अविनाश मिश्र की चार कवितायें : बदसूरत औरत की जरूरत और अन्य

अविनाश मिश्र
युवा कवि अविनाश मिश्र तीक्ष्ण धार और गहरी सम्वेदना के कवि हैं. संपर्क : darasaldelhi@gmail.com

1. बदसूरत औरत की जरूरत 


 उस दोपहर वह हर जगह अपनी नामौजूदगी
बड़ी शिद्दत से महसूस करती रही
शाम ढले जब बहुत सारे रास्ते जगमगा उठे
तब भी किसी पोस्टर में उसने खुद को नहीं पाया
खोई-खोई-सी वह रात दीवारों के बीच लौट आई
और अपने सारे कपड़े उतारकर
अपने बदन को अपने ही हाथों से सहलाते हुए सो गई

सुबह होने पर जब वह जागी
वह यह सोचकर खुश हुई
कि वह किसी और के बिस्तर पर नहीं है

...हवाएं खांसती हुई गुजरती थीं बदशक्ल कूचों से
थोड़ा और भीतर धंसने पर
कुछ खत्म किए जाने का बेरहम शोर सुनाई देता था

वह उड़ती हुई पतंगों और दड़बेनुमा मकानों के बीच पैदा हुई
और धीमे-धीमे अपने सारे ख्वाब खोकर
शाम से अंधेरे की तरह हो गई    

यह जानकर भी कि सारे सपने उसमें ही कहीं गुमशुदा हैं
उसने कभी उन्हें ढूंढ़ने की कोशिश नहीं की

उस वक्त जब सुंदरता मुकाबलों में शरीक हो रही थी
वह चाहती थी हथिया लेना हर वह प्रसाधन
जिससे ज्यादा और ज्यादा बदसूरत दिखा जा सके

अपने बलात्कार के हर डर को मुज्महिल करती हुई
वह महफूज थी अपने बनाए घेरे में

बसें धूल उड़ाती हुई जाती थीं उसके मुंह पर
लेकिन वह चिपकी नहीं रही किसी मर्द की कमीज से बटन बनकर

वह इस तरह थी
कि बस दर्पण ही देख सकता था उसे वासना से
रात ही कर सकती थी उससे प्रेम
स्वप्न ही हो सकते थे उसके प्रति कामुक
अवसाद ही ले सकता था उसका चुंबन
उसके इन बेरंग साथियों के यहां
आंखों से चुनने का कोई दृश्य न था

बहुत कुछ झूठ था उसके लिए
और सिहरन सबसे बड़ी सच्चाई जिंदगी की

दुनिया में सब कुछ वैसा ही था—
कलाएं, प्रतियोगिताएं, बलात्कार, विवाह और विज्ञापन
लेकिन वह कहीं नहीं थी
आईनों के पहले, आईनों के रहते, आईनों के बाद...


2. जा तुझको सुखी संसार मिले 

लड़कियां वहां एक अजीब उधेड़बुन में रहती थीं
जब पिता धावक में बदल जाते थे
और मांएं एक बहुत बड़े आईने में
पिता लड़कियों की तस्वीरें लेकर
देर रात तक भागते रहते थे
वे उनके लिए आनंददाताओं की तलाश में थे

अब तक जैसा होता आया था
उसमें सबके एक-एक आनंददाता थे
बावजूद इसके जिंदगानियां रुआंसी ही रही आईं
जब भी वक्त मिला या संग-साथ वे रो पड़ीं

वे तनाव में थीं और देखने पर झुक जाती थीं
आंखें उनमें न देखने का सदाचार जीती थीं
एक अक्षत असमंजस में
विरह या संयोग जैसा वहां कुछ नहीं था

स्त्रीत्व बस एक क्रम था
विवाह बस एक विकल्प
प्रेम बस एक शब्द
यात्राएं बस एक विवशता
और हत्याएं बस एक औपचारिकता

जहां वे रहती थीं एक अजीब उधेड़बुन में...


ऑनर किलिंग 

(संभावना सरकार में वह एक चीज जो मुझे बहुत अच्छी लगती थी)

मैं क्या बताऊं वह एक चीज क्या थी उस बला की बदसूरत और बेवकूफ औरत में। वह थी और बर्दाश्त नहीं करती थी। वह कुछ गोपनीय कहने के लिए मुझसे कान पास लाने को कहती और फिर मेरे कान में इस कदर जोर से बोलती कि सारा आस-पास सुनता। वह धत्त, ठेंगा, कद्दू और कुछ अंग्रेजी शब्दों का गलत उच्चारण के साथ गलत जगह और मेरे सिर में दर्द मत कीजिए, चलिए हटिए यहां से, काली मां सब कुछ देखती है... जैसे वाक्यों को मेरे साथ बातचीत में जब-तब प्रयोग करती थी। वह वर्ष में केवल एक बार संभोग करती थी और बाकी दिन रवींद्र संगीत सुनती थी। वह दो दिन में एक बार नहाती थी और खूब मछली खाती थी। और... और क्या बताऊं, वह सदा एक संभावना ही बनी रही मेरे लिए। वह जल गई या जला दी गई मैं क्या जानूं। लेकिन मैं यह जानना चाहता हूं कि आप आखिर संभावना सरकार पर डॉक्यूमेंट्री क्यों बना रही हैं...


मैट्रिमोनियल 


विवाहेतर यौन संबंध
विवाह पश्चात भी हस्तमैथुन
और हमउम्र मित्रों और कमउम्र बच्चों के साथ
अप्राकृतिक व अशोभनीय आचरण
कभी-कभी कुत्तों या
घर की निर्जीव वस्तुओं के साथ अराजक हो जाना
और भी कई माध्यम हैं
विवाह कर लाई गई एक लड़की को
बगैर छुए प्रताड़ित करने के…
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