कार्बाइड का कलंक : औरतों की आपबीतियां

स्वाति तिवारी
लेखन की कई विधाओं में सक्रिय स्वाति तिवारी मध्यप्रदेश सरकार की एक अधिकारी हैं.   संपर्क : stswatitiwari@gmail.com
 ( ३० साल हो गए हैं उस  हादसे के जब यूनियन कार्बाइड ने भोपाल में हजारो लोगों को तबाह कर दिया , देखते -देखते एक शहर मुर्दों के टीले में बदल गया था. स्वाति तिवारी ने इस हादसे की शिकार परिवारों की औरतों का दर्द दर्ज किया है , अपनी पुस्तक  ' सवाल आज भी ज़िंदा हैं' में. दो दिसंबर को भोपाल त्रासदी की बरसी है , स्त्रीकाल के पाठकों के  लिए स्वाति तिवारी की किताब से दो अंश . कल ( एक  दिसंबर ) का  अंश  पढ़ने के लिए क्लिक लिंक पर करें  )

कार्बाइड का कलंक

तय वक्त से पहले ही रविवार को मैं पार्क जा पहुंची। पार्क में बने एक चबूतरे पर कुछ महिलाएं नजर आईं। बालकृष्ण नामदेव वहीं थे। महिलाएं उन्हें पिछले हफ्ते की अपडेट दे रही थीं। अपनी ताजा समस्याएं गिना रही थीं।मुन्नी बी से मेरी मुलाकात यहीं हुई। उम्र करीब  सत्तर साल। अब वह अर्जुन नगर में रहती हैं, पर हादसे के वक्त सेठी नगर कॉलोनी में थीं।  एक झुग्गी में। घर में सब कुछ था। भरापूरा घर था, शौहर शेरखां इतना कमाते थे कि दो बीवियों का खर्चा बिना तंगी के चल जाता था।  मुन्नी पहली किरदार थी, जिससे मेरा आमना-सामना हुआ। सालों से लोग आकर इन लोगों से मिलते रहे। उनके जख्मों को कुरेदते रहे। किसी ने कहीं लिखा, किसी ने तस्वीर छापी, कोई फिल्म बनाकर ले गया। लेकिन सबको आते-जाते हुए ये किरदार सालों से एक ही तरह के सवालों को सुनते रहे हैं और एक ही तरह के सवालों से अपनी निजी जिंदगी में घिरे रहे हैं। बाहर से आए लोगों के सवालों के जवाब तो इन्होंने दिए, लेकिन इनके सवालों के जवाब इन्हें अब तक नहीं मिले। ये औरतें हर जाति और मजहब की हैं। लेकिन इन्हें इस निगाह से देखना बेमानी है। इन्हें सिर्फ एक औरत की शक्ल में देखिए। वो मां हो सकती है, बीवी, बेटी या बहन। लेकिन उसका नसीब हर किरदार में एक जैसा है। चाहे किसी मजहब की हो। कुछ कम या ज्यादा। लेकिन हाल एक जैसे हैं। गैस हादसे ने इनकी जिंदगी किस कदर बरबाद की, अब हम सीधे इनके बीच चलते हैं। सबसे पहले मुन्नी बी...

 मुन्नी से मैं सब कुछ जानना चाहती थी। मैं महसूस करना चाहती थी कि उस रात का दर्द किस तरह कहर बनकर इनके घरों में आया। मैं जानती थी कि मैं भी उनके जख्मों को हरा ही करूंगी, लेकिन एक औरत के लिए यह हादसा किस तरह पेश आया, इसे मैं तफसील से जानने को उत्सुक थी। मुन्नी ने बताया कि एक ही चूल्हे पर दोनों मिलकर रोटियां पकाती थीं। पर परवर दिगार ने जाने कैसा नसीब लिखा कि सब कुछ बर्बाद हो गया। जिस घर में दूध का धंधा चलता था उस घर का मालिक रोटी-पानी तक को मोहताज हो गया।उस रात हम अपने घरों में सोए थे, पड़ोस में शादी थी। हल्ले-गुल्ले में देर से ही नींद लगी थी कि अचानक लगा किसी ने चूल्हे में मिर्चें झोंक दी हैं। धुंआ नाक-कान गले में लगा और तेज जलन होने लगी। बाहर देखा तो शादी के पंडाल से लोग भाग रहेथे।चारों तरफ अफरा-तफरी। हम भी भागे। हमारे शौहर, हम दोनों बीवियां और हमारे बच्चे । वह अंधेरी रात गुजर गई। शेर खां फिर कभी खाट से उठ नहीं पाए। पेट में पानी भर जाता था। उस सुबह के बाद जिंदगी का नक्शा ही बदल गया। रोज पेट का पानी निकलवाने के लिए अस्पतालों की अंतहीन दौड़भाग हमारे हिस्से में आ गई। रोज पानी पेट में भरता, रोज अस्पताल जाते। एक साल बाद मेरे शौहर का इंतकाल हो गया।  सुगरा बी पहले ही गुजर गई थी। मेरा अपना बच्चा नहीं था पर सुगरा बी का बेटा मेरे साथ था। उसी के पास रहती थी। बाद में गैस के असर से बेटा बहू भी खत्म हो गए। तेरह साल का एक पोता है मेरा। वही संभालता है मुझे। हादसा याद करती हूं तो पड़ोस की बीबी जान का घर भी याद आता है। उस दिन उनके घर से चार-चार जनाज़े निकले थे। इतना कुछ देखा था.

 
उस हादसे में कि बताना मुश्किल है। सडक़  पर इंसानों की लाशों का ऐसा मंजर कभी देखा नहीं था। कभी जानवरों को भी इस बुरी हालत में मरते नहीं देखा। मुन्नी ने कहा, हमें जीते-जी बहुत इज्जत का अहसास जिंदगी में कभी नहीं हुआ था। मुश्किल हालातों में दो वक्त की रोटी कमा खा लेते थे। इज्जत से जीना क्या होता है, यह शायद ही हमारे आसपास के लोगों ने जाना हो। लेकिन मौत इतनी जलालत और बेइज्जती के आलम में आएगी, यह सोचकर भी आज रूह कांप जाती है...उस रात की याद मत दिलाइए। हमने न जाने कितनी रातें उसकी कड़वी यादों के साथ गुजारी हैं। अल्लाह रहम कर .....लाशें देखकर भागते हुए कोई रुकना ही नहीं चाहता था। कहां-कहां रुकता? जो भागते-भागते गिरा उसे वहीं छोडक़र लोग भाग रहे थे। ऐसा तो कभी किस्से कहानियों में भी नहीं सुना था। पर उस कहर बरपाती रात को सब कुछ देखा है इन आंखों ने। आज भी भूल नहीं पाती हूं। जब हालात काबू में हुए तो वापस लौटने पर घर के खूंटे में बंधी बेबस गाय और भैंस की फूली हुई लाशें आंखों के सामने थीं। एक हद के बाद दर्द के अहसास भी पथरा जाते हैं। घर लौटकर उस सन्नाटे में मैं इसी हाल में थी...
मुआवजे में पच्चीस हजार मिले थे। बैंक में रखे हैं। इसे मैं हज के लिए इस्तेमाल करना चाहती हूं। ताकि वहीं जाकर परवरदिगार से पूछूं कि यह कैसी तेरी दुनिया है? कैसा इंसाफ है? और कौन सा गुनाह था मेरा? इस उम्र में १३ साल के पोते को मजदूरी करते हुए देखती हूं तो सीने पर पहाड़ सा बोझ मालूम चलता है। हमारी दुनिया ही तबाह हो गई। लेकिन हम अकेले नहीं थे...

