लेकिन सुबह तो हो

नेह भारती
             
अनु अब भी कुछ समझाना चाह रही थी। लेकिन मैं नहीं रुकी। लगभग झटके से हाथ छुड़ाकर तेजी से सड़क की तरफ बढ़ी। एक आॅटोरिक्शा  सामने ही दिखा।
“सादतपुर चलोगे?“
आॅटोरिक्शा  ड्राइवर ने सहमति में सिर हिलाया तो मैं पीछे की सीट में धंस गयी। किक की आवाज हुई और इक्का-दुक्का वाहनों के बीच दिल्ली की सड़कों पर अंधेरे और सन्नाटे को चीरता हुआ आटोरिक्शा  हवा से बातें करने लगा। तेज ठंडी हवा से कंपकपी छूट रही थी, लेकिन दिमाग में मानो अब भी गरम सलाखें गड़ी हों।
“कम्प्रो, ये भी कोई बात हुई... कैसे-कैसे शब्द इजाद कर लेते हैं लोग, कुछ भी मतलब निकाल लो...“ मुझे अपने शब्द अब भी बार-बार याद आ रहे थे। अनु का चेहरा भी बार-बार आंखों के सामने आ रहा था। मेरी अच्छी दोस्त। मुझे कभी मिसगाइड नहीं कर सकती। न कभी डेमेारलाइज। शायद मैंने ही उसका मतलब गलत निकाला हो। या शायद वह मुझे किसी खतरे से आगाह कर रही हो। या फिर यूं ही सुनी-सुनाई बातें कर रही हो।
शाम तक कितनी खुश  थी मैं। पहली बार कायदे की नौकरी का आॅफर मिला था। कल ही सुबह ज्वाइन करने का आफर। ऐसी बात सबसे पहले अनु से ही शेयर करती हूं। लेकिन उससे मिलना मानो पहाड़ हो गया। उसके शब्द अब भी हथौड़े की तरह गूंज रहे हैं कानों में - “हां, अच्छा आॅफर है, लेकिन पहले पता लगा लो, सुना है कि इस कंपनी में कंप्रो ही टिक पाते हैं।" \

“ये क्या है?“ मैं चैंकी।
“अरे नहीं जानती, कंप्रोमाइज। सुना है कि आजकल कई जगहों पर कंप्रो टाइप या कंप्रो नेचर लड़कियां ही टिक पाती हैं। कुछ सरकारी दफ्तरों में भी ये बीमारी आ गयी है।“
अनु अपने सामान्य ज्ञान का परिचय दिये जा रही थी। लेकिन मैं हतप्रभ। क्या मतलब है इसका? किस तरह का कंप्रोमाइज? कैसा समझौता? किससे? क्यों?
मुझे विचलित देख अनु भी थोड़ा परेशान हो उठी। मानो उसने ऐसा कहकर कोई अपराध कर दिया हो। लगी समझाने - “अरे, मुझे कोई उतना ठीक-ठीक मालूम नहीं। हो सकता है सब सुनी-सुनाई हो। हो सकता है तुम्हें सब ठीक-ठाक मिल जाये। इस कंपनी का मैंने कहीं सुना था तो बता दिया। इन  वालों के हाथ में तो बहुत पावर होते हैं न। देर रात तक रुकने को कह सकते हैं, दूसरे शहरों में टूर पर भेज सकते हैं। कुछ भी ऐसा करने को कह सकते हैं जिसे तुम्हारा दिल या दिमाग पसंद न करे। लेकिन इनका रहता है कि हर एम्प्लाई हर वक्त हर चीज के लिए तैयार रहे। यस बाॅस कहता रहे। बस इतना ही। यही है कंप्रो टाइप या कंप्रो नेचर।“

