बदलते समय की कवितायें

गुलज़ार हुसैन
गुलज़ार हुसैन जितने संवेदनशील और बेहतरीन कवि हैं उतने ही अच्छे रेखा -चित्रकार. मुम्बई में पत्रकारिता करते हैं . संपर्क: मोबाईल न. 9321031379
( स्त्रीकाल , स्त्री का समय और सच , प्रिंट के बाद ऑनलाइन रूप में भी लोकप्रिय है . अप्रैल 2014 के से हम यहाँ स्त्रीवादी विचार , आलोचना , साहित्य प्रकाशित कर रहे हैं. साल के अंत होते -होते इसे अब तक 1 लाख हिट मिल चुके हैं. औसतन एक पोस्ट प्रतिदिन के साथ . इसके फेसबुक पेज को अब तक 1700 से अधिक लाइक मिल चुके हैं  . इस बीच हमने कुछ लेखकों , कवियों , आलोचकों से , स्त्रीकाल में प्रकाशित रचनाओं , आलेखों में से उनकी पसंद के कुछ (कम से कम 5 ) पोस्ट पर  आलेख मंगवाये हैं . गुलज़ार हुसैन ने इस कड़ी में पांच कविता -पोस्ट पर लिखा है .  इनमें आशा पांडे ओझा , सोनी पाण्डेय , रजनी अनुरागी ,  अनिता भारती , सुजाता तेवतिया और अवनीश गौतम की कवितायें शामिल हैं . यह गुलजार हुसैन , जो स्वयं कवि हैं और स्त्रीकाल में जिनकी कवितायें प्रकाशित हैं , के अपने चुनाव हैं , किसी सर्वोत्तम की सूची बनाने का यह प्रयास नहीं है . गुलज़ार के अनुसार वर्तमान में जिन समस्याओं से स्त्रियाँ सबसे अधिक जूझ रही हैं , उन्हीं विवध विषयों पर  आधारित कविताओं को उन्होंने प्राथमिकता दी है . स्त्रीकाल के पाठकों से आग्रह है कि इस तरह की आलोचनात्मक टिप्पणी के साथ यहां प्रकाशित अन्य आलेखों और रचनात्मक साहित्य पर अपनी राय ' themarginalised@gmail.com पर भेजें . 2015 में हम आपकी अपेक्षाओं पर और अधिक उतरने की कोशिश करेंगे.  )
इनकी कवितायें पढने के लिए ऊपर इनके नामों पर क्लिक करें :

'स्त्री काल' (वेबसाइट ) पर प्रकाशित कविताएं बदलते समय में करवट लेती हुईं नई पीढ़ी की आवाज़ हैं। इन कविताओं में स्त्री नए तेवर के साथ उपस्थित है। वह आँखों में आँखें डालकर बिना विचलित हुए सवाल करती है। इन नई कविताओं से लगभग गायब हो चुकी 'प्रेम- पंक्तियों' की जगह स्त्री-पुरुष के रिश्तों की नई पड़ताल है। पुरुषों को नई कसौटी पर कसती ये कविताएं स्पष्ट रूप से दुनिया को दो हिस्सों में बांटती हैं। एक वह हिस्सा है, जहां स्त्री अपने स्वाभिमान और अधिकारों के साथ स्वतंत्र है और दूसरा वह हिस्सा है, जहां वह पुरुषवादियों के जाल में फंसी हुई मुक्ति के लिए आंदोलित है। इन दोनों हिस्सों की कविताओं में पुरुषवाद पर कड़ा प्रहार है।
आशा पांडेय ओझा 


