मौसम में ऊमस भरी गरमी है .मेरे मन में भी भावों की सघनता ने एक ऊमस भर दी है .आसमान में लगातार बादलों की आवाजाही लगी हुई है .बादल - हां उसका नाम बादल ही तो था .मैं कई बार हंसकर पूछ बैठती -- ' बादल तुम्हारा नाम बादल ही क्यों है ?' और ,बादल बड़े प्यार से हंसते हुए मेरी आँखों में झाँक कहता -- ' क्योंकि बादल की ही तरह मैं तुमसे जो भी प्यार पाता हूँ वापस वही तुम्हारे ऊपर उड़ेल देता हूँ .मैं तुमसे अलग नहीं रह सकता हूँ सरोज .' उसकी बातें ख़त्म होतीं और हम दोनों के ही ठहाके आसपास गूंजने लगते .हंसते - हंसते कभी मैं गंभीर हो उससे कहती -- ' वैसे नामों का विन्यास देखें तो बादल के रहते सरोज का खिलना संभव नहीं उसे तो रवि चाहिए ' सुनकर ,बादल तड़प उठता और धीमे स्वर में पूछ बैठता -- ' यह रवि कौन है ?' उसके उतरे हुए चेहरे को देख मुसकुराते हुए मैं कहती -- ' तुम्हें छोड़ मैं किसी और से प्यार नहीं कर सकती .क्या तुम यह नहीं जानते ?' लेकिन ,मेरी इस बात से बादल की भाव - भंगिमा में कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ता और वह मुंह फुलाकर चुपचाप दूसरी और देखने लगता .उसकी नाराजगी के ये गुजरते पल मेरे ऊपर भारी होते .एक - एक पल में लगता जैसे सांस घुटती जा रही है .मेरे लाख मनाने पर भी जब उसकी नाराजगी दूर नहीं होती मेरी आँखों से आंसू बहने लगते .बादल तड़प उठता और मुझे बांहों में भर दुखी स्वर से कहता -- ' तुम ऎसी बातें करती ही क्यों हो जो मैं सुन नहीं पाता' और तब झट आंसू पोछ हंसते हुए मैं कहती -- ' तुम्हारी बांहों में आने के लिए " प्रेम भरे दिन बस ऐसे ही बीतते जा रहे थे .लेकिन कहते हैं न कि समय सदा एक सा नहीं रहता .मैं और बादल समय की इस चाल से अनजान एक - दूसरे में डूबे हुए थे

१८ सितम्बर - मैं ने एक कागज़ लिया और उस पर बादल की शर्ट की जेब से पेन निकाल लिख दिया ‘मौन ‘ बादल  ने पढ़कर मुस्कुराते हुए कहा – ‘ ये शब्द तो बोल रहे हैं ‘मेरे चेहरे पर हंसी की लहर दौड़ गई .हंसते – हंसते मैं बोल पड़ी –‘यह एक शब्द और बादल तुम इसे कई बोलते शब्द कह रहे हो ?’सुनकर बादल की आँखें हंसने लगीं और धीरे – धीरे यह हंसी पूरे चेहरे पर फ़ैल गई .मेरे  लिए बादल का यह रूप बिलकुल नया था .हम दोनों को एक साथ ‘लिव इन रिलेशनशिप ‘ में रहते हुए पूरे दस माह हो चुके थे .मैं ने इस समय से पहले तक बादल को सिर्फ एक मदहोश प्रेमी के रूप में ही जाना था .उसके चेहरे की हंसी कुछ पलों के बाद गायब हो गई और वह गंभीर स्वर में बोला – ‘ मौन की भाषा की व्यापकता के बारे में जानना चाहती हो तो मौन को सुनने की कोशिश करो ‘ मैं ने हंसते हुए उसके संवारे बालों को अपनी उँगलियों से बिखराकर कहा – ‘क्या बात है बादल आज तुम बिलकुल अलग तरह की बातें कर रहे हो . तुम्हें शायद मालुम नहीं कि इस तरह की गंभीर बातों से मैं घबडा जाती हूँ .मेरी समझ के परे की होती हैं ये बातें .मैं ने तो कागज़ पर मौन बस तुम्हें चिढाने के लिए लिखा था कि आज मैं तुमसे बातें नहीं करूंगी .लेकिन तुम तो ..’ मुझे बीच में ही रोक कर बादल ने कहा – ‘सरोज तुमने मुझे जानने की कोशिश ही कहाँ की .मैं ने जब तुमसे अपने प्यार का इजहार किया तुमने बिना किसी झिझक के उसे एक्सेप्ट कर लिया .शायद ,मेरा ऑफिस में तुमसे बड़ा ओहदा और तगड़ी सैलरी भी एक कारण
