दूजी मीरा : आख़िरी क़िस्त

संदीप मील
संदीप मील मह्त्वपूर्ण युवा कथाकार हैं . फिलहाल राजनीति शास्त्र में शोधरत हैं . संपर्क :09636036561
(राजस्थानी परिवेश में लिखी गई संदीप मिल की यह कहानी जाति और जेंडर के आपसी साहचर्य को समझने के लिए एक आवश्यक पाठ है. आख़िरी क़िस्त  )  


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दूजी मीरा : पहली किस्त
‘‘ओछा, यो ‘टाॅक’ कांई हुवै है ?’’ रफीक को इस बाबत कोई जानकारी नहीं थी।
‘‘रफीकड़ा, छोरां के सामणै क्यों अपणी मिट्टी पलीत करवा रिया है। तू कौन-सा जाणता नहीं। बिना ‘टाॅक’ ही चार बच्चों का बाप बन गया। थोड़ी तो शर्म कर गधा।’’ बन्नेसिंह ने बोलने की बजाय लगभग दहाड़ना ठीक समझा।

यह सुनते ही सारे लौंडे खिलखिलाकर हंसने लगे। कईयों को तो अपने ज्ञान पर नाज-सा होने लगा कि उन्हें अंग्रेजी आती है। वे भी ‘टाॅक’ का यही अर्थ निकाल रहे थे। और अब तो तय हो गया कि ‘टाॅक’ करने से बच्चे पैदा होते हैं, ठाकुर बन्नेसिंह ने जो कह दिया। बन्नेसिंह के दादा अंग्रेजों के राज में दरोगा थे और तभी से उनके परिवार वाले हर अंग्रेजी शब्द का अर्थ बता देते हैं। जब बच्चे परीक्षा के लिये तैयारी करते और उन्हें ‘टू दि हेडमास्टर’ का अर्थ नहीं मालूम होता तो ठाकुर ही बताता - सुण हेडमास्टर के बच्चे। इतने में ही राधेश्याम पंडित का छोरा नयन आते दिखा।

‘‘यह बतायेगा सही, जैपर ही रहता है आजकल। मीरा की पूरी कथा जानता है।’’ नरेश ने पूरे विश्वास के साथ कहा।
‘‘आओ बेटा नयन, जैपर से कब आया ?’’ ठाकुर ने बैठने का इशारा किया।
‘‘पाय लागूं बाबो-सा। परसों ही आया था।’’ नयन ने मोबाईल में वक्त देखा तो रात के करीब ग्यारह बजे थे।
‘‘चैधरी की मीरा की कहाणी बताय रे..............।’’ ठाकुर ने नयन के सर पर बड़े प्यार से हाथ फेरा।
‘‘जैपर में मीरा जिस काॅलेज में पढ़ती है वह एक बदनाम काॅलेज है। हर लड़की को कोई पंगा रहता है। रात को लड़कियां सड़क पर लड़कों के साथ घूमती हैं। कई बार तो बिल्कुल अकेली भी। ऐसे में मीरा कौन-सी दूध  की धुली है। मेरा एक दोस्त बता रहा था कि वह रात को चाय वाले के पास बैठी रहती है। आधी रात तक। भई, हमारे पंडितों में तो ऐसी लड़की होती तो अभी तक क्रियाकर्म कर देते लेकिन अब जाटों की ही मति मारी गई तो क्या करें............। नयन ने नरेश और अन्य जाटों के छोरों की तरफ हिकारत के भाव से देखा।
‘‘सुसरे..., शहर में चार पैसा कमा लिया तो कौन-सा बिड़ला बण गया। तेरा खानदान तो अब भी आटा मांगकर खाता है और हम जाट ही आटा डालते हैं। ज्यादा हुसियार होणे की जरूरत नहीं है। औकात में रिया कर।’’ नरेश को तैश आ गया।
‘‘देखो, बाबो-सा। आपके कहने पर मैंने सच बताया और मुझे ही गरिया रहा है। एक ठाकुर के ड्योढ़ी पर एक पंडित का ऐसा अपमान तो कभी नहीं हुआ होगा।’’ नयन से ठाकुर को उकसाया।
‘‘ऐ छोरे, जियादा बोलणै की जरुरत नहीं है। सच सबसे सहन नहीं होता। इतो ही जाट बणै है तो चौधरी को जात बहार कर दो। इण बेचारे समझदार पंडित पर क्यों हेकड़ी दिखा रिया है। याद रखो कि या ठाकुर की महफिल है, कोई भी जोर से नहीं बोलेगा। अपणै घर में देना ज्ञान, यहां नहीं होगा पंडित का अपमान।’’ बन्नेसिंह का जर्द चेहरा लालिमा दिखा रहा था जो अंधेरे में आगे के उजाले से भी दिख जाती है।
‘‘सुण ठाकर, बहुत देखी है तेरी हेकड़ी। दो बीघा जमीन बेचणै से कोई सेठ नहीं बणता। पव्वे के बीस रुपये मांगता था तू।’’ नरेश भी गुस्से में खड़ा हो गया।
‘‘ठहर, तनै मैं आज सारी औकात दिखा दूंगा।’’ बन्नेसिंह हवेली से तलवार लाने दौड़ा।   
‘‘आ जाणा चैधरियों की चैकड़ी में रांगड़ा।’’ नरेश के साथ कई जाटों के छोरों ने नारा लगाया।

