नरेश मेहता के उपन्यासों में स्त्री-जीवन

नितिका गुप्ता
नितिका गुप्ता डा. बाबा साहब आम्बेडकर विश्वविद्यालय , दिल्ली से शोध कर रही हैं.   संपर्क : nitika.gup85@gmail.com .
 नरेश मेहता (जन्म 15 फरवरी 1922, मृत्यु 22 नवम्बर 2000) स्वातंत्र्योत्तर भारत के प्रमुख रचनाकारों में गिने जाते हैं। नरेश मेहता का वास्तविक नाम पूर्णशंकर मेहता था। उनकी काव्य प्रतिभा से प्रभावित होकर एक दिन नरसिंह गढ़ की राजमाता ने उन्हें ‘नरेश‘ नाम से सम्बोधित किया। बस तभी से वह नरेश मेहता नाम से पहचाने जाने लगे। उन्होंने साहित्य की हर विधा-काव्य, खण्डकाव्य, उपन्यास, कहानी, नाटक, एकांकी, निबंध, यात्रा-वृत्तांत आदि में रचना की है। उनकी अब तक लगभग 40 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।

नरेश जी ने लगभग तीन दशकों में कुल सात उपन्यासों की रचना की थीं। उनका प्रथम उपन्यास डूबते मस्तूल सन् 1954 में और अंतिम उपन्यास उत्तरकथा भाग दो सन् 1982 में प्रकाशित हुआ। ‘डूबते मस्तूल’ उपन्यास में रंजना नाम की एक आधुनिक स्त्री का चरित्र, उसी के शब्दों में प्रस्तुत किया गया है। इस उपन्यास की अवधि16 घंटों की है। इन 16 घंटों में रंजना अपनी संपूर्ण जीवनगाथा को (पूर्वदीप्ति पद्धति में) अपरिचित स्वामीनाथन को परिचित अकलंक का आवरण देकर सुनाती है। रंजना का चरित्र पाल-पतवार रहित नौका की तरह उद्देश्यहीन, रोचक और करुण, पर अविश्वसनीय है। उसे जीवनभर कोई भी स्थायी सहारा नही मिलता है। वह जिस भी व्यक्ति के करीब जाती है वहीं उससे दूर चला जाता है या वह खुद ही उससे दूर हो जाती है। जिस कारण वह जिन्दगी भर भटकावग्रस्त जीवन व्यतीत करती रहती है।

8 वर्ष के बाद मेहता जी का दूसरा उपन्यास ‘यह पथ बन्धु था’ सन् 1962 में प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास ने उन्हें एक उपन्यासकार के रूप में स्थापित किया। यह उपन्यास एक आदर्शवादी, ईमानदार, स्वाभिमानी युवक श्रीधर की पराजय, थकान और टूटन की कहानी है। साथ ही इस उपन्यास में भारतीय स्त्री की भी करुण गाथा कही गयी है। नरेश मेहता ने मध्यवर्गीय परिवार की सरस्वती, गुणवन्ती के साथ ही सामन्तवर्गीय परिवार की इन्दु का भी यथार्थ चित्रण प्रस्तुत किया है। इस उपन्यास मे नरेश जी ने शिल्प मे प्रौढ़ता प्राप्त कर ली है।
नरेश मेहता ने चार खंडों में एक बृहत् उपन्यास की योजना बनाई थी। इसका प्रथम खंड ‘धूमकेतु: एक श्रुति’ सन् 1962 में और द्वितीय खंड ‘नदी यशस्वी है’ सन् 1967 में प्रकाशित हुआ। लेकिन किसी कारणवश इस उपन्यास का तृतीय और चतुर्थ खंड या तो लिखे ही नही गये या प्रकाशित नही हो सके। लेखक ने इस उपन्यास को संगीत के आधार पर विभाजित किया है। इसके प्रथम खंड को ’श्रुति-विस्तार’ की और द्वितीय खंड को ’श्रुति-आलाप’ की संज्ञा दी गयी हैं। इस उपन्यास में उदयन की आत्मकथा प्रस्तुत की गयी है। जहाँ ‘ धूमकेतु: एक श्रुति’  मे उसके शैशवावस्था का चित्रण है तो वहीं ‘ नदी यशस्वी है’  मे उसकी किशोरावस्था का चित्रण किया गया है।

