स्त्री -पुरुष समानता के अग्रदूत डा.आम्बेडकर

अनंत
अनंत स्वतंत्र पत्रकार एवं शोधार्थी हैं. fanishwarnathrenu.com का संचालन एवं संपादन करते हैं. संपर्क newface.2011@rediffmail.com और 09304734694
डा. आम्बेडकर  दलितों -पिछड़ों के मुक्तिदाता हैं और स्त्री -पुरुष समानता के अग्रदूत। वे स्त्री के ज्वलंत सवालों के लिए धर्म व जाति को जिम्मेदार मानते हैं। राजनीति और संविधान के जरिये भारतीय समाज में स्त्री  और पुरुष  के बीच व्याप्त असमानता दूर करने का सार्थक प्रयास किया है। जाति-धर्म व लिंग निरपेक्ष संविधान में उन्होंने सामाजिक न्याय की पकिल्पना की है । हिन्दू कोड बिल के जरिये उन्होंने  संवैधानिक स्तर से महिला हितों की रक्षा का प्रयास किया । संविधान सम्मत सामाजिक न्याय के सूत्र और हिन्दू कोड बिल में ही            ‘‘ महिला-सशक्तिकरण ’’ की विशद् व्याख्या विद्यमान है। संविधान शिल्पी के प्रयासों का प्रतिफल है कि भारतीय समाज में महिलाओं को सुनहरा अवसर प्राप्त हुआ है , फिर भी समाज में व्याप्त रूढि़यां और पूंजीवाद आधारित उपभोक्तावादी संस्कृति महिला सशक्तिकरण के मार्ग में रूकावट पैदा कर रही है। दरअसल यह समाज सदियों से मनुवादी ग्रंथि से ग्रस्त रहा है। आजादी के बाद सत्ता  पर काबिज होने वालों की सामंती मानसिकता से पूर्व परिचित आंबेडकर आजाद भारत में ‘‘ महिलाओं की सामाजिक गुलामी ’’ खत्म करने के लिये स्टेटसमैन की भूमिका निभाते रहे। आजादी , पूर्व छत्रपति शाहू जी महाराज द्वारा कोल्हापुर राज में महिलाओं के हित में बनाये गये विशेष विधानों को आजाद भारत के संविधान में स्थान दिल्वाया । डा आंबेडकर रचित ‘‘ हिन्दु कोड बिल ’’ कोल्हापुर के राज-विधान से प्रेरित दिखता है। इसलिये डा . अंबेडकर को ‘‘ शाहू संहिता ’’ के  संरक्षक के रूप में भी याद किया जाना चाहिए।

भारतीय समाज में महिलाओं के हितों  की रक्षा के लिए समाज सुधार का कार्य 19 वीं शताब्दी में शुरू हुआ। इस सदी में कई नायक पैदा हुए लेकिन , अंबेडकर सबसे ज्यादा प्रभावित महात्मा फूले और छत्रपति शाहू जी महाराज से दिखते हैं। यह दिगर बात है भारत में सबसे पहले अंग्रेजों एवं ईसाई मिशनरियों द्वारा स्त्रियों को शिक्षित करने के उद्देश्य से 1810 में बंगाल और 1824 में महाराष्ट्र के अंदर स्कूल खोला गया। बंगाल के गुरुमोहन विद्यालंकार द्वारा 1819 में बंगला भाषा में स्त्री शिक्षा से संबंधित पहली पुस्तक लिखी गई। दरअसल सशक्तिकरण का मूलमंत्र है - शिक्षा। इस वजह से देश के विभिन्न हिस्सों में स्थानीय समाज सुधारक स्त्री शिक्षा पर जोर दे रहे थे। लिंग-विभेद और छुआछूत जैसी कुरीतियां शूद्र व महिला शिक्षा के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा थी। 