आशा पांडे ओझा की कविता ' वो तिलचट्टा' पुरुष के अंतर्मन की क्रूर वासनात्मक कुंठा को सामने लाती है। इस कविता में पुरुषों की यौन अभिव्यक्ति में छुपी संकीर्णता को सफल रूप से सामने लाया गया है। आशा लिखती हैं - " किसी बस स्टॉप, रेलवे स्टेशन/ बाजार, राह चलते शहर, ऑफिस या कॉलेज में / बार- बार उसकी आँखें/  अँधेरे में, गर्म स्थान खोजती हुई/ तिलचट्टों सी रेंगती है जब मुझ पर/ या बार -बार छूने का करती है यत्न/भोजन ढूंढती फिरती तिलचट्टे के/ एक जोड़ी संवेदी श्रृंगिकाएं सी/ उसकी वासना के कीच से लिपटी गन्दी उँगलियाँ मुझे/ तब मैं खूबसूरत नहीं लगती खुद को/"
इन पंक्तियों में स्त्रियों को केवल देह और भोग की वस्तु समझने वाले पुरुषों के खिलाफ स्त्री मन का आक्रोश उभरा है। यह कविता वर्तमान में स्त्री विरोधी अपराधों के लिए जिम्मेदार पुरुषवादी मानसिकता पर चोट करती है।

इस कविता की कुछ और पंक्तिया देखिए-

" बचा -बचा कर नजर जांचती हूँ अपने अंगों को बार -बार/ सब कुछ ठीक है की तसल्ली के बावजूद/ कुछ गड्ढे से हो आए हों जिस्म पे/ उसकी पैनी नज़र से होता है यह आभास/ और तब अचानक/ मेरे बदसूरत हो जाने का एहसास होने लगता है मुझे/

इन पंक्तियों में घर से बाहर निकल कर काम काज करने वाली स्त्रियों की सबसे बड़ी समस्या को रेखांकित किया गया है। यहाँ स्त्री ताड़ती है पुरुष की दृष्टि और स्पर्श में घुली -मिली कुंठित मानसिकता को। स्त्री के मन में उपजी पुरुषवादियों के प्रति घृणा उसे स्वयं सुन्दर से बदसूरत में बदल देती है। इस कविता का चरम वहां है जहां स्त्री कह उठती है- " तब मेरे अंदर जरा नहीं बचते/ नारी वाले कोमल एहसास/"
यहां स्त्री की घृणा के हिंसा में बदलने की जो प्रक्रिया है, वह कविता को प्रासंगिक और जरूरी बना देती है। इस कविता की अंतिम दो पंक्तियां बदलते समय की आक्रोशित स्त्री का चेहरा सामने लाती है। ये पंक्तियाँ हैं- " हाँ, तब मैं पीटती हूँ उसे फिर जानवरों की तरह/ खो कर अपना आपा कभी- कभी बीच बाज़ार."
अनिता भारती 


धर्मों, संस्कारों और परम्पराओं के नाम पर बांधी गई स्त्री का विद्रोह सोनी पांडे की कविता ' ये जो पर्दा है..." में ज्वालामुखी के लावे सा फूट पड़ा है। यह कविता स्त्री के पुरूष की दासी बने रहने का पूर्ण अस्वीकार है। यहां स्त्री मन में स्वतंत्रता की आकांक्षा का प्रबल स्वर पुरुषवादियों की ओर से थोपी गई लिजलिजी परम्पराओं को धिक्कारता है। कुछ पंक्तियाँ देखिए- " नैतिकता के साँचे में/ संस्कारों की सूई से/ सिली गई चादर/ और धर्म, कर्म पाखण्ड के/ सैंकड़ों बूटे टाँके गए/ मेरी सीमा रेखा से सटे पर्देे में/ इस पर्दे के बाहर पाँव रखते ही/ मैं घोषित कर दी जाउंगी/ बे-पर्दा औरत..."