मेहता जी का ’दो एकांत’ उपन्यास सन् 1964 में प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास में विवेक और वानीरा के माध्यम से शिक्षित मध्यवर्गीय दम्पति का चित्रण प्रस्तुत किया गया है। लेखक ने इन दोनों के माध्यम से प्रेम और प्रेम के तनाव की कथा कही है। विवेक और वानीरा एक-दूसरे के साथ होते हुए भी अपने मन की व्यथा एक-दूसरे को नही बता पाते। जिस कारण उनका रिश्ता धीरे-धीरे भस्म होता जाता है और उपन्यास के अंत मे वह दोनों दो एकांत बनकर रह जाते हैं।नरेश जी का अगला उपन्यास ’प्रथम फाल्गुन’ सन् 1968 में प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास का केन्द्रीय विषय प्रेम है। गोपा और महिम एक-दूसरे को पहली बार फाल्गुन मे ही मिलते हैं और अगले फाल्गुन मे ही हमेशा के लिए अलग हो जाते हंै। जहाँ गोपा का प्रेम धरती के गर्भ में छिपे जल की तरह है वहीं महिम अन्तरालाप के रूप में गोपा के प्रति तड़पता है। जब गोपा महिम के समक्ष अपने जारज संतान होने की बात स्वीकारती है तो महिम समाज-भीरु होने के कारण उससे अपने सारे नाते तोड़ लेता है। इस तरह एक प्रेम कहानी का दुखद अंत हो जाता है।

प्रथम फाल्गुन के 11 वर्षों  बाद नरेश मेहता का अंतिम उपन्यास ’उत्तरकथा’ दो भागों (प्रथम भाग सन् 1979 और द्वितीय भाग सन् 1982) में प्रकाशित हुआ। यह उनका ’यह पथ बंधु था’ के बाद दूसरा महाकाव्यात्मक उपन्यास है। इसमे भारतीय मध्यवर्ग के जीवन को उकेरा गया है। इसके केन्द्र में ब्राह्मण परिवार की तीन पीढि़यों का चित्रण किया गया है। इसका प्रथम भाग 1900 से 1930 तक के और द्वितीय भाग 1930 से 1948 तक के काल समय में व्यक्ति और समाज के बिखराव को समेटे हुए हैं।नरेश जी ने अपने उपन्यासों में स्त्री के हर रूप-बेटी, बहन, पत्नी, बहू, माँ, सास, प्रेमिका आदि का चित्रण किया हैं। वह स्त्री को आदर्श या पतिता के रूप में चित्रित ना करके मानवीय रूप मे चित्रित करते हैं । उनके उपन्यासों में स्त्री परम्परागत और आधुनिक दोनों रूपों में आई हैं। वह स्त्री के ममतामयी और त्यागमयी रूपों के साथ ही उसके स्वच्छन्द और आत्मनिर्भर रूपों को भी प्रस्तुत करते हैं। उनके उपन्यासों के केन्द्र में हर आयु वर्ग की स्त्रियाँ हैं। प्रभाकर श्रोत्रिय कहते हैं कि “सर्वत्र स्त्री को अपार संवेदना देकर, भाँति-भाँति के प्रदेशों, आयुवर्ग की स्त्रियों का अकंन कर नरेश ने समूची मानवता और उसकी करुणा-धैर्य-संयम-बलिदान की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति कर के समूचे असहिष्णु समाज के प्रति इसी माध्यम से अपनी वितृष्णा और असहमति जताई है।”1

नरेश मेहता ने अपने समय की स्त्री का यथार्थ चित्रण अपने उपन्यासों में किया हैं। उन्हें स्त्री के परम्परागत स्वरूप में जो कुछ भी गलत लगा, उसका उन्होंने पुरुष होते हुए भी खुलकर विरोद्ध किया है। वह अपने समाज में स्त्री की स्थिति का गहनता से अध्ययन करते हुए, उसका मार्मिक चित्रण अपने उपन्यासों में प्रस्तुत करते हैं। उन्होंने अपने उपन्यासों में स्त्री जीवन की विभिन्न समस्याओं जैसे-अनमेल विवाह, बहुविवाह, दहेज प्रथा, वेश्यावृत्ति, यौन-उत्पीडि़न, जारज संतान आदि का दारुण चित्र प्रस्तुत किया हैं। साथ ही वह स्त्री जीवन के सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष-मातृत्व भाव का भी हृदयस्पर्शी चित्रण प्रस्तुत करते हंै। वह स्त्री की सभी समस्याओं का हल शिक्षा को मानते हैं। वह स्त्री को घर की चारदीवारी में ना रखकर, उसे समाजसेवा और देशसेवा करने के लिए भी प्रेरित करते हैं।