1848 में महात्मा फूले और सावित्री बाई फुले ने शूद्र व अछूत वर्ग के लड़के-लड़कियों के लिए स्कूल खोला। ब्राह्मणों ने इसका तीखा विरोध किया। महात्मा फूले की विरासत को आगे बढ़ाने के लिए कोल्हापुर नरेश अप्पा साहब धाड़के ने विशेष राजकोश बनाया। इनकी मृत्यु के बाद छत्रपति शाहू जी महाराज कोल्हापुर के नरेश बने। शाहू जी ने अपने पिता के अधूरे कार्यों को आगे बढ़ाया। प्राथमिक शिक्षा , उच्च शिक्षा व व्यवसायिक शिक्षा पर भी विशेष बल दिया। परिणामस्वरूप 1887 में आनंदी बाई जोशी विदेश से मेडिकल की डिग्री प्राप्त कर पहली भारतीय महिला डाक्टर बनीं। कहने का आशय है कि समाज में व्याप्त कुरीतियों के खिलाफ सामाजिक समानता के लिए संघर्ष जारी था। ऐसे ही महौल में डा आंबेडकर का जन्म 1891 ईस्वी में हुआ था।। चूँकि डा .आंबेडकर अछूत जाति में जन्मे थे, इसलिए सामाजिक दासता का दंश  उन्होंने नित-दिन झेला  दलितों की स्थिति पशुओं से भी बदतर थी। तालाबों में पशुओं को पानी पीने की छूट थी , लेकिन दलितों को नहीं। मंदिर में भी प्रवेश वर्जित था। असमानता की चक्की में पिस रहे डा . आम्बेडकर ने शिक्षा को कर्म माना और ' शूद्रों'  का तकदीर बदलने का फैसला किया। उनकी मेधा से प्रभावित बड़ौदा और कोल्हापुर नरेश ने वजीफा दिया जिससे वह विदेश पढ़ने गए।



स्त्री शिक्षा और उनकी सामाजिक हैसियत को लेकर वह चिंतित रहा करते थे। इसका प्रमाण 1913 में पिता के मित्र को लिखे पत्र का मजमून है :- ‘‘ लड़के के साथ-साथ लड़कियों की शिक्षा पर भी जोर देना आवश्यक है। ’’ देश-विदेश में भ्रमण करने के बाद वह इस निष्कर्ष पर पहुँचे थे कि ‘‘ लड़का शिक्षित होगा तो सिर्फ एक व्यक्ति शिक्षित होगा , जब लड़की शिक्षित होगी तो पूरा परिवार शिक्षित होगा।’’ उच्च शिक्षा ग्रहण करने के दरम्यान अंबेडकर ने ‘‘ भारत में जातियां , उनकी व्यवस्था , उत्पत्ति एवं विकास ’’ नामक शोध आलेख प्रस्तुत किया। उन्होंने भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति पर प्रकाश डालते हुए कहा था कि सती प्रथा के तहत हिन्दू महिलाओं के साथ क्रूरता पूर्वक व्यवहार किया जाता है। जबरन जीने का अधिकार छीन लिया जाता है। सगोत्र विवाह के लिए दबाव डाला जाता है। वहीं इस्लाम धर्म आधारित मुस्लिम समुदाय में पर्दा प्रथा के जरिये महिलाओं के मानसिक और नैतिक जरूरतों का दमन किया जाता है। शोधार्थी के रूप मेंडा. अंबेडकर हिन्दू  व इस्लाम धर्म के साथ-साथ अन्य धर्मो का भी गहण अध्ययन किया था। शायद यही वजह है कि वह धर्म व जाति की कैद से स्त्रियों की मुक्ति के हिमायती बने रहे।

हिन्दू धर्मशास्त्रों में महिलाओं का स्थान और नियम-कानून महिलाओं के हक में नहीं हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार स्त्री   धन , विद्या और शक्ति की देवी हैं। मनु संहिता के तीसरे अध्याय के छप्पनवें श्लोक में जहां लिखा है:- ‘‘जहाॅं नारी की पूजा होती है वहां देवता रमण करते हैं।’’ वहीं दूसरी ओर पांचवे अध्याय के 155 वें श्लोक में लिखा है:- ‘‘स्त्री का न तो अलग यज्ञ होता है न व्रत होता है , न उपवास। ऋग्वेद में पुत्री के जन्म को दुःख का खान और पुत्र को आकाश का ज्योति माना गया है। ऋग्वेद में ही नारी को मनोरंजनकारी भोग्या रूप का वर्णन है तथा नियोग प्रथा को पवित्र कर्म माना गया है। अथर्ववेद में कहा गया है कि दुनियां की सब महिलाएं शूद्र है। हिन्दु धर्म शास्त्रों में नारी की स्थिति को लेकर काफी विराधाभास है। इस्लाम में भी महिलाओं की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। कुरानशरीफ के आयत ( 1-4-11 ) में संपति से संदर्भित मामले में स्पष्ट लिखा है कि ‘‘ एक मर्द के हिस्सा बराबर है दो औरत का हिस्सा ।’’

धार्मिक आस्था और महिलाओं को कमजोर बनाकर रखने का ही परिणाम था कि 8 मार्च 1535 को चित्तौड़गढ़ की रानी कर्णवती सहित अन्य नारियों को जौहर की चिता में प्राणों की आहुति देनी पडी । मध्यकाल की नायिका मीराबाई ने जब महल से बाहर कदम निकाली तो उसे जहर देकर मार डाला गया। मैत्रेयी और गार्गी जब साध्वी बनीं तो साधुओं ने सवाल उठाया कि स्त्री  साधु कैसे बन सकती है ? इतिहास में मौजूद विरोधाभासों के कारण ही 1936 में लिखे आलेख के माध्यम से डा. आंबेदकर सवाल उठाया कि चातुर वर्ण व्यवस्था में महिलाओं को किस वर्ण में रखा जाएगा ? क्योकि इस समाज को स्त्री-पुरूष समानता से परहेज है। वे धर्म को महिलाओं की प्रगति में सबसे बड़ा बाधक मानते थे। यहां अहम सवाल यह भी है कि हिन्दू समाज ने सीता , लक्षमी , कुंती , पार्वती , सरस्वती जैसी मिथक नायिकाओं को जगत जननी माँ का दर्जा प्रदान किया है। इन लोगों की शिक्षा-दीक्षा किस गुरूकुल में हुआ था और गुरू कौन थे ? जबकि मिथक के नायको को शिक्षा देने वाले गुरूओं का महिमागान शस्त्रों में है। इससे स्पष्ट है कि देवी-देवताओं के यहां भी महिलाओं को दोयम दर्जा प्राप्त था। 

18वीं शताब्दी में अंग्रेजों ने मुगल शासकों को परास्त कर अपना साम्राज्य कायम किया। अंग्रेजों के शासन काल में समाज सुधार का कार्यक्रम शुरू हुआ। जिसका परिणाम यह निकला कि 1857 के गदर में रानी लक्षमीबाई , झलकारी बाई , ऊदा देवी , रानी आवंती बाई , जैसी वीरांगनाएं सामने आई। महिला हितों की रक्षा के लिये सबसे पहला कानून लाने का श्रेय भी अंग्रेजों को जाता है। 1860 में अंग्रेजों ने भारत में कानून व्यवस्था को सुचारू ढ़ंग से चलाने के लिए आई0 पी0 सी0 की धाराओं का निर्माण किया। जिसमें महिलाओं का शील भंग एवं बलात्कार के खिलाफ कारवाई करने हेतु धारा 354 और 376 का निर्माण किया। दरअसल इसके पहले बलात्कारियों को धार्मिक कानून के आधार पर जाति-गोत्र , कुल-खानदान देखकर सजा सुनाने की प्रथा थी।  यह कानून बहुजन आबादी के हित में नहीं था। इसके लिए बहुजन आबादी को जागृत करना आवश्यक था। 20 जुलाई 1920 से  डा . आम्बेडकर ने ‘‘ मूकनायक ’’ नामक पत्र का प्रकाशन कोल्हापुर नरेश के सहयोग से प्रारम्भ किय.  