क्या वाकई बस इतना ही? लड़कियों के लिए भी इसका मतलब बस इतना ही होता होगा? किस तरह के कंप्र्रोमाइज करने पड़ते होंगे? भला कोई क्यों बताये अगर करने भी पड़ते हों तो? आॅफर की खुशी  काफूर हो चुकी थी। मैं किसी भी तरह जल्द-से-जल्द घर जाकर मम्मी के कंधे से चिपककर रोना चाहती थी।
दिल्ली की सड़कों के अंधेरे सन्नाटे को चीरता आॅटो रिक्शा  भागा जा रहा था। ड्राइवर एफएम रेडियो के चैनल बदल-बदलकर गाने सुन रहा था। बीच-बीच में गाने की कुछ पंक्तियां भी गुनगुना रहा था। इस बीच रेडियो जाॅकी ने दिल्ली की सड़कों पर लड़कियों के साथ घटनाओं को जोक्स के अंदाज में पेश  करना शुरू किया, बोला- “निर्भया कांड के बाद अब कैब कांड... लडकियां सीखें कराटे, गुंडों  को मारो चांटे...“
इसी वक्त मोबाइल के मैसेज बाॅक्स में पापा का एसएमएस आया- “वेयर आर यू बेटे, आॅल इज  वेल?“
“यस, आॅन वे टू होम।“ जवाब भेजकर मैं फिर ख्यालों में डूब गयी। आखिर किस बात की चिंता रहती है पापा को? देश  की राजधानी है दिल्ली। बच्ची नहीं हूं मैं। आखिर क्यों परेशान रहते हैं मम्मी-पापा? क्या निर्भया कांड से इतना डर गये हैं सब लोग? क्या कैब कांड के बाद लड़कियों को घर से निकलना बंद कर देना चाहिए इस गालिब और मीर की दिल्ली में?
अचानक आॅटो रिक्शा  दाहिनी सड़क की तरफ मुड़ा। मैं लगभग चीख उठी- “उधर कहां, सादतपुर तो बाईं तरफ से जाते हैं न, रोको आॅटो।“
आॅटो ड्राइवर चाल धीमी करता बोला- “उधर रोड पर काम चल रहा है मैडम जी, डायवर्सन से जाना होगा।“
रेडियो जाॅकी अब भी मजे ले-लेकर दिल्ली की सड़कों की कहानियां सुना रहा था। लड़कियों को कराटे के गुर सिखा रहा था। मैं बदहवास सी बोली- “रोको आॅटो, मैं खूब समझती हूं तुम सबकी चालबाजी।“
आॅटो रुक गया। मैं झटके से उतरी और तेजी से सड़क किनारे खड़े एक आॅटो की ओर लपकी।
“सादतपुर जाओगे?“
“हां मैडम, लेकिन रोड बन रहा है, डायवर्सन से जाना होगा।“ इस आॅटो का ड्राइवर बोला। मैंने असहाय भाव से पलटकर देखा। जिस आॅटो से आ रही थी, उसका ड्राइवर बेहद मासूमियत के साथ बुला रहा था- “आप चिंता न करो मैडम, हम वैसे नहीं हैं, चलो आपको पहुंचा देता हूं।“

पहली बार नजर पड़ी उसके उम्रदराज चेहरे पर। पकी दाढ़ी। झुर्रियों पड़े चेहरे पर अभिभावक जैसा भाव। मैं थोड़ी शर्मिंदा होती वापस आॅटो में बैठ गयी। आॅटो ड्राइवर मानो मेरे मनोभाव समझ रहा हो। सांत्वना के अंदाज में बोला- “आपका कसूर नहीं मैडम जी, आजकल दिल्ली में औरतजात कहीं सुरक्षित नहीं, न घर में, न आॅफिस, न सड़क पर। दुनिया कहां जा रही है और हम कहां भटके पड़े हैं।“
मैं चुपचाप सुनती रही। गुमसुम।
घर पहुंची तो पापा ने दरवाजा खोलते ही पूछा- “आओ बेटे, सब ठीक है न?“
“हां पापा, आॅफर तो अच्छा मिला है। कल ही फाइनल करना होगा। लेकिन समझ नहीं पा रही क्या करना है।“ मेरी आवाज में रुलाई थी। पापा ऐसे मौकों पर ज्यादा बात करने की बजाय खामोशी  पसंद करते हैं। ज्यादा कुछ पूछते भी नहीं। बोले- “डोंट वरी, डिनर लेकर आराम से सो जाओ बेटे, सुबह सोचना क्या करना है।"

पापा अक्सर ऐसा ही करते। किसी मामले पर सोच-विचार करने की नौबत आने पर कुछ समय के लिए टाल देते। कहते, अभी छोड़ दो। कल खुद समझ में आ जायेगा। कोई सामान गुम जाये तो कहते, अभी खोजना बंद करो, घंटे-दो-घंटे में खुद मिल जायेगा। मजे की बात यह कि प्रायः यह फार्मूला काम भी कर जाता।
मम्मी ने खाना परोसा। मैं गुमसुम एक-एक कौर टूंगती रही। बीच-बीच में मम्मी कुछ पूछती। कहां का आॅफर है, कितना मिलेगा, कैसी कंपनी है, क्या समझ में नहीं आ रहा, लोग तो अच्छे होंगे न....। मैं कुछ-कुछ जवाब देती रही। फिर जाकर बिस्तर पर लेट गयी। लेकिन नींद कहां? आंखें बार-बार खुल जातीं, कमरे की छत से टंग जाती।