खबर मीरा तक भी पहुंच गई थी कि रोज उसके ब्याह के लिये चौधरियों का तांता लगा रहता है। कहीं न कहीं मामला सैट कर ही दिया जायेगा। लेकिन जब आज चौधराइन ने सगाई की बात पक्की होने की खबर दी तो मीरा के पैरों की जमीन खिसक गई। बहुत गुस्से में चौधराईन को डांटा, ‘‘आपको मेरी जीन्दगी तय करने का हक किसने दिया ?’’
‘‘किसणे का मतलब ? तेरे मां-बाप हैं तो तेरो ब्याह करणों फर्ज है।’’ चौधराइन ने समझाने अंदाज में कहा।
‘‘मेरे बारे में मैं खुद तय करुंगी। मुझे नहीं करनी है शादी।’’
‘‘ब्याह तो जगत की रीत है बेटा। आज नहीं तो कल करणा पड़ेगा।’’
‘‘मुझे नहीं करना है और मेरी शादी के बारे में आप सोचना बंद कर दीजिये।’’
‘‘तेरे बाप ने ‘हां’ कर ली है, इब ब्याह तो करणा ही पड़ेगा। ब्याह में डरण की बात नीं है पगली।’’
‘‘बाप की ‘हां’ जाये भाड़ में। मैंने ‘ना’ बोल दी है, यही मेरा अंतिम फैसला है।’’
‘‘तनै इति बड़ी करी है, पिसा खर्च किया है।’’
‘‘किसने आपको यह सब करने का हुक्म दिया था। और अब उसकी वसूली करना चाहते हो क्या ?’’
‘‘देख बेटी, इब भी सोच ले, चौधरी को मोह ही देख्यो है तनै, गुस्सो भोत जोरको है।’’
‘‘होगा तो, मैं क्या करुं ?’’
‘‘अगले महीने से पिसा भेजणों बंद है।’’
‘‘मुझे अपनी मेहनत पर जीना आता है। नहीं चाहिये आपकी दौलत।’’

हालांकि भाव में आकर मीरा ने कह तो दिया था कि उसे अपनी मेहनत पर जीना आता है लेकिन अभी तक तो कमाने की सोची भी नहीं थी। आज पहली बार सोचना पड़ रहा है। वैसे भी हाॅस्टल की फीस तो हर महीने देनी पड़ती है।
किसको कहे ?
रोहित को!
उसे ही क्यों ?
दोस्त है ना, इसलिये।
इन्हीं सब उलझनों में फंसी मीरा रात के ठीक ग्यारह बजे अकेली रोहित की दुकान की तरफ जा रही थी। ज्यों ही वह दुकान के करीब पहुंचने वाली थी कि पीछे से घोड़े की पैरों की टप-टप सुनाई दी। पीछे मुड़कर देखा तो फागुनी हवा की सनसनाहट थी, न घोड़ा  था और न ही बंजारा था। 
‘‘तेरा बंजारा पीछे से नहीं, आगे से आयेगा।’’ रोहित ने अपने सदाबहार अंदाज में कहा। उसके कान सुनने को उत्सुक थे, ‘‘तू कहता है तो मेरा बंजारा जरूर आयेगा।’’
आज मीरा ने यह जवाब नहीं दिया। वह चुपचाप कुर्सी पर बैठ गई। रोहित को बैचेनी तो उस जवाब न मिलने की वजह से ही हो गई थी लेकिन अपने रोजमर्रा के कामों में व्यस्त रहा। सारा सामान दुकान में जमाया और फिर एक कुर्सी लेकर मीरा के बगल में बैठ गया।
‘‘क्या हुआ मीरा, इतनी उदास क्यों हो ?’’
‘‘तू कौन हुआ मेरी उदासी का सबब जानने वाला ?’’
‘‘मैं तेरा दोस्त हूं। तेरे सदियों के प्रेम को कहानियां तो राहित सुने, तेरी जीन्दगी के सारे सपने भी सुने। बस, उसे तेरे गम सुनने का हक नहीं है। ठीक है फिर।’’
‘‘यार, मैं बहुत टेंशन में हूं।’’
‘‘घरवालों से लड़ाई हो गई ना ? शादी कर रहे होंगे ?’’
‘‘तेरे को कैसे पता चला जालिम कि ये सब हुआ है।’’
‘‘अक्सर लड़कियों के साथ यही होता है। तेरे साथ भी हो गया।’’
‘‘तो फिर ऐसी स्थिति में लड़कियां अक्सर करतीं क्या हैं ?’’
‘‘मर जातीं हैं। या तो आत्महत्या कर लेतीं हैं या अपने सपनों को मार देती हैं या अपने प्रेमी के साथ भाग जातीं है जिसे वे ठीक से समझी तक नहीं हों या फिर .....।’’
‘‘या फिर...कोई और भी रस्ता है क्या ? बोलो रोहित।’’
‘‘डगर कठिन है मगर, तू करेगी वही।’’
‘‘तू भी आजकल बातों को घूमाकर कहता है, सीधे बताओ ना ?’’
‘‘मुक्ति का मार्ग है ना, अपनी मर्जी की जिंदगी उसी में है।’’
‘‘आजादी कहां, सिवाय मर्दों के चंगुल से बाहर निकलने के।’’
‘‘यही मैं कह रहा था मीरा। लेकिन तेरे बंजारे का क्या करेगी ? वह भी तो पुरुष है और तू चैबीस घंटे तो उसी के उधेड़बुन में रहती हो।’’ रोहित ने दुखती हुई रग पर हाथ मारा।

