खूबसूरत हर्फों की गवाही

निवेदिता
निवेदिता पेशे से पत्रकार हैं. सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलनों में भी सक्रिय रहती हैं. हाल के दिनों में वाणी प्रकाशन से एक कविता संग्रह ‘ जख्म जितने थे’ के साथ इन्होंने अपनी साहित्यिक उपस्थिति भी दर्ज कराई है. सम्पर्क : niveditashakeel@gamail.com 
( निवेदिता किस्तों मे अपना जीवन और गुजरते समय को दर्ज कर रही हैं अपने संस्मरणों में . इस किस्त में वे साक्षी भाव में अपने जन्म से लेकर अपने किशोर होने की कहानी कह रही हैं . कहानी में एक लडकी के  मन के और उसके समय की सांस्कृतिक हलचल के किस्से दर्ज हैं . स्त्रीकाल में इनके संस्मरणों के अन्य किस्त पढ़ने के लिए नीचे के लिंक क्लिक करें :  )

जब ज़रा गर्दन झुका ली देख ली तस्वीरे यार 
यही फ़िज़ा थी , यही रुत यही ज़माना था 

वह सुबह भी हमेशा  की तरह आम सी सुबह थी, जब डाक्टर ने कहा कि बेटी हुई है। घड़ी उसी तरह टिक- टिक कर रही थी। अप्रैल के महीने की चार तारीख को वह पैदा हुई। कमरे में रौशनी  कुछ धुधंली थी। नर्स ने बताया बच्ची खूब स्वस्थ्य है। नाजुक-नाजुक हाथ-पांव, पेट के ही बाल इतने घने और घुंघराले कि लगता था काले -काले बादल पिघले पिघले घूम रहे हैं !

जब वह पैदा हुई तो उसकी मां की उम्र 16 साल थी। डाक्टर ने कहा मां कमजोर है, खून की कमी है। ख्याल रखना होगा। पिता की पोस्टिंग किसी दूसरे शहर में थी । उन दिनों टेलिफोन का जमाना नहीं था। जबतक उनको खबर हुई वो पैदा हो चुकी थी। बड़े काका ने मां की हालत देखते हुए छोटे काका को बुला भेजा था। वे डाक्टर हैं इसलिए उनके रहने से सबको भरोसा होता है। काका का घर अस्पताल से पास में ही है। अस्पताल से सीधी सड़क घर की ओर जाती है। दाएं हाथ को जाने वाला रास्ता हर के बाहर खेतों की ओर चला जाता है। दूर तक फैले लहलहाते खेत और पीछे पहाड़ों की श्रृखंला। गया पहाड़ों का  शहर है। बाएं मुड़ने पर एक चैड़ी सड़क सीधे घर की तरफ जाती है।  घर पहुंचे  तो काकी इंतजार में थी। क्या हुआ?  हंसते हुए काका ने कहा लक्ष्मी आयी है। काकी खुश  हो गयी, पूछा  फूलो को खबर किया। हां, टेलिग्राम भेजा है। फूलो भागे-भागे पहुंचे। इन्दू की हालत बेहतर हुई तो सुधीर  पटना के लिए रवाना हुए। रास्ते में ही थे कि  बेटी के जन्म की खबर मिली। चार दिन पहले फूलों की बेटी जन्मी और चार दिन बाद सुधीर की। दोनों बेटी। एक का दुधिया सफेद रंग में गुलाल मिला हुआ। दूसरी तांबाई रंग। तराशे  हुए नैन -नक्ष। दोनों लड़कियां बड़ी हो रही हैं। एक फूल सी नाजूक दूसरी खुलता  हुआ गेहुंआ रंग,बड़ी बड़ी जामुनी आंखें। तराशे हुए नाक और गर्दन उंची,  घने धुधराले बाल। दोनों बहनें जब साथ होती लोग तुलना करने लगते। दुधिया रंग के सामने गेहुंआ रंग। आहें भरते काश , अगर इसका भी रंग दुधिया होता तो कयामत होती। वह नाराज होती । मुझे अपना रंग पसंद है। नहीं होना है उसकी रंग का।

