स्त्रीकाल : स्त्रीवादी चिंतन का आर्काइव

नूतन यादव
नूतन यादव दिल्ली विश्वविद्यालय  में पढ़ा रही  हैं. फेसबुक पर सक्रीय स्त्रीवादी टिप्पणीकार हैं. संपर्क  :09810962991
 ( स्त्रीकाल , स्त्री का समय और सच , प्रिंट के बाद ऑनलाइन रूप में भी लोकप्रिय है . अप्रैल 2014 के से हम यहाँ स्त्रीवादी विचार , आलोचना , साहित्य प्रकाशित कर रहे हैं. साल के अंत होते -होते इसे अब तक 1 लाख हिट मिल चुके हैं. औसतन एक पोस्ट प्रतिदिन के साथ . इसके फेसबुक पेज को अब तक 1700 से अधिक लाइक मिल चुके हैं  . इस बीच हमने कुछ लेखकों , कवियों , आलोचकों से , स्त्रीकाल में प्रकाशित रचनाओं , आलेखों में से उनकी पसंद के कुछ (कम से कम 5 ) पोस्ट पर  आलेख मंगवाये हैं . गुलज़ार हुसैन ने इस कड़ी में पांच कविता -पोस्ट पर लिखा है .  इनमें आशा पांडे ओझा , सोनी पाण्डेय , रजनी अनुरागी ,  अनिता भारती सुजाता तेवतिया और अवनीश गौतम की कवितायें शामिल हैं . आज नूतन यादव की समीक्षा , जो उन्होंने वसीम अकरम , शैलेन्द्र सिंह , रजनी दिसोदिया , अरविंद जैन के आलेखों  को पढ़ते हुए लिखा है , साथ ही उन्होंने स्त्रीकाल में प्रकाशित रेहाना के पत्र के हवाले से भी अपनी बात कही है . स्त्रीकाल के पाठकों से आग्रह है कि इस तरह की आलोचनात्मक टिप्पणी के साथ यहां प्रकाशित अन्य आलेखों और रचनात्मक साहित्य पर अपनी राय ' themarginalised@gmail.com पर भेजें . 2015 में हम आपकी अपेक्षाओं पर और अधिक खरे उतरने की कोशिश करेंगे.  ) 

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स्त्रीकाल के ऑनलाइन एडिशन में स्त्रीवादी आलेखों , चिंतन और वैचारिकी को पढ़ना हमेशा विचारोत्तेजक रहा  पिछले साल यहाँ अकादमिक आलेख , और स्त्री मुद्दों पर चर्चा का निरंतर प्रकाशित होते रहे . सुधा अरोड़ा , अर्चना वर्मा , अनीता भारती , अरविंद जैन , निवेदिता आदि जहां नियमित कंट्रीब्युट करते  रहे  हैं वहीं दर्जनो शोध और विचार आलेख यहाँ पढ़ने को मिले . मैं अपनी इस टिप्पणी में कुछ आलेखों पर बात कर रही हूँ , छोटी टिप्पणी की अपनी सीमा है .

यहाँ वसीम अकरम का एक आलेख है ‘ धर्म की खोखली बुनियाद में दबी स्त्री ’ वसीम ने अपने इस लेख में मुस्लिम समाज में तलाक से पैदा हुई समस्याओं का एक भावुक लेकिन संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है |इस आलेख में अकरम उत्तरप्रदेश के गाजीपुर जिले के एक कस्बे बहादुरगंज की मुस्लिम महिलाओं की तलाक के बाद पैदा हुई बद से बदतर परिस्थितियों का वर्णन किया है |ये वो स्त्रियाँ है जिन्हें शादी के बाद पति द्वारा या तो छोड़ दिया गया है या तलाक दे दिया गया है| अकरम ने इस आलेख में मुस्लिम समाज की खोखली धार्मिक सामजिक और सांस्कृतिक कुरीतियों का  बहुत कड़े और सधे शब्दों में खंडन किया है |मुफ़्ती मुल्ले धार्मिक ज्ञान के नाम पर क़ुरान और शरियत का हवाला देकर धार्मिक कट्टरता का प्रचार प्रसार तो करते है लेकिन अपनी स्त्रियों की दुर्दशा के प्रति आँखें मूंदे रहते हैं |मुस्लिम नेता भी अपने धर्म और उनके मानने वालों की  गिरती आर्थिक और सामजिक स्थितियों के प्रति अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़े हुए हैं |