इस पत्र के माध्यम से दलितों एवं महिलाओं के मुद्दों को उठाया। 1924 में बहिष्कृत हितकारिणी सभा नामक संस्था स्थापित की. बेणु बाई मटरकर , रंगूबाई शुभरकर और रमाबाई आदि महिलाएं उनके  आन्दोलन से जुड़ीं। सन 1927 में  सरकार ने उन्हें मुम्बई विधानमंडल के सदस्य नियुक्त किया। मार्च 1927 को उनके चावदार तालाब  आंदोलन में काफी संख्या में दलित महिलाओं ने भाग लिया। महिला आंदोलन को नई दिशा देने के महिला मंडल की स्थापना की गई। इस संस्था की अध्यक्ष उनकी पत्नी रमाबाई बनीं। 28 जुलाई 1928 को डा. आम्बेडकर ने मुम्बई विधान परिषद में कारखाना तथा अन्य संस्थानों में कार्यरत महिलाओं को प्रसूति अवकाश की सुविधा वेतन सहित प्रदान करने से संबंधित प्रस्ताव पारित करने की वकालत की. 
1931 में , लंदन में गोलमेज सम्मेलन के अंतर्गत दलितों( स्त्री-पुरूष ) को पृथक मतदान देने के अधिकार दिलाने हेतु आवाज बुलंद किया। 1932 में पूना पैक्ट के अंतर्गत उन्होंने अछूत ( स्त्री-पुरूष ) को संसद , विधानसभा एवं सरकारी नौकरियों में आरक्षण दिलाने के लिए संघर्ष किया।


16 जून 1936 को मुम्बई के दामोदर हाल में महिलाओं को संबोधित करते
हुए उन्होंने कहा कि:- ‘‘ नारी समाज की गहना है , सभी को उसे सम्मान देना चाहिए।’’ इस सम्मेलन में अधिकांश वेश्याएं एवं जोगिनी थी। 20 जुलाई 1920 को नागपुर में महिला सम्मेलन को संबोधित करते हुये सशक्तिकरण पर प्रकाश डालते हुये कहा कि ' सशक्तिकरण का अर्थ है अपनी क्षमताओं को बनाना और उसे विकसित कर समाज की मुख्यधारा का एक अहम हिस्सा बनना।  । महात्मा गांधी से विचार-विमर्श कर पंडित नेहरू ने संविधान प्रारूप समिती का उन्हें अध्यक्ष नियुक्त किया। इस प्रकार उन्हें  समाज बदलने लायक विधान बनाने का सुनहरा मौका मिला। स्त्रियों और शूद्रों की मुक्ति और सशक्तिकरण का सवाल उनकी प्राथमिकता में था। महिला सशक्तिकरण  के संदर्भ में अंबेडकर का स्पष्ट दृष्टिकोण संविधान के अनुच्छेद 14 , 15 और 16 में झलकता है। लिंग समानता की प्रमुखता उन्होने मौलिक अधिकार , मौलिक दायित्वों के तहत निर्देशित सिद्धांतों के आधार पर किया है।धारा 14 के तहत महिलाओं को संपत्ति और शिक्षा का  अधिकार दिया। उनकी मान्यता थी कि ‘‘ शिक्षा शेरनी का दूध है शिक्षा के बिना जीवन व्यर्थ है। कुछ सोचने-समझने एवं चितन करने की ताकत शिक्षा से ही संभव है।’’ शिक्षित महिलाओं को योग्यता के अनुसार नौकरी करने का भी अधिकार दिया। बताते चले कि रवीन्द्र नाथ टैगोर की नतिनी सरला देवी घोषाल ने 1895 में बालिका विद्यालय में नौकरी करने का फैसला किया तो परिजनों ने इसका काफी विरोध किया था। उमा चक्रवर्ती लिखती हैं कि नौकरी करने से संबंधित सवाल जब सरला देवी से पूछा गया तो उनका कहना था कि:- ‘‘ वह अपने घर रूपी जेल की कैद से मुक्त होकर पुरूषों की भांति अपने जीवन-यापन के लिए आत्मनिर्भरता का अधिकार पाना चाहती थी।'

