महिलाएँ-जाति, वर्ग या एक उत्पीड़ित लिंग

  इविलीन  रीड /अनुवाद-प्रोमिला

प्रोमिला , असिस्टैंट प्रोफ़ेसर , हिन्दी विभाग ,अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय, हैदराबाद के द्वारा अनूदित इविलीन रीड का आलेख ' वीमेन : कास्ट , क्लास ऑर ऑपरेस्ड सेक्स मार्क्सवादी स्त्रीवाद को समझने के लिए बेहद महत्वपूर्ण पाठ है .

[इविलीन रीड(1905-1979)अमेरिका की एक ऐसी महत्वपूर्ण समाजवादी चिंतक हैं जिनका 1960-70 के महिला स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय योगदान रहा था। एंगेल्स और एलक्जेंड्रा क्लन्तोय से प्रेरणा लेते हुए रीड ने मार्क्सवादी स्त्री-चिंतन पर अपने महत्वपूर्ण विचार दिए हैं। ‘प्रोब्लमस् ऑफ वूमैन लिबरेशनःए मार्क्ससिस्ट एप्रोच’ और ‘वूमैन इवोलूशन फ्रॉम मैट्रिअर्चल क्लैन टू पेट्रिअर्चल फैमिली’ आदि इनकी उल्लेखनीय पुस्तकें हैं।‘महिलाएँ-जाति,वर्ग या एक उत्पीड़ित लिंग’नामक यह लेख 1970 में इन्टरनेशनल सोशलिस्ट रिव्यू के वॉल्यूम-31 में छपा था।]

इविलीन रीड
महिला उत्पीड़न का मूल स्रोत क्या है ? महिलाओं को एक जाति या वर्ग का गठनकर्ता माननेवालों का निष्कर्ष है कि पुरुष महिलाओं का प्राथमिक शत्रु है न कि पूँजीवाद। यह दृष्टिकोण स्त्री-स्वतंत्रता के संघर्ष को एक गलत रणनीति की ओर ले जाता है ।पिछली सदी के नारीवादी आन्दोलन की तुलना में महिला उत्पीड़न का नया चरण, उच्च वैचारिक स्तर पर खड़ा है । साथी विचारकों में से आज कई पूँजीवाद के मार्क्सवादी विश्लेषण का सम्मान करते हैं। महिला उत्पीड़न के मूल के विश्लेषण हेतु एंगेल्स के स्पष्टीकरण का आसरा लेते हैं। एंगेल्स का यह स्पष्टीकरण परिवार, निजी संपति और राज्य की अवधारणा पर स्थापित वर्ग समाज के विकास के सिद्धान्त से निकला है।लेकिन यहां अभी भी मार्क्सवादी पदों संबंधी कई गलतफहमियाँ और गलत व्याख्याएँ विद्यमान हैं। जिन्होंने उन कुछ महिलाओं का नेतृत्व किया है जो (प्रकटत: गुमराह होने तथा सैद्धांतिक तौर पर विचलित होने के लिए) स्वयं को रेडिकल या समाजवादी मानती हैं । ये रेडिकल महिलाएँ इस मिथ से प्रभावित होकर कि स्त्री हमेशा से अपने बच्चों की देखभाल के कार्यों द्वारा विकलांग बना दी जाती हैं, महिला-उत्पीड़न की उत्पत्ति का कारण (कम-से-कम कुछ सीमा तक) जैविक यौन भेद को ठहराती हैं। जबकि वास्तव में इसके कारणों का चरित्र ऐतिहासिक और सामाजिक रहा है ।

इन्हीं में से कुछ सिद्धांतकारों का मत है कि महिलाएँ एक वर्ग या जाति की निर्माणकर्ता हैं। ऐसी परिभाषाएँ न केवल मार्क्सवादी विचारों के लिए अजनबी हैं वरन इस गलत निष्कर्ष तक भी ले जाती हैं कि महिलाओं का प्रमुख शत्रु पूँजीवादी व्यवस्था नहीं, पुरुष है । मैं इस दावे को चुनौति देती हूँ ।वस्तुतः महिलाओं की पदच्युति केउत्पत्ति-ग्रंथ की व्याख्या करने की नींव रखने वाली मार्क्सवादी विधि की खोजों को निम्न बिन्दुओं में सारांशित किया जा सकता है ।सर्वप्रथम, महिलाएँ सदा से उत्पीड़ित या उत्पेक्षित सेक्स नहीं थी। नृवैज्ञानिक या प्रागैतिहासिक अध्ययन इसका दूसरा पक्ष रखता है। इनके अनुसार संर्पूण आदिम समाज में जोकि आदिवासी समष्टिवाद का युग था, महिलाएँ पुरुषों के समान थी और इसी रूप में सर्वमान्य थीं।दूसरे, मातृसत्तात्मक कम्यून कबीलों के विघटन और पितृसत्तात्मक परिवार, निजी संपति तथा राज्य सत्ता के संस्थानों पर आधारित वर्ग विभाजित समाज द्वारा इनके स्थानापन्न के साथ-साथ महिलाओं की स्थिति में गिरावट आयी ।

महिलाओं की सामाजिक स्थिति में यह विपर्यय लाने वाले प्रमुख कारक शिकार या भोजन जुटाने की अर्थव्यवस्था के स्थान पर कृषि, पशु पालन और शहरी शिल्पाधारित उच्च उत्पादन प्रणाली के परिवर्तन से पैदा हुए थे । लिंगों के मध्य श्रम का आदिम विभाजन, श्रम के अधिक जटिल सामाजिक विभाजन से प्रतिस्थापित हो गया था । बढ़ती श्रम-दक्षता ने बड़े अधिशेष उत्पादन को जन्म दिया था, जिसने पहले विभिन्नताओं और फिर समाज के विभिन्न खण्डों के मध्य गहरे विभाजनों का नेतृत्व किया ।व्यापक पैमाने पर कृषि, सिंचाई और निर्माण परियोजनाओं, साथ-ही-साथ पशुपालन के लिए पुरुष द्वारा निभायी गई निर्देशनात्मक भूमिकाओं के आधार पर, धीरे-धीरे यह अधिशेष धन, एक पदानुक्रम से उसकी (पुरुष की) निजी संपति के रूप में, विनियोजित हो गया। इस रद्दोबदल से पुरुष की संपति के कानूनी स्वामित्व तथा उत्तराधिकार को सुनिश्चित करने हेतु विवाह और परिवार जैसी संस्थाओं की आवश्यकता उत्पन्न हुई। एकल विवाह प्रणाली द्वारा पत्नी को पति के पूर्ण नियंत्रण में ला दिया गया। पुरुष संपति के उत्तराधिकारीयों के रूप में वैध बेटों का आश्वासन पा गया ।

