महिला मानवाधिकार बनाम घरेलू हिंसा

डा . परवीन कुमारी रमा

 स्त्री -पुरुष  के बिना विश्व की निरन्तरता, विकास असम्भव है।  इन दोनों के बिना विश्व, परिवार और मानव जीवन अधूरा एवं रिक्त है। दोनों का अस्तित्व एक-दूसरे की अनिवार्य शर्त है।

 स्त्री और पुरुष , ‘तुम’ और ‘मैं’ एक समस्या रहे हैं   जे. कृष्णमूर्ति के अनुसार –
“You and I are the Problem
and not the world, 
because the world is the 
Projection of ourselves and 
to understand the world we
must understand ourselves,
The world is not separate from
us, we are the world, and our
problems are the world’s problems.”

अर्थात ‘तुम और मैं समस्या हैं, हम संसार नहीं हैं।  क्योंकि संसार तो हमारी अपनी प्रतिच्छाया है और इस संसार को समझने केलिए हमें स्वयं को समझना है।  यह संसार हमसे अलग नहीं है, हम ही यह संसार हैं और हमारी समस्याएँ ही संसार की समस्याएँ हैं।”  अंतत:  इन प्रत्येक समस्यों का समाधान हम अधिकार टकराव में न रखकर स्वयं में ही खोजें, हम अपनत्व में खोजें आत्मियता की सरसता.   यह अधिकार चेतना मानवाधिकार के  संदर्भ में अर्थपूर्ण सिद्ध होगी।



डाँ. जगदीश्वर चतुर्वेदी जी ‘स्त्रीवादी साहित्य विमर्श’ में  लिखते हैं कि “स्त्री की समानता के संघर्ष के प्रति दया या सहानुभूति की ज़रूरत नहीं है बल्कि, यह महसूस करने की ज़रूरत है कि यह तो उसका अधिकार था जो उसे दिया जाना चाहिए और इसे देने में अगर मनोवैज्ञानिक, राजनीतिक, सामाजिक या आर्थिक असुविधाएं आये तब भी उसे दिया जाना चाहिए क्योंकि, स्त्री तो सर्जक है, उत्पादक है, श्रमिक है, वह उपभोक्ता नहीं है।  स्त्री को सर्जक की बजाय ज्योंही हम उपभोक्ता बनाते हैं तो एक ओर उसकी सामाजिक सीमा बांध देते हैं वहीं दूसरी ओर उसके सारे अधिकार भी छीन लेते हैं।  उसे उसकी स्वतंत्र पहचान से भी वंचित कर देते हैं अत: स्त्री समानता केलिए चलाया गया संघर्ष पितृसत्ताक विचारधारा के साथ-साथ उपभोक्तावादी पूंजीवादी विचारधारा के साथ भी है। स्त्री समानता का संघर्ष सामाजिक-आर्थिक एवं राजनीतिक इन तीनों स्तरों पर एक ही साथ चलना चाहिए।  इस क्रम में पुंसवादी विचारधारा द्वारा स्त्रियों में पैदा किया गया विभाजन (दलित महिला, सवर्ग महिला, पिछड़ी महिला आदि)  टूटेगा साथ ही स्त्रियों में समानता का बोध पैदा होगा।”  अर्थात अधिकार मानव होने के कारण उसे जो अधिकार प्राप्त हो वे क्या हैं?  कौन उन अधिकारों से उसे वंचित करता आया है? अंतत: जीवित रहने का अधिकार, जो अधिकार सर्व वांछित है, अर्थात सुरक्षा का अधिकार एवं संरक्षण अधिकार।  जीवन कल्याण अधिकार।  ये मुख्य अधिकार हैं। ये अधिकार कब मिल सकते हैं, इसके लिए वर्तमान तथा आने वाली पीढ़ी दोनों को ही स्वयं आत्म-निरीक्षण करना होगा और उक्त दोनों अधिकार उनके कर्तव्य बोध के संदर्भ में तय किया जाने चाहिए।