मुन्नी अपनी आपबीती सुनाती जाएगी। उसकी कहानी उस रात की अगली जहर से भरी सुबह के साथ खत्म नहीं होती। असल कहानी तो उस सुबह के बाद ही शुरू होती है। तकलीफों की एक अंतहीन दास्तान। अब नाम बदलते जाइए। मुन्नी की जगह कोई और नाम ले आइए। तारा, कलावती, कुसुम, चंपा, रानी, रशीदा...सिर्फकिरदार बदलते जाएंगे। लेकिन कड़वी यादें कम नहीं पड़ेंगी। इन कहानियों में दर्द का विस्तार पिछले पूरे 26 साल तक फैला हुआ है। जबकि जिंदगी है कि खत्म होने का नाम ही नहीं लेती...तारा बाई के पास चलिए। उम्र है करीब पैंतालीस साल। दिखने में सेहतमंद मगर भीतर शरीर बीमारियों का घर। दो साल पहले पति का देहांत हो गया। जब तक वे साथ रहे, दोनों मिलकर तकलीफों के हिस्सेदार बने रहे। अब सारी तकलीफें अकेले ढो रही हैं। क्या हुआ था उस दिन? यह सवाल अनगिनतबार पूछा गया है। जोर से एक पत्थर सा पड़ता है और यादों का दरिया फूट पड़ता है। सुनिए-वही हुआ था जो नहीं होना चाहिए था। तब मेरी शादी को तीन साल हुए थे। चार महीने का गर्भ था, नींद नहीं आ रही थी उस दिन। बीड़ी लपेट रही थी बैठे-बैठे। पड़ोस में शादी थी। हम भी शादी में खाना खाकर आए थे। पति सो गए थे। मुझे खांसी आई। लगा कि जैसे मिर्च जल रही है कहीं आसपास। दरवाजा खोलकर देखा तो भगदड़ मची थी। पति को उठाया और दोनों चूना-भट्टी की तरफ भागने लगे। रास्ते में हमने  लोगों से सुना कि कारखाने से जहरीली गैस निकली है - भागने में दम फूलने लगा। रास्ते में गिर पड़ी, पति ने उठाया पर अगले दिन अस्पताल में बच्चा गिर गया। वह कोख में ही मर गया था। बस मैं फिर मां नहीं बन पाई।

पति ने दूसरी शादी तो नहीं की। गैस ने बीमार  कर दिया और बीमारी झेलते-झेलते एक दिन वो भी चले गए।  सोचती हूं मैं जिन्दा हूं पर किसके लिए? कभी-कभी सुखद सपने देखती हूं। जागी आंखों से। सोचती हूं कि अगर बच्चा होता तो अब कितना बड़ा हो गया होता...कैसा दिखता वह? तारा की सूनी आंखों में अतीत की काली परछाइयां तैरने लगती हैं। वह सवालों के जवाब देती जाती है। हर जवाब के साथ वह भीतर ही भीतर पिघलने लगती है। आंखें बह निकलती हैं। फिर खामोशी घेर लेती है। वह मुंह छिपा लेती है। जैसे अपनी कड़वी यादों पर परदा डाल रही हो। हमेशा के लिए...उसे देखिए। कलावती बाई नाम है उसका। उम्र करीब 75 साल।  कुछ पूछती इसके पहले ही वह अपना आपा खो बैठी। चेहरा बोलने से पहले ही तमतमा उठा था। वह किसी सवाल का सामना करना नहीं चाहती थी। जोर से चिल्लाई,  नहीं बताती कुछ...। वो उठकर जाने लगी...। बालकृष्ण नामदेव बीच में आए। उसे प्यार से मनाया।  कहा, अरे बताओ अपने बारे में। दर्द बांटने से कम होता है। दुनिया को भी पता चलना चाहिए कि कलावती कितनी हिम्मतवालीऔरत है। किन-किन मुसीबतों को झेलकर भी गैस हादसे के शिकार लोगों के हक के लिए दम से दुनिया के सामने खड़ी है। बताओ। जो कुछ याद है कहो इनसे...कलावती सोच में पड़ गई। ठहरी। गहरी सांस ली। जैसे दिल से आह निकली हो। धीमी आवाज सुनाई दी, क्या बताऊं? कितनी बार बताऊं? ऐसा लगता है कि २६ बरस से सिर्फ बता ने के लिए ही हम जिन्दा हैं। लेकिन बार-बार दोहराने से मिला क्या है? उपेक्षा, बदहाली और बदकिस्मती?

फिर वो उतरती हुई धूप के टुकड़े  देखने लगी। फिर उसी पर जाकर बैठ गई। हल्के से मुस्कुराई। बोली, बेटा क्या बताऊं? पति पूरनचंद चालीस साल पहले ही मर गए थे। तीन बेटे थे मेरे। अब दो हैं, एक गैस की चपेट में आकर मर गया...उस रात सारा बरखेड़ी भाग खड़ा हुआ था और जब हम अपने घरों में वापस लौटे तो गैस बाहर नहीं फेफड़ों में भरी थी...आंखों में भरी थी...अब तक अंदर अपना असर दिखा रही है यह देखो, कैसी गिल्टी बन गई है।  छाती के पास। क्रोध से भरा चेहरा करुणा से कराह उठा। कहने लगी- मेरी नातिन १८ साल की उम्र में चली गई। एक बेटा भी गया। बचपन में मां मर गई थी। सौतेली मां ने मजदूरी कराई। तगारी उठाते बचपन से शादी ने मुक्ति दी तो बीच मझधार में छोडक़र पति भी चल बसे। तगारी फिर उठा ली। तगारी उठा-उठाकर पाले अपने  बच्चे की अर्थी उठते देखी तो मैं जीते जी मर गई। खूब चाहती कि बच्चे पढ़ते-लिखते। लेकिन ऐसा नहीं हो पाया।  मेरी तगारी उनके हिस्से में आ गई। मेरे बच्चे आज भी मजदूरी करते हैं। अब तो दिखता भी नहीं है मुझे...पर देखने को बचा भी क्या है? डॉक्टर दिखाई गिल्टी? बताती हैं, दवा मिले और लगे तभी तो फायदा है दिखाने का। मुआवजे के पच्चीस-पच्चीस हजार रुपए तो जाने कब इलाज पर ही खत्म हो गए। यहां तक क्यों आई हैं?  वह एक कार्ड दिखाती है - पेंशन कार्ड। मैंने देखा उस पर लिखा था-नाम कलावती, उम्र ७५ साल, पति का नाम स्व. पूरनचन्द।




