वसीम अकरम की कवितायें : आलू प्याज की बोरियां हैं लडकियां

वसीम अकरम
वसीम अकरम युवा पत्रकार हैं . इन दिनों प्रभात खबर में कार्यरत हैं. संपर्क : ई -मेल : talk2wasimakram@gmail.com : 9899170273 

आलू प्याज की बोरियां हैं लडकियां
सही कहा तुमने
अब कोई जोधाबाई
किसी अकबर के घर नहीं जायेगी
और न फिर से
कोई दीन-ए-इलाही पैदा होगा
जहां धर्मों से ऊपर होता है एक इंसान।
मगर मेरे दोस्त, तुम यह भूल गये
के फिर कोई हुमायूं
किसी कर्मावती की हिफाजत की
कसम नहीं खायेगा कोई
और न फिर कहीं किसी
रक्षाबंधन की बुनियाद ही पड़ेगी...
सही कहा कि अब कोई जोधाबाई
किसी अकबर के घर नहीं जायेगी।
सिकंदर अपनी बेटी तुम्हें दे जायेगा या नहीं
यह तो मुझे नहीं मालूम
पर इतना जरूर मालूम है कि तुम्हारी बेटियां
भले ही आसाराम जैसों की शिकार हो जायें
उन्हें उस राक्षस के पास भेजने में
तुम्हें कोई ऐतराज नहीं होगा
क्योंकि वह नुमाइंदा है तुम्हारे धर्म का।
बलत्कृत हो रही हैं
तो होती रहें ये लड़कियां
तुम्हारे मंदिर-ओ-मस्जिद तो सलामत हैं!
खुदकुशी कर रही हैं, तो करती रहें
तुम्हारे दीन-ओ-धरम तो सालिम हैं!
तुम्हारे खुद के हाथों
अगर वो मर रही हैं, तो मरती रहें
तुम्हारे किताबों पर तो कोई आंच नहीं!
उनके मरने, लुट जाने से
तुम्हें कोई फर्क नहीं पड़नेवाला
क्योंकि यह तुम्हारे धर्म का मामला नहीं है।
दरअसल, गलती तुम्हारी नहीं है
क्योंकि, तुम्हारी धर्म की ठेकेदारी
औरत की इज्जत पर ही टिकी है
तुम्हारे लिए औरतें और लड़कियां
महज आलू-प्याज की ऐसी बोरियां हैं
जिन्हें तुम अपने मन-भाव में
धर्म-जाति, शरिया-गोत्र की मंडियों में
बेझिझक बेच सकते हो
जो चाहे, कीमत लगा सकते हो उनकी
और इसी कीमत से तुम
पुरुष सत्ता के भुरभुरे खंभों को
मजबूत बनाते रहने की
नाकाम कोशिशें करते रहते हो।
कितने ओछे और कमजोर हैं तुम्हारे धर्म
जो मासूम प्रेम की चुनौती भी स्वीकार नहीं कर पाते
और गिरने लगते हैं भरभराकर
तुम इसमें दब के मर न जाओ
इसलिए औरत का सहारा लेते हो
कितनी कमजर्फ है तुम्हारी मर्दानगी
जिसकी इज्जत की हिफाजत भी नहीं कर सकती
उसी के सहारे
तुम अपने धर्मों की ठेकेदारी करते हो।
बिल्कुल सही कहते हो तुम मेरे दोस्त
अब कोई जोधाबाई
किसी अकबर के घर नहीं जायेगी...



लोकतंत्र में लोक

तुम अनाज उगाओगे
तुम्हे रोटी नहीं मिलेगी,
तुम ईंट पत्थर जोड़ोगे
तुम्हें सड़क पर सोना होगा,
तुम कपड़े बुनोगे
और तुम नंगे रहोगे,
क्योंकि अब लोकतंत्र
अपनी परिभाषा बदल चुका है
लोकतंत्र में अब लोक
एक कोरी अवधारणा मात्र है,
सत्ता तुम्हारे हाथ में नहीं
पूंजी के हाथ में है
और पूंजी
नीराओं, राजाओं
कलमाडियों और टाटाओं के हाथ में है,
तुम्हारी जबान, तुम्हारी मेहनत
तुम्हारी स्वतंत्रता, तुम्हारा अधिकार
सिर्फ संवैधानिक कागजों में है
हकीकत में नहीं,
तभी तो,
तुम्हारी चंद रुपये की चोरी
तुम्हें जेल पहुंचा देती है
मगर,
उनकी अरबों की हेराफेरी
महज एक
राजनितिक खेल बनकर रह जाती है।



 बाबा जी का लोटा

याद है न महाराज
बाबा जी का वह लोटा
हां-हां वही, शौच जाने वाला लोटा
एक दलित के छू जाने भर से ही
जो अशुद्ध हो गया था
अब उसमें गौमुत्र भरकर
बेचा जा रहा है बाजार में
 अगर कोई बाजार हो भी तो वहां
 विष्ठा का कोई मूल्य न हो शायद
 लेकिन यह तो
 धर्म का बाजार है महाराज
 जहां इंसानों से भी
 कहीं ज्यादा पवित्र होता है गौमुत्र
 क्योंकि सैकड़ों देवी-देवताओं का वास है उसमें
इस देवत्व की विडम्बना देखिए कि
सर्वोपरि हो गयी है विष्ठा की निष्ठा
और गाय हमारी माता हो गयी है
मगर ईश्वर के बनाये
संबंधों की यह कैसी विद्रूपता है कि
बेचारा बैल, हमारा बाप न हो सका
जिसकी मजबूत खुरों ने
धरती की छाती चीरकर
मुंह के निवाले पैदा किये हमारे लिए....
क्यों, सही कहा न महाराज....
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