‘ स्त्री एवं भाषा : तीसरी परम्परा की खोज एवं वैकल्पिक भाषावैज्ञानिक अध्ययन’ के लेखक प्रोफ. शैलेन्द्र सिंह ने भाषा को किसी दैवीय उत्पत्ति से अलग एक विशुद्ध सामाजिक वस्तु माना है,  जिसके निर्माण में स्त्री एवं पुरुष दोनों की बराबर की सहभागिता होती है |जिस प्रकार समाज निर्माण में दोनों की भूमिका अनिवार्य है उसी प्रकार भाषा निर्माण भी  स्त्री पुरुष दोनों में से किसी एक की उपस्थति और अभिव्यक्ति के अभाव में असंभव है | भाषा दोनों के साथ समान रूप से कार्य करती है किसी विशिष्ट भाषा की रचना ना तो स्त्री  की होती है और ना ही पुरुष की |लेखक ने स्त्री भाषा एवं सैद्धांतिकी को  अनेक भागों में विभाजित कर समझाने का प्रयास किया है | मूल सिद्धांत ,अतिवादी सिद्धांत  एवं वैकल्पिक सिद्धांत |लेखक मानता है कि स्त्री अध्ययन का उद्देश्य संसाधन निर्माण है तो मूल्य मानवीय और सीमा सार्वभौम है | स्त्री विमर्श को अकादमिक दायरों से निकाल कर सामाजिक यथार्थ के रूप में देखे जाने की जरूरत है |और इसी यथार्थ के साथ नए नए विषयों और नयी भूमिकाओं के लिए नयी स्त्री भाषा गढ़नी होगी

रजनी दिसौदिया ने अपने आलेख ‘शिक्षा में जातिगत और लिंगगत असमानता’ में कॉलेज की लड़कियों के बीच इस मुद्दे पर कराई गई  चर्चा के निष्कर्ष हमारे सम्मुख रखा है | वे लिखती हैं कि लडकियां लिंगगत असमानता पर मुखर होकर आवाज उठाती है | इस से जुड़े हर आयाम पर इन लड़कियों की  पैनी नजर है |इसके कई कारण भी वे गिनाती हैं जैसे ‘लड़कियों को लड़कों के मुकाबले स्कूलों में कम भेजा जाना’, ‘स्त्रियों और पुरुषों के बीच कामों का बँटवारा’ , सार्वजनिक स्थानो पर होने वाली छेड़छाड़ से लेकर बलात्कार तक’  आदि | लेकिन जातिगत असमानता के मूद्दे पर उनमें एक  ख़ास तरह की उदासीनता है  जिससे भविष्य में विशिष्ट प्रकार की स्थ्तियाँ पैदा होने की संभावना दिखती है | रजनी ने इस आलेख में जातिगत असमानता के कई पहलुओं को सामने रखा है  |उनके अनुसार “ ब्राह्मणवादी परम्परा ने सायास और अनायास : प्रत्येक भारतीय को यह सिखाया है कि ब्राह्मण, बनिया या ठाकुर होना कोई कमाल की बात है और चमार, चूहड़ा या धानुक होना कोई शर्मसार होने वाली बात है” | उन्होंने शिक्षा और अन्य सामाजिक समस्याओं के प्रति भी ब्राह्मणवादी मानसिकता पर कुठाराघात किया है | उच्च जातियों की राजनैतिक सांस्कृतिक अवसरवादिता को बहुत स्पष्ट रूप से पाठक के सम्मुख रखा साथ ही उनके द्वारा  निम्न और गैर सवर्ण जातियों को अलग अलग प्रकार से दबाने की कोशिशों को सामने लाने का प्रयास किया है  |अपने इस आलेख में आरक्षण पर सवर्णों की दया दृष्टि से लेकर निम्न जातियों की श्रम संस्कृति के अपमान आदि पर विस्तार से चर्चा की |