अब प्रश्न यही उत्पन्न होता है कि क्या भारतीय संविधान में मूल अधिकारों के रूप में इन अधिकारों के प्रावधित करने के पश्चात भी भारतीय स्त्री  को क्या  समान अधिकार प्राप्त हुआ है?  क्या उसको संविधान के प्राक्कथन में किया गया वादा न्याय - सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक,  उन सच्चे व सत्य अर्थों में प्राप्त हुआ जिसका वादा 26 जनवरी 1950 को किया गया था।  संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा प्रकाशित ' दी ह्रूमन डेवेलपमेन्ट रिर्पोट: दी प्रोग्रेस ऑफ दी वर्ल्ड्स वीमेन  रिपोर्ट' में भारतीय  महिलाओं की स्थिति में सुधार बताया गया है।  उसके पश्चात दी ' यू. एन. डी. पी. डाक्यूमेन्ट के समान' ही ' दी यू. एन. फण्ड फॉर डेवेलपमेन्ट आँफ विमेन (यू. एन. आई. एफ. ई. एम.)' के  स्कोरकार्ड में  भारतीय प्रयासों की सराहना की गई है,  जिसके अन्तर्गत भारतीय महिला के लिंग समानता के क्षेत्र में कार्य किया जाना बताया गया है लेकिन व्यवहारिक आकलन यही सिद्ध करता है कि अभी कुछ अधिक प्राप्त नहीं हुआ है और अधिक दूर जाने की आवश्यकता है।
“The advances towards the gender equality have been uneven and there is still a long way to go to make the premises made at Beijing a reality.” अर्थात जेंडर समानता के क्षेत्र में जो प्रगति हुई है, वह समतल नहीं है और बिजिंग सम्मेलन में जो वादे किया गये हैं , उनको वास्तविकता में बदलने केलिए बहुत लम्बी यात्रा तय करनी है।  अर्थात महिलाओं को सबल बनाने केलिए निर्णय लेने के स्तर पर महिलाओं का प्रतिनिधित्व आवश्यक है व महत्वपूर्ण स्थान रखता है।



आज मुख्य असमानता का कारण समाज में महिलाओं का निम्न स्तर होना है, जिसमें कानून में भेदभाव तथा महिलाओं के प्रति अत्याचार एवं हिंसा भी सम्मिलित है।  महिलाओं के प्रति मानसिक तथा शारीरिक हिंसा जन्म से मृत्यु तक बराबर होती रहती है।  आज सभी देशों में महिलाएँ जहाँ इक्कीसवीं सदी की वैश्विक समस्याओं और चुनौतियों से जूझ रही हैं, वहीं बढ़ती गरीबी और आर्थिक अनिश्चितता तथा आए दिन बढ़ते महिला उत्पीड़न और दिल दहला देने वाली हिंसात्मक घटनाओं का शिकार होती महिलाओं ने एक बार फिर विश्व में मानव अधिकारों के हिमायती, समानता और सुरक्षा तथा शांति की दुहाई देनेवाले राष्ट्रों के नेताओं,  अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं और समुदाओं के सामने इस कड़वे सच को उजागर करके, उनके मुखौटे उतार फेंके हैं।  क्योंकि महिलाओं को लिंग भेद के कारण कानूनी अधिकार, सामाजिक अधिकार और आर्थिक अधिकारों का न मिलना आज भूमण्डलीकरण की एक बड़ी चुनौती बन गई है।  इसी कारण महिलाओं का आज सबसे अधिक शोषण हो रहा है।  इसकी सबसे भयावह समस्या अवैध देह व्यापार के रूप में पूरे विश्व के सामने खड़ी है।  अवैध – देह - व्यापार में शोषण, वेश्यावृत्ति, बलपूर्वक श्रम कराना या गुलाम बनाकर देह-व्यापार करना शामिल हैं।  भूमण्डीकरण की इन तमाम चुनौतियों के मद्दे नजर रखते हुये आज महिलाओं की मांगे निरन्तर बढ़ती जा रही हैं।  “विश्व इक्कीसवीं  सदी में प्रवेश कर चुका है।  नई विश्व-व्यवस्था महिला और पुरुषों के समान अवसरों से ही प्राप्त हो सकती है। जब तक विश्व में महिलाओं की आधी आबादी त्रासदी से मुक्त होकर पुरुषों के समान अवसर युक्त जीवनयापन नहीं कर सकेगी,  विश्व-विकास का सपना अधूरा ही रहेगा।  अपनी योग्यता एवं क्षमता के अनुसार हर क्षेत्र में महिलाओं को जब समान अवसर उपलब्ध होंगे, तभी सही विकास होगा।  यद्यपि विश्व में और खासकर भारत में विछले वर्षों में काफी प्रयत्न किया हैं, तदापि अभी भी बहुत कुछ करना बाकी है।”