रही हो. ’

बादल के इस अंतिम वाक्य से मेरे तन – बदन में आग सी लग गई और लगभग चीखते हुए मैं ने कहा – ‘ बादल क्या तुम मुझे एक छोटी सोच वाली लड़की समझते हो ? ‘
‘बिलकुल भी नहीं सरोज .’ बादल ने हंसकर मुझे अपनी मजबूत बांहों के घेरे में जकड लिया .उसकी पकड़ मेरे इर्द – गिर्द मजबूत होती जा रही थी और मैं उस पकड़ से खुद को आजाद कराने का असफल प्रयास लगातार करती जा रही थी .अपने प्रयास से हारने की अनुभूति होने पर मैं ने जैसे ही कुछ कहना चाहा बादल ने अपने अधर मेरे अधरों पर रख दिए और मेरी आवाज हलक में ही घुट सी गई .उस क्षण के बाद हम फिर से प्रेम की मदहोशी में खो गए और उसके बाद दो दिनों तक – जो कि वीकेंड था – हमारे बीच बातें केवल देह – भाषा में ही हुईं आज जब मैं बादल के साथ ‘लिव इन रिलेशनशिप ‘ में बिताये गए दिनों को याद करती हूँ तो फिर से मन उसके लिए ही बेचैन हो जाता है .लेकिन अब शायद बादल मेरे पास कभी नहीं आयेगा .

१९ सितम्बर - आज सुबह से मूसलाधार बारिश हो रही है .रुक – रुक कर जोरों से बादल गरज रहे हैं बिजली ऐसे चमक रही है जैसे धरती को लील जायेगी .उस दिन बादल के स्वर भी कुछ ऐसे ही कठोर थे .मुझे दो दिनों से बुखार था .बादल ने मुझे डॉक्टर से दिखा दवा देते हुए कहा – ‘ मैं ऑफिस जा रहा हूँ .तुम फ्रीज में रखा ब्रेड फीवर उतर जाने पर खा लेना .’ मैं ने हां में बस सर हिला दिया और दवा खाकर आँखें बंद कर चुपचाप लेट गई .फीवर उतरने पर भी कुछ खाने की इच्छा नहीं हुई .बादल बाहर से ही खा कर देर रात गए ऑफिस से आया .मेरे पूछने पर कि ‘ इतनी देर कैसी हुई ?’ उसने  जवाब देना भी जरुरी नहीं समझा और बिना कुछ पूछे चुपचाप बगल में बैठ थर्मामीटर से मेरा बुखार देख बोला – ‘अभी तो तुम्हे फीवर नहीं .चलो सो जाओ .सुबह बात करेंगे ‘
अगले दिन सुबह – सुबह बादल ने चाय की प्याली और एक प्यारी मुस्कराहट के साथ मुझे जगाया .चाय पीते हुए बादल ने पूछा – ‘कैसी बनी है चाय ?’ मैं ने जवाब में मुस्कराहट बिखेर दी .बादल के चेहरे पर भी मुस्कुराहट खिल गई .अभी उसने कुछ कहने के लिए मुंह खोला ही था कि दरवाजे की बेल बज उठी .बादल का एक मित्र ,जो किसी दूसरे ऑफिस में काम करता था दरवाजे पर खडा था .उसे अन्दर लाते हुए बादल ने कहा –‘ सरोज मिलो मेरे मित्र पुरु से .यह मेरे कॉलेज के समय का मित्र है .’

पुरु बड़े अपनेपन से मुझसे मिला .हममें बातें होने लगीं और बातों – बातों में पुरु ने जान लिया कि मेरी तबियत खराब है और बादल को खाना बनाना नहीं आता .फिर क्या था ,पुरु ने जल्दी से उठकर कहा – ‘मैं बहुत बढ़िया खाना बनाता हूँ .बादल तुम थोड़ी मेरी हेल्प करो .मैं आज तुम दोनों को खाना  बनाकर खिलाता हूँ ‘ – मैं और बादल दोनों ने इसकी बात का विरोध किया लेकिन उसके अपनेपन के आगे हमारी एक न चली .पुरु ने सचमुच काफी बढ़िया खाना बनाया था .मैं उसके खाने की तारीफ़ किये बिना रह न सकी .बादल ने उस दिन छुट्टी ले रखी थी .लेकिन पुरु को ऑफिस जाना था .अत: हमारे साथ खाना खा वह हमसे विदा लेकर ऑफिस चला गया .पुरु के जाते ही बादल की मुख – मुद्रा कठोर हो गई और कड़े स्वर में वह बोला – ‘ अब इतनी तारीफ़ क्यों कर रही थी पुरु की ?’