‘‘ते क्या सोचता है कि मैं उस बंजारे की मोहब्बत में पन्द्रह साल निकाल दिये। वह तो मेरा शगल था, ऐसा थोड़ा ही होता है कि अमूर्त प्यार पर जिंदगी कुर्बान की जाये। यह तो सिर्फ दिल बहलाने के बहाने होते हैं। मैंनें भी ऐसा ही किया। एकान्त अपने आप में कई बार इंसान का खून पीने लग जाता है और जब यह अहसास होने लगता है कि वह अकेला है तभी से यह प्रक्रिया शुरू हो जाती है। अपनी उसी उदासी को भूलने के लिए एक तरीका था ‘बंजारा’। हुआ यूं कि इस बहाने मैं अपने आप को बहुत गहराई तक छूने लगी। यार, यह अन्तर्मन की यात्रा ही मुझे मुक्ति का मार्ग दिखा गई थी। वैसे तू कह सकता है कि तू जिस पुरुष के खिलाफ लड़ना चाहती है उसी के जरिये मुक्ति का मार्ग खोज रही है। अगर तेरा बंजारा सच में महबूब होता तो अभी तक क्योंकर  नहीं आया। सच भी है कि बचपन की दोस्तियां सिर्फ भावनाओं की नींव पर खड़ी होती हैं, वहां विचार और तर्क की कोई गुंजाईश नहीं होती। यूं तो भावना का भवन बहुत मजबूत होता है लेकिन जिंदगी के भूचालों से उतनी ही तेजी से धराशायी भी हो जाता है। वह कोई बंजारा नहीं था, जिसकी खोज में सर्दियों की कई रातें इन अंधेरी सड़कों पर बेवजह जाया कर दी जाती। वह मेरा आदर्श पुरुष भी नहीं कहूं तो, ऐसा कह सकती हूं कि बेहतर दुनिया को बनाने का साथी हो सकता है, इसलिए उसका सृजन मैंने अपनी तमाम तर्कों की चाक पर विचारों की मिट्टी से किया था। हो तो यह भी सकता है कि कल को मैं एक पुरुष बन जाऊं और वह मेरे सपनों के बंजारे जैसा पुरुष हो। यह एक मनोवैज्ञानिक विकृति भी है कि इंसान ख्वाब में खामियां नहीं छोड़ता और अगर छूट जाये तो ‘एडिट’ करने का आॅप्शन भी रखता है। अच्छा यह बता कि मैं जब मर्दों के खिलाफ विद्रोह कर रही हूं तो तेरे खिलाफ भी हुआ ना, तू क्या सोचता है मेरे बारे में?’’ मीरा ने एक लम्बी सी सांस ली।
‘‘मैं तो मर्द हूं ही नहीं।’’
‘‘तो तू क्या नामर्द है?’’
‘‘पत्ता नहीं! कभी चैक नहीं किया। हां, तेरे साथ रहने से कुछ गड़बड़ जरूर हो गई।’’
‘‘मर्दानगी में लोचा हो गया क्या?’’
‘‘नहीं रे, मैं धीरे-धीरे औरत होता जा रहा हूं।’’
‘‘अपने ‘पुरुष’ को मारकर स्त्री होने की प्रक्रिया ही एक पुरुष की इंसान बनने की प्रक्रिया हैं।’’
‘‘चलो, मैं पशु से इंसान हो ही रहा हूं।’’
‘‘अब बड़ा संकट आने वाला है यार। इम्तिहान की घडि़या नजदीक आ गई हैं। शादी तय। अपुन की मनाही और पैसा बंद।’’
‘‘मुक्ति की असली सीढ़ी तो अभी शुरू हुई है। आर्थिक रूप से अपने पैरों पर खड़ा होना, मुक्ति के लिए जरूरी होता है। और वह...... क्या नाम था उसका..... तू रोज-रोज बोलती है ना...... अरे.... हां कार्ल मार्क्स  .... उसने क्या कहा था।’’
‘‘बंद कर मार्क्स के बच्चे। हाॅस्टल बिल की सोच।’’
‘‘कितना लगता है? दो हजार ही लगता है ना, ले जाना मेरे से।’’
‘‘अबे बिड़ला के मुनीम, मैं आजादी की लड़ाई लड़ रही हूं। तू दो हजार देकर फिर से गुलाम बनाना चाहता है।’’
‘‘मैं तो तेरा दोस्त हूं ना मेरे से लेने में क्या हर्ज, जब कमाने लगो तो चुका देना।’’
‘‘वह तो ठीक है लेकिन संसार के सारे मर्द एक जैसे होते हैं गर पूंजी का मामला हो तो सारे मर्दों के साथ औरतें भी वैसी ही होती हैं।’’