 मां कहती,  ' दूध पी जाओ तो उसी की तरह गोरी होगी।' वह गुस्से में पूरा गिलास खाली कर देती पर रंग ताबांई ही रहता।  धीरे-धीरे उसे पता चलने लगा कि उसके रंग में गजब का जादू है। लोग कहते उसकी आंखें ऐसी जैसे राधा के नीमबाज आंखें। वह सोचती राधा कौन है। एक दिन उसने मां से पूछा , मां ये राधा कौन है?
मां ने कहा , ' कृष्ण की प्रेमिका।'
 मां सब कहते हैं, ' मेरी आंखें  राधा की तरह है।'
मां खिलखिलाई। विद्यापति के गीत में है ऐसी आंखों का वर्णन-राधा की अधखुली आंखें जैसे कमल के फूल पर भंवरा बैठा हो।

दो साल गुजरते गुजरते भाई आ गया। फिर तीन बहनें और एक भाई। मां को छोटे बच्चों से फुरसत नहीं मिलती। उसे अकेलापन लगता। कभी बागान में टहलती। कभी किचन में जाकर मां का हाथ बंटाती। रात में एक बड़े पलंग पर मां के साथ सारे बच्चे सोते। मां काफी सफाई पसंद करती थी। बच्चे बिस्तर गीला करते थे। बिस्तर पर बड़ा सा प्लास्टिक बिछाया जाता। उसके उपर मोटी सी चादर। उसे प्लास्टिक पर सोना पसंद नहीं।  पांच भाई-बहनों के बाद पलंग पर जगह बचती भी नहीं थी। वह मां के पायताने सोती। रात में कई बार डर लगता। मां अपना पांव बढ़ा देती। मां के पांव को सीने में चिपकाए वह सुकून की नींद सो जाती। 6 बच्चों को मां अकेले संभाल नहीं पाती। इसलिए नानी अक्सर मां को गांव ले आती।

निवेदिता के मां और पिता 
नानी का घर सहरसा में है। सहरसा तक सब रेलगाड़ी से आते फिर वहां से सिमराही तक बस से। नाना सिमराही में बैलगाड़ी भेज देते। उसे बैलगाड़ी पर बैठना खूब पसंद था। बैलों के गले में लगी घंटी बजती रहती। धीमी-धीमी सुरीली। रास्ते में धान की पीली बालियां लहलहाती। उसकी पत्तीयां इतनी हल्की और इस कदर बारीक होती कि हवा के हल्के झोके से भी लचकती रहती।

गांव हमेशा  से उसे पसंद है। हरे भरे बागान। सामने आम का बगीचा। घर के पिछवाड़े साग-सब्जी उपजती थी। नानी के साथ उनकी मां भी रहती थीं। जिसे सब बड़ी नानी बुलाते। जबसे उन्हें देखा सफेद बाल और सफेद साड़ी में ही देखा.  उनके बाल कभी लंबे नहीं देखे। बाद में पता चला कि विधवाएं ऐसे ही रहती हैं। नानी बगीचे में ले जाती, ' देखों ये नेनुआ का बत्ती है और ये कटहल का पेड़। ' उसे लगता नानी को गांव के सारे गाछ के रहस्यों का पता है। नानी के साथ मिलकर घर के पिछवाडे में वह सब्जियां रोपती। नानी कहती किसानों के खेत से सब उपजना चाहिए नहीं तो खेत बांझ औरत की तरह लगते हैं। वह पूछ्ती ,  'नानी बांझ औरत क्या होती है?'  नानी हंसती अभी ही सब जान लोगी बिटिया। अच्छा चलों हम धनिया बो दें। वो क्यारियों में धनियां बोती। घर में रोज धनिया की चटनी बनती। आम के मौसम में धनिया में आम मिलाकर पीसा जाता। उसकी खुशबू से  गम-गम करता आंगन।  उसे बड़ी हैरानी होती की एक नन्हें से बीज से इतनी घनी-घनी हरी पत्तीयां फूटती कैसे हैं? आंखें खुलते ही भागती कि क्यारियों में धनिया बोया वह फूटा या नहीं। देखा तो बारीक-बारीक हरी हरी पत्तियां निकल आयीं थीं। चिकने -चिकने हरे रंग की  नन्हीं -नन्हीं पत्तीयां लहलहा रही हैं