डा. आम्बेडकर  ने महिलाओं को मतदान करने का अधिकार प्रदान कर उनकी राजनैतिक अधिकारों की  सिर्फ रक्षा ही नहीं की अपितु संपूर्ण विश्व के समक्ष एक मिशाल भी पेश किया। क्योंकि प्रथम विश्वयुद्ध के पहले रूस को छोड़कर तमाम देशों में महिलाओं और अर्द्धविक्षिप्तों को मताधिकार से वंचित रखा गया था। इसके लिए अमेरिका , इंग्लैंड , आस्ट्रिया समेत कई देशों की महिलाओं को काफी संघर्ष करने के बाद मतदान में भाग लेने का अधिकार प्राप्त हुआ था। इस मुद्दे पर भारत के नेताओं में भी काफी मतभेद था। देश के अंदर इस मसले पर लंबे समय से बहस जारी था। संविधान निर्माण के वक्त डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद सरीखे विद्वान यह अधिकार 1935 के एक्ट के अनुसार देने के हिमायती थे। 1935 के एक्ट के अनुसार यह अधिकार शिक्षित और 2 रुपया सालाना चैकीदारी टैक्स देने वाले नागरिकों को ही प्राप्त होता। अगर ऐसा हो गया होता तो इसका खमियाजा महिलाओं को कितना भुगतना पड़ता , इसका अंदाजा सिर्फ इस बात से लगाया जा सकता है कि 1951 में देश की साक्षरता दर 24% थी। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 45 में यह उल्लेख किया गया था कि राज्य 14 वर्ष के प्रत्येक बच्चों को संविधान लागू होने की 10 वर्षों की अवधि के भीतर अनिवार्य शिक्षा देने का प्रयास करेगा। इसके बावजूद 1971 में महिला साक्षरता दर 18% हो पाई थी। और रही बात 2 रुपया सालाना चैकीदारी टैक्स देने का तो महिलाएं किस श्रोत से अदा करती ? महिलाओं के प्रति हिंसा को रोकने के लिए धारा 313 के तहत हिंसात्मक और जबरन गर्भपात को अपराध की श्रेणी में रखा। हिन्दू धर्म में रीति-रिवाजों के नाम पर देवदासी बनाकर महिलाओं का यौन शोषण करने की परंपरा लम्बे अरसे से चली आ रही थी। इस प्रथा को खत्म करने के लिए धारा 17 का निर्माण किया।

खासतौर पर हिन्दू महिलाओं के हक में डा . आम्बेडकर रचित हिन्दू कोड बिल है। इसाई और मुस्लिम समुदाय की तरह हिन्दू समाज के लिए कोई पर्सनल लाॅ नहीं था। भारतीय हिन्दू समाज में विवाह , उतराधिकार , दत्तक  , निर्भरता या गुजारा भत्ता  आदि का नियम-कानून एक समान नहीं था। इसाई तथा पारसियों में एक समय में एक स्त्री से शादी का प्रावधान था। वहीं मुस्लिम समुदाय में चार शादियों को मान्यता प्राप्त है। लेकिन हिन्दू समाज में कोई पुरूष 100 शादियां कर ले कोई बंदिश नहीं था। विधवा को मृत पति के संपत्ति  पर हक नहीं था। सवर्ण समाज में विधवा विवाह की परंपरा नहीं थी। 'अनुलोम विवाह' , 'सम्बन्धम विवाह' जैसी स्त्री - शोषक परंपरा का दबदबा था। सदियों से महिलाओं के साथ हो रही अमानुषिक व्यवहार को समूल नष्ट करने के लिए 11 अप्रैल 1947 को लोकसभा में हिन्दू कोड बिल पेश किया। इस बिल के अंततर्गत हिन्दू विवाह अधिनियम , विशेष विवाह अधिनियम , गोद लेना ( दत्तक  ग्रहण ) अधिनियम , हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम , निर्बल तथा साधनहीन पारिवारिक सदस्यों का भरण पोषण , अप्राप्तव्य संरक्षण संबंधी अधिनियम , उतराधिकारी अधिनियम , हिन्दू विधवा को पुनर्विवाह अधिनियम आदि कानून बनाये।