‘उसने सच में बढ़िया खाना बनाया था बादल .अब तारीफ़ तो बनती है न !’
सुनकर बादल के गुस्से में जैसे आग लग  गई .वह और भी कड़े स्वर में बोला – ‘ या तुम उसकी प्रशंसा कर मुझे नीचा दिखाना चाहती थी .क्योंकि मुझे खाना बनाना नहीं आता ‘
‘लेकिन बादल मैं ने ऐसा  तो सोचा ही नहीं ‘ – मेरा स्वर रुआँसा था
‘झूठ मत बोलो ‘ – बादल गरजा
‘तुम बहुत अधिक पजेसिव हो बादल .इतनी ज़रा सी बात तुहें बर्दाश्त नहीं हो रही ‘—कहते हुए मैं रो पड़ी .
मेरी परवाह किये बगैर बादल कपडे पहन चुपचाप घर से निकल गया .यह बादल से मेरी पहली मुलाक़ात थी – भावनाओं के स्तर पर .शारीरिक रूप से साथ रहते हुए भी हम कितने  अनजान थे एक – दूसरे से ?

२० सितम्बर - कई दिनों के बाद एक दिन पुरु फिर आया बादल के साथ .उसे देख कर मुझे काफी अच्छा लगा था लेकिन  बादल के उस दिन के व्यवहार को याद कर मैं ने पुरु से सीमित बातें की .शायद मैं बादल के साथ एक स्थायी रिश्ता चाहने लगी थी जो विवाह की संज्ञा तक पहुँच सके .ईमानदारी से आज सोचती हूँ तो लगता है इस चाह में बादल की मोटी तनख्वाह और उसका ऊंचा ओहदा भी था .लेकिन ,पुरु के जाने के बाद बादल उस दिन फिर मुझसे यह कहते हुए झगड़ पडा कि मैं उसकी और उसके मित्रों की इज्जत नहीं करती .अजीब मन:स्थिति थी उसकी .खैर ,उसके बाद एक दिन फिर उसने पुरु को खाने पर बुलाया मेरी सहमती से . बादल ने  जो कहा मैं ने वही सारी डिशेज बना दी बिना किसी नुक्ताचीनी के .बादल काफी खुश था .उसके चेहरे की खुशी से मैं ने राहत की सांस ली .पुरु ,हमेशा की तरह मुझसे काफी अपनेपन से ही मिला .पता नहीं ,पुरु कहाँ मेरे दिल में जगह बना पाया उस दिन और ,मैं ने उससे किस भाव के वशीभूत हो उसका फोन नंबर ले लिया .बादल ने इस पर कोई आपत्ति नहीं की .एक दिन मैं ने पुरु से फोन पर बातें भी की और बादल को बताया तो वह हंस पडा और बोला – ‘अब तुम मुझे रोज के क्रिया कलापों की लिस्ट मत दिया करो ‘ मुझे भी अपने इस बचकाने व्यवहार पर हंसी आ गई .पुरु से इसके बाद अक्सर बातें होने लगीं .कभी फोन कॉल से तो कभी मैसेजिंग से .व्हाट्स ऐप पर के मेरे मैसेजेज का जवाब पुरु कभी नहीं देता था इसलिए मैं उसे उसके फोन पर ही मैसेज करती जिसका जवाब वह पूरी मुस्तैदी से देता था ..

२५ सितम्बर - सब कुछ सामान्य चल रहा था कि एक दिन बादल ऑफिस से आते ही मुझ पर आग – बबूला हो गया और बोला – ‘तुम्हें पता है आज पुरु मुझसे मिलने ऑफिस आया था .’
‘हां ,मैं ने उसे तुम्हारे केबिन में जाते हुए देखा तो था .लेकिन वह मुझसे बिना मिले ही चला गया ‘
‘तुम उसे इतने प्यार भरे मैसेज क्यों करती हो ?जबकि रह तुम मेरे साथ रही हो .’—बादल गुस्से से गरजा
मैं ने आश्चर्य से उसे देखते हुए कहा – ‘ लेकिन बादल मैं ने उसे ऐसा कोई मैसेज नहीं किया ?’