नानी के घर में रहते हुए पढ़ाई का नुकसान हो रहा था यह सोच कर पापा उसे और छोटे भाई प्रियरंजन को पटना ले आए। मां के बगेर बच्चे अनाथ से ही रहते हैं। घर से दो किलोमीटर दूर स्कूल था। दोनों भाई-बहन ' बस्ता' ( स्कूल बैग ) उठाए निकल पड़ते। उसके घर के पास एक बड़ा सा नाला बहता। नाले के किनारे-किनारे संकरी सी सड़क। चाॅय टोला के नाम से वह मुहल्ला जाना जाता था।  रास्ते में जितने पेड़ मिलते  वे गिनते जाते। दरख्तों पर फैली हुई बेलें। केले और ताड़ के पत्ते। नीम,पीपल ,कदंब, कटहल। कदंब के पेड़ को देखकर लगता जैसे कोई समाधी में लीन हों । पीपल की घनी छाया के बीच से सूरज की किरनें झरती। पेड़ों को छूते हुए दोनों भाई-बहन स्कूल पहुंच जाते।

टिफीन का समय उसके और भाई के लिए परेशान करने वाला होता। वह चाहती कि उसका टिफीन कोई ना देखे। उन दिनों उसकी मां नहीं रहती थीं। टिफीन अक्सर उसके चचरे भाई दिया करते थे। भात,दाल सब्जी और चीनी। चीनी दाल में धुल जाता और उसका मजा बेकार हो जाता। कभी सत्तु देते। बच्चे मजाक उड़ाते कि वे टिफीन में भात लाते हैं या सत्तू लाते हैं। कई बार शर्म से दोनों भाई-बहन छुप कर जल्दी जल्दी खाते। इस चक्कर में सत्तू बिना पानी मिलाए खाते। उनका पूरा मुंह उजला हो जाता। बच्चे हो-हो कर हंसने लगते। भाई के सारे दोस्त उसके दोस्त थे। सब सारे दिन छत पर पतंग उड़ाए फिरते। उनकी पतंग बादलों को छूती। कभी-कभी सूरज की किरणें बादलों के बीच से निकलती। उसमें नीलमी हीरे जैसी बुंदकियां चमकती। गहरे नीले रंग के आसमान पर हल्की-हल्की सूरज की किरणें पतंग पर फैल जाती। उसे लगता कि वह सूरज को छू रही है। पतंग उड़ाते हुए बचपन में पढ़ी एक कहानी ‘काकी’ की याद आती। जिसमें बच्चा पतंग के लिए पिता की जेब से पैसा चुराता है। उसे किसी ने बताया कि उसकी मां जो आसमान में रहती है उसतक वह पतंग के जरिये पहुंच  सकता है। वे दोनों भी उस कहानी की तरह मां के पास अपनी पतंग भेजेना चाहते । कई बार सोचते काश  कितना अच्छा होता अगर मां पतंग की डोर पकड़-पकडे़ हमारे पास आ जाती।   मां कि चिठ्ठियां आती, वे खुशी से भर जाते। जैसे उनके हाथ खजाना लग गया हो।  खत पढ़ते ही नन्हें भाई-बहनों की सूरतें साफ-साफ नजर आती।
बचपन की यादें मलगजी-मलगजी,धुंधली हैं ,लेकिन उन यादों में कहीं कोई अजनबीपन नहीं है। कभी-कभी नींद में ऐसे मंजर दिखाई पड़ते की वह बेचैन होकर जाग जाती।  निगाहों की हद के पास,मां बाहें फैलाए दिखतीं। जब वह करीब जाती तो मां गायब हो जाती। वह घबरा कर उठ जाती । फिर परेशान रहती कि इस ख्वाब का मतलब क्या है?
निवेदिता अपनी मां के साथ 
कुछ दिनों बाद पिता मां को  ले आए। उन दिनों वे राजेन्द्र नगर  में रहते थे। उसका दाखिला 9वीं कक्षा में रवीन्द्र  बालिका विधालय में हुआ। स्कूल से लौटकर घर के पास के मैदान में सारी लड़किया जुटतीं और उनकी खिलखिलाहट से मुहल्ला गूंजता । ये उम्र ही ऐसी थी जिसमें बेवजह हंसना, इतराना चलता रहता था। सामने के घर में रज्जी रहता था। वे लोग इसाई थे। रज्जी के घर के उपर में शबनम चाचा। मुहल्ले में लड़कियों की पूरी फौज थी। उनके मजे थे। ईद-बकरीद में शबनम चाचा के यहां सारे बच्चे जमे  रहते। एक से एक लजीज गोश्त  और सेवैयां खाने को मिलती। क्रिसमस में सब मिलकर क्रिसमस ट्री सजाते। केक और मिटाईयां खा-खा कर अघा जाते। क्या होली, क्या दशहरा पूरा मुहल्ला इस तरह जीता जैसे सारे पर्व पर उनका हक हो। उसने कभी नहीं जाना की ईद मुसलमानों का पर्व है और क्रिसमस ईसाईयों का। मुहल्ले के लड़के-लड़कियों की टोली सारे दिन आवारागर्दी करती। इश्क  के किस्से चटकारे ले लेकर हम सुनते। आज कौन हलाल हुआ? किसकी नजरें चार हुई जैसे जुमले लोगों की जुबान पर होता। प्रेम पहले खिड़कियों के रास्ते आता । प्रेम पत्र भेजने के नए-नए तरीके ईजाद किये जाते।