ज्यों-ज्यों पुरुष ने सामाजिक उत्पादन की गतिविधियों को अपने अधिपत्य में लिया और परिवार नामक संस्था अस्तित्व में आयी त्यों-त्यों महिला (घर में) अपने पति और परिवार की सेवा के लिए पदावनित हो गई । निजी संपति और पितृसतात्मक परिवार की संस्थाओं को सुदृढ करने तथा वैधता देने के लिए राज्य-तंत्र अस्तित्व में आया । जिसे बाद में धर्म से भी पवित्र और पोषित कर दिया गया ।संक्षेप में, यह महिला उत्पीड़न की उत्पत्ति का मार्क्सवादी दृष्टिकोण है । महिला की अधीनता लिंग विशेष के रूप में,किसी जैविक कमी के कारण नहीं आयी । यह क्रांतिकारी सामाजिक परिवर्तन का परिणाम था जिसने मातृसतात्मक जीन या कबीले के समतावादी समाज को नष्ट कर, उसे एक पितृसतात्मक वर्गीय समाज में रूपांतरित कर दिया । यह पितृसतात्मक वर्गीय समाज अपनी उत्पत्ति से ही लिंगों की असमानता सहित, अनेक प्रकार के अन्य भेदभावों, असमानताओं से अंकित था । इस दमनकारी सामाजिक, आर्थिक संगठन का विकास महिलाओं के ऐतिहासिक पतन के लिए उत्तरदायी बना ।
किन्तु यह जाने बिना कि उसी समय पुरुष के साथ क्या घटा, महिलाओं के पतन को पूर्णता से नहीं समझा जा सकता, न ही उसके उत्थान के लिए कोई सही सामाजिक, राजनीतिक समाधान ही कारगर हो सकता है । सामान्यत: यह अनदेखा किया जाता है कि जिस पितृसत्तात्मक वर्ग प्रणाली ने मातृतंत्र और उसके सामुदायिक सामाजिक संबंधों को कुचला उसने पुरुष पक्ष के भातृत्व या आदिवासी भाईचारे को भी नष्ट किया। एक निश्चित स्वामी वर्ग (पुरुष) के पक्ष में महिलाओं का अपदस्थीकरण और बड़े पैमाने पर पुरुष श्रमिक की अधीनता साथ-साथ घटित हुए ।

प्रोमिला

यदि हम आदिवासी संरचनात्मक ढांचे के उस मूल चरित्र की जाँच करते हैं जिसे मार्गन, एंगेल्स तथा अन्य ‘आदिम साम्यवाद’ की प्रणाली के रूप में वर्णित करते हैं तो इन विकास प्रक्रियाओं के अभिप्राय को और अधिक स्पष्टता से समझा जा सकता है। कबीले के कम्यून में महिलाओं का बहनापा तथा पुरुषों का भाईचारा दोनों ही विद्यमान था । महिलाओं का बहनआपा, जिसमें मातृत्व का सार भी शामिल था अपने समूहवादी चरित्र का सूचक था । महिलाएँ बहनों के समूह के रूप में साथ-साथ कार्य करती थी । उनका सामाजिक परिश्रम व्यापक स्तर पर संपूर्ण समुदाय को स्थिरता देता था । वे मिलकर बच्चों को पालती थी । एक माँ अपने और कबीले की बहनों की संतानों में कोई भेद नहीं करती थी और बदले में सभी बच्चे भी सभी महिलाओं को परस्पर माँ मानते थे । दूसरे शब्दों में, सामुदायिक उत्पादन और सामूहिक संपति के साथ-साथ बच्चों का पालन-पोषण भी सामूहिक था ।
भाईचारा इसी बहनआपे का पुरुष प्रतिरूप था जो बहनापे की ही भांति उसी सामुदायिक ढांचे में आबद्ध था। जनजाति में समाविष्ट कबीला या कबीले की उपजातियाँ पुरुष की दृष्टि से ‘भाईचारे’ के रूप में मानी जाती थी,ठीक वैसे ही जैसे महिलाओं  की ओर से इसे ‘बहनापे ’ या ‘मातृभाव’ के रूप में देखा जाता था । इस मातृभाव और भाईचारे में दोनों लिंगों के व्यस्क, न केवल एक-साथ जीवन की आवश्यकताओं के लिए उत्पादन कर रहे थे ‍वरन समुदाय के अन्य सदस्यों को भी उसे उपलब्ध कराकर, उनकी सुरक्षा कर रहे थे । इन लक्षणों ने बहनापे  और भाईचारे को ‘आदिम साम्यवाद’ की एक विशिष्ट व्यवस्था बना दिया था ।

इस प्रकार से, परिवार (जिसमें कि आज वैयक्तिक पिता मुखिया के रूप में विद्यमान है) के जन्म से पूर्व ही पितृत्व का भाव उपस्थित था । उस पितृत्व के रूप में पुरुष के सामाजिक कार्य थे, न कि पारिवारिक दायित्व । और इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि पहले पुरूष, जिन्होंने पितृत्व की सेवांएँ निभाई, वे कबीले की बहनों के पति या साथी नहीं बल्कि उनके कबीलाई भाई थे ।परप्राचीन समाज में शारीरिक पितृत्व की क्रियाएँ अज्ञात होना इसका कारण कदापि नहीं था । वरन ज्यादा निर्णायक रूप में,उत्पादन के सामुदायिक संबंधों और बच्चों के समष्टिवादी पालन-पोषण पर स्थापित एक समाज में यह अप्रासंगिक था ।आज परिवार नामक संस्था में बच्चे के पालन-पोषण के अभयस्त लोगों को, यह व्यवस्था चाहे कितनी ही विचित्र प्रतीत हो, किंतु आदिम कम्यूनों में बहनों के बच्चों के, भाइयों या मामाओं द्वारापित्रात्मक कार्य करना एकदम सामान्य बात थी । यही कार्य बाद में वैयक्तिक पिता द्वारा अपनी पत्नी से उत्पन्न बच्चों के लिए किए गए।

इस भाई-बहन समूह प्रणाली में पहला परिवर्तन जैसा कि मार्गन और एंगेल्स ने उन्हें कहा है समुदाय और परिवार में रहते हुए युग्म दंपति या युग्म परिवारों की प्रवृति बढ़ने के कारण हुआ । हालांकि इस सामान्य सह-निवास ने पूर्व के समष्टिवादी संबंधों या समुदायों में महिलाओं के उत्पादक की भूमिका को बड़े पैमाने पर नहीं बदला । पर इतना अवश्य हुआ कि श्रम का यौन विभाजन जोकि पहले क्लेन बहनों और भाइयों के मध्य आबंटित किया गया था, धीरे-धीरे पतियों और पत्नियों के मध्य, श्रम-यौन विभाजन में परिवर्तन हो गया । किंतु जब तक समूहवादी संबंध प्रबल रहे तथा महिलाओं ने सामाजिक उत्पादन में भाग लेना जारी रखा,लिंगों के मध्य, कम या ज्यादा,प्रारंभिक समानता चलती रही । संपूर्ण समुदाय ने युग्म इकाईयों को उसी रूप में बनाए रखा जिस रूप में इन इकाइयों के प्रत्येक वैयक्तिक सदस्य ने श्रम गतिविधियों में अपना-अपना योगदान दिया । परिणामत: परिवार प्रणाली के प्रारंभ में उभरा युग्म परिवार हमारे आज के, एकाकी या एकल परिवार से पूर्णत: भिन्न था । आज की इस क्रूर प्रतिस्पर्धी पूंजीवादी व्यवस्था में प्रत्येक छोटे परिवार को स्वयं के प्रयत्नों से ही डूबना या तैरना होता है । वह किसी बाहरी सहायता पर भरोसा नहीं कर सकता । इसमें पत्नी पति पर आश्रित है, जबकि बच्चों को निर्वाह हेतु अभिभावकों की ओर देखना पड़ता है । फिर चाहे कमानेवाल (जो उनका भरण-पोषण करते हैं) बेरोजगारी, बीमारी या मृत्यु से ही ग्रस्त क्यों न हो जायें । किन्तु युग्म परिवार के समय में ‘परिवार के अर्थशास्त्र’पर निर्भरता की ऐसी कोई प्रणाली विद्यमान नहीं थी । क्योंकि पालने से कब्र तक प्रत्येक व्यक्ति की बुनियादी आवश्यकताओं का ध्यान पूरा समुदाय रखता था।