 इससे शादी-विवाह में उॅच-नीच व जातीय भेद-भाव को खत्म कर दिया गया। एक पत्नी के रहते दूसरी शादी पर रोक लगा दिया गया और दंड का प्रावधान किया गया। पत्नी को तलाक देने के बाद दूसरी शादी करने की इजाजत दी गई। पति-पत्नी को तालाक देने का समान अधिकार दिया गया। तलाक के लिए आठ शर्तो को रखा गया। पति की मृत्यु के पश्चात् उसके संतान के बराबर अधिकार दिया गया। पिता के मृत्यु के पश्चात पुत्री को भी भाईयों के बराबर जायदाद का वारिस बनाया। हिन्दू परिवार में जन्मे बच्चा-बच्ची को गोद लेने का प्रावधान किया गया। गोद लेने वाले की संपति में भी अधिकार का प्रावधान किया। बतातें चले कि छत्रपति शाहू जी महाराज कोल्हापुर राज में 1917 में विधवा पुर्नविवाह , 1918 में अंतर्जातीय विवाह , 1919 में विवाह विच्छेद , 1920 में देवदासी प्रथा से संबंधित कानून पारित चुके थे। लेकिन डा . आम्बेडकर  ने जैसे ही हिन्दू कोड बिल को संसद में पेश किया। संसद के अंदर और बाहर विद्रोह मच गया। सनातनी धर्मावलम्बी से लेकर आर्य समाजी तक अंबेडकर के विरोधी हो गए। संसद के अंदर भी काफी विरोध हुआ। अंबेडकर हिन्दू कोड बिल पारित करवाने को लेकर काफी चिंतित थे। वहीं सदन में इस बिल को सदस्यों का समर्थन नहीं मिल पा रहा था। वह अक्सर कहा करते थे कि:- ‘‘मुझे भारतीय संविधान के निर्माण से अधिक दिलचस्पी और खुशी हिन्दू कोड बिल पास कराने में है।’’ सच तो यह है कि हिन्दू कोड बिल के जैसा महिला हितों की रक्षा करने वाला विधान बनाना भारतीय कानून के इतिहास की महत्वपूर्ण घटना है। धर्म भ्रष्ट होने की दुहाई देने वाले विद्वानों की विशेष बैठक अंबेडकर ने बुलाई। विद्वानों को तर्क की कसौटी पर कसते समझाया कि हिन्दू कोड बिल पास हो जाने से धर्म नष्ट नहीं होने वाला है। कानून शास्त्र के नजरिये से रामायण का विश्लेषण करते हुए कहा कि ‘‘ अगर राम और सीता का मामला मेरे कोर्ट में होता तो मैं राम को आजीवन कारावास की सजा देता।’’ संसद में हिन्दू  कोड पर बोलते हुए डा . आम्बेडकर ने कहा कि ‘‘ भारतीय स्त्रियों की  अवनति के कारण बुद्ध नहीं मनु है।’’ काफी वाद विवाद के बाद चार अनुच्छेद पास हुआ। अंततः राजेन्द्र प्रसाद ने इस्तीफे की धमकी दे दी। पंडित नेहरू इस बिल के पक्ष में थे, लेकिन वे बिल पास नहीं करा सके.  अंततः डा. आम्बेडकर ने 27 सितंबर को हिन्दू कोड बिल सहित कई अन्य मुद्दों को लेकर कानून मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया। नये संसद में विधी मंत्री एच0 पी0 पटास्कर ने नये सिरे से टुकड़ों में बिल पास करवा लिया . यह भी सवाल है कि हिन्दू कोड बिल पर अंबेडकर का विरोध और पाटस्कर समर्थन क्यो ? 