26 वर्षीय ईरानी महिला रेहाना जब्बारी को  आख़िरकार फांसी दे दी गयी |अपने साथ जबरदस्ती करने वाले की ह्त्या के आरोप में लभग सात साल की सजा काटकर 25 अक्टूबर को उसे फंसी दे दी गयी |अंतर्राष्ट्रीय हलकों में इस मामले की कड़ी भर्त्सना की गयी | । रेहाना की मां ने जज के सामने पूर्व खुफिया एजेंट मुर्तजा अब्दोआली सरबंदी की हत्या के आरोप में अपनी बेटी रेहाना की जगह खुद को फांसी दे दिए जाने की गुहार लगाईजिसे वहां की सरकार ने अनसुना कर दिया | उसने अंतिम समय में अपनी माँ के लिए एक पत्र लिखा जिसमें उसने अपनी माँ से कुछ बातें साझा की | स्त्रीकाल में वह पत्र पढ़ा जा सकता है .

उस पत्र के माध्यम से रेहाना को और उसकी मानसिक स्थिति को समझने में एक नयी दृष्टि मिलती है | रेहाना चली गयी लेकिन जाते जाते वो एक सवाल उठा गयी| स्त्रियों के लिए क्या जरूरी है जीना या सर उठाकर जीना | अपने पत्र में ये सवाल उठाती है कि कैसा होगा वो समाज जो एक स्त्री को उस पर यौन हमला करने वाले को मारने पर उस स्त्री को ही फाँसी की सजा देता होगा |इस तरह की सजा का प्रावधान रखने वाला समाज सीधे सीधे स्त्रियों को ये सन्देश देता हैं  कि गलती से भी वे  अपने दोयम दर्जे को न भूलें और अगर वे इस पुरातन पंथी समाज से किसी तरह की प्रगतिशील और आधुनिक समझ की अपेक्षा रखती हैं तो उन्हें इस तरह की सजाओं के लिए तैयार रहना होगा |

रेहाना की फांसी के बाद कानूनी सुधारों पर बात आरम्भ हो गयी है लेकिन यह  स्पष्ट है कि बात सिर्फ इरानी कानूनों पर बहस करने से पूरी नहीं होगी |भारत में भी तो इसी तरह के तथाकथित कानूनों से भरा समाज है जो स्त्रियों को बचपन से ही बलात्कारियों से लड़ने के बजाए उनसे भागने, बचने और डरने की सीख ( ट्रेनिंग या प्रशिक्षण ) देता है | बचपन से हम अपनी बच्चियों के दिमाग में ये बात दाल देते हैं कि रात  में बाहर नहीं निकलना चाहिए| हर बार किसी बलात्कार पर हमारा दिमाग हम बिना एक क्षण गँवाए ये सोचने के इस बात के लिए प्रशिक्षित कर दिया गया है कि हम उस बलात्कार के लिए जिम्मेदार एक कारण खोज लें |