यह आदिम कम्यूनों में उन सामाजिक उत्पीड़नों और परिवारिक विरोधों, (जिनसे हम आज परिचित हैं) की अनुपस्थिति का भौतिक-आधार था। कभी-कभी यह भी लक्षित किया जाता है कि पुरुष वर्चस्व सदा से ही अस्तित्व में रहा है । पुरुषों द्वारा सदा से ही महिलाओं से निर्दयी व्यवहार किया जाता रहा है । दूसरी और यह भी (व्यापक तौर पर) माना जाता है कि मातृसत्तात्मक समाजों में, महिलाओं द्वारा पुरुषों पर वर्चस्व के साथ, दोनों लिंगों के मध्य संबंध हमारे आज के समय से ठीक विपरीत थे । इनमें से कोई भी प्रस्ताव नृवैज्ञानिक साक्ष्यों पर खरा नहीं उतरता ।इसका  अभिप्राय बर्बरता के युग को महिमामंडित करने या अतीत के किसी स्वर्णिम युग की रोमांटिक वापसी की वकालत करने का कदापि नहीं है । शिकार और भोजन जुटाने पर खडी अर्थव्यवस्था मानव विकास का सबसे निचला स्तर थी । इसकी जीवन स्थितियाँ असभ्य, कच्ची और अत्यधिक कठोर थी । तदापि हमें समझना होगा कि उस समाज में स्त्री पुरुष संबंध वर्तमान समाज से मूलतः भिन्न थे ।महिलाओं के बहनापे और पुरुषों के भाईचारे की कबीलाई व्यवस्था के अन्तर्गत एक सेक्स के दूसरे पर हावी होने की अधिक संभावना नहीं थी । महिलाएँ सबसे महत्वपूर्ण स्थानों पर अधिकृत थी क्योंकि वे जीवन की आवश्कताओं की प्रमुख उत्पादक होने के साथ-साथ नव जीवन की सर्जक भी थी । लेकिन इस अधिकार ने उन्हें पुरुषों की शोषक नहीं बनाया था । उनका सामुदायिक समाज वर्ग, नस्ल या यौन के आतंक को बाहर रखता था।

जैसा कि एंगेल्स ने संकेत किया है, निजी संपति,एकल विवाह और पितृसत्तात्मक परिवार के उदय के साथ पारिवारिक संगठन और समाज में मौटे तौर पर नई सामाजिक ताकतें उभरी । इन्होंने पहले की, नारी जाति के अधिकारों को नष्ट कर दिया । सहज सामान्य युग्म से आगे एकल विवाह की कठोर ढाँचाकृत कानूनी प्रणाली का उदय हुआ । पत्नी और बच्चों को उस पति और पिता के पूर्ण नियंत्रण में ला दिया गया, जिसने परिवार को अपना नाम दिया और उसकी जीवन स्थिति और नियति निर्धारित की।महिलाएँ, जो एक समय बहनों के समुदाय के रूप में साथ रहती और काम करती थी। सामुदायिक रूप से बच्चों का पालन-पोषण करती थी,अब व्यक्तिगत परिवारों में अपने प्रभु और स्वामी की सेवा के लिए पुरुषों की पत्नियों के रूप में तितर-बितर हो गई । कम्यून में पुरुषों और महिलाओं के मध्य श्रम के भूतपूर्व बराबरी के यौन विभाजन ने परिवार के श्रम-विभाजन का मार्ग प्रशस्त किया, महिलाओं को कोल्हू के बैल की तरह पति, घर और परिवार की सेवा के लिए सामाजिक उत्पादन से दूर कर दिया गया । इस प्रकार, एक समय में समाज की संचालिका रही महिलाएँ (वर्ग संरचना में) पुरुष के बच्चों की दाई और उसकी प्रमुख नौकरानी बनने के लिए अवक्रमित या पदावनत हो गई ।

महिलाओं की यह पदवनति वर्ग समाज के सभी तीन चरणों-दास व्यवस्था से लेकर, सामंतवाद और पूँजीवाद तक की एक स्थायी विशेषता रही है । जब तक महिलाओं ने नेतृत्व किया संपूर्ण समुदाय के उत्पादक कार्य में भाग लिया, उन्हें आदर और सम्मान मिला । किन्तु अलग-अलग परिवार-इकाईयों के रूप में विखंडित होते ही वे महिलाएँ (घर, परिवार में) दासत्व की स्थिति में पहुँच गई ।  वे अपनी शक्ति और प्रभाव के साथ प्रतिष्ठा भी खो बैठी।क्या यह आश्चर्यपूर्ण है कि ऐसे प्रबल सामाजिक परिवर्तनों को, लिंगों के मध्य गहन और दीर्घकालिन विरोधों को जन्म देना चाहिए था। जैसा कि एंगेल्स कहते हैं – 'एकल विवाह जो विवाह के सर्वोत्कृष्ठ रूप से दूर है, किसी भी तरीके से स्त्री-पुरुष की सुलह के रूप में, इतिहास में प्रवेश नहीं करता बल्कि  इसके विपरीत एक सेक्स द्वारा अन्य सेक्स की अधीनता के रूप में आता है क्योंकि इससे पूर्ववर्ती इतिहास में लिंगों के मध्य शत्रुता की घोषणा अज्ञात है । ..............इतिहास में वर्णित पहला वर्ग संघर्ष, एकल विवाह में, पति पत्नी की शत्रुता के विकास से मेल खाता है तथा पुरुष द्वारा महिला का पहला वर्ग उत्पीड़न भी यहीं प्रकट होता है ।' (परिवार, निजी संपति की उत्पत्ति और राज्य, किर संस्करण, पृ.-79)