सुबह सोचना क्या करना है। पापा का फार्मूला राहत देने वाला था। लेकिन सुबह तो हो। कल जो करना है सो तो अलग, लेकिन आज जो किया, वह भी तो नहीं भूलता। क्या आज ओवर रिएक्ट कर रही थी मैं। क्या अनु के साथ मेरा बर्ताव ठीक था? क्या आॅटो ड्राइवर को बुरा नहीं लगा होगा मेरे व्यवहार से? पापा क्यों परेशान रहते हैं मेरे लिए? मम्मी क्यों पूछती है कि कंपनी वाले लोग अच्छे तो होंगे न? रेडियो जाॅकी मजे ले रहा था कि आगाह कर रहा था? आॅटो ड्राइवर क्यों कह रहा था कि औरत जात के लिए डरावनी होती जा रही है दिल्ली।
दिल्ली। बेदिल दिल्ली? गालिब और मीर की दिल्ली? लुटियंस की दिल्ली? सत्तालोलुपों और कारपारेट दलालों की दिल्ली? किसकी दिल्ली? कैसी दिल्ली?
हर देल्हाइट  के लिए इसके अलग मायने हैं। पापा के लिए भी अलग। वह अक्सर गुनगुनाते- “गालिब-ओ-मीर की दिल्ली देखी, देख के हम हैरान हुए। उनका शहर लोहे से बना है, फूलों से कटता जाए है।"
मुझे काफी अच्छा लगता ऐसी चीजें सुनना। एक बार मैंने पूछा था- “पापा, ये आखिरी वाली लाइन समझाइये जरा। फूलों से कटता जाये है, इसका क्या मतलब? कटने यानी क्या? दूर होना? कि ये दिल्ली फूलों से दूर हो रही है?“
“अरे नहीं बेटी, यही तो कमाल है गोरख पांडे का। वो कहते हैं कि ये जो दिल्ली है, यह भले बनी हो लोहे की, लेकिन फूल इस लोहे को काट रहे हैं। कटने का मतलब दूर होना नहीं है बल्कि कटने का मतलब कटना ही है। यानी फूल से कट रहा है लोहे का शहर। समझो कि फूल की कोमलता से परास्त हो रही है ये दिल्ली।“ समझाते हुए पापा की आंखें चमक रही थीं।


फूलों से पराजित होती लोहे की दिल्ली। कमाल की बात। कवि की कल्पना। दार्शनिक  बात। लेकिन जो अनु कह रही थी, रेडियो जाॅकी और आॅटो ड्राइवर कह रहा था, वो सब क्या है? पापा जो वक्त-बेवक्त पूछते रहते हैं खैरियत, वो क्या है? किस दिल्ली की बात हो रही है यहां? किसकी दिल्ली? और ये जो कंप्रो है वो क्या है? हू विल कंप्रोमाइज? लोहा कि फूल?
सुबह सोचना क्या करना है। पापा का फार्मूला राहत देने वाला था। लेकिन सुबह तो हो। रह-रहकर कोई ख्याल आ रहा है। कभी किसी का चेहरा, कभी किसी की बात।
अनु ने ऐसा कुछ तो कहा नहीं था। कोई स्पेसिफिक बात नहीं थी। बस एक जनरल टाइप बात। एक अच्छी दोस्त की सदिच्छा से जन्मी आशंका भर। क्या यह वही बात नहीं हो मम्मी पूछती है, और जिसकी पापा को चिंता रहती है। आखिर क्यों हर वक्त डरना पड़े मुझे? क्यों चिंता करें मेरे दोस्त, मम्मी, पापा? लोहे और फूलों का यह कैसा रिश्ता  है दिल्ली में?