कलावती की हथेली पर कार्ड वापस रखती हूं तो एक और महिला आगे आकर अपना कार्ड मेरे हाथ में रख देती है। उस पर लिखा है-प्रेमबाई, उम्र ५० साल, ग्राम बरखेड़ी। वह आगे बढक़र बताने लगती है, उस रात जो मेरे साथ हुआ था मैडम, वो तो सिनेमा में भी नहीं देखा होगा आपने? अच्छा!’ उस रात जब गैस रिसी, हम सब भागे.... रास्ते में उल्टी हुई और मेरी तीन महीने की छोरी छूट गई और गिर कर मर गई। सास, ससुर, पति, ननद, देवर भरा पूरा कुनबा था हमारा। सब विधानसभा वाली सडक़ की तरफ भाग रहे थे। दूसरी लडक़ी भी हादसे के बाद मर गई। अब कोई औलाद नहीं है मेरी..मुआवजा मिला? प्रेमबाई कहती हैं, उसी के लिए आज तक लड़ रही हूं, पर नहीं मिला। पति ने दूसरी औरत को रख लिया था। उसी को मेरी जगह खड़ा कर दिया, पैसा उसे मिला। भगवान दास की वह दूसरी पत्नी भी अब नहीं रही। केन्द्र सरकार के विभागीय कर्मचारी की इस परेशानहाल पत्नी का कहना है कि रिश्तेदार देवर वगैरह अब मुझे फिर परेशान करते हैं, क्योंकि प्रापर्टी की एक मात्र दावेदार हूं मैं, फिर पति की पेंशन और नौकरी के पैसे भी मिलेंगे। संतान नहीं है, तो देवर सब हड़पना चाहता है। मुआवजा भले ही नहीं मिला हो पर मैं आखरी दम तक संगठन के साथ मिलकर न्याय के लिए लड़ती रहूंगी। मेरे पास अपने लिए जीने के लिए कुछ नहीं बचा। इसलिए संगठन के लिए सक्रिय हूं। गैस ने सिर्फ लोगों को फौरन ही नहीं मारा। न ही हमेशा के लिए बीमारियों ने घर किया। आप सोच नहीं सकते कि मुआवजे और संपत्तियों के लिए हम किस तरह की मुसीबतों में पड़ गए। घरों में रिश्ते-नाते सब चकनाचूर हो गए...

किरदारों की यह एक अंतहीन कतार है। सबके पास सुनाने के लिए अपनी कोई न कोई दर्द भरी दास्तान है। सबके ह्दय भरे हुए हैं। जरा सी बात छेडि़ए या किसी के पास बैठकर उसे सुनिए। आसपास से न जाने कितने चेहरे जमा हो जाएंगे। सबके पास अपनी कहानी है। ये वो औरतें हैं, जो अब तक आंदोलनों में शामिल होने वाली भीड़ का हिस्सा रही हैं। अखबारों में छपने वाली तस्वीरों की भीड़। अनाम चेहरे। प्रेमबाई अपनी बात खत्म करे इसके पहले ही एक और चेहरा सामने आ जाता है। यह लक्ष्मीबाई है। करोंद की रहने वाली। नाम की लक्ष्मी है। दौलत की देवी का नाम ही है उसके पास।  वह अपनी आपबीती लेकर सामने आ जाती है। बताती है, ये देखिए गैस  शरीर पर जाने कौन-सा रोग छोड़ गई जो कुष्ठ रोग की तरह दिखाई देता है। गनीमत है हम बच गए थे, लेकिन देह पर यह निशान उभर आए। इसके बाद पति ने भी छोड़ दिया।  यह तो गैस का असर नहीं था। यह कैसे रिश्ते हैं? मैं दो दिसंबर की शाम तक यह सोच भी नहीं सकती थी कि मेरे पति कभी मुझे छोड़ देंगे। हम मिलजुलकर   रहते थे। सुख-दु:ख के साझीदार थे। गैस ने जान से तो नहीं मारा लेकिन इंसानी रिश्तों की परतें इतनी जल्दी छीलकर रख दीं और यह नंगी सच्चाई मेरे हिस्से में भोगने के लिए आई। भोपाल की जो औरतें गैस हादसे में चल बसे अपने पति के लिए रो रही हैं, उन्हें जरा मेरी हालत भी देखनी चाहिए...पचपन साल की आमना बी। कभी संगठन में सबसे आगे चलती थीं। लेकिन शरीर में कैंसर की शक्ल में मौत ने दस्तक दी और अपने साथ ले गई। इन औरतों के हक के लिए 26 साल से लड़ रहे नामदेव आमना को याद करके भावुक हो जातेहैं

कुछ बताने लगते हैं तभी उनका ध्यान पार्क के गेट पर जाता। वो देखिए इमली के नीचे शायद मस्जिद वाली बीबी खड़ी है ! मैंने देखा एक नाजुक सी औरत को। ७५ साल से कम क्या होगी उसकी उम्र। बुरके में थी वह। इमली और बरगद के दो बड़े घने पेड़ इस पार्क में इन औरतों की बातचीत सालों से सुन रहे हैं। हादसे के समय की भागमभाग भी इसी खामोशी से इन्होंने देखी होगी। जिसे नामदेव ने मस्जिद वाली बीबी कहा, वह इन्हीं दरख्तों के नीचे अपने संगठन के साथियों को तलाश रही थी। उनकी तस्वीर लेने के लिए मैं कैमरा खोलती हूं। पर बैटरी जवाब दे गई है। एक पल को मुझे कोफ्त होती है। मैं झुंझला जाती हूं अपनी लापरवाही पर। मुझे यहां आने की जल्दी थी। महीनों से सोचती रही थी इन औरतों के बारे में। इसलिए जब मिलने का वक्त आया तो ख्याल ही नहीं रहा।मैंनें देखा कि मस्जिद वाली बीबी वहीं बरगद के नीचे बैंच पर बैठ गई थीं। प्रेमबाई मुझसे कहती है वहीं चलना पड़ेगा आपको। चार कदम चलकर हम वहां पहुंचे। सामने हैं राशिदा सुल्ताना।  मरहूम अब्दुल मनान की बेसहारा बीबी। मस्जिद के पीछे इमली का पेड़ है। उसी के नीचे एक घर है। राशिदा का आशियाना। इसीलिए उन्हें उनके नाम से नहीं मस्जिद वाली बीबी के नाम से ही पहचाना जाता है। पास आते ही खुश होकर हाथ मिलाती हैं। फिर बताती हैं चेहरे पर आंखों के पास लगी चोट। आंखों से साफ दिखाई नहीं देता। रास्ते के पत्थर से टकराकर गिर गयी थी। कहती हैं, दवाइयों ने पीछा पकड़ लिया था, अब मैंने ही दवाई लेना छोड़ दिया है। कितना खाती?