संयुक्त राष्ट्र संघ की संस्था यूनिफेम की एक रिपोर्ट के अनुसार 45 देशों ने महिलाओं के साथ होने वाली घरेलू हिंसा को रोकने के लिए सुनिश्चित कानून बनाए।  महिलाओं के साथ विभेदकारी व्यवहार की समाप्ति की घोषणा 7 नवम्बर, 1967 को संयुक्त राष्ट्र संघ महासभा द्वारा अंगीकृत किया गया था।  इस घोषणा के अनुच्छेद 10 के अन्तर्गत यह प्रावधान किया गया है कि महिलाओं को फिर वे चाहे विवाहित हों अथवा अविवाहित, पुरुषों के साथ आर्थिक तथा सामाजिक क्षेत्र के सभी समान अधिकार प्रदान किये जाने केलिए समुचित व्यवस्था की जायेगी और विशेषकर –
(क) विवाहित स्तर के आधार पर अथवा किसी अन्य आधार पर बिना किसी भेदभाव के कार्य के व्यवसाय सम्बन्धी प्रशिक्षण प्राप्त कर सके तथा व्यवसाय चयन और रोजगार में उसके साथ किसी प्रकार का भेदभाव न करें।
(ख) पुरुषों के समान मजदूरी तथा उसी के समान कार्य में समान व्यवहार हो।
(ग) वेतन सहित अवकाश का अधिकार, सेवामुक्ति, विशेषाधिकार तथा बेरोजगारी, बीमारी,  वृद्धावस्था  अथवा काम करने की अन्य अयोग्यताओं की दशा में सुरक्षा सम्बन्धी प्रावधान।
(घ) पुरुषों के समान शर्तो पर पारिवारिक भत्ता प्राप्त करने का अधिकार महिलाओं के विरुद्ध विवाह के आधार पर अथवा मातृत्व के आधार पर विभेद को समाप्त करने केलिए तथा उन्हें प्रभावकारी अधिकार दिलाने केलिए कार्य किये जाऐंगे तथा उनको आवश्यक सामाजिक सेवायें जिसके अन्तर्गत बच्चों की देखरेख, रोजगार सम्बन्धी सेवायें आदि सम्मिलित होंगी फिर भी शारीरिक प्रकृति की भिन्नता के कारणों से कुछ प्रकार के कार्यों में महिलाओं की सुरक्षा केलिए स्तर निर्धारित किया जायेगा जो कि विभेदकारी नहीं होगा।


10 दिसम्बर को पूरी दुनिया  में “मानावाधिकार दिवस” के रूप में मनाया जाता है। “10 दिसम्बर 1948 को संयुक्त राष्ट्र की साधारण सभा ने संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकारों की विश्वव्यापी घोषणा को अंगीकृत किया गया।  मानवाधिकारों की विश्वव्यापी घोषणा में प्रस्तावना एवं 30 अनुच्छेद हैं।”  इस विश्वव्यापी घोषणा की प्रस्तावना में कहा गया है कि “मानव समुदाय के सभी सदस्यों के गौरवपूर्ण जीवन एवं समानता के अधिकार विश्वव्यापी स्वतंत्रता, न्याय एवं शान्ति के अधिकार केलिए है, जहाँ पुरुष एवं महिला अच्छे सामाजिक विकास के साथ अधिक से अधिक स्वतंत्रता प्राप्त कर सके।”  अर्थात अनुच्छेद 1 से लेकर अनुच्छेद 20 तक व्यक्ति के नागरिक तथा राजनीतिक अधिकारों की व्याख्या की गई है तथा अनुच्छेद 21 से 30 तक व्यक्ति के सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक अधिकारों को सम्मिलित किया गया है।