‘तो क्या पुरु झूठ बोल रहा है ?’
मैं ने बादल की बातों का कोई जवाब नहीं दिया .लेकिन उसी क्षण मैं ने निर्णय ले लिया कि मैं अब पुरु को न तो फोन करूंगी और न ही कोई मैसेज .कुछ दिनों तक सबकुछ शांत रहा .एक दिन फिर बादल मेरे ऊपर गरज पडा –‘तुम इतनी गिरी हुई होगी मैं ने यह सोचा भी न था ‘
‘ क्यों क्या हुआ ? ‘ मेरा स्वर गुस्से से काँप रहा था .
‘पुरु को तुम इतने अश्लील मैसेज कर रही हो कि मुझे शर्म महसूस हो रही है ‘
‘पर .मैंने उसे न तो कोई मैसेज किया है और न ही कोई कॉल ‘--- जाने क्यों मैं अपनी सफाई देने लगी
जवाब में बादल का स्वर  काफी तेज था – ‘ उसने तुम्हारे मैसेजेज दिखाए हैं मुझे .मैं ने पढ़ा भी है सारे ही तुम्हारे नंबर से थे .मुझे घिन्न आ रही है तुम पर ‘ --- और उसी समय बादल अपने सारे कपडे सूटकेस में भर कहीं और चला गया .बिना मेरा कोई जवाब सुने .मैं उसके इस व्यवहार से हतप्रभ थी .मैं ने उस समय पुरु से मिलने का मन बनाया लेकिन जाने क्यों  मन अवसाद से भर गया मुझे अपने आप से और बादल से घिन्न आने लगी ‘बादल के साथ बिठाये  दिनों की याद कर मुझे उबकाई सी आने लगी .मैं ने ऑफिस से दो दिनों की छुट्टी ले ली और अपने आप को इस नई परिस्थिति से जूझने की हिम्मत बंधाने लगी .दो दिनों बाद हिम्मत कर मैं ऑफिस गई .मेरे और बादल के रिश्ते टूटने की बात ऑफिस में फ़ैल चुकी थी .मेरी कुछ महिला कलिग मुझे सांत्वना दे रही थीं तो कुछ लिव इन रिलेशनशिप की कमियाँ भी समझा रही थीं .कारण सभी जानना चाहते थे लेकिन मैं कुछ बता नहीं पाई .शायद बादल भी इस विषय पर मौन ही रहा होगा क्योंकि रिलेशन टूटने से अधिक किसी को कुछ मालुम न था .इस घटना के कई महीने बीत गए .मैं इस बीच रोज अपने आप से लड़ती रहती .कई बार तो मुझे रात में नींद भी नहीं आती थी .अत: मैं ने डॉक्टर से मिलकर नींद की दवा लेना शुरू कर दिया .अब तो मुझे बिना दवा के नींद ही नहीं आती. उन्हीं मुश्किल दिनों में से एक दिन जब मैं तबीयत ढीली होने के कारण कुछ देर से ऑफिस पहुंची तो देखा ऑफिस में भीड़ लगी हुई थी .ऑफिस एक मल्टीनेशनल कम्पनी के कस्टमर केयर का था तो कस्टमर अपनी समस्याएं लेकर आते ही रहते थे लेकिन इतनी बड़ी संख्या में एकदम से उनका जमा होना आश्चर्य की बात थी .मैं ने अपने साथ काम करने वाली मित्र सुधा से जानकारी लेनी चाही तो सुधा ने बताया – ‘हमारे ऑफिस के फोन नंबर से सभी कस्टमर्स के फोन पर यह मैसेज चला गया है कि वे कम्पनी के सारे प्रोडक्टस के पैसे वापस ले सकते हैं क्योंकि हमारे प्रोडक्ट में एक ख़ास किस्म की गड़बड़ी पाई गई है ,जिसके लिए हम शर्मिन्दा हैं .’ सुनते ही मेरा सर घूमने लगा .मैं ने अपनी आवाज को किसी  तरह ठेलते हुए कहा – ‘क्या यह सच है ?’  ‘नहीं ‘ सुधा ने कहा ‘फिर मुझसे वहाँ रहा नहीं गया और मैं उस दिन छुट्टी लेकर वापस घर आ गई .घर आकर नींद की एक टेबलेट निगल मैं सो गई .कॉलबेल की तेज आवाज से मेरी आँख खुली .दरवाजा खोला तो देखा पुरु और बादल दोनों ही खड़े थे .मैं ने बिना कुछ कहे उन्हें अन्दर आने के लिए रास्ता दिया .अन्दर आकर कुछ मिनट चुप बैठने के बाद बादल ने कहना शुरू किया – ‘आज ऑफिस के फोन से हुई याँत्रिक भूल या कहें किसी शरारती दिमाग की चूक ने मुझे सच का अहसास करा दिया है .सरोज ,मैं समझ गया हूँ कि तुम गलत नहीं थी .’                                                                                                  