मैं बाहर से मिलने आई हूं। इसका रशिदा को ख्याल है। वे शिष्टाचार निभाने का ख्याल नहीं भूलतीं। आसपास किसी को देखती हंै। चाय लेने का हुक्म देती हैं। मैं उनसे अदब से मना करती हूं। चाय की क्या जरूरत है? आपके साथ थोड़ा वक्त गुजार लूं।  आप कुछ बता दें। मेरे लिए आज इतना ही काफी है। चाय फिर कभी। लेकिन वे मानी नहीं। उनके लिए यह तहजीब का तकाजा था। चाय मंगाकर ही दम ली।  अब हमारे बीच एक मीठा रिश्ता बन गया था। हम काफी देर तक गुफ्तगू करते रहे। वे सुनाती रहीं। मैं सुनती रही। नोट्स लेती रही। अखबारों में अब तक इन बेसहारा औरतों की तस्वीरें देखी थीं। एक तस्वीर में अनगिनत चेहरे। लेकिन इनकी तस्वीरें अलग-अलग थीं। जितने चेहरे उतनी तस्वीरें। हर चेहरे की कई तस्वीरें। दर्द की परछाइयां। अपनों के खोने, रिश्तों के तार-तार होने, मुआवजे के लिए भटकने के अंतहीन किस्से। ये औरतें चलती-फिरती सजा से कम नहीं बची थीं। उस दिन घर लौटते हुए यही ख्याल दिलो-दिमाग में घूम रहा था कि इनके इस हालात के लिए कौन जिम्मेदार है?अब मुझे अगले गुरुवार का इंतजार था। एक-एक दिन इंतजार के बाद वह आ ही गया। बालकृष्ण बोले कि आज आप थोड़ा सा लेट हो गईं, वो अभी-अभी चली गईं।‘कौन?’                             

शांतिनगर में गांधीनगर स्कूल के पास रहती हैं भूरिया बाई। वहीं से आई थीं। गले का कैंसर है और इलाज को तरस रही हैं। भोपाल में गैस पीडि़तों के लिए ३३ चिकित्सा केन्द्र स्थापित किए गए। फिर इलाज के लिए तरसने का मतलब मेरी समझ में नहीं आया। मुझे मालूम था कि इस समय ६ चिकित्सालय, ९ डे-केयर यूनिट कार्यरत हैं। इसके अतिरिक्त देशी चिकित्सा पद्धति के अन्तर्गत आयुर्वेद, होम्योपैथी एवं यूनानी के तीन-तीन कुल नौ औषधालय भी हैं। भोपाल मेमोरियल हॉस्पिटल ट्रस्ट का एक मुख्य चिकित्सालय और इसकी ८ मिनी यूनिट, गैस पीडि़तों के लिए संचालित हैं। गैस राहत चिकित्सालयों में हर रोज करबी साढ़े तीन हजार मरीज आते हैं। गैस पीड़ितों की जांच एवं उपचार मुफ्त। फिर भूरिया बाई इलाज के लिए क्यों तरस रही है? वहां मौजूद संगठन के एक कार्यकर्ता ने आंकड़े और असलियत में अंतर को साफ करते हुए बताया कि आपकी जानकारी सरकारी आंकड़ों सहित एकदम सही है, पर समस्या यह है कि वहां वे लोग इलाज कराने आते हैं जो असल में गैस पीडि़त नहीं हैं। दवाइयों का तो सरकारी दवाखानों में सदा टोटा ही रहता है। उस पर ओ.पी.डी. चालू कर देने से सामान्य मरीजों को ही फायदा हुआ है। आप कभी गई हैं वहां? उन्होंने प्रश्न किया।‘नहीं।’
तो फिर आपको समझना होगा कि एक शानदार इमारत, आधुनिक और महंगी मशीनों के बावजूद गैस पीडि़तों के इलाज  के ऐसे हाल क्यों हैं? दवाइयां कई बार नहीं मिलतीं। ज्यादातर बाहर से ही लानी होती हैं। पांच रुपए की पर्ची बनवानी पड़ती है? एक लम्बी प्रक्रिया है। सब कुछ उतना आसान नहीं है, जितना दूर से दिखता  है।

आंकड़े बताते हैं कि केंद्र सरकार द्वारा चिकित्सा पुनर्वास हेतु प्रथम कार्ययोजना में १५०.३५ करोड़ रुपए मंजूर किए गए थे। अक्टूबर २०१० तक ४.२४ करोड़ रुपए खर्च भी हुए। २७३.७८ करोड़ रुपए राज्य सरकार ने किए। नई नीति के अनुसार अक्टूबर  २०१० तक कुल २३५ मरीजों को जवाहरलाल नेहरू कैंसर हॉस्पिटल में इलाज के लिए भेजा गया है। अब तक कुल दो हजार ६२८ गैस पीडि़त कैंसर मरीजों को इलाज के लिए इस अस्पताल में रैफर किया गया है। १४.७८ रुपए का भुगतान कैंसर चिकित्सा के लिए किए जाने के बावजूद भूरिया बाई के हाल ये थे। ऐसी न जाने कितनी औरतों को यह जिल्लत भोगनी पड़ रही थी। ऐसा क्यों है?एक औरत सहमकर कहती हैं, सुविधाओं का फायदा संपन्न तबके के लोगों ने लिया है। आम आदमी तो लम्बी लाइन में पर्ची कटवाने में ही लस्त-पस्त होकर लौट जाता है या लौटा दिया जाता है। आप समझ रही हैं ना मैं क्या कहना चाहती हूं? समस्या एक हो तो बताएं आपको, यहां तो हर रोज एक नई समस्या सामने आती है। सामाजिक सुरक्षा पेंशन को ही ले लो।‘क्यों उसमें क्या गड़बड़ है?’आपको पता है १९८४ तक वह सिर्फ साठ रुपए थी, हम तब से लड़ रहे हैं। नामदेव बताते हैं कि उन्होंने एक नारा दिया था, ‘साठ नहीं, डेढ़ सौ दो, भीख नहीं, पेंशन दो’, वे कहते हैं फार्म भरने की प्रक्रिया ही इतनी जटिल थी कि ये अनपढ़ निराश्रित महिलाएं क्या आवदेन कर सकती हैं!

    

फार्म पर १२५० स्थित जेपी अस्पताल में डॉक्टर से दस्तखत कराना होते थे और डॉक्टर के पास फीस लेकर इलाज का तो समय नहीं है। वहां गरीबों के फार्म पर दस्तखत आसान काम लगता है आपको? आपको पता है सामाजिक सुरक्षा पेंशन अब एकीकृत वृद्धावस्था पेंशन है, जो १५० रुपए के लगभग मिलती है। इसे लेने में हजार पापड़ बेलने पड़ते हैं। इसका नाम सुरक्षा नहीं, समस्या पेंशन होना चाहिए।  नामदेव बेहद संयत और शांत प्रकृति के इंसान हैं, लेकिन बदइंतजामी पर बोलते हुए वे गुस्से को अपने चेहरे पर आने से रोक नहीं पाते। वे बताते हैं, २६ साल गुजर गए हादसे को। एक पीढ़ी बीत जाती है इतने वालों में। कितने लोग मर खप गए यहां मुआवजा और पेंशन मांगते-मांगते।एक महिला ने बताया कि कोई डॉ. अमर डूमर सिंह तोमर ४८ साल की उम्र में डॉक्टर होकर भी जिंदा नहीं रह पाए। उनकी दोनों किडनी खराब हो गई थीं गैस के असर से। फिर आम मरीजों की कल्पना ही कर लीजिए।एक और चेहरा उभरता है। रामकली बाई। उम्र पचपन साल।  पैरों में सूजन रहती है, सिर चकराता है। यह रोना हमेशा का है। वह बताती है, गैस ने उसके पति का लीवर खराब कर दिया था, वे नहीं बचे। मुआवजे के पैसों से इलाज हुआ और बेटों की शादी भी। अब उन्हें दवाई की दिक्कत है। कार्ड गुम हो गया है। पर्चा बनवाने में पाँच रुपये लगते हैं और ऊपर से दवाई भी बाहर से ही लाइए। कार्ड नया बने तो शायद कुछ हो।