 पहली बार उसे वहीं देखा था। खाक और धूल से सने कपड़े। रुपहली बालों पर घनी घनी लटें कानों तक झूल रही थी। धूप से रंग कुछ और झुलसकर शोख हो गया था। होठों के दरमियान सितारों की लडि़या चमकी। दोनों ने एक -दूसरे को देखा। दिल में बादल फटे। बिजलियां चमक गयीं। उसके लिए दिल धड़का। फिर बाद में पता नहीं कितनों के लिए धड़का। हर दिन की तरह वह स्कूल जा रही थी। उसने महसूस किया कि कोई उसके पीछे चला आ रहा है। मुड़कर देखा तो वही था। उनकी नजर मिली । वह ठिठक गया। वह आगे बढ़ गयी। कई दिनों तक ये सिलसिला चलता रहा। उसे बुरा लगता । इस तरह पीछा करना बेवकूफी लगती। लोग क्या सोचेंगे? एक दिन उसने हिम्मत कर कहा -इस तरह पीछा क्यों कर रहे हो? वो खामोशी  से सर झुकाए खड़ा रहा। उसे वहीं छोड़ वह तेज कदमों से निकल गयी। उस दिन के बाद वह कई दिनों तक दिखा नहीं। उसे बुरा लग रहा था उसके लिए।
एक दिन वह छत पर थी। जाड़े का दिन था। गुनगुनी धूप फैली हुई थी। सामने ताड़ के बड़े बडे़ दरख्त उंचे होकर सुर्ख आसमान से जा लगे थे। वह किताब में डूबी हुई थी कि अचानक जोर से आवाज हुई। उसके सामने पत्थर में लिपटा कागज का दुकड़ा फड़फड़ा रहा था। उसने इधर-उधर नजर दौड़ाई तो देखा वह छत पर खामोश  खड़ा है। दिल में खलबली मच गयी। खत लेकर उसके हाथ कांपने लगे। उसने नजर बचा कर खत को जल्दी से स्वेटर के अंदर छिपा लिया। वह भागी -भागी जयश्री के पास गयी। जयश्री उसके साथ स्कूल में थी। दोनों गहरे दोस्त हैं। हमराज, हमख्याल। जयश्री समझ गयी। आज कोई खास बात है, निवेदिता सुबह-सुबह पंहुची है। दोनों ने कमरा बंद किया, और एक स्वास  में खत पढ़ गयी। पहला खत बड़ा फिल्मी था। जिसे पढ़कर दोनों सहेलियां देर तक हंसती रहीं । सफेद कागज पर खूबसूरत हर्फ चमक रहे थे-‘माना की तुम बेहद हंसीं इतने बुरे हम भी नहीं।’ बदले में उसने फैज की नज्म भेज दी। फिर ये सिलसिला चलता रहा। उसे देखकर उसका दिल उसकी तरफ खींचने लगता। वह कहीं भी होतीं, उसके वजूद का एहसास नब्ज की तरह धड़कता।  पहली बार वह उससे एक दोस्त के छत पर मिली। दोनों पर मुकम्मल खामोशी तारी थी। आसमान का रंग सूर्ख  था। उसने उसका हाथ अपने हाथ में लिया। सूरज पूरी तरह डूब चुका था। उसकी लाली रात की स्याही में तब्दील हो गयी। उसने चोर नजरों से उसे देखा। कद निहायत बुलंद ,पेशानी उंची,आंखें रौशन,सीना चैड़ा। सांवला रंग, घनी भवें, लंबी पलकें। एक लम्हें के लिए उसकी निगाहें उसके चेहरे पर टिक कर रह गयी। उसने देखा वह उसे देख रहा है अपलक। शर्म से उसका चेहरा लाल हो गया। धीमी-धीमी चांदनी फैली हुई खामोशी  को और भी पुरइसरार बना रही थी। बगैर  कुछ कहे वे एक-दूसरे से विदा हुए। उनकी आंखें कहती रहीं। प्रेम जब भी होता है तो इसी एहसास के साथ। वह दिन भी आया जब वे अलग हो गए। जानें कितनी रातें आसूंओं से तर होती रहीं।