बादल की बातों का जवाब देने का मन मेरा बिलकुल भी नहीं हुआ मैं चुपचाप निर्विकार बैठी रही .शायद मेरे चेहरे का भाव कुछ अधिक ही कठोर रहा होगा क्योंकि इस वाक्य से आगे बात बे बात गरजने वाले बादल के शब्द भी खामोश हो गए .पुरु चुपचाप सर झुकाए बैठा रहा .लगभग आधे घंटे की खामोश मुलाक़ात के बाद बादल और पुरु चुपचाप उठकर चले गए .दोनों में से किसी ने अपने व्यवहार के लिए मुझसे माफी नहीं मांगी और न ही शब्दों में कोई शर्मिंदगी जाहिर कीं .मैं ने उस दिन के बाद वह कम्पनी छोड़ दी और एक दूसरी कम्पनी में नौकरी कर ली .कई महीनों  बाद सुधा मुझसे अचानक  मिली थी .तो ,बातों – बातों में उसने मुझे बताया कि बादल ने अपने माता – पिता की पसंद की किसी लड़की से शादी कर ली है और अब वह यहाँ की नौकरी छोड़ कम्पनी के मेन ब्रांच जर्मनी जा रहा है .मैं ने उसकी बातों में कोई दिलचस्पी नहीं जाहिर की लेकिन मेरे अन्दर कहीं कुछ गहरे टूट गया .शायद वह आशा थी कि बादल मेरे पास ही आयेगा .आखिर हममें इतना प्यार जो था .
आज अपनी डायरी का यह पन्ना लिखते हुए सोच रही हूँ कि अगर बादल और मैं विवाह के बंधन से बंधे होते तो शायद मेरे अन्दर की वह प्यारी स्त्री आज भी ज़िंदा रहती या फिर नहीं भी रहती .मुझे अहिल्या की कहानी याद आ रही है .छल और गलतफहमी के बीच एक रेखा खिंची हुई तो रहती है लेकिन स्त्री के लिए परिणाम एक सा ही होता है .काश !कि मैं बादल हो पाती और फिर से अपना जीवन शुरू कर पाती .


५ दिसंबर - आज कुरियर से मुझे एक मोटा सा लिफाफा मिला
.देखा डाक जर्मन से आई थी .धड़कते दिल और कांपते हाथों से मैं ने लिफाफा खोला एक डायरी के साथ पत्र भी था .मैं ने पहले पत्र पढ़ना शुरू किया --- “ सरोज जी ,आप शायद मुझे जानती नहीं .मैं आपके बादल की पत्नी सुपर्णा हूँ .बादल आज भी आपके हैं .हालांकि उनहोंने मुझे कुछ नहीं बताया .लेकिन कई बार नशे में - हां बादल अब काफी शराब पीने लगे हैं --- रात में सोते हुए अक्सर आप का नाम बडबडाते हैं .मैं कुछ पूछती हूँ तो बिना कोई जवाब दिए चुपचाप सूनी आँखों से छत  को देखने लगते हैं .आज अचानक उनकी अलमारी ठीक करते हुए मुझे एक फ़ाइल नजर आई .जो काफी एहतियात से कपड़ों के बीच छुपाकर रखी गई थी शायद .मैं ने उत्सुकतावश जब उसे खोला तो उसमें से यह डायरी रखी हुई मिली .आप खुद ही पढ़ लें .” पत्र पढ़कर मेरी समझ उलझ गई .कांपते हाथों से मैंने डायरी के पन्ने पलटे  .बिना कोई डेट दिए पहले पन्ने पर लिखा था – ‘ सरोज ,मैं तुम्हें सच में बहुत प्यार करता हूँ .तुम्हारे साथ ही जीवन की कल्पना की थी मैं ने लेकिन आज की परिस्थिति के लिए मैं  दोष किसे दूं यह मैं समझ नहीं पा रहा .