रामकली के पास ही है एक और लक्ष्मीबाई, जिन्हें सब गहना भाभी बुलाते हैं। 65 साल की लक्ष्मी बताती हैं, उस रात बाजू वाले घर में राम प्रसाद की बेटी की बारात आई थी। भांवरें पड़ रही थीं। आधे फेरों में अचानक सबका जी मचलाने लगा। थोड़ी ही देर में हाल बुरे हो गए। दूल्हा-दुल्हन भी हाथ पकड़ कर भागने लगे। सडक़ का यह हाल था कि उस पर कंकड-पत्थर की तरह लाशें पड़ी थी। स्कूटर, सायकल, सामान, मवेशी..जिसके साथ जो था भागते हुए या गिरते हुए सडक़ पर ही छूट गया। किसी को घर, जायदाद, रुपया-पैसा, गहनों की चिन्ता नहीं थी। कई लोग सोते बच्चे छोडक़र भाग रहे थे। मौत की दस्तक घर-घर के दरवाजे पर थी। कहीं वह गैस का बादल बन कर उतरी तो कहीं सफेद जहरीला धुंआ बन कर। किसी को उबली बन्द गोभी की तीखी गंध लगी तो किसी को ताजी कटी घास की पर असर उसका जलती लाल मिर्च जैसा था। आंखों को जला देने वाला। भागते-भागते लोग सार्वजनिक नल खोल कर पानी के नीचे जमीन पर लोट रहे थे। छटपटा रहे थे। दिसम्बर की सर्द रात और शरीर के भीतर आग लगी हुई थी, जहर भरे धुएं के साथ।  लक्ष्मी पूछती है कि कहां हैं वे भविष्यवक्ता, जो सबका अलग-अलग भाग्य बांचते फिरते हैं...कोई बताये कि उस दिन उन सबकी राशियां और ग्रह दशाएं क्या एक जैसी ही थीं? इतनी शादियां थीं शहर में। हर गली में रात शहनाइयां बज रहीं थीं, जो मातम की खामोशियों में बदल गईं। क्या कुण्डलियों के मिलान करने वालों ने कुण्डलियां सही मिलाई थीं? कहां थे भाग्य के शनि-मंगल? क्या सब धरती पर उतर आए थे? अगर सितारे हमारे तकदीर के फैसले करते हैं तो उस रात पूरे

भोपाल के सितारे गर्दिश में थे। ज्योतिषियों को वॉरेन एंडरसन की कुण्डली भी देखना चाहिए और हमारे नेता-अफसरों की भी। क्या वे सब राजयोग लिखाकर लाए हैं? हमने क्या पाप किए थे, जो यह फल भोगे?  लक्ष्मी के पास तमाम सवाल हैं। वह रोकर अपनी बात नहीं कहती। तैश में आ जाती है। उसकी मुट्ठियां भिंच जाती हैं। आंखों से आग सी बरसने लगती है। वह सिर्फ यह जानना चाहती है कि उसका कुसूर क्या था, जो अपनी आंखों के सामने अपनी दुनिया उजड़ती देखी...
भोपाल के कवि राजेंद्र अनुरागी की पंक्तियां हैं-
एक और... एक और...
वे खरीदार हैं, थैली फुलाने वाले
और यह हालात हैं
हम सबको रुलाने वाले
कराहती पड़ी है यह
बूढी़ बीसवीं सदी
घाव सी कसकती है
भोपाल गैस त्रासदी

जेपी नगर कार्बाइड के एकदम सामने ही है, वह बस्ती जहां गैस ने सबसे ज्यादा कहर बरपाया था। उस रात यह मौत के मुहाने पर थी। गैस में मरने वाले अभागे सबसे ज्यादा इसी और इससे सटी दूसरी बस्तियों से ताल्लुक रखते हैं। बरबादी के सबसे पहले और सबसे ज्यादा हकदारों की बस्ती। ऐसा शायद ही कोई घर हो, जहां गैस से बीमार कोई न कोई न मिले।  एक दो नहीं सैकड़ों लोग गैस जनित बीमारियों से पीडि़त हैं। इनमें कुछ की उम्र तो पांच से २५ साल तक है यानी घटना के बाद पैदा हुए बच्चों को बीमारी विरासत में मिली। इनकी और इन्हें जन्म देने वाली महिलाओं की अजीब सी दिक्कत यह है कि कोई भी सरकारी फार्मूला इन्हें गैस पीडि़त मानने को तैयार नहीं है। मुआवजा तो बहुत दूर, दवाई तक के लिए पैसे नहीं मिलते। कैंसर पीडि़त  ६५ वर्षीय बाबू खां की बेटी सुरैया को दमा है। उनकी १६ वर्षीय नातिन गुलफशा को पेट की गंभीर बीमारी है। सुरैया बताती हैं, दस साल का अरबाज विक्षिप्त है। यहीं के बलराम और लीलाबाई का २३ वर्षीय बेटा जगदीश शारीरिक विकास रुकने की वजह से दस साल से ज्यादा का नहीं दिखता। लीला बाई की शादीशुदा बेटी गैस प्रभावित थी।




राजकुमारी के फेंफड़े खराब हुए। वह अंतत: मर गई। पचास वर्षीय रशीदा बेगम के पैरों में सूजन स्थाई घर बना चुकी है। पैर सुन्न हो जाते हैं। पर जिन्दगी उन्हीं के सहारे घिसट रही है। प्रमिला का दर्द यह है कि बीमारी ने उसका सुसराल से नाता ही तोड़ दिया है। वह जब करीब दस साल की थी तब हादसा हुआ था। प्रमिला ने भी अपने लोगों को खोया था। वक्त गुजरने के साथ प्रमिला पर भी बीमारी ने अपना असर दिखाया। इसके बावजूद वह जब १८ वर्ष की उम्र पार कर गई तो उसका विवाह हो गया। पति सरकारी कर्मचारी था और जिन्दगी पटरी पर चलती मालूम चलने लगी।  पर बढ़ती खांसी और आंखों की कम होती रोशनी के कारण बार-बार इलाज कराना पड़ता। इलाज पर होने वाला खर्च ससुराल वालों को खटकने लगा। उसे परेशान करने का एक  सिलसिला अनायास शुरू हो गया। वह घर के लोगों को खर्चीली साबित होने लगी। अब गुजारा मुश्किल था।  रात दिन  ताने सुन-सुन कर वह दुखी थी ही और आखिर में उसे इलाज के नाम पर मायके भेज दिया गया। तब से आज तक वह मायके में ही है। किसी ने आकर हाल पूछने की जहमत भी उसके बाद नहीं की। वह पूछती है
कि सरकारी बदइंतजामी को कोसना आसान है, लेकिन इन रिश्तों में इंसानियत को मैं जाकर तलाश करूं?
जन्म लेते ही थमी सांसें सफेद बाल। दुबली-पतली देह। लेकिन नाम है-शोभा। हादसे से जुड़े किसी भी सवाल पर