मेहता जी ने स्त्री के विधवा हो जाने पर उसके जीवन में आने वाले उतार-चढ़ावों को अपने उपन्यासों में चित्रित किया हैं। धूमकेतु: एक श्रुति उपन्यास में उदयन की बुआ दादी (माँ) बाल विधवा है, वह श्रृंगार नही करती है, उसके बाल नही है, सफेद साड़ी पहनती है और वह किसी शुभ कार्य में भाग नही लेती है। वहीं रत्नशंकर की विधवा पत्नी को जायदात मे हिस्सा यह कहकर नही दिया जाता कि ’यह शास्त्रगत नही है’। नरेश मेहता ने सूर्यशंकर द्वारा यह प्रश्न भी उठाया है कि-पुरुष को तीन-तीन विवाह करने का हक है तो स्त्री दूसरा विवाह क्यों नही कर सकती? लेकिन उनका यही पात्र सूर्यशंकर अपनी पत्नी को कुरूप होने के कारण त्याग देता है। यह स्त्री जीवन की कितनी बड़ी विडबंना है कि उसके गुणों को ना देखकर उसकी खूबसूरती को देखा जाता है। नरेश जी अनमेल विवाह की समस्या को भी चित्रित करते हंै। यह पथ बंधु था उपन्यास की इन्दु का विवाह एक बुढ़े जमींदार से कर दिया जाता है। विवाह के कुछ समय बाद ही वह विधवा हो जाती है और उसे अपना पूरा जीवन तीर्थाटन करते हुए व्यतीत करना पड़ता है। वहीं अगर स्त्री माँ नही बन पाती तो उसे सामाजिक बहिष्कार झेलना पड़ता है। धूमकेतु: एक श्रुति उपन्यास की मनुमाँ माँ ना बन पाने के कारण समाज द्वारा डाक्कन कहकर पुकारी जाती है। उत्तरकथा भाग एक उपन्यास मे वसुन्धरा के माँ ना बन पाने का कारण उसका बाँझ होना माना जाता है। जबकि वह दुर्गा को बताती है कि ’कमी उसमे नही है उसके पति मे है’। वहीं प्रथम फाल्गुन उपन्यास मे श्रीमती नाथ के माँ ना बन पाने के कारण रिटायर जस्टिस नाथ बाबू दूसरा विवाह कर लेते हंै। नरेश मेहता बताते हैं कि “लग्नोपरान्त भी जब अनेक वर्षों तक कोई सन्तान न हुई तब नाथ बाबू को दूसरे विवाह के लिए बाध्य होना पड़ा।”2 यह स्त्री जीवन का कितना बड़ा दुर्भाग्य है कि अगर वह माँ नही बन पाती है तो उसमे ही कमी मानी जाती है और पुरुष को दूसरा विवाह करने का अधिकार प्राप्त हो जाता है। जबकि इस समस्या का समाधान बच्चा गोद लेकर भी किया जा सकता है।