सोनी की कविता में परम्पराओं की ड्योढ़ी लांघने  और नया पर्दा बुनने की जद्दोजहद स्त्री के जीवन संघर्ष को नया मोड़ देने की जिद का नाम है। यहां स्त्री केवल अपने अस्तित्व को बचाए- बनाए रखने के अलावा थोपे गए संस्कारों के तटबंध को तार- तार करने को व्याकुल है। पुरुषवाद के उस डोर को तोड़ने की कोशिश है यह कविता, जिस डोर के सहारे टिक कर पुरुष सदियों से विजय पताका लहराता रहा है।

कविता की कुछ पंक्तियों को देखिए, " बह सकती है /अविरल, उन्मुक्त/ परम्पराओं की ड्योढ़ी उलाँघ/ बुन सकती है/ एक नया पर्दा/ जिसे सदियों से अपनी विजय पताका बना/ लहराता रहा पुरुष..."

कविता के अंत में पुरुष को ललकारती हुई स्त्री सवाल करती है। यह सवाल ही पुरुषवाद के लिए वर्तमान समय का सबसे बड़ा प्रश्न भी है। सदियों से बिछाए जाल को हटाती हुई स्त्री पूछती है- " कहो पुरुष/ तुम क्यों नहीं रखते कल्याण कामना के लिए / असंख्य निर्जला व्रत?/ क्या ये सारे ठेके/ केवल मेरे हिस्से हैं?..."
सोनी पांडेय 


अनिता भारती की कविता 'हमें तुम्हारी बेटियां पसंद हैं ' दलित समाज से जुड़ी सबसे गंभीर समस्या की ओर इशारा करती है। इस कविता में दलित स्त्री को लगातार हाशिए पर करते चले जाने का रोंगटे खड़े करने वाला वर्णन है। यहां जवानी की दहलीज पर खड़ी दलित किशोरियों को किस तरह सवर्णवादी घरों में जानवरों की तरह जांच-परख कर कर रखा जाता है उसका मार्मिक चित्रण है। यहां सवर्ण स्त्री किसी ऐसी दलित लड़की को काम पर रखना चाहती है, जो केवल मन लगा कर काम कर सके।

कविता की कुछ पंक्तियाँ देखिए- " बताओ तुम्हारी बेटियां/ काम करने में कैसी हैं?/ कामचोर तो नहीं?/साफ- सुथरे रहने की आदत है या नहीं?/ लालची तो नहीं खाने की?/ शौक़ीन तो नहीं ना/ मोबाइल, लिपस्टिक, टेलीविजन की?/ हमें जरूरत है/ ऐसी ही लड़कियों की/ जो हों अल्प वयस्क/ जो मन लगाकर काम कर सकें सारे..."


इस कविता से सवर्ण परिवारों की महिलाओं की दलित लड़कियों के प्रति गैर जिम्मेदारी से भरी सोच का पता चलता है। कविता इस समय के सबसे बड़े सवाल को उठाने में सफल रही है कि क्या दलित परिवार के आर्थिक रूप से कमजोर होने का खामियाज़ा दलित लड़की को एक गुलाम बनकर भुगतना पड़ता है? यह कविता वृद्ध होती सवर्ण स्त्री को उसके घरेलू कार्यों से छुटकारा पाने की मनःस्थिति को भी दर्शाती है।


रजनी अनुरागी की कविता 'माँ ' बेटी और माँ के रिश्ते को बहुत अलग तरीके से सामने रखती है।  इस कविता में एक वृद्ध माँ के बारे में सोचती स्त्री थोड़ी सी सशंकित भी है कि क्या मैं खुद एक दिन माँ की तरह हो जाउंगी? यहां माँ के सब कुछ संभाल कर रखने का बहुत भावुक चित्रण हुआ है।
कुछ पंक्तियां देखिए- " आज तक नहीं फेंकी मेरी छोटी फ्रॉक/ मेरा लिखा पहला अक्षर उसके संग्रहालय में / आज भी सुरक्षित है..."
रजनी अनुरागी 


माँ- बेटी के बीच का यह मौन -संवाद मन को गहरे छू जाता है। यहां वृद्धावस्था के कारण माँ की आँखों की कम होती रोशनी, सुनने की कम होती क्षमता को लेकर चिंतित बेटी की मनःस्थिति कहीं से भी ख़ुशी ढूंढ लाने की है। माँ तो बेटी का हर दर्द महसूस कर ही लेती है- " वह मुझे ठीक से नहीं देख पाती/ हाथों से देखती है मेरा चेहरा/ महसूसती है मेरा दर्द/ पोछती है अपने आंसू..."