यहाँ निजी संपति की प्रणाली के अंतर्गत एकल पारिवारिक जीवन में, महिला-शोषण की दो डिग्रीयों के बीच अंतर नोट करना आवश्यक है । पूर्व औद्योगिक युग के उत्पादक किसान परिवार में महिलाएँ उच्च स्थिति में रहती थी। उन्हें हमारे शहरी जीवन के नाभिकीय उपभोक्ता परिवार की तुलना में अधिक सम्मान प्राप्त था ।
जब तक कृषि और शिल्प उद्योग अर्थव्यवस्था में प्रमुख रहे, किसान परिवार, (जोकि विस्तृत परिवार था) एक जीवनसक्षम उत्पादक इकाई बना रहा । लिंग और उम्र के आधार पर इसके सभी सदस्यों के कार्य निर्धारित थे । परिवार में महिलाएँ खेती करने, घरेलू उद्योग में शामिल होने के साथ ही साथ बच्चों के पालन-पोषण में मदद करती थी, जबकि बच्चे और बुड्डे सामर्थयनुसार, अपने-अपने हिस्से का उत्पादन करते थे ।औद्योगिक और एकाधिकारवादी पूँजीवाद तथा नाभकीय परिवार के उदय के साथ स्थिति बदल गई  । कारखानों में मजदूरी अर्जक बनने के लिए आम जनता कृषि और अन्य लघु व्यवसायों से एक बार बेदखल हुई तो उनके पास जीवन-निर्वाह हेतु अपनी श्रम शक्ति (पूँजीपतियों को) बेचने के अलावा कोई उपाय न बचा । इन दिहाड़ी मजदूरों की पत्नियाँ खेतों और शिल्प मजदूरी से विस्थापित हो कर अपने और बच्चों के निर्वाह हेतु पूर्णत: पति पर आश्रित हो गई । ज्यूँ –ज्यूँ पति मालिकों पर आश्रित हुआ त्यूँ-त्यूँ पत्नी अपने पतियों पर आश्रित होती गई ।


इस प्रकार महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता छिनने के साथ ही वे सामाजिक सम्मान में भी सदा के लिए निम्नतम स्तर तक गिर गई। वर्गीय समाज के आरंभ से ही पति के माध्यम से घर और परिवार की उत्पादक बनने के लिए उन्हें सामाजिक उत्पादन तथा सामाजिक नेतृत्व से हटा दिया गया । तत्पश्चात औद्योगिक शहरों के नाभकीय परिवार द्वारा कृषि परिवार के विस्थापन से तो इस धरातल से भी विस्थापित हो गयी ।बदली परिस्थितियों ने महिलाओं को दो निराशाजनक विकल्प दिए। वे या तो आश्रयदाता के रूप में पति की तलाश कर सकती थी और वैतनिक गुलामों की अगली पीढ़ी तैयार करने के लिए शहर में, किराये के घरों या अपार्ट्मेंटों में गृहणियों के रूप में लेख बद्ध हो सकती थी । अन्यथा सबसे खेदजनक हो सकता था कि मिलों और कारखानों में, सीमांत श्रमिकों के रूप में (अपने बच्चों के साथ) पसीना बहानेवाली, सबसे दलित तथा अल्पवैतनिक श्रमिक शक्ति बन सकती थी । 

पिछली कई पीढियों में महिला वेतन कर्मियों ने अपना श्रम संघर्ष संचालित किया है। वे पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर अपने वेतन और काम की परिस्थितियों में सुधार के लिए लड़ी हैं । किंतु आश्रित गृहणीयों के रूप में महिलाओं के सामाजिक संघर्ष का ऐसा कोई साधन नहीं रहा है । वे अपने कष्टों के लिए पति या बच्चों से शिकायतें या लड़ाई, झगड़े ही कर सकी हैं। महिलाओं की दयनीय परनिर्भरता और पुरुषों के लिए उनकि अनुचाकरी ने दोनों लिंगों के मध्य संघर्ष को और गहरा तथा तेज किया है ।‘पवित्र माँ’और ‘समर्पित गृहिणी’के रूप में नारीजाति को प्रदत आडम्बरों, श्रद्धाँजलों के बावजूद पूँजीवाद में महिलाओं की महत्ता न्यूनतम स्तर तक रह गयी है । चूँकि गृहणियाँ न तो बाजार के लिए कोई उत्पाद निर्मित करती है और न ही मुनाफाखोरी के लिए कोई अधिशेष मूल्य । अतः वे पूँजीवाद के क्रियाकलापों के केन्द्र में नहीं हैं । इस प्रणाली में उनके अस्तित्व का औचित्य केवल- प्रजनक के रूप में,घर के द्वारपाल के रूप में तथा परिवार हेतु घरेलु वस्तुओं के खरीदार के रूप में बचता है ।

धनी महिलाएँ अपने नीरस कार्यों को करने के लिए नौकरों को रख सकती हैं पर गरीब महिलाएँ जीवनप्रयन्त एक अंतहीन चक्की में पिसती रहती हैं । परिवार के भरण-पोषण हेतु जब से वे बाहर नौकरी करने के लिए बाध्य हुई हैं, उनकी दासता और गहरी हो गई है। दोहरे दायित्वों ने उनके दोहरे उत्पीड़न का काम किया है ।यहाँ तक कि पश्चिमी दुनिया की मध्यवर्गीय गृहणियाँ अपनी आर्थिक समृद्धि के बावजूद पूँजीवाद से पीड़ित हैं । उनके जीवन की रुक्ष,एकाकी,तुच्छ परिस्थितियाँ उन्हें बच्चों के द्वारा‘जीने का रास्ता’देती हैं –यह एक ऐसा संबंध जिसने कई तंत्रिका संबंधी समस्याओं को बढावा दिया है और जिससे आज का पारिवारिक जीवन भी प्रभावित है । महिलाओं की ऊब को कम करने की कोशिशें मुनाफाखोरों द्वारा उपभोक्ता वस्तुओं के क्षेत्र में इस्तेमाल और शिकार की जा सकती है और की जा रही है । उपभोक्ता के रूप में महिलाओं का यह शोषण उस प्रणाली का अभिन्न अंग है जो पुरुष द्वारा उत्पादक के रूप में पहली बार शोषण के लिए निर्मित किया गया था ।
पूँजीपतियों के पास एकल परिवार की महिमा गाने के पर्याप्त कारण हैं। इसकी छोटी-छोटी गृहस्थियाँ,पंसारियों, अचल संपति एजेंटो से लेकर डिटर्जेंट तथा प्रसाधन सामग्री निर्माताओं के लिए सोने की खाने हैं । यह ठीक वैसे ही है जैसे कि पर्याप्त जन परिवहन के विकास के स्थान पर व्यक्तिगत प्रयोग के लिए ऑटोमोबाइल उत्पादित किए जा रहे हैं, ताकि बड़े निगम छोटे घरों को व्यक्तिगत वाशिंग मशीन,रेफ्रिजरेटर और अन्य वस्तुओं से सुसज्जित करने के क्रम में बिक्री से अधिक पैसा बना सकें । वे कम किराये में बड़े स्तर पर आवास निर्माण या सामुदायिक सेवाओं और शिशु पालन गृहों के विकास की तुलना में इसे ही लाभप्रद पाते हैं ।