मीरा जयपुर आकर अपनी पढ़ाई के साथ साहित्य और अन्य वैचारिक किताबों को भी पढ़ना शुरु कर दिया। दरअसल, उसे अपने शिक्षक बासु से इस तरह की किताबों की प्रेरणा मिली। बहुत ज्यादा तो नहीं लेकिन कामभर की किताबें पढ़ डाली थी। इन किताबों से अपने बदलते विचारों को एक व्यवस्थति रूपरेखा बनाने और उसको परिमार्जित करने में सहुलियत हुई। इसी सिलसिले में वह जो भी पढ़ती उसकी चर्चा रोहित से जरूर करती। यूं रोहित को कुछ लेखकों और विचारकों के नाम याद हो गये। कई बार तो ऐसा होता कि वह कोई बात कहता और मीरा हंसती, ‘‘तेरी बात, फुको से टकरा गई। उसने भी यही बात कही है, थोड़ी-सी भाषा का बदलाव जरूर हुआ है।’’
‘‘फुको कौन था ? मैंने तो उसका नाम भी नहीं सुना। मेरी बात उससे टकरा गई इसमें मेरी क्या गलती है।’’ रोहित आश्चर्य प्रकट करता।
और ऐसे ही फुको, ग्राम्शी सहित मार्क्स का नाम भी रोहित को पता हो गया था। उसने इनकी कोई किताब नहीं पढ़ी फिर भी वह मानता था कि इन लोगों ने बात तो ठीक ही कही है। मीरा की काॅलेज जीवन में कोई विशेष लगाव नहीं था। वह क्लास में जाती और अपनी मस्ती में कुछ किताबें पढ़ती रहती और इसी वजह से काॅलेज में उसका कोई दोस्त नहीं बन पाया। सब उसे गंवई लड़की समझते थे। कितना विराधाभास है कि बिंदास रहने और मोडर्न होने के बावजूद शहर वाले गांव की समझते थे और गांव वाले शहर की। उसने खुद कभी इस बारे में कुछ तय नहीं किया। क्लास में अपनी आदतों के मुताबिक स्टूडेंटस के ग्रुप थे लेकिन मीरा किसी में भी नहीं थी। उसकी आदतें तो किसी से मेल ही नहीं खाती। अपनी रूममेट निकिता से भी मीरा का अजीब-सा रिश्ता था। दोनों बहुत प्यारी दोस्त थीं और उतनी ही प्यारी दुश्मन। इन दोनों की वजह भी क्या थी, मालूम नहीं। कई बार तो दोनों एक ही बैड पर सोती और दूसरा बैड कमरे से बाहर निकाल देती। दो-चार दिन का वक्त गुजरता की बेवजह ही बाहर रखा हुआ बैड अन्दर आ जाता और कमरे की तमाम चीजों का बंटवारा हो जाता। सीमांकन भी होता। कमरा मापा जाता और फिर ऐन बीच में चाॅक से सीमांकन हो जाता। कोई भी एक-दूसरे की सीमा को नहीं लांघती। कमरे को भी मालूम नहीं चलता की कब बीच की दीवार गिरा दी गई और बैड को अराम फरमाने के लिये बाहर पहुचा दिया गया। ये सिलसिला यूं चलता रहा। दोनों ही आलसी थीं, सो कमरे की सफाई के बारे में इतना ही कहा जा सकता है कि उन्होंने झाडू को दुश्मन मांन रखा था। इन सब के बावजूद वे एक-दूजे के जीवन के प्रति कोई भी भाव नहीं रखतीं थीं। रूम से बाहर मिलती तो ऐसा लगता कि आपस में जान-पहचान मात्र है। इसलिये मीरा की कहानी में निकिता कोई जगह नहीं बना पाई। न कभी आपके इस लेखक से शिकायत की कि मीरा मेरी रूममेट है तो मुझे भी कहानी में रखो।