सब मुझे कहते हैं तुम देर से आयी दिल्ली। छोटे कस्बे में पढ़ाई के बदले पहले ही आ गयी होती तो आज दिल्ली में इतना स्ट्रगल नहीं करना पड़ता। मैं तो खुद आना चाहती थी दिल्ली। लेकिन पापा अकेले भेजने को तैयार नहीं थे। यूपी के जिस जिले या कस्बे में उनका तबादला होता रहा, वहीं से पढ़ाई। रिटायरमेंट के बाद दिल्ली आ बसे पापा, तो मुझे भी राजधानी में अपने पंख फैलाने मौका मिला है। लेकिन वह कौन सा डर था जिसके कारण मैं पहले नहीं आ सकी? आखिर वह क्या है जिसके लिए आज भी अनु कह रही है कि आजकल ये लोग कंप्रो नेचर को ज्यादा पसंद करते हैं?
आंखों से अब भी गायब है नींद। दूर कहीं एफएम रेडियो से पुराने गीत की धुन आ रही थी- आज की रात मुझे नींद नहीं आएगी, सुना है तेरी महफिल में रतजगा है।
उफ् ये उलझन, ये ख्याल। कैसी महफिल है ये और कैसा रतजगा। पापा कहते हैं सुबह सोचना क्या करना है। लेकिन सुबह तो हो।

अनु एकदम बिंदास है। साफ-साफ बोलने वाली। सामान्य ज्ञान जबरदस्त। ग्रेजुएशन करके किसी बीएड काॅलेज में नाम लिखाया था। लेकिन दो साल पढ़ाई के बाद पता चला कि काॅलेज की मान्यता ही गलत मिली थी। केस-मुकदमे में मामला उलझता गया। लेकिन इस झमेले ने अनु को दुनियादारी सिखा दी। उसकी बातों में व्यंग्य की मात्रा बढ़ती गयी। देश , दुनिया और समाज पर उसके कटाक्ष सुनने लायक होते। मैं करियर को लेकर जितना परेशान होती, वह भविष्य को लेकर उतनी ही बेपरवाह। दार्शनिक  अंदाज में कहती- “फिकर नहीं करते मेरी दोस्त, ये दुनिया एक संसार है। जब तक दुख है, तब तक तकलीफ है."

अनु शब्दों की बाजीगरी करती। मैं असल सवाल पर टिकी रहती। क्या सारी चिंताएं हम लड़कियों के लिए ही हैं?
एक बार अनु अचानक गंभीर होकर बोलने लगी थी- “अरे नहीं पगली, असल चिंता तो हर उसकी है जो मेहनत-मजूरी की कमाई करे, ईमानदारी से जीना चाहे। भले वो औरत हो या मर्द। ये मामला सिस्टम का है। ज्यादा कमजोर लोगों के सामने ये सिस्टम जल्दी एक्सपोज होता है। जैसे महिलाओं के मामले में।“
मैं चुपचाप सुनती रहती। इन पहेलियों के बीच आखिर कहां है मेरे लायक एक सुरक्षित कैरियर? मेरे पापा कब होंगे मेरे व्हेयर-अबाउट को लेकर चिंतामुक्त?

“तुम सुरक्षा की बात करती हो? जब दिल्ली की सड़कों पर चलती बसों और कैब में हम लुट रही हैं तो हमारी सुषमा जी गीता को राष्ट्रग्रंथ बनाने को बेचैन हैं। बना दीजिये, आपकी सरकार है, किसने रोका है? लेकिन ये भी नहीं करना है, बस हमें असल सवालों से भटकाना मकसद है इनका।“ अनु ऐसे मौकों पर ऐसी ही उत्तेजना में बातें किया करती। फिर कहती- “अच्छा छोड़ो, तुम वो सुनाओ रघुवीर सहाय ने जो लिखा था गीता वाली पोएम में।“
मैं उत्साह के साथ सुनाती- “पढि़ये गीता, बनिये सीता, फिर इन सबमें लगा पलीता, किसी मूर्ख की हो परिणीता, निज घर बार बसाइये...। होंय कंटीली, आंखें गीली, लकड़ी सीली, तबियत  ढीली, घर की सबसे बड़ी पतीली, भरकर भात पसाइए।“
“हा-हा-हा, किसी मूर्ख की परिणीता बन जाओ, शत-प्रतिशत सुरक्षा की संपूर्ण गारंटी।“ अनु छेड़ती।
लेकिन क्या सचमुच? विवाह क्या महिलाओं की सुरक्षा की गारंटी लेता है? उन औरतों का क्या जो तरह-तरह के दबावों में जीती हैं? और ये कंप्रो टाइप होने की परोक्ष मांग?
ऐसे सवालों के जवाब अनु के पास हर वक्त तैयार मिलते। कहती- “इस सिस्टम का महिलाओं को लेकर नजरिया देख लो, सब समझ जाओगी।“
कई बार वह तरह-तरह के उदाहरणों और नवीनतम सूचनाओं के साथ ऐसी बातें  करती। मैं हंसकर कहती- “तुम तो मानो कोई आंदोलन खड़ा कर दोगी।“
“अरे नहीं, उतना तो नहीं, हां लेकिन जो समझ में आयेगा सही-गलत, वो बोलूंगी जरूर।“ कहकर अनु किसी नौटंकी की तरह अभिनय पूर्वक कहती- “और हां, सच बोलने के कारण फांसी चढ़ जाऊंगी लेकिन यह नहीं कहूंगी कि हमसे भूल हो गयी, हमका माफी दई दो। मैं कहूंगी, हमने सच ही कहा है, हमका फांसी दई दो।“
और हम दोनों बेफिक्र खिलखिलातीं। इस बीच अनु तरह-तरह की सूचनाओं की फुलझडि़यां छोड़ती- “तुमने सुना, पचास करोड़ की गर्लफ्रेंड ? यह लेबल है पोलिटिक्स का। चुनाव की रैली में किसी की मंगेतर का ऐसा मजाक उड़ाने वाले लोग इस देश  को कहां ले जाना चाहते हैं?“