माँ की पुराने चीजों को सहेजने की आदत एक बेटी की नजरों में एक बड़ी बात है, लेकिन बेटी उस तरह कहाँ से हो सकती है । कविता में बेटी कहती है- " सोचती हूँ, क्या मैं भी एक दिन माँ जैसी हो जाउंगी/ लेकिन मुझमें इतनी सब्र कहाँ/ कि चीजों को संभाल कर रख पाऊँ/ मैं अभी से चीजों को भूलने लगी हूँ..."


 सुजाता तेवतिया 
 सुजाता तेवतिया की कविता ' अगर नहीं होती गुफा मैं' स्त्री के अंतर्मन के जटिल गांठों को खोलती है। यहाँ स्त्री- मन हवा में बदल जाने के उल्लास से भरा है। यहां निर्बंध, स्वतंत्र स्त्री कह रही है कि मैं प्यार सीखने लगूंगी फिर से।कविता में 'आज' का हर क्षण महत्वपूर्ण है । सुजाता लिखती हैं- " कभी नहीं हो पाती मैं/ जैसे हो सकती हूँ आज!/ हवा हो जाती मैं शायद या बयार/ लेकिन सिर्फ बाढ़ हो पाती हूँ अक्सर!" इस कविता में ऊब को भूल आगे बढ़ने की बात है। यहाँ स्त्री के उत्साह से उसके सपने भी जुड़े हैं। वह पंख फैला कर उड़ना चाहती है। कुछ पंक्तियाँ देखिए- "तुम ऊब न जाओ/ चलो फिर से गाए वही कविता/ जिसमें मैं बन जाती थी चिड़ियाँ और तुम भंवरा.."

अवनीश गौतम 

अवनीश गौतम की कविता 'सफाई कार्यक्रम' वर्तमान समय के राजनीतिक छल से पर्दा उठाती है। सियासी सत्ता से सम्मोहित नेताओं ने जिस तरह जन- समस्याओं से मुंह मोड़कर अपने फोटो छपवाने के लिए व्यर्थ नीतियों का सहारा लिया है, उससे उनकी कलई खुल गई है। गौतम की इस रोंगटे खड़ी देने वाली कविता में राजनीतिक दिशाहीनता पर बड़ा कटाक्ष है। कुछ पंक्तियाँ देखिए- " सफाई कार्यक्रम जोरों पर है/ और ये कोई आज की बात नहीं/ यह तो सांस्कृतिक कार्यक्रम है/ जो चलता रहता है/ धार्मिक अनुष्ठानों के साथ- साथ.."
इस कविता में जहां एक ओर बिछी हुई लाशों का जिक्र है, वहीँ दूसरी ओर हत्यारों के नई चालों का जिक्र है. गौतम लिखते हैं - " अब तो हत्यारों ने/ नए तंत्रों/ नए यंत्रों/ नए मन्त्रों से / वधस्थलों का ऐसा आधुनिकीकरण कर दिया है/  कि लाशें भी शामिल होती जा रही हैं/ अपनी मृत्यु के उत्सव में..."


इसके अलावा 'स्त्री काल' में प्रकाशित अन्य कविताएं भी पाठकों को झकझोरने में सफल हैं। इन कविताओं में स्त्री के विद्रोह, संघर्ष, आत्मसम्मान और अंतर्मन की उथल-पुथल के अलावा कई 'रूप ' उपस्थित है। आशा है कि इसी तरह नव वर्ष में 'स्त्री काल' के इस 'गुलदस्ते' में नए समय की आहट और तेवर लिए कविताएं पढ़ने को मिलती रहेंगी।

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