राजपूतों और जाटों के बीच दंगल तो मचना ही था, नरेश ने ठाकुर बन्नेसिंह को टका-सा जवाब जो दे दिया था। होली के रंग की बजाय गांव अब रंजिश के रंग में रंग गया था। दोनों तरफ तैयारियां होने लगी। जोधपुर, बीकानेर से लेकर जयपुर तक के बन्नेसिंह के रिश्तेदारों के रिश्तेदारों के रिश्तेदार तक आ गये थे। ठाकुर की इज्जत का सवाल था। राजपूतों की ड्याढ़ी में शराब के प्यालों का दौर चल रहा था। जंग लगी तलवारों को धार दी जा रही थी और इन सब के लिये बन्नेसिंह ने चार बीघा और  बेच दी थी। एक तरफ ईंटों के चुल्हे पर बकरा जवान हो रहा था। बन्नेसिंह भी सज-धज के तैयार हो गया था, जैसे कि रण में शहादत को जाते हैं। बाकी सारा गांव सहमा हुआ था। लोग घरों में दो-चार दिन का खाना एक साथ बनाकर दुबके हुये थे। अस्सी बरस का ठाकुर कुशाल सिंह राजपूतों की वीरता के किस्से सुना रहा था।

इधर भी ऐसा ही हाल था। हालांकि जाटों के अखाड़े में गांव के बाहर से कोई नहीं आया था लेकिन गिनती करने पर गांव के ही कुल एक सौ बीस आदमी हो रहे थे। हालांकि ठाकुर बन्नेसिंह से निपटना एक चुनौती थी लेकिन पहले अंदरवियर से भी निपटना था।
‘‘चौधरी जात में रेहसी या अपण रहेगा। दोन्यूं साथ नहीं रहेगा।’’ नरेश जाटों के पूरे जमावड़े को संबोधित कर रहा था।
‘‘भई, दोनों ही रह जावो।’’ गिरधारी ने समझाने का यत्न किया।
‘‘ना जी। आज फैसलो करणों ही पड़ेगा।’’ हठ था नरेश का भी।
‘‘पहले ठाकर बड़ो दुसमण है, चौधरी नै बाद में सुलटा देंगा।’’ सांवरमल ने कहा।
‘‘आ बात ठीक लागी मनै भी।’’ गिरधारी बीचबचाव करना चाहता था।
‘‘तनै तो सारी बात ठीक ही लागै हैं। डूंगरी दादी के चिपककर बैठो हो न।’’ नरेश न ताना मारा।
इता सुनते ही गिरधारी को रीस आ गई और वह उठकर जमावड़े से अलग चला गया। भीड़ में लोग अपनी बगल वाले से गुसर-फुसर करने लगे। चांदनी रात में हुक्कों से निकलने वाले धुआं लोगों के सर पर बादल की तरह मंडरा रहा था। ऐन बीच में आग जल रही थी और उसके आसपास कुछ पावरफुल चौधरी बैठे थे। धीरे-धीरे सारा मजमा छोटे-छोटे गुटों में बदल गया और इस गंभीर सवाल पर चर्चा होने लगी कि पहले चैधरी को निपटाया जाये कि ठाकुर को। कोई चैधरी को पहले निपटाने के पक्ष में था तो कोई ठाकुर को। हर किसी के अपने-अपने तर्क थे लेकिन इस पर आम राय थी कि दोनों को निपटाना है। हुक्कों में लगातार तम्बाकु भरी जा रही थी। रात के करीब दो बज गये थे लेकिन कोई एक राय नहीं बन पाई। असल में इस समाज के लोगों में कभी एक राय बनती ही नहीं है, सब अपनी-अपनी राय पर डटे रहते हैं। फतवा ही अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचाता है। करीब आठ चौधरियों में से कोई भी खड़ा होकर फतवा जारी कर देता है, तब किसी की बोलने की हिम्मत नहीं होती। सब उसको स्वीकार कर लेते हैं और अपने तर्कों को जिंदा ही दफना देते हैं। आज भी इंतजार किया जा रहा था कि कब इन चौधरियों में से कोई मुंह खोले और अंतिम फैसला हो पर मुंह किसी का खुल ही नहीं रहा था। हर किसी का चौधरी कानाराम से अपना रिश्ता था, वे पहले बोलकर दुश्मनी मोल लेना नहीं चाह रहे थे। नरेश ने अपने घर से चाय, चिणी और दूध भी मंगवा लिया था। चाय का दौर भी शुरु हो गया। नरेश ज्यादा उत्साह इसलिये दिखा रहा था क्योंकि वह अपना भविष्य चैधरी बनने में देख रहा था। यह मौका था प्रमाण देने का। वह चूकना नहीं चाहता था।