बाद में एक दिन अनु काफी उदास दिखी। बोली- “जानती हो, पचास करोड़ की वह गर्लफ्रेंड  अब इस दुनिया में नहीं है। यह भी नहीं मालूम कि मौत कैसे हुई।“ मैं चुपचाप समझने की कोषिष करती रही इन गुत्थियों को।
कुछ दिनों बाद एक बार फिर अनु ने यही बात निकाली- “जानती हो, उस पचास करोड़ की गर्लफ्रेंड  के लिए जिस राजनेता पर व्यंग्य किया गया था, वह अब उसी व्यंग्य करने वाले का चहेता बन गया है। झाडू टीम के नौरत्नों में एक। जिसे उस मौत का जवाब देना है, और जिसे उसका हिसाब लेना है, दोनों एक हो गये। कोई पूछने वाला नहीं कि उसकी मौत कैसे हुई। यही है एक औरत की औकात। भले ही वह पचास करोड़ की क्यों न हो।“
मैं हैरान होकर सुनती रहती। एक बात का दूसरी बात से संबंध जोड़ने के सूत्र तलाशती रहती।
एक बार अनु ने पूछा- “स्नूपगेट का नाम सुनी हो?“

“हां, आज ही टीवी समाचारों में देख रही थी। किसी महिला आर्किटेक्ट की कई महीनों तक जासूसी करायी गयी, व्यक्तिगत कारणों से सरकारी तंत्र का दुरुपयोग हुआ।“ मैंने अरुचिपूर्वक जवाब दिया। मुझे अंदेशा था कि अब अनु घंटों इस पर लेक्चर देगी। लेकिन उसने इतना ही कहा- “मैं तो पहले ही कह चुकी हूं कि इस सिस्टम का महिलाओं को लेकर नजरिया देख लो, सब समझ जाओगी।“

मेरी ऐसी बातों की गहराई में रुचि नहीं होती। लेकिन इन बातों में छिपे व्यंग्य-विनोद का आनंद लेती थी। जब वो गंभीर होकर बोलने लगती थी, तब मुझे परेशानी होती। अपना कैरियर याद आने लगता। अपने मम्मी-पापा की चिंताएं दिमाग में कौंधने लगती। इधर-उधर की बात करके मन हलका करती।लेकिन अनु कहां मानने वाली। एक बार बताने लगी- “यह देखो, गजब हो गया। प्रधानमंत्री की पत्नी ने आरटीआइ डाला है। सूचना मांग रही हैं कि उनकी सुरक्षा के नाम पर जिन लोगों को भेजा है, उनका कर्तव्य क्या है। वो बेचारी इन पुलिसवालों की आवभगत करके परेशान हैं। उन्हें तो इन सुरक्षाकर्मियों से ही डर है। क्या मजाक है, जब पीएम की पत्नी को न्याय नसीब नहीं तो हम जैसी अन्नु का क्या होगा धन्नो?“