महिलाओं के साथ हिंसा, विश्व में आज मानव अधिकार उल्लंघन का सबसे घिनौना रूप माना जा रहा है।  आज पूरे विश्व की महिलायें इस समस्या का सामना कर रही है।  यदि हम वैश्विक दृष्टि से देखें तो प्रत्येक तीन महिला में से एक महिला के साथ बलात्कार होगा या उसे पीटा जाऐगा या सेक्स के धंधे में जाने केलिए उसे विवश किया जाऐगा या पूरे जीवन हिंसा के अभिशाप को भोगने केलिए तत्पर रहना होगा।  आज ‘घरेलू हिंसा’ एक चिन्ता का विषय बन चुका है।  वास्तव में महिलाओं के विरुद्ध होने वाली आपराधिक हिंसा का कारण कोई एक तथ्य नहीं है।  अर्थात ‘घरेलू हिंसा’ महिलाओं एवं लड़कियों के विरुद्ध यह एक ऐसी भूमण्डलीय गंभीर समस्या है जो उसे शारीरिक, मानसिक, यौनाचार और आर्थिक रूप से उसकी हत्या करती या उसे अपंग बना देती है।  मानव अधिकारों का यह सर्वाधिक व्यापक उल्लघंन है जिसके द्वारा महिलाओं तथा लड़कियों को सुरक्षा, सम्मान, समानता, आत्म उत्कर्ष और बुनियादी आजादी के अधिकारों से वंचित रखा जाता है।  अर्थात ‘घरेलू हिंसा’ एक ऐसा अपराध है जो न तो सही गैर पर रिकॉर्ड किया जाता है और न ही इसकी सही तौर पर रिपोर्ट की जाती है। अंतत: जब कोई महिला रिपोर्ट लिखवाना चाहती है या मदद चाहती है तो पुलिस उसके प्रति उदासीनता का व्यवहार करती है।  इसके साथ-ही-साथ महिला का यह भी सत्य है कि शर्म, बदला लिए जाने का भय, कानूनी अधिकारों की जानकारी न होना, अदालती प्रक्रिया के प्रति विश्वास की कमी या भय, कानूनी कार्यों पर होने वाले खर्च भी ऐसे ही कारण हैं जो घरेलू हिंसा से उत्पीडित महिला को रिपोर्ट न लिखवाने केलिए विवश करते हैं।  विश्व स्वास्थ्य संगठन ने महिलाओं के विरुद्ध हिंसा का पूरा जीवन क्रम यों उजागर किया है।
1) जन्मपूर्व हिंसा – लिंग चुनाव केलिए भ्रूण हत्या, लिंग-जाँच हो जाने पर गर्भावस्था के दौरान औरत पर अत्याचार क्योंकि वह बालिका शिशु को जन्म देने वाली है।
2) शैशव हिंसा - बालिका शिशु के जन्म लेते ही उसकी हत्या। इसके साथ ही उसे जन्म देने वाली औरत को दिए जाने वाले शारीरिक, यौन और मानसिक उत्पीड़न।
3) बालिका उत्पीड़न - बाल विवाह, महिलाओं का खतना, शारीरिक, यौन और मानसिक उत्पीड़न, दुराचारपूर्ण व्यवहार, बाल वेश्यावृत्ति और अश्लील सामग्री तैयार करने केलिए उनका इस्तेमाल।
4) किशोरावस्था और प्रौढ़ावस्था में हिंसा-डेटिंग और सामंती हिंसा (एसिड फेंकना, डेट के दौरान बलात्कार करना), गरीबी के कारण मजबूर करके यौनाचार करना (जैसे लड़कियों द्वारा अपनी स्कूल फीस के बदले, फीस देनेवाले के साथ यौन-संबंध बनाना), दुव्र्यवहार, कार्यस्थल पर यौनशोषण, बलात्कार, यौन उत्पीड़न, जबरदस्ती करवाई गई वेश्यावृत्ति, अश्लील सामग्री केलिए दुरुपयोग और हत्याएँ, मानसिक उत्पीड़न, विकलांग महिलाओं का यौन शोषण, बलात करवाया गया गर्भधारण।
5) वृद्ध महिलाओं के साथ हिंसा - आत्महत्या करने के लिए विवश कर देना या आर्थिक कारणों से की गई हत्या। यौन, शारीरिक और संवेदना के स्तर पर मानसिक उत्पीड़न। अर्थात आज वैश्विक स्तर पर बचपन से लेकर वृद्धावस्था तक लड़कियों और महिलाओं के साथ हो रही हिंसा की इस महामारी ने सारे विश्व को जकड़ लिया है।