दूसरी ओर, महिलाओं का अलगाव, निजी घर में घेराव और रसोईघर तथा पालन-पोषण में बंधीकरण उन्हें एक साथ एकत्र होने नहीं देता । स्थापित सत्ता के विरूद्ध उन्हें एक मजबूत सामाजिक बल और गंभीर राजनैतिक खतरा बनने से रोकता है।अत:वर्गीय समाज के घर और परिवार में नारीजाति के इस दीर्घकालीन कारावास के गहन सर्वेक्षण से क्या सबक तैयार होता है, जो पूर्व के वर्गीय समाज से ऐसे चिन्हित विपपर्य में खड़ा है? यह सवाल दर्शाता है कि स्त्रीलिंग की अवर स्थिति उनकी जैविक संरचना या बच्चों की जन्मदात्री होने के तथ्य का परिणाम नहीं है । आदिम कम्यून में बच्चे पालना विकलांगता नहीं थी। यह हमारे समय के नाभिकीय परिवार में विकलांगता बन गई है । गरीब महिलाओं को घर में बच्चों की देखभाल तथा संपोषण हेतु बाहर काम करने के परस्पर विरोधी दायित्वों में विभाजित कर दिया गया है ।तत्पश्चात महिलाएँ उन्ही सामाजिक शक्तियों और संबंधों के द्वारा (अपनी दीन-हीन स्थिति के लिए) निन्दित तथा दंण्डित की गई है जो एक वर्ग के दूसरे वर्ग, एक नस्ल के दूसरी नस्ल और एक राष्ट्र के दूसरे राष्ट्र के द्वारा पीड़न के लिए जिम्मेदार थे । यही है- पूँजीवादी व्यवस्था, वर्गीय समाज के विकास की अंतिम अवस्था, जो महिलाओं के ह्रास और उत्पीड़न का मूल स्रोत है ।

मुक्ति आंदोलन की कुछ महिलाएँ मार्क्सवाद के इन आधारभूत शोधों पर विवाद करती हैं । वे कहती हैं कि स्त्रीलिंग एक अलग जाति या वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है । उदाहरण के लिए टी.ग्रेस एंतकिंसन महिलाओं को एक अलग वर्ग ठहराती हैं जबकि रौक्सै डनबर कहती हैं कि वे एक अलग जाति प्रस्तुत करती हैं। अतः अब हम वर्ग और जाति दोनों सिद्धान्तों और  इनके निष्कर्षों की  जाँच करते हैं। सर्वप्रथम,क्या महिलाएँ एक जाति हैं ? इतिहास में जाति पदानुक्रम पहले आया। यह वर्ग प्रणाली का पूर्वरूप और पूर्वगामी था । यह श्रम के नये विभाजनों और सामाजिक कार्योंनुसार समाज के विभिन्न वर्गों के सबसे पहले चिन्हित अन्तरों के आविर्भाव के कारण और आदिवासी कम्यून के टूटने के बाद उभरा था। उत्कृष्ट या अवर पद की सदस्यता जाति विशेष में पैदा होने से निर्धारित हो जाती थी ।यहां यह रेखांकित करना महत्वपूर्ण है कि जाति व्यवस्था जन्मजात थी और अपनी उत्पत्ति में ही वर्ग प्रणाली भी थी । इसके अलावा जहाँ दुनिया के केवल कुछ क्षेत्रों जैसे कि भारत में जाति व्यवस्था अपने चरम पर पहुँची, वहाँ वर्ग-प्रणाली, विश्व व्यवस्था बनने के लिए , इससे बहुत आगे विकसित हुई, जिसने जातिव्यवस्था को अपने में समाहित कर लिया ।

यह स्पष्ट रूप से स्वयं भारत में देखा जा सकता है,जहाँ चारों प्रमुख जातियों- ब्राह्मण या पुजारियों, सैनिकों, किसानों और व्यापारियों, श्रमिकों की, जाति बहिष्कृत अछूत जाति के साथ शोषक समाज में अपनी-अपनी उचित सुनिश्चत स्थितिभी थी। आज भारत में, जहाँ प्राचीन जाति व्यवस्था जीर्ण रूपों में जीवित है, पूँजीवादी संबंध और सत्ता ने जाति के अवशेषों सहित, दूसरी विरासत में मिले पूर्व-पूँजीवादी संस्थानों पर भी अपना प्रभाव कायम कर लिया है . हालांकि दुनिया के वे क्षेत्र जो सभ्यता के रास्ते पर तेजी से और बहुत आगे तक विकसित हुए, जाति व्यवस्था को पूर्णतया बाइपास कर गये । पश्चिमी सभ्यता, जो प्राचीन ग्रीस और रोम के साथ आरंभ हुई थी, गुलामी से सामंतवाद के रास्ते आगे बढते हुए, वर्ग समाज की सबसे परिपक्व अवस्था पूँजीवाद तक विकसित हुई ।

महिलाओं ने कभी भी न तो जातिव्यवस्था में, न ही वर्ग प्रणाली में और न ही इनके संयोजन में पृथक् जाति या वर्ग बनाया । जिन्होंने इन सामाजिक संरचनाओं को बनाया उनके द्वारा महिलाएँ भी अपने आप ही विभिन्न जातियों और वर्गों में विभाजित कर दी गई ।महिलाएँ सेक्स के रूप में अवर स्थिति रखती हैं, यह तथ्य वास्तव में महिलाओं को अवर जाति या वर्ग नहीं बना सकता । यहाँ तक की प्राचीन भारत में भी महिलाएँ ठीक उसी प्रकार विभिन्न जातियों से संबंधित थी, जैसे समकालीन पूँजीवाद में वे वर्गों से संबंधित हैं । एक में उनकी सामाजिक स्थिति जाति विशेष में जन्म से निर्धारित थी । दूसरी में उनके पति या पतियों के धन से निर्धारित है । किन्तु एक स्तर पर महिलाओं और दोनों पुरुषों के संबंध में इन दोनों ही बातों को जोड़ा जा सकता है और वह है कि दोनों ही लिंग उच्च जातियों से संबंधित होकर उच्च सत्ता, स्थिति तथा ऐश्वर्य को भोग सकते हैं ।तो फिर, रौक्सै डनबर सभी महिलाओं को एक वर्ग विहीन जाति (या चाहे वर्ग क) बता कर क्या कहना चाहती हैं ? और इस लक्षण वर्णन से वे कार्यवाही के लिए कौन से परिणाम निकालती हैं ? उनके आधार और निष्कर्ष की सटीक अन्तर्वस्तु स्पष्ट नहीं है । अत: यह विषय गहन विश्लेषण की अपेक्षा करता है ।