हालांकि बात अंदरवियर तक भी पहंच गई थी। वह लगातार दो दिनों से पी रहा है, किसी से भी बात नहीं करता। चौधराईन की तबियत तो मीरा से शादी वाली बात करते ही नासाज हो गई थी। खाट ही पकड़ ली। गिरधारी सेवा में लगा रहता है। आज रात की सभा में चौधराईन ने ही भेजा था कि कैसे भी करके चौधरी को जाति में रखो लेकिन वहां से भी नाउम्मीदी ही हाथ लगी। गिरधारी निराश होकर जब अंदरवियर की हवेली की तरफ आ रहा था तो उसका मन किया कि कुआ-फांसी कर ले। एक बार तो इरादा भी बना लिया था लेकिन फिर सोचा कि चौधराईन को मुश्किल में अकेले छोड़ना बेवफाई है। सो, उस समय के लिये इरादा तज दिया। संकोच तो यह था उसे कि चौधराईन कहेगी कि गिरधार तेरे पर ही बिसवास हो, इब तो नैया डूबगी। वह गर्दन झुकाये अंदरवियर की हवेली में दाखिल हुआ और फिर मुश्किल से, दिल पर हाथ रखकर चैधराईन की कोटड़ी में प्रवेश किया।

‘‘ओ........हो......। दो दिण में ई चैधराइन की सुरत ही बदलगी। वह रौनक तो गुजरे जमाने की बात हुगी इब।’’ गिरधारी यह सोच ही रहा था कि उसके कानों में चैधराईन की दर्दभरी दहाड़ पड़ी।
‘‘गिरधारी, ऊंट पर जीन मांड, जैपर चालस्यां।’’
गिरधारी अचानक जयपुर जाने की योजना के बारे में ज्यादा तो नहीं समझ पाया लेकिन उसने यह अंदाज जरूर लगा लिया था कि मीरा से मिलने जाना है और अब या तो ऊंट टीला पार या फिर घुटने टेक देगा। चैधराईन का हुक्म भला कभी गिरधारी ने टाला है। तुरन्त ऊंट पर जीन मांडकर चलने को तैयार कर दिया। चैधराईन ने अंदरवियर को कुछ भी कहने की जरूरत नहीं समझी और जाकर ऊंट पर सवार हो गई। इशारे के मुताबिक गिरधारी रस्सी पकड़कर आगे रवाना हो गया। रात के इस पहर अमूमन गांव में खामोशी होती है लेकिन ठाकुर और जाटों की जंग की तैयारी के कारण लोग सोने की बजाय घरों में दुबके पड़े थे। गिरधारी के मन में एक शंका थी, सोच रहा था कि गांव की बसावट से बाहर निकलकर पूछूंगा  लेकिन इतनी सब्र नहीं कर पाया और पूछ ही डाला, ‘‘चौधराईन जैपर को रस्तो जानो हो कै ?’’
‘‘नहीं जाणूं। लोगा सूं पूछता-पूछता ही पूग जावांगा।’’ चौधराईन को पूरा यकीन था।
जब चौधराईन के कह दिया कि लोगों को रास्ता पूछ कर जयपुर पहुंच जायेंगे तो गिरधारी को मानना ही था। लेकिन जब चौधराईन ने जवाब दिया तब वे नरेश के घर के बगल से ही गुजर रहे थे। वह चाय के लिये दूध लेने के लिये आया था और चौधराईन की आवाज भले कोई न पहचाने। उसके घर के बगल से ही रस्ता जाता है, गिरधारी और चौधराईन के बीच जब यह वार्तालाप हो रहा था तब नरेश पतीले से दूध का कटोरा भरकर बोतल में डाल रहा था। चौधराईन की आवाज सुनते ही उसके हाथ से कटोरा छूटा.............खननन से।
‘‘छुरेरे......।’’ नरेश की मां बिल्ली के भरोसे तुरंत खाट से उतरी।
‘‘मैं हूं......।’’ नरेश ने दबी आवाज में कहा।
यह सुनकर उसकी मां तो चुप हो गई और वह दबे पांव दौड़कर छत पर चढ़ा। उसे चांदनी रात में जाता हुआ एक ऊंट दिखा जिस पर शायद कोई औरत बैठी है और नीचे एक मर्द रस्सी पकड़े चल रहा है। यह तीनों देखते ही उसने सही अंदाजा लगा लिया था क्योंकि गांव में चौधराईन के अलावा कोई औरत ऊंट पर चढ़ती ही नहीं है और चैधराईन के साथ चैधरी तो नीचे रस्सी पकड़कर चलता नहीं है। जाहिर तो पर गिरधारी होगा, इतना सोचते ही नरेश के कदमों के पंख लग गये और वह कब जाटों के उस मीटिंग में आ गया जहां पर आज कुछ फैसले होने थे।