मेहता जी अपने उपन्यासों में आए दिन दहेज की बलि चढ़ने वाली स्त्रियों का भी हृदयस्पर्शी चित्रण प्रस्तुत करते हैं। डूबते मस्तूल की रंजना, यह पथ बंधु था की गुणवन्ती, उत्तरकथा के त्र्यम्बक की पहली पत्नी और दुर्गा दहेज के लिए प्रताडि़त की जाती हैं। गुणवन्ती को दहेज के लिए इतना मारा-पिटा जाता है कि वह लंगड़ी हो जाती है। वहीं त्र्यम्बक की पहली पत्नी को दहेज में सोने का पानी चढ़े जेवर लाने के कारण त्र्यम्बक की माँ कृष्णादेवी उसे कुएं में धक्का देकर मार देती है । गोपाल राय सही ही कहते हैं कि “भावनाप्रवण और दुखी स्त्रियों के चित्रण में नरेश मेहता शरच्चन्द्रीय भावुकता के शिकार तो हैं, पर वे उस भारतीय नारी का अत्यंत मार्मिक चित्रण करने में सफल हुए हैं जो करुणा, त्याग, सहिष्णुता, स्नेह और आत्मबलिदान की सजीव मूर्ति होती है।”3
नरेश मेहता बहुविवाह के प्रचलन को भी अपने उपन्यासों में प्रस्तुत करते हैं। उत्तरकथा उपन्यास मे त्र्यम्बक के दादा त्रिलोचन शुक्ल पहली पत्नी के जीवित होते हुए और भरापूरा परिवार होते हुए भी अपने दोस्त की बहन पार्वतीदेवी से दूसरा विवाह कर लेते हैं। इन्होंने  पति-पत्नी के रिश्ते मे किसी तीसरे के आने पर होने वाले दुःखदायी अंत का भी चित्रण किया है। उत्तरकथा उपन्यास मे मनोहरलाल उपाध्याय (कामदार साहब) अपनी पत्नी गायत्रीदेवी को उपेक्षित करके कमला नाम की स्त्री के साथ रहते हैं। उनका यही सम्बन्ध उनकी मृत्यु का कारण बनता है। कमला के भाई रुपयों के लालच मे अपनी बहन और मनोहरलाल उपाध्याय की हत्या कर देते हैं। नरेश मेहता कहते हैं कि लोगों ने कामदार साहब और कमला की इस प्रेम -कथा से यही शिक्षा ग्रहण की कि “पत्नी के अतिरिक्त किसी दूसरी स्त्री के होने पर मनुष्य का ऐसा ही दुःखदायी अंत होता है।”4

नरेश जी ने परित्यक्ता स्त्रियों का भी यथार्थपूर्ण चित्रण प्रस्तुत किया है। यह पथ बंधु था उपन्यास मे जब श्रीधर घर छोड़कर चला जाता है तो सरस्वती जीवन के 25 वर्ष परित्यक्ता स्त्री के रूप मे व्यतीत करती है। वह अपने इस दुःख के कारण यक्ष्मा रोग से भी पीडि़त हो जाती है। वहीं उसकी बड़ी बेटी गुणवन्ती को उसका पति त्याग देता है जिस कारण उसे परित्यक्ता स्त्री बनकर अपना जीवन व्यतीत करना पड़ता है। साथ ही इन्होंने वेश्या जीवन की त्रासदी का भी मार्मिंक चित्रण प्रस्तुत किया है। वैसे तो वेश्या का सामाजिक बहिष्कार किया जाता है लेकिन विवाह समारोह, जनेऊ संस्कार आदि में इन्हीं वेश्यों को बुलाकर नचाया जाता है। यह पथ बंधु था उपन्यास की मालिनी, वेश्या होते हुए भी धार्मिक प्रवृति की स्त्री है, फिर भी उसे समाज द्वारा उचित सम्मान नही दिया जाता।

मेहता जी ने अपने उपन्यासों में स्त्रियों पर हो रही यौन-हिंसा का भी संवेदनशील चित्रण प्रस्तुत किया है। डूबते मस्तूल उपन्यास की रंजना के साथ एक रात रेनाल्ड नामक व्यक्ति बलात्कार करता है। जिससे रंजना को अत्यधिक मानसिक आघात पहुँचता है। धूमकेतु: एक श्रुति उपन्यास मे विधवा वल्लभा का पिता ही उसका शारीरिक शोषण करता है। जब इस शारीरिक शोषण के कारण वल्लभा को गर्भ ठहर जाता है, तो वह आत्महत्या कर लेती है। वहीं उत्तरकथा उपन्यास की दुर्गा को घर मे अकेला पाकर उसका देवर विश्वनाथ उसके साथ बलात्कार की कोशिश करता है। लेकिन दुर्गा यहाँ पर रंजना और वल्लभा की तरह हार नही मानती बल्कि उसे मारकर भगा देती है। नरेश मेहता के उपन्यासों में इन प्रकरणों से पता चलता है कि स्त्री घर के बाहर तो सुरक्षित है ही नही, घर के अंदर भी सुरक्षित नही है। और ऐसी स्थिति मे तो बिल्कुल भी नही, जब उसका रक्षक ही (जन्मदाता ही), उसका भक्षक बन जाए। उन्होंने हिन्दू स्त्रियों के साथ ही मुस्लिम स्त्रियों के शोषण का भी हल्के से रूप मे चित्रण प्रस्तुत कर दिया है। नदी यशस्वी है उपन्यास मे मुनीर खां उदयन को बताता है कि जब वह पांच वर्ष का था तो उसके पिता के जाने के बाद ’उसकी मां को मौलवी साहब ने घर में डाल लिया’ और उसे धक्के मारकर घर से निकाल दिया। अतः स्त्री किसी भी धर्म की हो, पुरुषों द्वारा उन पर एकाधिकार जताया ही जाता है।