घरेलू हिंसा के तहत पति द्वारा किया गया यौन-उत्पीड़न या बलात्कार अधिकांश देशों में अपराध नहीं माना जाता है।  कहने का अभिप्राय यदि एक बार एक महिला विवाह बंधन में बंध जाती है तो पुरुष (पति) उसके साथ मनचाही यौन क्रिया करने का अधिकारी हो जाता है।  इस समस्या को हल करने केलिए अनेक देशों ने ‘दांपतिक बलात्कार के विरुद्ध कानून’ बनाने की दिशा में कार्य किया है।  जिनमें – “आस्ट्रेलिया, आस्ट्रिया, बाखाडोस, कनाडा, साईप्रस, जर्मनी, आयरलैंड, मेक्सिको, नामीबिया, डेनमार्क, दि डोमिनिकल रिपब्लिक, इक्वेडोर, फिनलैंड, फ्रांस, न्यूज़ीलैंड, स्वीड़न, नार्वे, दि फिलिपाइंस, पोलैंड, रूस, दक्षिणी आफ्रिका, स्पेन, यु.के, ट्रिनिड़ाड, टोबैगो और अमेरिका।” घरेलू हिंसा को रोकने केलिए जो कानून बनाये जा रहे हैं उसमें प्रगति हो रही है किन्तु समस्या यह उत्पन्न होती है कि, पीड़ित महिला अपराध संबंधी कानूनों को आरोपों की पुष्टि केलिए आवश्यक सबूत उपलब्ध नहीं करा सकती है। स्टीफेनी ए. आइसेनटैट और लुंडी बैक्राफ्ट के अनुसार ‘घरेलू प्रातड़ना या उत्पीड़न दांपत्य संबंधों में पति द्वारा किया गया मानसिक, आर्थिक और बलपूर्वक यौनाचार का ऐसा स्वरूप है, जिसे शारीरिक चोटों या शरीर को क्षति पहुँचाने वाली विश्वसनीय घमकियों द्वारा चिन्हित किया जाता है।  महिला उत्पीड़न या घरेलू हिंसा उन सोचे-समझे नियन्त्रणकारी आचरणों और प्रवृत्तियों का जोड़ा है जिन्हें सांस्कृतिक रूप से समर्थन प्राप्त होता है और जो पाशबद्धता वाले संबंध-स्वरूप को जन्म देते हैं।  इस प्रताड़ना का लक्ष्य आमतौर से महिलाएँ और बच्चे ही होते हैं और एक महिला को इन बेड़ियों से मुक्त होने में वर्षों लग जाते हैं और इस पूरी अवधि में प्रताड़ना का स्तर निरन्तर बढ़ता चला जाता है।” अर्थात विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट 2002 में हिंसा (जिस में घरेलू या दांयतिक हिंसा भी सम्मिलित है) को व्यापक रूप से परिभाषित किया गया है।  अरविंद जैन जी ‘औरत होने की सज़ा’ में स्त्री उत्पीड़न के बारे में यों लिखते हैं कि “समाजसेवी संस्थाओं, शोधकर्ताओं और विचारकों के सुझाव पर 1986 में एक बार फिर बिल नंबर 44 प्रस्तावित किया गया जो राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद 26 जनवरी, 1987 से लागू हो गया है।  इस अधिनियम का नाम ‘महिला और बालिका अनैतिक देह-व्यापार नियंत्रण अधिनियम’ कर दिया गया है।  यहाँ उल्लेखनीय है कि ‘दमन’ के स्थान पर ‘नियंत्रण’ शब्द का प्रयोग किया गया है।” अंतत: शारीरिक प्रताड़ना में ऐसा कोई भी कार्य या आचरण सम्मिलित नहीं है जो इस तरह का हो कि वह उत्पीड़ित महिला, लड़की को शारीरिक पीड़ा या अन्य कोई हानि या शरीर के अंगों या स्वास्थ्य को उत्पीडित करके उसे क्षति पहुँचाए।  जिसमें उसका अपमान, उपहास, नीचा दिखाना, अनादर करना, भद्दे नामों से पुकारना आदि भी आ जाते हैं।