तुमसे माफी की इच्छा मन में लेकर मैं उस दिन पुरु को लेकर तुम्हारे पास गया लेकिन शायद हमारे बीच का सम्बन्ध इस हद तक जम चुका था कि वह कुछ भी संभव नहीं हो सका जो मैं चाहता रहा . मैं ने माँ के कहने पर जिन्दगी  दुबारा शुरू तो की है .पर ,मैं शायद अब और इस शहर में नहीं रह सकूंगा .सुपर्णा एक भली लड़की है शायद एक अच्छी पत्नी भी साबित हो लेकिन मैं जीवन में उसके साथ न्याय नहीं कर पाऊँगा .न्याय तो मैं तुम्हारे साथ भी नहीं कर पाया .जिन गलतफहमियों  से मैं घिर गया था अगर तुम उन परिस्थितियों में घिरी होती तो शायद तुम भी वही करती जो मैं ने किया .’---- ‘नहीं बादल ,मैं वह नहीं करती जो तुमने किया .शायद मैं एक झटके में अपने रिश्ते को तोड़ नहीं पाती .शायद मैं अपने रिश्ते को थोड़ा समय देती सुलझाने के लिए .मैं तम्हारे साथ अपना पूरा जीवन बीताना चाहती थी ‘---- डायरी पढ़ते हुए मैं बुदबुदा उठी .आँखों में तीखी जलन महसूस हुई और आगे के शब्द धुंधले हो गए .बहुत रोकने पर भी आंसुओं की धार बहने लगी .मैं ने डायरी बंद कर दी और बिस्तर पर लेट गई .मन किया जोर – जोर से चिल्लाकर रोती जाऊं .क्यों हुआ यह सब ? हां बादल मैं ने जीवन में सिर्फ और सिर्फ तुमसे प्यार किया था .जब रोते – रोते आँखों के आँसू सूख गए तो मैं ने वह डायरी फिर से उठा ली  और आगे पढ़ने लगी – ‘ मुझे नहीं पता मैं क्यों अपने मन की बात इन पन्नों में कैद कर रहा हूँ . जानता हूँ तुम तक मेरे शब्द कभी नहीं पहुँच पायेंगे . लेकिन शायद इन्हें लिख लेने के बाद सुपर्णा के साथ न्याय कर पाऊँ .सरोज ,आज भी मैं प्यार के पलों में तुम्हें ही सुपर्णा में ढूँढता हूँ .तुम्हें वहाँ न पा मैं हताश हो जाता हूँ और सुपर्णा की अतृप्त निगाहें मेरे अन्दर एक अजीब सी शर्मिंदगी भर देती है ..सरोज .तुम्हारे बिना मैं जिन्दगी और मौत के बीच झूलता अनुभव कर रहा हूँ .’--   बस इसके आगे सुपर्णा का एक छोटा सा नोट था ;जिसमें बादल का फोन नंबर देते हुए लिखा था – ‘ अब तक आप मेरी और बादल की मुश्किलों को समझ गई होंगीं और मैं आशा करती हूँ कि आप बादल को जरुर फोन करेंगीं .शायद आपसे बात कर बादल अपनी कुंठाओं से मुक्त हो सकें और हमारा जीवन सामान्य हो सकें ‘
डायरी के सच से अधिक मुझे सुपर्णा  के पत्र और नोट ने व्यथित कर दिया .मैं समझ नहीं पा रही कि मैं क्या करू ?

१५ दिसंबर - आज मैं ने सुपर्णा का पत्र और बादल की डायरी जला दी .हां ,लम्बे मानसिक द्वन्द्व के बाद यही फैसला लिया मैं ने .सॉरी बादल ,मैं तुम्हे तुम्हारे हाल पर ही छोड़ती हूँ .समय तुम्हारे और सुपर्णा के साथ खुद ही न्याय करेगा .हां ,तुम्हारी तरह मैं दोहरी जिन्दगी नहीं जी पाऊँगी कभी .मैं ने अभी तक अपने माँ – पापा की बात नहीं मानी .नहीं स्वीकार पा रही हूँ मैं एक नए रिश्ते को .शायद वक्त लगेगा एक नए रिश्ते से बंधने में लेकिन मैं जीऊंगी और तुमसे बेहतर एक जिन्दगी जीऊंगी .ऐसा विश्वास है मुझे – खुद पर और अपनी क्षमताओं पर .

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