जिन्दगी की खूबसूरती यही है कि वह अतीत में पड़ी नहीं रहती। उन मुश्किल   दिनों में फैज की नज्म खूब काम आयी। ‘राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा।’ वह स्कूल से काॅलेज में पहुंच  गयी। छात्र आंदोलन और इप्टा जैसे संगठनों से जुड़ाव ने जिन्दगी के नए मायने समझाए। उन्हीं दिनों पटना में प्रगतिशील  लेखकों की ओर से बड़ा मुशायरा का आयोजन किया गया था। देश  के बड़े नामी कलाकार,शायर जमा हुए थे। यह वह दौर था जब पटना की रचनात्मक सरगर्मियां बढ़ी हुई थीं। ऐसा लगता था जैसे शहर के रगों में रचनात्मकता दाखिल हो।  पहली बार वह कैफी और शौकत आजमी से यहीं मिली थी। एक बेहद खूबसूरत इंसान। बदन पर बारीक रेशमी कुर्ता। रंग निहायत गोरा। बड़ी-बड़ी आंखें। नाजुक-नाजुक होठ पर हल्की सी मुस्कान।  उनका चेहरा इस कदर पुरकशिश  कि देखते रहिए। उनकी आवाज में अजब लोच और दिलकशी  थी। निहायत साफ और खुली आवाज। मिठास ऐसी जैसे शब्द  श हद में लिपटे हों।
कैफी आज़मी  बेटी शबाना आज़मी के साथ 

कैफी आजमी की देख-रेख का जिम्मा उसे और उसकी बहन जोना को सौपा गया। दोनों बहनें पहुंच गयीं। आदाब किया। इधर आओ बिटिया। जी हमें आप दोनों की देखभाल के लिए भेजा गया। वे हंसे। शौकत आजमी ने प्यार से उनके माथे पर हाथ फेरा, '  बैठ जाओ बिटिया। तुम्हें पता है शबाना भी हमदोनों का इसी तरह ख्याल रखती है।'
  ' जी वो तो बड़ी अदाकारा हैं।'
'  हां वो तो है। आज हिन्दुस्तान को इतनी बड़ी अदाकारा नहीं मिलती अगर मैंने फैसला नहीं लिया होता। दोनों की आंखे चमकी।

शौकत आजमी अपनी रौ में बह रहीं थीं,  ' अब क्या बताएं वह जमाना ही कुछ और था। 1950 के आस-पास की बात है। कैफी साहब सारे दिन पार्टी के कामों में लगे रहते। न रहने का ठिकाना न खाने का। हम दोनों ने जीवन में कई उतार-चढ़ाव देखें हैं। शबाना पेट में थी। मुझ से मारे मारे फिरना अब मुमकिन नहीं लग रहा था। मुझे ठीक ठीक याद नहीं शायद उनदिनों बी.टी रणदिबे पार्टी के महासचिव थे। उन्होंने इन्हें बुलाया । हाल चाल पूछा । ये जानकर परेशान हुए की मैं गर्भवती हूं। उन्होंने कैफी से कहा तुम्हारी ये हालत नहीं कि अभी बच्चे पैदा कर सको। कैफी लौटकर आए तो उदास थे। उन्होंने मुझसे कहा कि हमलोग अभी बच्चे की जिम्मेदारी नहीं ले सकते। मुझे काफी गुस्सा आया । मैंने कहा  उन्हें झाडू मारुंगी। बच्चा मेरा है उसे पैदा करने की इजाजत पार्टी से नहीं लेना है। जैसे भी होगा हम पालेंगे। '

 यह  किस्सा बताते हुए हंसने लगी, '  बिटिया अगर मैंने उस वक्त ये फैसला नहीं लिया होता तो देश  एक संवेदनशील अभिनेत्री से वंचित रह जाता।'