हमारे भारतीय समाज में पुरुष के सम्मान के लिए महिलाओं की ज़िन्दगी ले ली जाती है।  उदाहरणतया पुरुष का सम्मान, प्राय: उसके परिवार की महिला की मानी हुई यौन ‘पवित्रता’ से जुडा होता है। यदि किसी भी औरत या लड़की का यौन दूषित हो जाती है जैसा कि बलात्कार या वैवाहिक संबंधों के होते हुए स्वेच्छा से किसी और से यौनसंबंध बना लेती है उसके प्रति समाज व परिवार का मानना है कि उसने समाज व परिवार का सम्मान घटाया है तथा अपमानित किया है।  अनेक बार तो उसे इस अपमान व सम्मान के लिए अपने प्राणों की आहूति तक देनी पड़ती है।  यहाँ समस्या यह उजागर होती है कि लड़की या महिला के साथ यौन शोषण हो रहा है तो केवल वही दण्ड की अधिकारणी क्यों? पुरुष केलिए कोई दण्ड क्यों नहीं है? यौन शोषण तो पुरुष ही करता है महिला का फिर महिला किस भांति अपवित्र या अपमानित हो सकती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन 2002 की रिपोर्ट के अनुसार – “दाम्पत्यमूलक हिंसा के बारे में पूरे विश्व में किए गये 48 प्रतिशत सर्वक्षण बताते हैं कि 10 प्रतिशत से 69 प्रतिशत महिलाओं ने बताया कि उसके जीवन में कभी न कभी पति द्वारा हिंसा अवश्य की गई है। दाम्पत्य संबंधों में शारीरिक प्रताड़ना के साथ-साथ मानसिक प्रताड़ना भी शामिल होती है, और एक तिहाई से लेकर आधे मामलों में यौन प्रताड़ना भी होती है” अर्थात पति-पत्नी के मध्यम विभिन्न प्रकार की प्रताड़नाएँ एक-दूसरे से जुड़ी रहती है।  जीवन-साथी द्वारा की गई घरेलू हिंसा कभी-कभी महिलाओं की मौत का कारण भी बनती रहती है।  भारत में महिलाओं की अधिकतर हत्यायें पिटाई और आग से होती है।  औरत पर किरोसिन डालकर आग लगा दी जाती है और बाद में कहा जाता है कि ‘रसोईघर में दुर्घटनावश’ मृत्यु हो गई।  यह घरेलू हिंसा आखिर होती क्यों है?  पहला वह कि जिसमें हिंसा गम्भीर तथा उग्र रूप ले लेती है जैसे भद्दी व गन्दी गालियाँ देना, आतंकित करना व प्रताड़ित करना। साथ ही उसका नियन्त्रणकारी एवं एकाधिकार प्रदर्शित करनेवाला व्यवहार।  दूसरी हिंसा यों कह सकते हैं कि लगातार चलनेवाली कुंठा और क्रोध कभी-कभी शारीरिक प्रताड़ना के रूप में प्रकट हो जाते हैं।  घरेलू हिंसा का भड़काने का कारण भी कभी-कभी यह कह सकते हैं –
1) पुरुषों की आज्ञा न मानना।
2) उलटकर बहस करना या जवाब देना।
3) वक्त पर खाना तैयार न करना।
4) घर के बच्चों की ठीक से देखभाल न करना।
5) पुरुषों के धन या गर्लफ्रेंड़स के बारे में पूछताछ करना।
6) पति की अनुमति के बगैर कहीं चले जाना।
7) पुरुषों को सेक्स केलिए मना करना।
8) पुरुषों को पत्नी पर विश्वासघाती होने का संदेह।