सामान्य ढ़ग से कहें तो महिलाओं को अवर ‘जाति’ के रूप में संदर्भित करना संभव है – जैसे कि कभी-कभी उन्हें ‘दास’या पददलित कहकर किया भी गया है। जब उद्देश्य मात्र इतना ही संकेत करना होता है कि वे पुरुष प्रधान समाज में अधिनस्थ स्थिति रखती हैं, ऐसे में ‘जाति’ शब्द का प्रयोग केवल हमारी भाषा की दरिद्रता का भंडाफोड़ करता है-जहाँ शोषित लिंग के रूप में नारी जाति को इंगित करने के लिए कोई शब्द नहीं है । किन्तु यदि हम रौक्सैन डनबर के फरवरी 1970 के पर्चे (जिसमें वे इस प्रश्न पर अपनी पूर्व राय को बदल देती हैं) के आधार पर विश्लेषित करते हैं तो लगता है कि इसमें कुछ गहरी बात शामिल है । इस लेख में वे कहती हैं कि उसका महिलाओं को एक शोषित जाति के रूप में चरित्रांकित करना कोई नई बात नहीं है। मार्क्स और एंगेल्स इसी प्रकार से स्त्रीलिंग की स्थिति का विश्लेषण करते रहे हैं। पर यह बात बिल्कुल नहीं है । न ही मार्क्स की ‘दास कैपिटल’ में न एंगेल्स के परिवार, निजी संपति और राज्य की उत्पत्ति’ में और न ही लेनिन से रोजा लग्समवर्ग तक किन्ही भी विख्यात मार्क्सवादियों के लेखन में  स्त्री को ‘जाति’ के रूप में परिभाषित किया गया है । अत: यह शब्द के दुरूपयोग का मौखिक झगड़ा मात्र नहीं है। यह मार्क्सवाद के नाम से प्रस्तुत किए जाने के बावजूद  मार्क्सवाद से पृथक् प्रस्थान बिन्दु है ।

रौक्सैन डनबर को इस निष्कर्ष पर स्पष्टीकरण देना चाहिए जो वह अपने सिद्धांत से निकालती हैं कि यदि सभी पुरुष उच्च जाति तथा महिलाएँ निम्न जाति से संबंधित हैं, तो महिलाओं के मुक्ति-संघर्ष की केन्द्रीय धुरी सभी महिलाओं का,सभी पुरुषों के खिलाफ एक ‘जातिगत’ युद्ध होगा । उनके इस कथन से यह निष्कर्ष पुष्ट होता हुआ प्रतीत होता है कि “हम एक अन्तराष्ट्रीय जाति व्यवस्था के तहत रहते हैं ।”यह दावा भी उतना ही गैर मार्क्सवादी है क्योंकि मार्क्सवादी कहते हैं कि हम एक अन्तराष्ट्रीय वर्ग प्रणाली के तहत रहते हैं न की अन्तराष्ट्रीय जातिव्यवस्था के तहत। और आगे वे कहते हैं कि महिला मुक्ति के साथ सभी शोषित स्त्री-पुरुष और संपूर्ण प्रताड़ित जनता की मुक्ति के लिए जाति-संघर्ष की नहीं, वरन सभी प्रताड़ित स्त्री और पुरुषों के वर्ग-संघर्ष, की आवश्यकता होगी । क्या रौक्सै डनबर वर्ग संघर्ष की सर्वोपरि भूमिका के इस दृष्टिकोण से सहमत है, या असहमत?

डनबर का भ्रम एक वैज्ञानिक व्याख्या में सटीक भाषा के उपयोग की आवश्यकता का संकेत करता है । पूँजीवाद के तहत पददलित महिलाएँ आज किसी सामंती गुलाम या निम्न जाति की सदस्य, नहीं है तथा दास, गुलाम और जाति की सामाजिक श्रेणियाँ तो हमारे इतिहास के विभिन्न चरणों और विशेषताओं का उल्लेख करती हैं न कि हमारे आज के समाज में महिलाओं की स्थिति को परिभाषित नहीं करती हैं ।यदि हम सटीक और वैज्ञानिक होना चाहते हैं, तो महिलाओं को एक ‘शोषित लिंग’ के रूप में परिभाषित किया जाना चाहिए । दूसरे दृष्टिकोण से देखें तो महिलाओं को विशेष ‘वर्ग’ के रूप में चिन्हित करना और भी गलत है। मार्क्सवादी समाजशास्त्र में वर्ग को दो अन्तर्संबंधित ढंगों से परिभाषित किया गया है:- पहला उस भूमिका से जो वह उत्पादन की प्रक्रिया में निभाता है । दूसरा जो संपति के स्वामित्व में उसकी हिस्सेदारी से हैं । इस प्रकार से पूँजीपति हमारे समाज की प्रमुख शक्ति हैं क्योंकि उत्पादन के साधनों पर उन्हीं का स्वामित्व है वे ही राज्य को नियंत्रित और अर्थव्यवस्था को निर्देशित भी करते हैं । जबकि धन पैदा करने वाले दिहाड़ी मजदूरों के पास और उनकी श्रम शक्ति के अलावा कुछ नहीं होता जो उन्हें मालिकों को बेचनी ही पड़ती है ।

इन ध्रुवीय वर्ग ताकतों  के  पारस्परिक संबंधों में महिलाएँ कहाँ खड़ी हैं ? वे सामाजिक पिरामिड के सभी स्तरों से संबंधित हैं। शीर्ष की कुछ महिलाएँ धनिक वर्ग का हिस्सा हैं, कुछ अधिक हमारे मध्यम वर्ग का हिस्सा हैं तथा अधिकांश जनसंख्या सर्वहारा परतों से संबंधित है । इनका विशाल प्रसार रॉकफेयर, मार्गन और फोर्ड के परिवारों की कुछ धनी महिलाओं से लेकर,कल्याणकारी अंशदान पर निर्भर करती लाखों गरीब महिलाओं तक है । संक्षेप में, महिलाएँ, पुरुषों की भांति एक बहुवर्गीय लिंग हैं । यह महिलाओं को एक-दूसरे से विभाजित करने का प्रयास कतई नहीं है बल्कि उनके मध्य विद्यमान वास्तविक विभाजनों की पहचान है । सभी महिलाओं के एक ही वर्ग के सदस्यों की तुलना में, परस्पर सेक्स के रूप में अधिक समानता रखने की धारणा गलत है। उच्च वर्ग की महिलाएँ अपने धनवान पतियों की केवल हमबिस्तर नहीं हैं । एक नियम के तहत उनके मध्य दूसरे संबंध भी हैं, जो उन्हें एक-साथ बाँधते हैं । वे आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक हमसफर हैं, जो निजी संपति, मुनाफाखोरी, सैनिक शासन, नस्लवाद की सुरक्षा और अन्य महिलाओं के शोषण के लिए एकजुट हैं ।