प्रसिद्ध लेखक एवं कानूनविद अरविन्द जैन के आलेख शादी का झूठा आश्वासन यौन शौषण हमें कई कानूनी प्रावधानों और अड़चनों से वाकीफ कराता है . आज के दौर में लड़कियों की सुरक्षा एक बहुत बड़ी जरूरत है जिसके अंतर्गत उन्हें कानूनी सूचनाओं से वाकिफ कराना बहुत जरूरी है |अरविन्द जी का ये आलेख इसी तरह की महत्वपूर्ण जानकारियाँ देता है | इस आलेख में अरविन्द जी ने  शादी का झांसा देकर किसी लड़की के साथ शारीरिक रिश्ते बनाने और बाद में शादी से मना करने को बलाकार  के दायरे में लाने जैसी महत्वपूर्ण कानूनी सूचना विस्तार के साथ  पाठकों के साथ साझा की है| लेखक ने बलात्कार से पहले बलात्कार करने के कारणों में कामुक फ़िल्मी छवियों, उद्दाम फैंटसी ,और कई बार खानदान की इज्जत के नाप पर भी बलात्कार आदि को गिनाया है| कई ऐसे मामले सामने आते रहे हाँ जिनमें लड़की को शादी का झांसा देकर शारीरिक सम्बन्ध बनाए जाते हैं और ये सिलसिला तब तक चलता रहता है जब तक लड़की गर्भवती नहीं हो जाती  |चूँकि भारतीय अदालत कई बार इस तरह के सवाल उठाती रही हैं शादी के झाओठे वायदे करके  बनाये गए शारीरिक संबंधों को बलात्कार जैसे आपराधिक मामले में लाया जाए या नहीं |जयंती रानी पांडा बनाम पश्चिम बंगाल सरकार वाले मामले में कलकत्ता उच्च न्यायालय ने भी  माना “अगर कोई बालिग लड़की शादी के वादे के आधार पर, शारीरिक रिश्ते को राजी होती है और तब तक इस गतिविधि में लिप्त रहती है, जब तक कि वह गर्भवती नहीं हो जाती, तो यह उसकी ओर से ‘स्वच्छंद संभोग’ के दायरे में आएगा |” “साथ ही बंबई उच्च न्यायालय ने  भी कहा भारतीय दंड संहिता की धारा-415 में ‘धोखाधड़ी’ के अपराध को परिभाषित किया गया है।  शादी का झूठा वायदा कर, जानबूझकर दिए गए प्रलोभन के बाद शारीरिक रिश्ते बनाना, 'धोखाधड़ी' की परिभाषा के तहत 'शरारत' के दायरे में आते हैं और दंडनीय अपराध है। (आत्माराम महादू मोरे बनाम महाराष्ट्र राज्य (1998 (5) बीओएम सीआर 201)”

इस तरह के कई मामले उच्चतम न्यायालय में भी सामने आये जिनमें लड़की की सहमती सिद्ध करके इस तरज के कुकृत्य को सिर्फ धोखाधड़ी माना गया लेकिन एक मामले में उच्चतम न्यायालय में न्यायमूर्ति ए.के माथुर और अल्तमस कबीर ने 2006 में एक अलग फैसला सुनाया जिसके अंतर्गत उन्होंने एक तार्किक किन्तु संवेदलशील धरातल पर माना किआरोपी ने  पीड़ित लड़की को राजी करते हुए सब किया लेकिन ये सब उसने उसे शादी के लालच में करवाया | और गवाहों की गवाही से पूरी तरह स्पष्ट होता है कि गवाह पंचायत की तरह काम कर रहे थे। आरोपी ने पंचायत के समक्ष स्वीकार किया कि उसने लड़की के साथ शादी करने का वायदा कर उसके साथ शारीरिक रिश्ते बनाये लेकिन पंचायत के सामने वायदे के बावाजूद वह पलट गया इससे साफ़ पता चलता है कि उसका शुरू से ही लड़की से विवाह करने का कोई इरादा नहीं था | न्यायालय भी अब ये मानते हैं कि इस तरह के मामले  ‘न सिर्फ घोर निंदनीय कृत्य है बल्कि प्रकृति से भी आपराधिक है |” इस तरह से शादी को धोखाधड़ी के लिए एक आधार मिलेगा और आर्थिक सामजिक वर्ग की लड़कियों पर एक दबाव बनाकर उनका शौषण किया जाता रहेगा  | लेखक का मानना है कि इस तरह के मामलों में न्याय प्रक्रिया और न्यायाधीश भी बंटे हुए दिखते हैं |ऐसे मामले सिर्फ आपसी समझ और सामजिक भागेदारी के साथ कानूनों में संशोधन से ही सुलझ सकते है |
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