जख्म हरे हैं आज भी

निवेदिता
निवेदिता पेशे से पत्रकार हैं. सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलनों में भी सक्रिय रहती हैं. हाल के दिनों में वाणी प्रकाशन से एक कविता संग्रह ‘ जख्म जितने थे’ के साथ इन्होंने अपनी साहित्यिक उपस्थिति भी दर्ज कराई है. सम्पर्क : niveditashakeel@gamail.com 
( भागलपुर दंगों के 25 साल पूरे हो गए , स्वतंत्र भारत का एक ऐसा दंगा , जो पिछले दंगों से इस मायने में अलग था कि इसकी लपटें गाँव -गाँव तक फ़ैली , महीनो चली . शोधकर्ताओं ने बाद में उद्घाटित किया कि लोगों को मारकर लाश छिपाने के लिए गोवी के फूल उगा दिये गये थे. इस दंगे की दुःखद स्मृतियों को याद कर रही हैं निवेदिता. यह आलेख पिछले दिनों जनसत्ता में भी प्रकाशित हुआ था. )
25 साल पहले एक शहर जख्मों से भर गया था, आज फिर उसके जख्म हरे हो गए। वर्षो से जमा मवाद बाहर आ गया। फोड़े की तरह,जो न दबता है, न फूटकर बाहर आता है। स्मृति भी किस अंधेरे में अपना राज खोलती है। मुद्दत पहले गुजरी घटनाएं ऐसे याद आ रही हैं जैसे आज की बात हो। भागलपुर दहक रहा था। दंगे की आग में झुलसे घरों की लपटें मंद पड़ने लगी थीं, पर धुएं की तीखी गंध हवा में वर्षो तैरती रही थी।

मुझे याद है कि भैया की कांपती आवाज फोन पर देर तक हम सुनते रहे थे। वे दहशत में थे। हम उन्हें रीयाज भाई बुलाते हैं। मेरे पति के बड़े भाई। नाथनगर ब्लाॅक के पास उनका घर था। भाभी सरकारी मुलाजिम हैं। उन्हें क्वार्टर मिला हुआ था। भाभी बच्चों के साथ अपने मायके गयीं हुई थी। उसी दौरान शहर में तनाव बढ़ा। वे लोग वहीं रुक गए। भैया घर की ओर निकले। दूर से ही देखा की उनके घर में दंगाईयों ने आग लगा दी है। आग की लपटें कई किलोमीटर दूर से दिखायी दे रही थीं। एक ठंडी सी झुरझुरी पूरे बदन में भर गयी। वे रो रहे थे । आंखों के सामने सबकुछ जल कर खाक हो गया। वर्षो से तिनका-तिनका जोड़ कर जो घर बनाया था, वह पलक झपकते ही मलवे के ढ़ेर में तब्दील हो गया। वे भागे थे। दहशत और ड़र पीछा कर रहे थे । उनके पास स्कूटर  था । अभी अपना मुहल्ला पार भी नहीं किया कि लोग हथियारों से लैस खड़े दिखे। उन्हें लगा अब बच पाना मुमकिन नहीं है। अपनी पूरी ताकत लगा कर वे भागे। जब तक दंगाई समझते की कौन आ रहा है वे पार कर गए। भैया ने फोन पर सब बताया था।  हम बुत बने खड़े थे। कुछ भी नहीं बचा था। बच्चों के कपड़े तक जला दिये गए। जो बचा वे पड़ोसी लूट कर ले गए। इस से भयावह क्या होगा जिनलोगों के साथ सालों जीवन गुजरा, दुख-सुख साझा किया वे ही कातिल थे। उन्होंने कहा था अगर हो सके तो कुछ कपड़े और कुछ जरुरी सामान भिजवा दो। मैंने दूध के डब्बे, बरतन,साड़ी बच्चों के कपड़े भेजे थे। जब कोई दंगा होता है तो सिर्फ लाश  ही नहीं गिरती, मनुष्यता भी हारती है।