‘‘इब बताओ, डूंगरी दादी ऊंट पर चढ़ी गांव सूं बाहर गयी है। साथ में गिरधारी भी है।’’ नरेश ने पूरा दम लगाकर चिल्लाते हुये खबर उछाली।इतनी धमाकेदार खबर सुनते ही सबके कान खिलखिलाकर हंसने लगे। अलग-अलग गुटों में बैठे लोग दौड़कर नरेश के चारों ओर इक्कठे हो गये। अपने चारों ओर जाटों का इतना बड़ा झुंड अपनी ओर ताकते हुये देखकर नरेश को एक बारकी चौधरी बनने का अहसास हो गया। यह अहसास होते ही उसे लगा की वह जमीन से पांच इंच उठ गया है और सीना भी सरक रहा है। छोटी-सी मूछें भी अचानक बढ़ती हुई लगी। धीरे-धीरे सारा चौधरीपन उसके जिस्म में उतरने लगा और वह हर अंग में सरसराहट महसूस करने लगा। बोलने से ठीक पहले उसे लगा कि उसकी आवाज बहुत भारी हो गयी है, इसलिये जोर लगाना पड़ा, ‘‘इति रात को डूंगरी दादी इक पराये मर्द के साथ जा रही है। समाज की नाक चौधरी पूरी कोटेगो।’’
‘‘इब कै फैसलो करणों है पंचो।’’ भीड़ ने एक स्वर में प्रमुख चौ रियों की ओर मुखातिब होते हुये कहा।
उन आठ चौधरियों ने चुपचाप एक-दूसरे की ओर देखा। कोई भी पहले बोलने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था। आखों के इशारों से अलग जाकर राय मश्विरा करने को कहा किसी एक चौधरी ने। आठों तुरंत उस भीड़ से तकरीबन अस्सी फिट दूर जा चुके थे। अब भीड़ को तस्सली हो गई थी कि जब ये गुप्त मंत्रणा करने गये हैं, तो कुछ फैसला जरूरी होगा और यह तो यकीन था ही कि कुछ भी हो, फैसला जाति के हित में होगा। काफी देर तक इंतजार करने के बाद मंत्रणा का दौर समाप्त हुआ और सातों चौधरी भीड़ की तरफ आये और एक चैधरी ने कहा, ‘‘देखो जात भाईयो, बात या सै कि चौधरी ने जाति सूं बाहर करणों ही पड़सी। बन्ने ठाकर नै भी सुलझाना पड़ेगा। बारी-बारी सूं सारे काम निपटाने हैं। इब पहलो काम है कि चौधराईन की खबर करणी कि वह रात को कहां गई है। पंचों ने तय किया है कि सारे भाई चौधराईन के पीछे चालेंगे और देखेंगे कि वह कहां गई है।’’
‘‘पंचों को हुक्म सिर-माथै।’’ सारी भीड़ ने एक स्वर में कहा।