आज भी सदमे की हालत में पहुंच जाती हैं। गैस कांड के समय छोला मंदिर के पीछे शोभा का परिवार रहता था। तब उन्हें सात महीने का गर्भ था और पूरा घर आने वाले मेहमान की तैयारी में जुटा था। अचानक हादसे की चपेट में आने के बाद शोभा की हालत दिन-ब-दिन बिगडऩे लगी। हादसे के तीन महीने बाद एक दिन के अंतराल से जुडवां बेटों का जन्म हुआ, लेकिन दोनों ही बीमारियों की चपेट में आ गए थे। दोनों जन्म के तुरंत बाद ही चल बसे। सदमे से शोभा आज तक नहीं निकल पाईं। सांस की बीमारी ने इतना कमजोर कर दिया है कि ज्यादा दूर तक चल भी नहीं सकतीं। उसे मुआवजे के लिए तमाम मेडिकल जांचों के साथ मामला पेश होने पर सब कुछ मिलाकर महज एक लाख रुपए मिले। इलाज के अलावा काम नहीं कर पाने और जर्जर आर्थिक स्थिति के कारण परेशान शोभा को इतने साल बाद अब कोई उम्मीद नहीं बची है। सवालिया लहजे में वह कहती हैं कि अब बची-खुची ङ्क्षजदगी किस बूते काटूं, बुढ़़ापे के सहारे तो पैदा होते ही छिन गए। अदालत कहती है कि अगर दुर्घटना दोनों बेटे नहीं बचे तो इसकी एवज में हम क्या करें?

इन्हीं दिनों केन्द्र सरकार द्वारा गठित मंत्री समूह ने करीब ४८ हजार पीडि़तों को अतिरिक्त मुआवजा देने की घोषणा की है, लेकिन उसने ५ लाख २१ हजार गैस पीडि़तों को मुआवजे से वंचित कर दिया, जो त्रासदी के बाद स्थाई या अस्थाई रूप से विकलांग हुए थे। फेफड़ों और पेट संबंधी बीमारियों, आंखों की रोशनी पूरी तरह चली जाना और न्यूरोलॉजीकल या साइकेट्रिक समस्याओं से बेजार लोगों को सरकार ने अपने हाल पर छोड़ दिया है। सरकार का यह फरमान पीडि़तों के लिए एक और हादसे से कम नहीं है। ऐसे हजारों गैस पीडि़त हैं, जिन्हें पहले सामान्य श्रेणी में २५ हजार रुपए मुआवजा मिला, लेकिन बाद में वह घातक बीमारियों के शिकार हो गए। आईसीएमआर और कई रिसर्च एजेंसियों की रिपोर्ट बताती हैं कि एक लाख से ज्यादा गैस मरीजों को लगातार निगरानी और उपचार की आवश्यकता है, लेकिन उन्हें केन्द्र सरकार ने मुआवजे के रूप में कोई राहत नहीं दी है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि कुल गैस पीडि़तों में से २० से २५ प्रतिशत न्यूरोलॉजीकल डिसऑर्डर के शिकार हैं। सेंटर फार रिहेबिलीटेशन स्टडीज की रिपोर्ट बताती है कि गैस पीडि़तों में श्वसन, नेत्र, पेट रोग और सामान्य बीमारियों की दर अप्रभावित लोगों के मुकाबले ४ से ५ गुना ज्यादा है। केन्द्र सरकार द्वारा गठित मंत्री समूह ने इन रिपोट्र्स पर ध्यान दिए बिना मुआवजे की राशि और मुआवजे की श्रेणियां घोषित कर दीं। मंत्री समूह ने १९८७ के आंकड़ों के हिसाब से मुआवजे की घोषणा की है, जबकि तब से लेकर अब तक मरीजों की तादाद तीन गुना बढ़ गई है।

हशमत बी को ही लीजिए। उसे सामान्य श्रेणी का मुआवजा २५ हजार रुपए मिला था, लेकिन बाद में वह गैस जनित कई बीमारियों में जकड़ गईं। उनकी आंखों की रोशनी अब पूरी तरह जा चुकी है। उनके अंधियारे जीवन में सरकारी फैसलों ने अंधेरे को और गहरा दिया है। बीबी जान को पहले तो कोई समस्या नहीं थी, लेकिन बाद में वह और उनके पति दोनों टीबी के मरीज बन गए। चांदबड़ निवासी रफीया ने जन्मजात विकृत बच्ची को जन्म दिया। काफी इलाज कराने के बावजूद वह बच नहीं पाई। रफीया को भी २५ हजार रुपए ही मिले। महामाई का बाग निवासी साजिदा बी को उस समय सामान्य श्रेणी में २५ हजार रुपए मुआवजा मिला, लेकिन वक्त बीता तो वह कई बीमारियां उभर आईं। अब उनसे जूझ रही हैं। उन्हें पथरी है, जिसका ऑपरेशन उन्होंने हाल ही में कराया है।  पसलियों में पानी भर जाने की समस्या से लड़ते हुए सालों गुजर गए। पति भी बीमार। मौत से बदतर जिंदगी जी रहे इन लोगों को कोई राहत नहीं है !यादगारे शाहजहांनी पार्क  सुल्तानिया अस्पताल के ठीक सामने यादगारे शाहजहांनी पार्क। यहां गैस पीडि़तों की आवाज हादसे के बाद से ही लगातार गूंज रही है। यह अनगिनत आंदोलनों का गवाह है। जब मैं कई सालों से यहां आती रही औरतों से मिलने पहुंची तब होली के दिन थे। पार्क में चारों तरफ बैनर लगे हुए थे। माइक पर एक महिला अपने हकों के लिए अपना और अपने संगठन का पक्ष रख रही थी। बड़ी तादाद में गैस पीड़ित एकत्र थे। मुझे लग रहा था कि होली जैसे त्योहार के वक्त कौन आएगा वहां? लेकिन जो लोग यहां जमा हुए थे, उनके लिए त्योहारों की अहमियत सालों पहले खत्म हो चुकी थी।




हर शनिवार की दोपहर बारह बजे ये यहीं एकत्र होते रहे हैं। कोई भी मौसम हो, त्योहार हो, कोई फर्क नहीं पड़ता। सभा समाप्त होते ही मैं उन औरतों तक पहुंची, जो न जाने शहर के किस-किस कोने से यहां आई थीं। जैसा छोला रोड पर फूटा मकबरा की रहने वाली नजबून बी। चलना-फिरना तक मुहाल है।  गैस ने पैरों में गठानें पैदा कर दीं। अब वे गठानें बड़ी हो गई हैं। शौहर आठ साल पहले करोंद अस्पताल में बीमारियों से लड़ते-लड़ते चल बसे। नजबून बी का एक बेटा है। वह भी हार्ट पेशेंट है। हादसे के बाद जिंदगी की हर सुबह-शाम घर और अस्पताल के बीच ही कटती रही है। लाचारी से कहती हैं, इससे तो वे लोग ठीक थे, जो हादसे की रात मर गए। कम से कम रोज-रोज की इस जिल्लत भरी जिंदगी से तो बच गए। यह मौत से बदतर है।
टीला जमालपुरा की एक और औरत।  हादसे के वक्त उसकी शादी हो चुकी थी। एक बेटा था तब। अब तीन बच्चे हैं। उम्र पैंतालिस साल है। गले और पेट में स्थाई छाले गैस के सबूत हैं। आंखों से भी पानी आता रहता है, जिसका आपरेशन हो चुका है। ये इलाज नाकाफी साबित हुए, क्योंकि आंखों से पानी का बहना बंद नहीं हुआ...   शमशाद बेगम जे.पी. नगर की हैं। गली नम्बर तीन, मकान नम्बर ८५/१। मौत का मंजर सबसे करीब से देखने वाले लोगों में वे भी हैं। उस रात के बारे में सोचकर आज भी आंखों में अंधेरा छा जाता है। पांच साल का मेरा बेटा उसी रात खोया था। दोजख जैसी जिंदगी जीते-जीते सात साल पहले शौहर भी चल बसे। नेहरू चिकित्सालय में इलाज चलता रहा उनका...