गंभीर बात बोलते-बोलते हास्य का छौंकन लगाकर अनु हंस पड़ती। फिर हम तरह-तरह की बातों  में मशगूल हो जातीं। मुझे मेरा कैरियर पसंद, लेकिन उसका बस चले तो इस सिस्टम को मिनटों में बदल डाले। मेरी किसी भी समस्या का कोई तत्काल हल शायद ही उसके पास हो। हर चीज के लिए पहले बेचारे सिस्टम को दो गाली जरूर पड़ती। मैं तो यहां तक कह देती- “देख अनु, ऐसा न हो कभी मैं एक ग्लास पानी के लिए तड़फ रही होऊं तब तुम वाटर सप्लाई सिस्टम सुधारने का तरीका बताने लगो."
अनु मेरा व्यंग्य ताड़कर कहती- “बिलकुल संबंध है मेरी दोस्त, तुम्हें  एक ग्लास पानी देने से पहले मैं जरूर देखूंगी कि तुम्हारा सिस्टम ठीक रहे।“
फिर कहती- “ये जो तुम हर वक्त कैरियर और पढ़ाई का रोना रोती हो न, यह सब तुम डिजर्व करती हो। जितना चाहती हो, उससे कई गुना ज्यादा डिजर्व करती हो। लेकिन ये सिस्टम उतनी भी इजाजत नहीं देता, जिस मामूली चीज के लिए तुम तैयार हो।“

क्या अनु की बातें मेरी चिंतनशैली का हिस्सा बन गयी हैं? मुझे क्यों न मिले वह सब कुछ जो मैं डिजर्व करती हूं। एक खुला आसमनान क्यों नहीं है मेरे लिए जहां मैं इतमिनान से पंख फैला सकूं। जिस कैरियर की इतने वक्त से तलाश  थी, उसका मिलना आज कोई राहत क्यों नहीं दे रहा? कल सुबह आखिर क्या जवाब दूंगी कंपनी को? सुबह सोचना क्या करना है। पापा का फार्मूला राहत देने वाला था। लेकिन सुबह तो हो। दिमाग में तरह-तरह के चेहरे आ रहे थे, तरह-तरह की बातें। रेडियोे जाॅकी की बातें और उम्रदराज आटो ड्राइवर के चेहरे की झुर्रियां। आखिर क्या कह रही थी अनु?

कुछ रातें ऐसी ही काली होती हैं।  ऐसे मौकों पर पापा याद आते हैं। गीतों, गजलों और रुबाइयों में अक्सर बात करने वाले पापा। हर बात के लिए कोई न कोई पंक्ति तैयार। इस उलझन वाली रात के लिए पापा की झोली में क्या होगा? मैं दिल बहलाने के लिए सोचने लगी। याद आया एक बार पापा को गुनगुनाते सुना था- काव-ए-काव ए सख्त जानिहा ए तन्हाई, न पूछ। सुबह करना शाम का, लाना है जू-ए-शीर का।
मैं कुछ समझ नहीं पाती थी। पूछने पर पापा खुश  होते। कहते- “चचा गालिब अपने अकेलेपन से परेशान हैं। उनके लिए शाम को सुबह करना यानी समझो रात काटना उतना ही मुश्किल  है, जितना पहाड़ को काटकर दूध की नहर निकालना।“
पापा इसकी सप्रसंग व्याख्या करते। इससे जुड़ा शीरीं और फरहाद का किस्सा सुनाते। फरहाद के सामने शर्त रखी गयी थी कि शीरीं चाहिए तो पहाड़ को काटकर दूध की नहर निकालनी होगी।

आज की रात ऐसी ही मुश्किल  क्यों बन गयी है मेरे लिए? आखिर किस पहाड़ से कैसी नहर निकालने की शर्त है मुझे अपना कैरियर पाने के लिए? कंप्रो? क्या वाकई ऐसी किसी शर्त का सामना करना होगा? या बस यूंही  एक काल्पनिक भय है? जैसे मम्मी जब पूछती है कि कंपनी के लोग सब अच्छे तो होंगे न, तो शायद वो समझती हो कि मुझे दरिंदों से निपटना पड़ेगा। जैसे पापा जब एसएमएस करते हैं कि सब ठीक तो है न, तो गोया किसी ने मुझे किडनैप कर लिया हो। अगर यह सारा डर काल्पनिक  है तो क्यों ऐसी डरी रहती है यह दिल्ली? किसकी दिल्ली है यह, कैसी दिल्ली?