 बहरहाल, कानून मंत्री के रूप में डा. आम्बेडकर की शहादत पर ही भारतीय स्त्रियाँ  सशक्त होती रही हैं.  29 दिसंबर 1946 को भारतीय संविधान सभा की पहली बैठक हुई थी। 203 सदस्यों की बैठक में महिलाओं की संख्या महज 8 थी। 1957 के लोकसभा चुनाव में महिला उम्मीदवारों की  जीत का प्रतिशत  था। लोकसभा के चुनावी राजनीति के इतिहास में महिलाओं की यह सर्वाधिक शानदार जीत है। वहीं आजाद भारत की राजनीति में इंदिरा गाँधी , प्रतिभा देवी सिंह पाटिल , सोनिया गांधी , श्रीमती मीरा कुमार , मायावती , ममता बनर्जी , जय ललिता , राबड़ी देवी , सहित दर्जन भर से अधिक महिलाओं ने अपनी पहचान बनाई है। फिर भी विधान सभा और लोकसभा में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण का मसला वर्षों से खटाई में पड़ा है। अरूधती राय , सुनीता विलियम , महाश्वेता देवी , मेधा पाटेकर , असंतुता लकड़ा सहित कई अन्य महिलाएं विभिन्न क्षेत्रों में अपनी विशिष्टता के कारण चर्चित हैं। राजनीति , शिक्षा , खेल , साहित्य , समाज सेवा के अलावे फिल्म और गलैमर के क्षेत्र में भी शोहरत बटोर रही हैं  सत्ता , शोहरत और बौद्धिक जगत से इतर बिहार के वैशाली जिला की किसान चाची और पटना जिला के नौबतपुर की लालमुनी देवी की गिनती देश के गिने-चुने महिला किसानों में हो रही है। गाँव कस्बे में बसने वाली महिलाएं राजनैतिक सत्ता  से लेकर पुरूष सत्ता को चुनौती दे रही है और अपने संघर्षों के माध्यम से नित-नई महिला सशक्किरण की दास्तान लिख रहीं हैं।



आजादी के 65 वर्ष बाद भी सामाजिक रूढि़यों , पुरूषवादी सामंती ढ़ाचा और बाजारीकरण के खिलाफ महिलाएं सशक्तिकरण के लिए संघर्ष कर रही है। भारतीय समाज में जाति और धर्म का ढ़ाचा अभी भी मजबूत है। सामंतवाद के बाद पूंजीवाद के आगमन के बाद पितृ सत्तात्मक  समाज महिलाओं के समक्ष नित-नई चुनौतियां पेश कर रहा है। दहेज दानव जनित भ्रूण हत्या से बेटियों की संख्या में लगातार कमी आ रही है। बेटियों की संख्या में हो रही कमी पर नामचीन लेखिका तस्लीमा नसरीन ने टिप्पणी ने टिप्पणी की है , ‘ भारत एक दिन पुरूषों का देश बनकर रह जाएगा।’ स्त्री-पुरूष समानता के सवाल पर समाज की मानसिकता में अमूल-चूल बदलाव आना आवश्यक है। जिसकी प्रक्रिया काफी धीमी है।
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