भागलपुर दंगा के 25 साल पूरे हुए। दंगा ने जो जख्म दिए  उसे पाटने में जाने कितनी सदियां बीतेंगी । भैया कहते हैं उन हादसों को हम याद नहीं करना चाहते। दुख बीत जाता है पर डर ठहरा रहता है। एक ऐसे देश  में, जिसके संविधान में देश  के सभी नागरिकों को जीने का अधिकार है। उस देश  में कोई इसलिए नफरत का शिकार होता है कि वह एक दूसरे घर्म को मानता है। उनकी स्मृतियों में 24 अक्टूबर 1989 का दिन आज भी ताजा हैं।  1989 में 24 अक्तूबर को भागलपुर  शहर में दंगा भड़का था. इस दंगे में सरकारी आंकड़ों के अनुसार ग्यारह सौ से ज्यादा लोग मारे गये थे.  दंगे ने धीरे-धीरे शहर के साथ-साथ तत्कालीन भागलपुर जिले के अठारह प्रखंडों के 194 गांवों को अपने चपेट में ले लिया था.




यह दंगा इस मायने में भी अलग है कि दंगे के 25 सालों बाद भी पीडि़तों के दावों की जांच-पड़ताल के बाद मुआवजा राशि का भुगतान किया गया है. लेकिन अब भी बड़ी संख्या में पीडि़त अलग-अलग आधार पर मुआवजे की मांग कर रहे हैं. जिस दंगे में हजारों लोग मरे, लापता हुए, वहां सरकार ने मृत व लापता व्यक्तियों के 861 मामले ही स्वीकार किये हैं. उनके परिजनों को अब तक प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष से दस हजार, बिहार सरकार से एक लाख और फिर सिख दंगों के तर्ज पर साढ़े तीन लाख रुपये की सहायता राशि मिली है. लेकिन जिनके दावे स्वीकार नहीं किये गये हैं वे हर तरह की सहायता राशि  से अब तक वंचित हैं. दिल्ली स्थित संस्था सेंटर फाॅर इक्विटी स्टडीज ने दंगा पीडि़तों की हालात जानने और उनके उनकी मदद के लिये पिछले तीन सालों के दौरान 50 दंगा प्रभावित गांवों के दो हजार पीडि़त परिवारों से संपर्क किया.



संस्था के अनुसार इस दौरान उसे 50 से अधिक ऐसे परिवार मिले जिनके यहां दंगे के दौरान लोग मारे तो गये लेकिन उन्हें अब तक कोई सहायता राशि नहीं मिली है. सरकार की मुआवजा नीति के तहत ऐसे परिवार हकदार तो हैं लेकिन उस नीति के तहत अपने दावे के समर्थन में साक्ष्य नहीं जुटा पा रहे हैं. ऐसे परिवार दंगे के दौरान या उसके कुछ दिनों बाद अगर किसी भी कारण से एफआईआर दर्ज नहीं करवा सके तो उनका दावा प्रशासन स्वीकार नहीं करता है.हालांकि ऐसे दावों के सत्यापन के लिये भी मुआवजा नीति में व्यवस्था है. लेकिन सरकारी अधिकारियों के सत्यापन के सहारे पूरी होने वाली यह लंबी प्रक्रिया शायद ही किसी परिवार की मददगार साबित हुई हो.

मैं नहीं जानती 25 साल बाद मिले इन मुआवजा से जख्म भरेंगे या नहीं पर एकबार भी हम अपने लहुलुहान अतीत से सबक ले सकते हैं। सबक वो पार्टियां भी ले सकती हैं जिसने ऐसी हिंसा की जमीन बनायी। हम सबक ले सकते हैं देश में फिर से पैदा किये जा रहे साम्प्रदायिक तनाव के खिलाफ। याद कर सकते हैं उन बुरे वक्त को जिसमें भाजपा द्वारा राम मंदिर अंदोलन चलाना और बाबरी मस्जिद का ध्वंस शामिल है.  
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