कई बार मैं सोचती कि पापा को मेरी ऐसी चिंता क्यों रहती है आखिर? कई बार कहती- पापा, ये दिल्ली है, देश  की राजधानी है, महानगर है। सब ठीक तो है। आप क्यों परेशान होते हैं। लेकिन पापा को परेशानियों के मौके मिल ही जाते। किसी सुबह अखबार की हेडलाइन उन्हें परेशान करती। कभी टीवी के ब्रेकिंग न्यूज काटने को दौड़ते। बल्कि मैंने तो कई बार देखा कि पापा से ज्यादा बोल्ड मम्मी हैं। वो कहती, आप इतनी चिंता क्यों करते हैं, कुछ नहीं होगा मेरी बेटी को। पापा चुपचाप सुनते रह जाते हैं इन बातों को।
हालांकि जानती हूं कि पापा के स्वभाव में दब्बूपन नहीं है। उनकी कई बातों में बेफिक्राना झलकता। कई बार वह अनु जैसा बोलने लगते। एक दफे किसी बात पर दार्शनिक  अंदाज में गुनगुनाए- कहें क्या जो पूछे कोई हमसे मीर, जहां में तुम आए थे, क्या कर चले?
क्या मतलब? मैंने दिलचस्पी दिखाते हुए पूछा तो पापा खुश होकर बोले- “मीर तकी मीर यह सोचकर परेशान हैं कि अगर कोई यह पूछ ले कि इस दुनिया में आकर तुमने क्या किया, तो इसका क्या जवाब देंगे। यानी हर आदमी को कुछ ऐसा करना चाहिए कि उसका होना सार्थक हो।“
मैं क्या जवाब दूंगी, अगर कोई मुझसे यही बात पूछ ले? मन ही मन सोचा मैंने। इस महानगर में एक ऐसी लड़की, जो अपने मामूली कैरियर के लिए जूझ रही हो, वह भला क्या जवाब दे अपने होने का? जिसे कंप्रो जैसे नये शब्दों का मतलब समझना पड़ रहा हो, वह क्या कर जाये इस दुनिया से?
लेकिन मुझे ऐसे सवालों पर पापा को उकसाने में मजा आता। पूछती- “वो तो मीर साहब की चिंता थी पापा, आप अपना भी तो जवाब तैयार कर लीजिये।“

“हर आदमी का यही सपना होता है कि अपने बच्चों के लिए एक बेहतर दुनिया छोड़कर जाये। लेकिन इसके लिए हम कर कहां कुछ पाते हैं।“ पापा का स्वर रुंआसा हो जाता ऐसी बातें करते वक्त। लेकिन वे इसका एहसास नहीं होने देते। मैं भी यह जाहिर नहीं होने देती कि उनकी मनोदषा समझ में आ गयी है। बात बदल देती।
लेकिन आज की रात बात बदलने का समय नहीं। अब फैसला लेना होगा। कंपनी के आॅफर पर कल ही जवाब देना है। यह ठीक है कि संदेह की स्थिति में आफर ठुकरा देना बेहद आसान है। लेकिन सिर्फ संदेह के आधार पर अवसर गंवाने से क्या मिलेगा? और अगर ज्वाइन करने के बाद कोई परेषानी आयी तो क्या रास्ता निकलेगा। ऐसे सवालों से पापा को तो कभी नहीं गुजरना पड़ा होगा। महिलाओं के लिए ही इतनी जटिलता क्यों बना दी गयीं?

सुबह सोचना क्या करना है। पापा का फार्मूला राहत देने वाला था। लेकिन सुबह तो हो। इस पहाड़ जैसी काली रात को सुबह कैसे करे कोई? क्या सोचता होगा बेचारा शरीफ आॅटोवाला जब मैं चिल्लाई थी उस पर? अनु जब कहती है कि आजकल कंप्रो की ज्यादा पूछ है तो क्या मतलब है इसका? और फिर वो लोग कहां जाएं जिन्हें समझौते पसंद नहीं?

उफ्। नींद तो आने का नाम ही नहीं ले रही। आंखें मूंदने की कोशिश करूं तो कई चेहरे एक-एक कर विशाल  छाया बनकर दिखने लगते हैं। कभी निर्भया आकर पूछती है कहां है सुरक्षित दिल्ली का वादा, तो कभी कैब से गूंजती चीख सुनाई देती है। कभी पचास करोड़ की गर्लफे्रंड आकर पूछती है कि मेरे लिए यह दुनिया इतनी निर्मम क्यों हो गयी, तो कभी कोई युवती आकर कहती है कि जासूसी कांड के बाद मेरे लिए क्या बचा इस दुनिया में? कभी हिन्दी फिल्मों में सदैव दुखियारी की भूमिका निभाने जैसी मां का चेहरा उभरता है जो अपनी सुरक्षा से जुड़े मामूली सवालों के बहाने तमाम उम्र का हिसाब मांगती है। इन सभी महिलाओं के सवालों का कोई आपसी संबंध है या नहीं? क्या कभी किसी ने इन अलग-अलग दिखने वाले टुकड़ों को जोड़कर एक मुकम्मल तसवीर बनायी? किसने बनाया ऐसा निजाम जो औरतजात के लिए एक डरावने सपने जैसा हो? अनु ऐसा क्यों कहती है कि इस सिस्टम का महिलाओं को लेकर नजरिया देख लो, सब समझ जाओगी? क्या है इस सिस्टम की असलियत?

