आशा पाण्डे ओझा की कवितायें

आशा पांडे ओझा
कवयित्री आशा पांडे ओझा साहित्य ,पेंटिंग और फोटोग्राफी में रुचि रखती हैं. संपर्क :asha09.pandey@gmail.com
 वो तिलचट्टा

मैं उसें जानती नहीं
मैं उससें मुहब्बत नहीं करती
न ही पसंद भी
नापसंद भी नहीं करती
नापसंद उसें  किया जाता है
जो कभी पसंद भी आया हो
जिससें कभी कोई वास्ता ही ना रहा
ना तन का,,ना मन का ना जीवन का
किसी बस स्टॉप ,रेल्वे स्टेशन ,
बाजार, राह चलते शहर , ऑफिस या  कॉलेज में
बार-बार उसकी आँखें
अंधेरे में, गर्म स्थान खोजती हुई
 तिलचट्टों सी रेंगती है जब मुझ पर
या बार बार छूने का करती है यत्न
भोजन ढूंढती फिरती  तिलचट्टे के
एक जोड़ी संवेदी श्रृंगिकाएँ  सी
उसकी वासना के कीच से लिपटी गंदी उँगलियाँ मुझे
 तब मैं खूबसूरत नहीं लगती खुद को
बल्कि लगता है
गंदी चिकनाई सी कुछ काइयां
उतर आई है मेरे बदन पर कहीं न कहीं
या कुछ उघड़ा छुट गया है मेरा सोचकर
 बचा बचा कर नजर जांचती  हूँ अपने अंगों को  बार बार
सब कुछ ठीक है की तसल्ली के बावजूद
कुछ गड्ढे से हो आये हों  मेरे जिस्म पे
उसकी पैनी नजर से होता है यह आभास
और तब अचानक
मेरे बदसूरत हो जाने का अहसास होने लगता है मुझे
बड़ी सिद्दत से
मिचलाने  लगता है मन
जी करता है अपने पैरों तले कुचल दूँ
 उसकी उँगलियों के श्वासरंध्र
तब मेरे अंदर जरा  नहीं बचते
नारी वाले कोमल अहसास
तुम अक्सर जिसें  कहा करते हो
चंडी या दुर्गा या चाहे फूलन भी
वैसा ही कुछ  कुछ अहसास होने लगता है मुझे
मेरी सहन शक्ति देने लगती है जबाब
हाँ  तब मैं पीटती हूँ उसें फिर जानवरों की तरह
 खो कर अपना आपा , कभी कभी बीच  बाजार

संभावना  प्रतिकार की

जाने कैसे अपने मन की  घुटन
 अपना आक्रोश
अपनी आँखों से पीस कर
आंसुओं में बहा देती है स्त्री
अपनी छाती में दबाकर
चिंगारियां विरोध की
कैसे शांत बह लेती है
नीर की तरह
सागर मिले या सहरा
सम्पूर्ण समर्पण से मिल जाती है उसमे
हो जाती एकाकार
हर अच्छा बुरा उसें सहर्ष स्वीकार
क्या प्रतिकार  करना नहीं जानती स्त्री
या नहीं है उसमें  आत्मा
अगर वो  आत्मा होती तो निश्चय ही
 बनी रहती संभावना  प्रतिकार की
तब डरता पुरुष भी कहीं न कहीं हावी होने से


 जीवन या आत्म हत्या 

भोगते हुवे सारे सुख वैभव ऐश्वर्य
चलाते हुवे मंहगी कारें
खा कर महंगे रेस्तरां में
दिखाते हुवे महंगे विलायती  परफ्यूम
चश्मे ,घड़ियाँ ,मोबाइल
काँधे पर लटकता
भर कर हरे लाल नोटों से इम्पोर्टेड  पर्स
बन कर किसी किट्टी क्लब की अध्यक्ष
मुस्कराते हुवे कुटिल मुस्कानें
गिरा गिरा कर पल्लू सँभालते हुए
दिखाना  बेशक़ीमती साड़ियाँ
बोलना अंग्रेजी में अनावश्यक गिटर पिटर
याद दिलाना  बार बार सबको अपनी डिग्रियां
दुःख आभावों से सेंकडों मील दूर
इन सबका मतलब यह नहीं कि
मैं जी रही हूँ जीवन
बैठकर ग़रीबों के बीच
कभी चलते हुवे दुर्गम पथ पर पैदल
टूट जाती साधारण चप्पलें
खिलाकर अपनी सीमित आय से
कभी कभी जरुरतमंदों को रोटी
जीर्ण-शीर्ण कायाओं के बीच
लगभग उन्हीं सी होती प्रतीत
संव्य के जीवन का हिस्सा ना होते हुवे भी
महसूस करते रहना दुःख दर्द अभाव
कभी कभार बिता लेना इन्हीं आभावों में रात
नहीं बनी किसी हाई प्रोफाइल सोसायटी का हिस्सा
होते हुए भी डिग्रियां नहीं कर पाती प्रदर्शन
बोलती इन्हीं के साथ ठेठ वो ही देहाती भाषा
इन सबका मतलब यह नहीं है कि
मैं कर रही हूँ आत्म हत्या

पहला पुरुष देवता
कब कौन प्रतिष्ठित हुआ होगा
पहला पुरुष देवता
कब कौन पहली स्त्री
बनी होगी पहली  पुजारिन दास
पूजते-पूजते पत्थर न पा कर प्रत्युत्तर
हुई होगी प्रबल उत्कंठा
देखने की साक्षात ईश्वर
अथाह अंध आस्था में डूबकर
थोप दिया होगा उसने
पहला पति परमेश्वर
छोड़ उसके हाथों में
निज जीवन-मरण की आस
भावना और समर्पण की भूखी
बन गई निष्ठुर हाथों की दास
ओ भोली, ओ बावली
पूजती ही रहती तूँ पत्थरों को काश !
आज तेरी वजह से न सहना पड़ता
अगिनत स्त्रियों को यह संत्रास
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