 प्राय: पूरे विश्व की महिलायें यह मानती हैं कि पुरुषों को अपनी पत्नी को अनुशासित में रखने का अधिकार है और आवश्यकता पड़ने पर वह उसे बलपूर्वक प्रताड़ित भी कर सकता है, लेकिन जहाँ की संस्कृतियाँ स्वयं पुरुष को महिलाओं के व्यवहार और नियंत्रण का अधिकार देती है, वहाँ सदैव दुराचारी पुरुष प्राय. सीमाएँ लाँघ जाते हैं।  अर्थात दाम्पतिक हिंसा विश्व के प्रत्येक भागों में गंभीर और व्यापक रूप से फैली हुई एक गंभीर समस्या है।  इसीलिए इस दिशा में ठोस परिणाम देनेवाले कार्यों को पूर्ण करना आवश्यक माना जाने लगा है।
 महिलाओं के विरुद्ध हिंसा समाप्त करने हेतु संयुक्त राष्ट्र महासभा घोषण-पत्र वियना में संपन्न मानव अधिकार विश्व सम्मेलन (1993) द्वारा अपने घोषणा पत्र में महिलाओं के विरुद्ध हिंसा को रोकने संबंधी घोषणा को सम्मिलित करने का यह परिणाम हुआ कि 20 दिसम्बर, 1993 को संयुक्त राष्ट्र महा सभा ने ‘महिलाओं के विरुद्ध हिंसा’ को समाप्त करने केलिए एक विस्तृत घोषणा-पत्र जारी किया।  इस घोषणा-पत्र के जारी होने से ‘महिलाओं के विरुद्द हिंसा’ एक अंतर्राष्ट्रीय समस्या के रूप में सामने आई और संयुक्त राष्ट्र संघ के सभी सदस्य देशों केलिए इसका पालन अनिवार्य बन गया।  इस प्रकार घरेलू हिंसा को समाप्त करने की एक वैश्विक मुहिम प्रारम्भ हुई।  इस अंतर्राष्ट्रीय मानव अधिकार संधि को मनाने केलिए 179 देशों ने हस्ताक्षर किये थे।  यह ध्यान देते हुए कि वे अधिकार और सिद्धान्त उन अंतर्राष्ट्रीय साधनों में समाहित हैं, जैसे - मानव अधिकारों का सार्वभौमिक घोषणा-पत्र, नागरिक और राजनीतिक अधिकारों संबंधी अंतर्राष्ट्रीय प्रतिज्ञा-पत्र, महिलाओं के विरुद्ध हर तरह के भेदभाव को समाप्त करने संबंधी सम्मेलन का घोषणापत्र और प्रताड़ना तथा अन्य क्रूर मानवीय, अपमानजनक व्यवहार या दण्ट देने के विरुद्ध सम्मेलन का घोषणा-पत्र।

निष्कर्ष के रूप में कह सकते हैं कि महिलाओं के विरुद्ध हो रही ‘घरेलू हिंसा’ को स्पष्ट और व्यापक रूप से परिभाषित किया जाये तथा महिलाओं के विरुद्ध हिंसा के प्राय: सभी रूपों को समाप्त करने केलिए और अधिक प्रयास किया जाये। क्योंकि एक ओर तो जहाँ कानून बनाये जा रहे हैं, संशोधित किये जा रहे हैं तो वहीं दूसरी ओर सरकारी घोषणाओं में उन्हें लागू किये जाने की बात कही जाती है।  किन्तु वास्तव में जो परिणाम सामने आना चाहिए वह नहीं आ पाता।  आवश्यकता है तो जनता, प्रशासन और कानून तथा उसे लागू करनेवालों के नज़रिए में बदलाव की।  सादियों से जो घोषणाएँ, पारंपरिक मान्यताएँ, धार्मिक विचार, नैतिक मूल्य महिलाओं की सामाजिक, आर्थिक या व्यक्तिगत स्थिति पर अत्याचार करती आ रही है, निस्संदेह उसे एक दिन में समाप्त नहीं किया जा सकता।  लेकिन अगर व्यापक पैमाने पर प्रत्येक वर्ग और प्रत्येक माध्यम इस अभियान में पूरी शक्ति व निष्ठा से साथ दे तो विश्चित ही इस हिंसात्मक हिंसा का अंत हो सकता है।
डा . परवीन कुमारी रमा हिन्दी साहित्य में पी एच डी हैं , केरला में रहती हैं . संपर्क : Mail idparvilordshiva7@gmail.com

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