मौत तक जाने का रास्ता खुद बनाया पहले उसने

सुधा अरोड़ा
सुधा अरोड़ा सुप्रसिद्ध कथाकार और विचारक हैं. सम्पर्क : 1702 , सॉलिटेअर , डेल्फी के सामने , हीरानंदानी गार्डेन्स , पवई , मुंबई - 400 076 फोन - 022 4005 7872 / 097574 94505 / 090043 87272.
 ( पिछले दिनों स्त्रीकाल  द्वारा शर्मिला रेगे को सम्मानित किये जाने के अवसर पर सुधा अरोड़ा ने उनके लिए लिखी अपनी कविता पढ़कर उपस्थित लोगों को भाव विभोर कर दिया था . पाठकों के लिए सुधा जी की कविता  ) 


महीना भर पहले तुमने हमसे विदा ली
बहुत सलीके से
जैसे लंबी यात्रा पर निकलने से पहले
कोई आंख भर देखकर
गले मिलकर विदा लेता है ....
जैसे जाने से पहले कोई पलकों को
बंद कर देखने से बरज देता है .....
पर क्यों है ऐसा कि तुम जाकर भी गयी नहीं
हमारे भीतर सांस ले रही हो अब तक !

क्या इसलिये
कि तुमने मौत की ओर भीे वैसे ही हाथ बढ़ाया
जैसे हमारी ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया था एक दिन
और फिर
हमारे सारे दुःखों को अपने में समेट लिया
हमें तो पता भी नहीं चला
कि वे बड़े बड़े झुमके जो तुमने कानों में पहने थे
और वह मुड़ी हुई तार वाली नथनी
जो हमें भरमा रही थी
दरअसल हमारी मुसीबतें थीं
जिसे तुमने गिलट के आभूषणों की तरह पहन लिया था
और हमें अपने दुखों से आज़ाद कर दिया था।

तुमने हम सब के हिस्से की लड़ाई को अपने पर लिया
और इतिहास में उनके सूत्र तलाशे
हमें बताया
कि देखो, यह जगह तुम्हारी होनी चाहिये थी
जो तुमसे छीन ली गई
कि अपने हक को पहचानो और लड़ो
और अपनी ज़मीन से उखड़कर
तुम हमारे लिये जगह बनाने में जुट गयी
जैसे ईंट दर ईंट सजाता है मजदूर
और पक्की नींव तैयार कर चल देता है आगे
जैसे फूल गिरने से पहले साथ की टहनी पर
एक बंद कली को भर आंख देख जाता है......
जैसे कोई राजमिस्त्री अपना टाट का परदा हटाकर
अपने औजार साधता है
और दूसरे का घर बनाने में जुट जाता है ।

तुमने परवाह नहीं की अपने घरौंदे की
अपने टाट के परदे की
जो लगातार बारिश में, अंधड़ में छीज रहा था
अपनी भी परवाह नहीं की तुमने ......
नहीं सोचा
कि एक देह की प्रकृति में छह घंटे की नींद भी होती है
और कुछ पल का सुकून भी .....
अपने को उन सारी ज़रूरतों से महरूम रखा
जो सांस को चलाये रखने के काम आती हैं
क्योंकि तुम तो हमारी सांसों को
सम पर लाने में जुटी थीं ।

समय से पहले ही एक हड़बड़ी में
तुमने अपने सारे कामों को अंजाम दिया
और इस आपाधापी में समय से पहले ही थक भी गईं
फिर डूबते सूरज की लालिमा पूरे समंदर पर बिखेरते हुए
तुमने एक गुड़ुप सी डुबकी लगानी चाही अनंत में
और उसका ऐलान भी किया
कि खूब सुकून भरी जि़ंदगी भरपूर जी ली मैंने
कि बस, अब जाना चाहती हूं
वह देखो, तुम्हारे लिये इतना उजास ,
इतनी सारी लालिमा छोड़े जा रही हूं
जो डूब नहीं रही, उग रही है तुम सबके अंदर !

हां, सुनो
उगी तो है
पर इसमें तुम्हारा रेशा रेशा बिखरा है
हम उसे हाथों में भर कर अहद लेते हैं
अपने भीतर तुम्हें समेटेंगे
और इस बार तुम्हें थकने नहीं देंगे
इतनी आसानी से जा नहीं पाओगी अब !
हमारे जाने के बाद भी रहोगी
इतिहास के हर मोड़ पर
क्योंकि यही इतिहास उस आगत को बनायेगा
जिसे बनाने का हमने मिलकर सपना देखा था

                                        13 अगस्त 2013



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