निश्चित तौर पर,इस नियम के कुछ अपवाद हो सकते हैं ।विशेष रूप से आज की युवा महिलाओं के मध्य। उदाहरण के लिए हम जानते हैं कि श्रीमती फ्रैंक लेस्ली ने महिला मताधिकार आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए करोडों की वसीयत छोड़ी थी । तथा उच्च वर्ग की अन्य कई महिलाओं ने भी हमारे नागरिक अधिकारों को सुरक्षित करने के उद्देश्य से अपनी संपति समर्पित कर दी। लेकिन पूँजीवीदी  हितों और विशेषाधिकारों के लिए खतरा पैदा करने वाले क्रांतिकारी संघर्ष का अनुमोदन या समर्थन करने के लिए, धनी महिलाओं की किसी बड़ी संख्या की उम्मीद करना बिल्कुल भिन्न बात है । उनमें से अधिकांश ने खुले तौर पर या परोक्ष रूप में, “हमें मुक्त होने के लिए क्या चाहिए?” कहकर मुक्ति आंदोलन का तिरस्कार ही किया है ।

क्या इस बात पर बल देना वास्तव में आवश्यक है ? नवम्बर 1969 और मई 1970 में, वाशिंगटन में हजारों हजार महिलाएँ युद्ध विरोधी प्रदर्शनों के लिए गई थी । जीवन और मृत्यु के उस मुद्दे पर क्या आतंकी पुरुषों के साथ चलते हुए उनमें कुछ अधिक समानताएँ विद्यमान थी ? या फिर श्रीमती निक्सन, उनकी बेटियों और अटॉर्नी जनरल की पत्नी श्रीमती मिशेल से उनकी कुछ समानता थी जिन्होंने बेचैन होकर खिड़की से बाहर झांका और उस प्रदर्शन करती जनता में एक और रूसी क्रांति की काली छाया को देखा था? क्या बेंकरों, जनरलों, वकीलों और बड़े उद्योगपतियों की पत्नियाँ, मुक्ति के लिए लड़ रही महिलाओं की, मजदूर वर्ग के पुरुषों की अपेक्षा अधिक कट्टर सहयोगी हो जाएँगी ? वर्ग संघर्ष के दोनों पक्षों पर क्या महिलाएँ और पुरुष दोनों नहीं होंगे ? यदि ऐसा नहीं है तो क्या यह पूँजीवाद के स्थान पर पुरुष-लिंग के खिलाफ संघर्ष होगा ? यह सत्य है कि वर्ग समाज के सभी रूप पुरुष प्रधान रहे हैं और पुरुषों को पालने से ही युद्धप्रिय होने के लिए प्रशिक्षित किया जाता रहा है । लेकिन यह सही नहीं है कि पुरुष अपने आप में महिलाओं के प्रमुख शत्रु हैं । यह उन हजारों-हजार पददलित, शोषित पुरुषों जोकि स्वयं भी (महिलाओं के प्रमुख दुश्मन) पूँजीवादी व्यवस्था ,द्वारा पीड़ित है को कटघरे में खड़ा कर देता है । ये पुरुष इस तरह महिलाओं की मुक्ति-संघर्ष में हिस्सेदार हैं, और यही हमारे सहयोगी हो सकते हैं तथा होंगे।

हालांकि संघर्ष पुरुष हिंसा के विरूद्द पूरी  कार्यवाही का एक महत्वपूर्ण अंग है जिसे महिलाओं को अपने मुक्ति आन्दोलन के माध्यम से जरूर आगे बढ़ाना चाहिए किन्तु इसे ही केन्द्रिय मुद्दा बनाना गलत होगा। यह सत्तारूढ़ शक्तियों की भूमिका छुपाने या नजरअंदाज करने की कोशिश होगी, जो भेदभाव और उत्पीड़न के सभी रूपों में न केवल पोषित और लाभान्वित होते हैं वरन् पुरुष हिंसा को पोषित करने और बनाए रखने के जिम्मेदार भी होते हैं । स्मरण कीजिए कि पुरुष वर्चस्व बहनआपे और भाईचारे पर स्थापित आदिम समाजों में मौजूद नहीं था । नस्लवाद की तरह लिंगवाद की भी जड़ें निजी संपति प्रणाली में निहित हैं।

एक गलत सैद्धान्तिक दृष्टिकोण महिला-मुक्ति-संघर्ष को बड़ी सहजता से गलत रणनीति की ओर ले जाएगा । ऐसा ही रेडस्टोकिंग का मामला है, जिन्होंने अपने घोषणा पत्र में कहा कि ‘महिलाएँ एक उत्पीड़ित वर्ग हैं ।’2 यदि समस्त महिलाएँ एक वर्ग की संरचना करती हैं तो सभी पुरुष एक विरोधी वर्ग यानि शोषक वर्ग का निर्माण करेंगे। इस अवधारणा से क्या अर्थ संप्रेषित होता है ? कि शोषित वर्ग में कोई पुरुष नहीं?यह निष्कर्ष उन लाखों अश्वेत मजदूरों को कहाँ खड़ा करेगा, जो शोषित अश्वेतों और अन्य अल्पसंख्कों की ही भांति एकाधिकारवादियों के द्वारा उत्पीड़ित किए जा रहे हैं? क्या ये लोग सामाजिक क्रांति के संघर्ष में केन्द्रिय स्थान नहीं रखते? फिर किस बिन्दु पर और किस झंड़े के नीचे सभी नस्लों और लिंगों के ये पीड़ित लोग, अपने सांझा दूश्मन के विरूद्द कार्यवाही हेतु संगठित होंगे । महिलाओं द्वारा एक वर्ग के रूप में पुरुषों को एक अन्य वर्ग मानकर विरोध का सीधा परिणाम वास्तविक वर्ग-संघर्ष में भटकाव ही साबित होगा ।

क्या रौक्सै डनबर के दावे में इसी दिशा का सुझाव नहीं है कि महिला-मुक्ति सामाजिक क्रांति का आधार है ?  यह मार्क्सवादी रणनीति से दूर है क्योंकि यह वास्तविक स्थिति को सिर के बल खड़ा कर देता है । मार्क्सवादी कहते हैं कि सामाजिक क्रांति सम्पूर्ण महिला मुक्ति का आधार है-जैसे कि यह संपूर्ण मजदूर वर्ग की मुक्ति का भी आधार है । अतः अंतिम विश्लेषण में महिला-मुक्ति की वास्तविक सहयोगी वे शक्तियाँ ठहरती हैं जो स्वयं के कारणों से साम्राज्यवादी स्वामियों के विरूद्ध संघर्ष के लिए प्ररित होती हैं और उनकी बेड़ियों को तोड़ देती हैं । महिलाओं के शोषण का मूल स्रोत, जोकि पूँजीवाद है, केवल महिलाओं द्वारा समाप्त नहीं किया जा सकता, न ही सभी वर्गों की महिलाओं के गठबंधन द्वारा । आज के संयुक्त राज्य अमेरिका में केन्द्रीत पूँजावादी सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए स्त्री-पुरुष, मजदूरों एवं उत्पाड़ित वर्ग के विश्वव्यापी समाजवादी संघर्ष की आवश्यकता होगी । निष्कर्षत:हमें सवाल उठाना चाहिए कि महिला-मुक्ति-संघर्ष और समाजवाद के लिए संघर्ष के मध्य क्या संबंध है ?