नरेश जी स्वतंत्र विचारों वाली और अतिभौतिकताग्रस्त स्त्रियों का भी चित्रण प्रस्तुत करते हैं। दो एकांत उपन्यास की वानीरा वैवाहिक होते हुए भी दूसरे पुरुषों से सम्बन्ध बनाती है। ऐसे ही सम्बन्धों से उत्पन्न संतान है- प्रथम फाल्गुन उपन्यास की गोपा। गोपा जारज संतान होने के कारण अपने प्रेम को विवाह मे परिणत नही कर पाती। समाज उसे ’एक घटिया औरत की संतान कहकर बुलाता है’ साथ ही यहाँ तक कहा जाता है कि ’ऐसी नाजायज औरत को उसकी संतानें कैसे अपनायेंगी’। वहीं यह पथ बंधु था उपन्यास की कमल एक पढ़े-लिखे परिवार की और खुले विचारों वाली स्त्री हैं। पर जब वह अपने परिवार के खिलाफ जाकर, बिशन से प्रेम विवाह कर लेती है तो उसके परिवारजन उसको खूब मारते-पीटते हंै और पुलिस मे झूठा ब्यान दिलवाते हैं कि ’बिशन ने मेरा अपहरण करके जबरदस्ती मुझसे विवाह किया है’। अतः स्त्री संभ्रंात परिवार से ही क्यों न हो उसकी नियति भी समाज की और स्त्रियों जैसी ही होती हैं। यह पथ बंधु था की सावित्री और उत्तरकथा की शारदा अतिभौतिकता से ग्रस्त स्त्रियाँ हैं। वह अपने पतियों के कान भरकर घर का बंटवारा कर देती हैं।  मेहता जी स्त्रियों को समाजसेवा व देशसेवा करने के लिए प्रेरित करते हैं। जहाँ प्रथम फाल्गुन की गोपा समाजसेवा को जीवन का लक्ष्य बना लेती है, वहीं उत्तरकथा की दुर्गा और नर्मदादेवी उपाध्याय स्वतंत्रता आंदोलन के लिए लोगों को जागरूक करके देशसेवा करती हैं। तो दूसरी और यह पथ बंधु था की रतना देश की स्वाधीनता के लिए फांसी पर चढ़ जाती है। साथ ही वह स्त्रियों को शिक्षा द्वारा आत्मनिर्भर भी बनाना चाहते हैं। वह उत्तरकथा उपन्यास मे दुर्गा को पढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं और आंनदशंकर दवे (दुर्गा के मामा) भी अपनी विधवा बहू शकुंतला को पढ़ाते हैं । जिससे वह आत्मनिर्भर होकर अपना जीवन व्यतीत कर पाती है।

अंत मे हम कह सकते हैं कि नरेश मेहता ने अपने उपन्यासों के द्वारा समाज मे स्त्री की स्थिति का मर्मंभेदी चित्रण प्रस्तुत किया हैं। स्त्री चाहे पढ़ी-लिखी हो, किसी भी वर्ग की हो या किसी भी धर्म की हो, उसे परिवार द्वारा, समाज द्वारा और पुरुषों द्वारा प्रताडि़त किया ही जाता है। उन्होंने स्त्रियों की अच्छाईयों के साथ ही उनकी बुराईयों को भी चित्रित किया हैं।

संदर्भ-सूची:-
1. श्रोत्रिय प्रभाकर, भारतीय साहित्य के निर्माता नरेश मेहता, साहित्य अकादेमी, पुनर्मुद्रण 2013, पृष्ठ-107
2. मेहता नरेश, प्रथम फाल्गुन, लोकभारती प्रकाशन इलाहाबाद, पहला पेपरबैक संस्करण 2012, पृष्ठ-7
3. राय गोपाल, नरेश मेहता के उपन्यास, वागर्थ पत्रिका, भारतीय भाषा परिषद कोलकाता, नवम्बर 2001, पृष्ठ-19
4. मेहता नरेश, उत्तरकथा भाग एक, लोकभारती प्रकाशन इलाहाबाद, चतुर्थ संस्करण 2011, पृष्ठ-358    
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