पुतलीघर के पीछे शाहजहांनाबाद की सईसा बी के पति और दो बच्चे हादसे के शिकार हुए। दोनों का आठ माह तक इलाज चलता रहा पर बेटे के दिमाग का संतुलन बिगड़ा हुआ है। कमाने वाले दोनों हाथ लाचार हो गए। ब्लूकार्ड है। राशनपानी का नाममात्र का जरिया...  जहांगीराबाद की रईसा बी। बरगद के नीचे ओटले पर बैठी थी। गैस ने इस औरत की आंखों की रोशनी मंद कर दी और सांसों को बेदम कर दिया। सुबह के उजाले में भी सुई नहीं दिखती। हादसे से पहले सिलाई करते थकती नहीं थी पर हाथों का यह काम तो जाता ही रहा। इलाज और दवाएं मुफ्त में मिलती रहीं हैं। धीरे-धीरे जिंदगी इसी के लिए बची रह गई कि अस्पताल जाना है। जांच करानी है। दवा लाना है।  सिर्फ 25 हजार रुपए पल्ले पड़े थे। उम्र के इस मोड़ पर पेंशन का इंतजार है..बिरजिश खातून। हादसे के वक्त 45 साल की थीं। अब ७१ की हैं। उम्र के इस फासले में दो बार दिल का दौरा पड़ा। शरीर के सारे जोड़ दुखते हैं। गुर्दे में गैस का असर ज्यादा हुआ था। वे हमेशा के लिए संक्रमित हो गए। गैस के तरह-तरह के असर दिखाई देते हैं। बिरजिश की जीभ आधी पतली, आधी मोटी हो गई। गला  इतना खराब रहता है कि पानी की घूंट भी रुक-रुककर पेट तक जाती है। बीमारियों का जखीरा सिर्फ उनके ही हिस्से में नहीं आया। शौहर मोहम्मद को कैंसर हुआ और बेटे को टी.बी.। दोनों इन घातक बीमारियों के कारण मारे गए। इस हाल में ये 26 साल बिताए हैं। इनके बारे में बताते हुए आज भी गश आ जाता है...


रानी राजपूत, टीला जमालपुरा की रहने वाली हैं। वे और उनके परिजन भागे नहीं थे उस रात। घर को बंद करके एक कमरे में बन्द हो गए थे। गैस के असर में आए ससुर की मृत्यु हो गई है। एक साथी राधा शर्मा की तब शादी हुई थी और छ: माह का बेटा था। गैस से बचने के लिए वे जरूर कहीं चले गए थे। इस बीच जो गैस लगी उसका नतीजा बीमारियों की शक्ल में सामने आया। हफिजा बी...कनीजा बी...कुरैशा बी...एक के बाद एक कई चेहरे। परदे के ये किरदार अपनी कहानियों से परदा उठाते गए। दिल दहलाने वाले किस्से।तार-तार हुए रिश्ते ! एक हिंदू औरत मिली। नाम नहीं दे रही हूं। कुछ भी हो सकता है। लीला या कला। क्या फर्क पड़ता है? इस औरत की मानसिक स्थिति इस कदर बिगड़ी कि वह आज भी खुद को पागल ही कहती है। इनके इलाज के लिए भोपाल में जगह नहीं थी। मानसिक संतुलन बिगड़ा तो ग्वालियर भेजा था समाज के लोगों ने। जब इलाज पूरा हो गया तो वापस आ गईं। गैस रिसी तब  बारह वर्ष की थी। भाई के साथ रहती थी। भाई भी पच्चीस एक साल का होगा तब।  पिता बचपन में ही गुजर गए थे। कुछ सालों बाद मां भी चली गईं। तब भाई का ही सहारा था। उस रात भाई गैस का शिकार हो गया। कहती हैं कि मेरा भाई अपनी जान की परवाह किए बगैर ढूंढता रहा मुझे और उसी रात मर गया। भाई के नाम पर मकान मिला और कुल दस लाख का मुआवजा भी। भावुक होकर कहती हैं कि मेरे भाई ने मेरे पालनपोषण के लिए शादी तक नहीं की थी। वह मां-पिता दोनों की भूमिका में था। तब भी और मरने के बाद भी उसी के नाम पर जिंदा रहने लायक रह पाई हूं। 

भाई के गुजरने के बाद समाज के शुभचिंतकों ने एक फौजी से सात फेरे कराए। एक बेटा भी हुआ जो आर्मी के बोर्डिंग स्कूल में है। पति भी है और बेटा भी है पर भाग्य में सुख नहीं था। गैस का असर दिमाग पर हुआ था। अक्सर दौरे पड़ते थे। शरीर बेजान था। खून की कमी थी। वजन बढ़ता नहीं था। इस हाल में पति ने भी नजरें फेर लीं। उनकी अपनी जरूरतें थीं। एक दिन मैंने एक औरत के साथ उन्हें घर में देखा। मैं काबू में नहीं रह पाई। मेरे भाई के नाम पर मिली मुआवजे की रकम पति ने उड़ाई। वह औरत भी गैस पीडि़तों में थी। उसे पैसे चाहिए थे। जब पति ने सब पैसे उड़ा दिए तो उस औरत ने भी आंखेें फेर लीं। यह सब मैं देखती-भोगती रही। लेकिन मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुईं। जब मैं ग्वालियर के अस्पताल से लंबे इलाज के बाद लौटी तो देखा कि पति ने दूसरी लडक़ी से शादी कर ली। वे भोपाल छोडक़र चले गए। अब उनका अलग परिवार है। उनके दूसरी पत्नी से भी दो बच्चे हैंै। मैं किराए के मकान में रह रही हूं अकेली। एक डॉक्टर के घर खाना बनाकर गुजारा चलता है। गनीमत यह रही कि मुआवजे की बड़ी रकम आठ लाख रुपए अब मिली। इसी से एक घर खरीद लिया। सेहत बिल्कुल ठीक नहीं। यह औरत हिम्मत से कहती है कि मेरी कहानी पूरी लिखना। काट-छांट मत करना। ताकि दुनिया को यह पता चले कि गैस से लोग मरे ही नहीं, न ही बीमार पड़े, हम जैसों की जिंदगी में हालात ऐसे बने कि रिश्ते तार-तार हो गए, सब कुछ बरबाद ही बरबाद होता गया।