 कैफी ने मजे ले-लेकर किस्सा सुना। फिर गंभीर होकर बोले, '  देखो इससे ये मत समझना की पार्टी हमारी जिन्दगी के निजी  फैसले भी तय करती है। वे मुश्किल  भरे दिन थे। हम अपने काॅमरेड के सुख-दुख के हिस्सेदार थे।  एक-दूसरे के जीवन में रचे-बसे रहते थे।'  पर आज न तो पार्टी वैसी रही न ही पार्टी कामरेड।
कैफी उस दौर के कम्युनिस्ट थे जो ये मानते थे कि पार्टी का उनपर पूरा इख्तियार है। वे लंबे समय तक कम्युनिस्ट पार्टी के होलटायमर रहे। कैफी की उबड़-खाबड़ संकटों और चुनतियों भरी जिन्दगी में एक अन्तर्निहित लय है। शायद इसलिए उनकी शायरी इनसान और इनसानियत के हक में आवाज उठाती रही है। उन्होंने एक मुसलसल लड़ाई लड़ी। दिल की गहराईयों में डूब कर लिखा। कैफी और उनके पाठकों के बीच गहरे संबंध हैं। वे उनकी नज्मों में सीधे उतरते हैं। कैफी की शायरी हिन्दी-उर्दू की साझी सांस्कृतिक विरासत का सबसे अहम सबूत है।

दोनों बहनों ने पूरा दिन उनके साथ गुजारा था। उनकी स्मृतियों में वे दिन आज भी हरे हैं। उनकी बातें खत्म ही नहीं हो रही थीं। शाम हो गयी थी। उन्हें मुशायरा के लिए जाना था। वे बाहर निकल आयीं। आसमान पर सूरज की पीली परत फैली थी। हवा में हल्की खूंनकी थी। दोनों बहने हाॅल पहुंच कर उनका इतंजार करने लगीं। एक बड़े से कमरे में कालीनों पर कोई 15-20 का मजमा लगा था। कमरे की रौशनी कुछ धुंधली  थी, मगर संदल और इत्र की गाढ़ी खुशबू हवा में तैर रही थी। बहुत बारीक धुंए की लकीरों के साथ शम्मा धीमें-धीमें जल रही थी। कैफी आए। महफिल में जान आ गयी। अजीजजाने-गिरामी,इरशाद फरमाएं-सब सुनने को तैयार हैं। अब इंतजार की ताब नहीं। कैफी बड़ी अदा से मुस्करये। भई पहले हम इन बच्चियों का शुक्रिया अदा करते हैं। सारे दिन दोनों ने मिलकर हमारी खितमत की। फिर वे लोगों  की तरफ मुखातिब हुए और निहायत दिलकश , अंदाज में नज्म पढ़ी..........

शौकत आज़मी 
आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है
आज की रात न फ़ुटपाथ पे नींद आएगी
सब उठो, मैं भी उठूँ तुम भी उठो तुम भी उठो
कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जाएगी ।
ये जमीं तब भी निगल लेने को आमादा थी
पाँव जब टूटती शाखों से उतारे हमने
इन मकानों को ख़बर है न मकीनों को ख़बर
उन दिनों की जो गुफ़ाओं में गुज़ारे हमने ।

हाथ ढलते गए साँचों में तो थकते कैसे
नक़्श के बाद नए नक़्श निखारे हमने
की ये दीवार बुलन्द और बुलन्द और बुलन्द
बाम.ओ.दर और ज़रा और निखारे हमने ।

आँधियाँ तोड़ लिया करतीं थीं शामों की लौएँ
जड़ दिए इस लिए बिजली के सितारे हमने
बन गया कस्र तो पहरे पे कोई बैठ गया
सो रहे ख़ाक पे हम शोरिश ए.तामीर लिए ।

                                                                       
                                                                       
                                                                         अपनी नस.नस में लिए मेहनत.ए.पैहम की थकन
                                                                          बन्द आँखों में इसी कस्र की तस्वीर लिए
                                                                          दिन पिघलता है इसी तरह सरों पर अब तक
                                                                          रात आँखों में खटकती है सियाह तीर लिए ।

उनकी नन्म पर कुछ सिर झुकाए, कुछ निगाहें उठाए वल्लाह, सुब्हानल्लाह, वाह-वाह कह रहे थे। दोनों बच्चियां सुन रही थीं, भीग रही थीं, डूब रही थीं। विदा होते समय कैफी ने उनकी डायरी में लिखा बिटिया निवेदिता और जोना के लिए.....चंद कतरे। आज भी वो डायरी उसके पास सुरक्षित है। पुखराजी सुनहरी  रौशनाई, में खूबसूरत हर्फ उन दिनों के गवाह हैं।

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