लगता है, आज की रात मुझे नींद नहीं आएगी। रात के सन्नाटे में कहीं दूर से पायल की आवाज देगी। झुन, झुन, झुन। दूर कहीं एक बच्ची अपने नन्हें पैरों में पीतल की छोटी-सी पायल पहने दौड़ती हुई आएगी और पापा की बांहों के सहारे कंधे पर जा बैठेगी। बिलकुल निडर। इस ऊंचाई पर पहुंचने ने का गर्व। पूर्ण सुरक्षा का एहसास। लेकिन वही बच्ची आज इतना पढ़-लिखकर, बड़ी होकर ऐसी डरी-सहमी क्यों है? हर वक्त किस बात का डर है जबकि कोई डर नहीं है?

रह-रहकर बगल के कमरे में सोये पापा के खांसने की आवाज आ रही है। मन करता है जाऊं, और झकझोर कर जगा दूं। कहूं कि उठा लें अपने मजबूत कंधों पर। दें एक सुरक्षा का एहसास। या फिर लोरी सुनाकर सुला दें। वही लोरी, जो मुझे सुलाने के लिए अक्सर सुनाया करते थे- चुपके से नैनन की बगियन में, निंदिया आ-जा, रे आ-जा। आंखें तो सबकी, हैं इक जैसी, जैसे अमीरों की, गरीबन की वैसी। दम भर गरीबन की अंखियन में, निंदिया आ-जा रे आ-जा...।
क्या यह किसी गरीब की आंखों में महज निंदिया लाने भर की बात है? या कि इसमें उसके सपनों की बात है? यहां कौन अमीर है और कौन गरीब? क्या इसमें अमीरों का मतलब महिला उत्पीड़क सिस्टम से भी है? गरीब क्या उस डरी-सहमी लड़की को भी कहा गया है? क्या महिला मुक्ति और निर्धनता मुक्ति में कोई रिश्ता  बनाती है ये पंक्तियां?

मन करता है जाकर पापा से साफ-साफ मीर साहब वाला सवाल पूछ ही लूं- “पापाजी, आप ही बता दो कि जहां में तुम आए थे, क्या कर चले? आखिर क्यों छोड़ जाओगे तुम अपनी बिटिया के लिए एक ऐसी दुनिया, जो उसे कदम-कदम पर किन्हीं अज्ञात समझौतों का डर दिखाये?“
नींद नहीं आ रही। मन करता है, पापा से उनका कोई पसंदीदा गीत गुनगुनाने को कहूं। शायद वो मखदूम मोइउद्दीन की ये पंक्तियां सुना दें - कोई दीवाना गलियों में फिरता रहा, कोई आवाज आती रही रात भर।
क्या सचमुच कोई दीवाना है, जिसकी आवाज सुनने को जी चाहे? पापा जब कहते हैं कि बदलाव तो प्रकृति का नियम है, तब वो ऐसे किसी दीवाने की भी राह देख रहे होते हैं। पापा जब कहते हैं कि हर दौर में बदलाव का कोई-न-कोई नायक जरूर उभरकर आता है, तो क्या उन्हें ऐसी कोई उम्मीद दिखती है?
याद आया, एक बार पापा ने बताया था कि मखदूम साहब के उस गीत को आगे बढ़ाते हुए फैज अहमद फैज ने लिखा- एक उम्मीद से दिल बहलता रहा, इक तमन्ना सताती रही रात भर।
किस उम्मीद ने दिल बहलाया फैज साहब का? रात भर सताने वाली किस तमन्ना की बात कर रहे थे वह? आज क्या कोई उम्मीद है जो दिल बहला सके? अब किस तमन्ना ने रात को सुबह करना मुश्किल  रखा है? कहां हैं वो फूल जिनसे दिल्ली का लोहापन कटता हो? गालिब और मीर की इस दिल्ली में ऐसा क्या है जो हमें हैरान किए देता है?
सवाल-दर-सवाल मेरे दिमाग में चकरघिन्नी काट रहे हैं। उफ्। नींद तो आने का नाम ही नहीं ले रही। सुबह सोचना क्या करना है। पापा का फार्मूला राहत देने वाला था। लेकिन सुबह तो हो।


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