सब कुछ उजड़ते देखा

सुमन कहती है मेरी आंखों में दिल दहला देने वाले वे दृश्य हमेशा के लिए ठहर गए हैं, ऐसे दृश्य हैं वे जो आंखें बंद करती हूं तो दिखाई देते हैं और आंखें खोलती हूं तो याद आ जाते हैं। सारे के सारे चेहरे इतने सालों बाद भी मेरे जेहन में ज्यों के त्यों हैं। होंगे भी क्यों नहीं? वह मेरा बचपन था और बचपन का हर दृश्य अपने मां-बाप और भाई बहनों से जुड़ा होता है, उनके सुख-दुख सब साझा होते हैं। स्वार्थ से परे का जीवन होता है बचपन, तब मैं सात साल की थी। तीसरी में पढ़ती थी। कैंची छोला में था घर हमारा। वह घर जहां मैं अपने माता-पिता, और तीन भाईयों की अकेली बहन लाड़-प्यार से रहती थी। भाई तीनों मुझसे छोटे उनकीउम्र क्रमश: ड़ेढ साल, तीन साल और पांच साल थी। मां गर्भवती थी। मेरे पिता नाथूराम कुशवाह रेलवे में ड्रायवर थे! बदकिस्मती ही थी कि वे उस दिन ट्रेन की ड्यूटी पर नहीं गए थे और उस रात मेरे बचपन ने एक नई अंधेरी गली देखी। एक भयावह दृश्य था, हम सब उनींदे से उठकर रेलवे स्टेशन की तरफ भागे। भीड़ उसी तरफ भाग रही थी।पर अगली सुबह सात बजे माँ ने दम तोड़ा, दस बजे भाई ने और दूसरे दिन पिता ने भी। सात साल की एक बच्ची और दो नन्हें भाई? आज भी सिर्फ जिक्र करने भर से आंसुओं की धाराएं बहने लगती हैं।                  

शिवनगर की एक पतली गली में रहने वाली सुमन कुशवाह का दर्द है यह। आज उनके पास पक्का मकान है परवाह करने वाला पति है और हंसती खेलती दो बेटियां हैं। घर में जरूरत का सब सामान है। एक व्यवस्थित गृहस्थी। सुमन कहती है यूं तो सब सामान्य है पर मेरे भीतर जो सन्नाटा विगत २६ सालों से सांय-सांय करता है, उसका अन्दाजा बाहर कोई नहीं लगा सकता। गैस ने शरीर पर और परिजनों की मौत ने मन पर इतना असर डाला है कि सरदर्द से परेशान रहती हूं। यहां तक कि बालों को तक बांध नहीं सकती। बुआ ललिताबाई ने ही तब से लेकर आज तक मां-बाप बन कर पाला पोसा। बी. ए. तक पढ़ाया और स्कूल टीचर चन्द्रकिशोर कुशवाह के संग सात फेरे हो गए। लेकिन मां-बाप और भाई-बहनों के लाचार चेहरे अब भी आंखों में कौंधते हैं। काश यह सब न हुआ होता! ऐसा भी हुआ उस रातमनोहर लाल अंतिम संस्कार का सामान बेचते हैं। वे उस दिन सुबह आठ बजे तक दुकान पहुंचे ही थे लोगों की कतार लग गई। क्या हिन्दू और क्या मुसलमान। इस शख्स ने अपना कारोबार बेहतर चलाने के लिए ऐसी दुआएं कभी ईश्वर से मांगी थीं। उस दिन एक औरत आई, जिसकी आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे।  उसका इकलौता बेटा गैस से मारा गया था।  बेटे ने अपने होने का फर्ज निभाया था।  

जब गैस रिसी तो बेटे ने मां को बचाने के लिए कपड़ों से ढक दिया और खुद ढेर से लिपटकर बैठ गया। गैस उसे लगती रही। आखिरी सांस तक भी वह अपनी मां की जान बचाने के लिए ही जिंदा रहा। फिर दम तोड़ दिया। वह रात बीत चुकी थी और वह औरत सुबह अपने उसी बेटे के लिए कफन मांग रही थी। दर्द कहीं कम नहीं शायद डॉक्टर भी सालों से पीडि़तों को देखते-देखते तंग आ गए हैं। अस्पतालों के चक्कर लगा रही औरतें कहती हैं कि संवेदनहीन ही है कि डॉक्टर अब पीडि़तों को देखते तक नहीं हैं। बेमन से टरका देते हैं। हादसे के वक्त नौ साल की थी रानी यादव। पांच भाई-बहन थे। सबसे छोटी बहन जो एक साल नौ माह की थी उसी वक्त मर गई। जे.पी. नगर गली नम्बर दस में रहते थे। आज भी वहीं हैं। त्रासदी के तेरह साल बाद रानी की शादी हो गई। गैस पीडि़त गरीब लडक़ी की गाँव के किसी मंद बुद्धि लडक़े से शादी हुई। पर रानी की किस्मत ही खराब थी कि वह भी पिछले कई सालों से गायब है। कोई नहीं जानता कहां चला गया। इसलिए मां-बाप के घर में ही रहती है। भाई के दो बच्चे हुए, दोनों विकलांग हैं। भाभी भी गैस पीडि़त है। दवाई के बगैर चार कदम नहीं चल सकती। छोटी बहन के बच्चे के हार्ट में छेद है। दो बच्चे हैं जिन्हें रोज ही ‘फिट’ (मिर्गी) आते हैं। रानी कहती है, बीमारियां हमारे चारों तरफ पसरी हुई हैं। यह एक अंतहीन संघर्ष है। सिवाय बीमारियों के हमारे घरों में बातचीत का कोई दूसरा विषय ही नहीं बचा। सरकारी दवाखाने को लेकर रानी का गुस्सा सातवें आसमान पर  है। वह कहती हैं कि डॉक्टर नजर उठाकर देखता भी नहीं है।


 एक वरिष्ठ डॉक्टर ने बताया कि हर मरीज अपने लिए खास तवज्जो चाहता है। हमारे पास दिन भर मरीजों की कतारें रहती हैं। यह सिलसिला थोड़े समय का नहीं है। ढाई दशक से ज्यादा वक्त गुजर गया। यह रोज का काम है। साधन और समय सीमित है। स्टाफ भी इनकी तादाद के आगे नाकाफी है। ऐसे में संवेदनहीन होने का आरोप गलत है। हमारी मजबूरियां भी देखिए। हमें सिर्फ दो चार मरीजों को ही नहीं देखना है। दिन भर अंतहीन कतारें हैं। रानी मुझे ङ्क्षचगारी ट्रस्ट के म्यूजियम में ले जाती है। वह पांच साल से ट्रस्ट से जुड़ी है। इस म्युजियम में हादसे के शिकार हुए लोगों की निशानियां सहेज कर रखी गई हैं। किसी बच्चे के गरम कपड़े, किसी की शादी का जोड़ा, किसी का चश्मा तो किसी बच्चे की सायकल। एक सिलाई मशीन, बच्चों के खिलौने हैं, चप्पलें हैं। यादों का एक अजीब सा अजायबघर। कवि प्रो. सरोजकुमार ने लिखा था-                                             
वैसे ही नहीं रही जिन्दगी कभी निरापद।
अब तो व्यवस्थाओं से डर लगता है।
शिराओं में बहती है बदबू भरी नदियां
किडनियां सूजी हैं शहर की।
अणुबम की रिहर्सल हो गई भोपाल में!
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