सर्वप्रथम, हालांकि समाजवादी क्रांति के बिना महिला-मुक्ति का पूर्ण लक्ष्य प्राप्त नहीं किया जा सकता है, किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि तब तक सुधारों के लिए संघर्ष को स्थगित कर दिया जाए । विशेष उद्देश्यों की प्राप्ति हेतुलिए हमारी सभी संघर्षरत बहनों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर संगठित कार्यवाही के लिए लड़ना मार्क्सवादी महिलाओं के लिए आज से ही आवश्यक है । एक वर्ष पूर्व या उससे भी कुछ समय पहले, जब से महिला मुक्ति आन्दोलन का नया चरण सामने आया है, यही हमारी नीति रही है ।अन्य मुक्ति आन्दोलनों की भांति महिला-मुक्ति आन्दोलन भी प्राथमिक माँगो जैसे-शिक्षा और रोजगार में पुरुषों के समान अवसर और समान वेतन, स्त्री इच्छानुसार मुक्त गर्भपात, सरकार द्वारा वित पोषित तथा समुदायों द्वारा नियंत्रित शिशु पालन गृहों को आगे रखकर  आरंभ हुआ है। इन मुद्दों के लिए महिलाओं को एकजूट करना सुधार प्राप्ति की न केवल कुछ संभावना निर्मित करता है बल्कि इस समाज में हमारी अधीनता के सबसे घृणित पहलूओं को भी उजागर, नियंत्रित और संशोधित करता है ।

दूसरे, क्यों महिलाओं को अपने मुक्ति-संघर्ष का नेतृत्व स्वयं करना चाहिए, जबकि अंतत: समाजवादी क्रांति की जीत के लिए संपूर्ण मजदूर वर्ग का संयुक्त पूँजीवादी-विरोध आवश्यक हो जाएगा? इसका कारण यह है कि उत्पीड़न के लिए अधीन कर लिया गया समाज का कोई भी खंड (फिर चाहे वे तीसरी दुनिया के लोग हों या महिलाएँ) अन्य शक्तियों की आजादी के लिए अपनी स्वतंत्रता के नेतृत्व और प्रोत्साहन से प्रतिनिधित्व दे सकते हैं । हालांकि अन्य शक्तियाँ भी उनके सहयोगियों के रूप में कार्य कर सकती हैं । पर हम उन कुछ राजनैतिक प्रवृतियों के दृष्टिकोण को अस्वीकार करते हैं, जो स्वयं को मार्क्सवादी तो कहते हैं, लेकिन वे इस बात को मानने से इंकार करते हैं कि महिलाओं को अपने उद्दार के लिए स्वयं स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व करना होगा। ठीक वैसे ही जैसे वे यह नहीं समझ सकते कि अश्वेतों को भी ऐसा ही क्यों करना चाहिए ।आयरिश क्रांतिकारियों में एक प्रसिद्द कहावत है कि ‘जो स्वयं को मुक्त करेगा वह स्वयं प्रहार करेगा ।’ यह कहावत महिला-मुक्ति के प्रश्न पर शत-प्रतिशत लागू होती है । महिलाओं को स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए स्वयं प्रहार करना चाहिए । और यह पहले भी तथा पूँजीवाद विरोधी क्रांति की विजय के बाद भी सत्य बना रहेगा।

हमारे संघर्ष के दौरान और इसके बाद भी, हमें उन पुरुषों को पुन: शिक्षित करना होगा, जिनका ब्रेनवॉश इस विश्वास के पक्ष में किया गया है कि जैविक संरचना की कुछ कमियों के कारण महिलाएँ, स्वाभाविक रूप से अवर लिंग रही हैं । पुरुषों को समझना होगा कि उनकी हिंसा और प्रभुत्व, पूँजीवाद के द्वारा बनाए गये उत्पीड़न के पदानुक्रम, मालिक वर्ग द्वारा अपना शासन बनाए रखने के दूसरे हथियार हैं। शोषित मजदूर अपनी आश्रित गृहिणी के, अपने से गहरे दुखों को देखकर कोई आत्मसंतुष्टि नहीं प्राप्त कर सकता है । उसे दमनकारी शक्ति के उन स्रोतों को पहचानने के लिए तैयार करना होगा । जिसनसे वे दोनों पदावनित हैं।

अंततः  यह कहना कि महिलाएँ एक अलग जाति या वर्ग की निर्माणकर्त्ता हैं, दोनों लिंगों के मध्य विरोध को (मार्क्सवादियों के क्रांतिकारी आशावाद के ठीक विपरीत) तार्किक रूप से अत्यन्त निराशावादी निष्कर्ष तक ले जाएगा । इसलिए जब तक कि, या तो दोनों लिंगों को पूर्णतया अलग न कर दिए जाएगा अथवा पुरुष पूर्णत: समाप्त न कर दिए जाऐंगें । ऐसा प्रतीत होता है कि वे परस्पर सदैव युद्ध की स्थिति में ही बनें रहेंगे ।

मार्क्सवादियों के रूप में हमारे पास अधिक यथार्थवादी तथा आशावादी संदेश है । हम अस्वीकार करते हैं कि जैविक संरचना में महिलाओं की अधिनता एक निर्धारित नियति थी और यह हमेशा से अस्तित्वमान थी । शाश्वत होने के बजाय महिलाओं की अधीनता और दोनों लिंगों के मध्य की कटु शत्रुता कुछ हजार सालों से अधिक पूरानी नहीं है । यह उन कठोर सामाजिक परिवर्तनों द्वारा पैदा की गई है जिनसे परिवार, निजी संपति और राज्य सत्ता का उदय हुआ ।

इतिहास का यह दृष्टिकोण असमानता के कारणों को जड़ से उखाड़ फेंकने और अपने लिंग के लिए मुक्ति प्राप्त करने हेतु संपूर्ण (सामाजिक, आर्थिक संबंधों में) क्रांति से कम की आवश्यकता को नहीं अंकित करता। यही समाजवादी कार्यक्रम का वादा और उद्देश्य है तथा इसी के लिए हम निरन्तर संघर्षरत हैं।

संदर्भ-

1  रोबिन मार्गन(एडिटर) सिसटरहुड इज पॉवरफूल, न्यूयोर्क:विनटेज बुक्स,1970, पेज 486
2  ‘रेडस्टॉकिंग्स मैनिफेस्टो’, (नोटस फ्रॉम द सैकंड ईयर(1970)रीप्रिंटिंड इन फूल इन फेमेनिज्म इन आवर टाइम : द एशेंशियल राइटिंगस् , वर्ल्ड वार II, टू द प्रजैंट, मिरियम सच्नियर, एडिटर, न्यूयार्क विंटेज बुक्स,1974, पी.पी.-125-129

संपर्क :
प्रोमिला
असिस्टेंट प्रोफेसर,
हिंदीविभाग,
अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय
हैदराबाद, आन्ध्र प्रदेश-500605,
फोन-+91-89779611  ई -मेल : promila.du@gmail.com




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