संजय इंगले तिगांवकर की कवितायें

संजय इंगले
संजय इंगले तिगांवकर मराठी के रचनाकार है और अंधश्रद्धा निर्मूलन के सक्रिय कार्यकर्ता हैं. संपर्क : मोबाईल : 09765047672
( मूलतः मराठीकी इन कविताओं का अनुवाद किया है अशोक काम्बले ने  ) 

१. तू बता मेरी बेटी तुम्हें  क्या पसंद है

मुझे एक बार तुमसे पूछना चाहिए था कि
तू बता मेरी बेटी तुम्हें क्या पसंद है .
रंग –बिरंगी तितलियों के पीछे दौड़ने की उम्र तेरी
तेरा दौड़ के चलना , तेरा लय में बोलना
घर ही तेरी आकाश गंगा
तेरी आलमारी तुम्हारा बैग
उसी में तुम्हारी दुनिया सारी
रंगीन कांच , गोल पत्थर , चमकने वाले टैटू
स्कूल के पुराने फोटो , कुछ चित्र और कार्टून्स
देखकर यह सब
चिडचिडाती थी तुम्हारी माँ
पर उसे भी याद आती होगी बचपन की
उसके भी बस्ते में होंगे रंगीन चूड़ियों के टुकडे
नदी किनारे के शंख , शिंपले , चिचोके बिट्टे
घर संवारते हुए चिड़ती वह
थक जाती तुम्हारी तैयारी कराते हुए

पहली बारिस में तुम्हारा छत पर नाचना
भरी धूप में सायकिल पर घूम कर आना
कार्टून फिल्म देखना
और अपने हाथों से सुन्दर ग्रीटिंग बनाना
  
तुम्हारी आँखों में भी होंगे ख्वाब
जो मुझे दिखे नहीं, पता नहीं क्यों
दूर होकर तुम्हारी दुनिया से मैं
करता रहा अपने व्यवहार का हिसाब
     
घर के सामने से अभी गई तुम्हारी स्कूल बस
पर तुम्हारे लिए अब हॉर्न नहीं बजेगा
अब भी होंगे तुम्हारे स्कूल अनेक कार्यक्रम
पर अब वह आकर्षण नहीं होगा
अब कौन पीछे पडेगा पैरेंट्स मीटिंग में आने के लिए



पिछले चार दिनों से तुम्हारा निःशब्द होना
अँधेरे कमरे में घंटों बैठे रहना
मुरझाया चेहरा निस्तेज आँखें
तेरे माथे पर पड़े बल
क्यों लगाया परिणाम को ऐसे दिल  पर

बहुत बार मुझे लगा तुम्हें यह सब बताऊँ
पास बुलाऊं प्यार करूँ सहलाऊँ
अब ऐसा लगने का कोइ अर्थ नहीं
समझ नहीं पाया तेरा भाषांतर

तुम्हारे आइसक्रीम का एक कप
तुम चार दिनों तक बचा कर रखती
जीवन भी ऐसा ही होता है पगली
काश , धीरज रख पाती !
 
छत के  पंखे का पत्ता अब भी लटका हुआ है
कोने में खामोश पडी है रस्सी
एक बार सोचना चाहिए था मेरी बच्ची
गुम हुआ घर के घर होने का अहसास
मैं निःशब्द



मुझे एक बार तुमसे जरूर पूछना चाहिए था
तू ही बता मेरी बेटी तुम्हें क्या पसंद है


२. सावित्री

सावित्री
अब तक तुम्हारे हाथ में पूजा का पात्र है
तुम्हें मालूम नहीं
यहाँ के वटवृक्षों में पुरुषत्व नहीं के बराबर
सावित्री
तू ऐसी कब तक वक्त की कसौटी पर घिस कर
और कितनी बार प्रतिमा के नाम पर तरस कर निकलोगी
सावित्री
यहाँ का कोई भी परंपरागत वटवृक्ष
अब सत्यवान नही रहा .
तुम्हारी हजार जन्मों की इच्छाओं का क्या !
  
सावित्री
कभी रूपकँवर , कभी मनोरमा बन कर
बता ऐसा कौन सा दिन है
जब तू जलती नहीं
सावित्री , तेरी चिता पर जाने की परंपरा अब भी यथावत है

सावित्री
सत्ययुग गया और अब भी तू गाफिल है
अब तो सत्यवान भी यम की टोली में शामिल है
अब तो अग्नि परीक्षा का आयोजन राम रावण के साथ मिलकर कर रहा है
और वस्त्र हरण की स्कीम दुर्योधन को कृष्ण ही देता है .
    

सावित्री
इसलिए अब हमें तुम्हारे साथ
विचारों का अस्त्र देखना है
एक दिन तुम्हारे हाथों में
दुर्योधन का वस्त्र देखना है

  
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