हुक्म पंचों का था और बाकी तैयारियां नरेश को करनी है थी क्योंकि भविष्य में वह भी पंच बनने वाला है और फिर हुक्म भी जारी करेगा। उस समय शायद कोई ओर उस जैसा जवान तैयारियों में लगा होगा, यही चक्र चलेगा जब तक जाति रहेगी। पूरी रात न सोने के कारण भी भीड़ के चेहरे पर किसी प्रकार की थकान का भाव नहीं था, वे पूरी थकान जहन में छुपाकर जाति को बचाने के लिये तैयार थे। गांव में कुल पांच टेªक्टर थे और उनमें से एक अंदरवियर के पास था। इसलिये तीन टेªक्टर के पीछे ट्रोली जोड़ी गई, लोग उनमें लाठियां भी भर ली और फिर सवार होकर चले। लोगों को मालूम नहीं था कि चौधराईन गई किस तरफ है। उसे गांव के बाहर निकलती हुई को नरेश ने जरूर देखा था। अब काफिले का नेतृत्व भी वही कर रहा है। आगे वाली ट्रोली में नरेश जोर से जय बोल रहा था, ‘‘बोलिये बजरंग बली की।’’
‘‘जय हो।’’ एक स्वर में सारे लोग बोले। चौधराईन ने गांव से निकलते ही गिरधारी को ऊंट रोकने का आदेश दिया। उसने आदेश की तुरन्त पालना की। दूसरा आदेश आया कि वह भी ऊंट पर चैधराईन के साथ बैठ जाये क्योंकि थक गया था और सफर तो इतना लम्बा था कि दोनों को किलोमीटरों का भी कोई हिसाब मालूम नहीं था। गिरधारी को थोड़ा-सा संकोच हुआ।
‘‘किण दिक्कत नहीं है। मैं तो पैदल ही चालूं हूं।’’
‘‘अरे बावले, इति दूर पैदल चलेगा तो जाण निकल जायेगी। आ, बैठ जा।’’ चैधराईन ने बड़े प्यार से कहा।
गिरधारी के लिये चैधराईन का यह आदेश टालना मुमकिन नहीं था। उसने ऊंट को बिठाया और चैधराईन से आगे बैठ गया। यूं तो गिरधारी कई बार ऊंट की सवारी की है लेकिन आज कुछ अलग ही अनुभव हो रहा था। उसे लग रहा था कि वह ऊंट पर नहीं, हवाईजहाज में उड़ रहा है। चूंकि जयपुर का रास्ता नहीं जाने थे और सड़क पर ऊंट धीरे भी चल रहा था। गिरधारी को सीकर तक का रास्ता मालूम था और सड़क पर किसी के देखने का डर भी उसे सता रहा था। सो, बीकानेर से जयपुर जाने वाली मुख्य सड़क को छोड़कर उन्होंने कच्चे रास्ते ही जाना उचित समझा। कच्चे रास्ते भी सीकर तक तीन जाते थे। उन्होंने सबसे सीधा रास्ता चुना जिस पर वाहनों का जाना सम्भव ही नहीं है। पीछे से आ रही भीड़ वैसे तो उनसे दो घंटे की देरी से चली थी लेकिन ट्रोली से चलने के कारण उन्हें पकड़ सकती थी। एकदम गुस्सायी भीड़ उस निर्जन में संभव है कि दोनों को मार देती, बंदी बना लेती या फिर अंदरवियर के खिलाफ गवाही दिलवा लेती लेकिन ऐसा नहीं हुआ क्योंकि उन्होंने सीकर जाने का रास्ता तो कच्चा चुना लेकिन दूसरा चुन लिया। चौधराईन और गिरधारी को यह जानकारी तो नहीं थी कि कोई उनका पीछा कर रहा है लेकिन उनके मन में एक डर जरूर था। इसलिये चुपचाप ही सवारी कर रहे थे। कभी कुछ इशारों से बातें हो जाती तो कभी फुसफुसाहट से काम निकाला जाता।

उधर ठाकुर की ड्याढ़ी में वैसे ही महफिल जमी हुई थी। जंग की लगभग तैयारियां पूरी हो चुकी थी। यह तय करना था कि जगं की शुरुआत कैसे, कहां और कब की जाये । इन तीन सवालों पर कोई एक राय नहीं बन रही थी। शेखावतों का कहना था कि जाटों को घर में घुसकर मारेंगे। राठौड़ों ने इसका विरोध किया और कहा कि हम कायर नहीं हैं, दुश्मन को ललकारेंगे और बीच मैदान जंग होगी। इन दोनों के अलावा कुछ मड़तिया राजपूतों का मानना था कि जैसे मौका मिले, वैसे ही मारो। इसी सवाल पर रातभर बहस चल रही थी। कई बार तो वे आपस में ही उलझ जाते और तलवारें तन जाती। फिर कोई उन्हें याद दिलाता कि आज जंग राजपूतों की आपसी नहीं, जाटों से है। कुछ देर मामला ठंडा रहता और फिर वैसे ही मूंछें फरकाई जातीं। कई राठौड़ ज्यादा पीने की वजह से लुढ़क गये थे। किसी के मुंह में कुता मूत रहा था तो कोई गोबर में लौट रहा था। हर कोई अपना राग अलाप रहा था। बीच में कुछ शेखावत और राठौड़ों के बीच रिश्तों की बात पक्की हो रही थी। हालांकि जो रिश्तों की बात कर रहे थे वे बिल्कुल नौजवान थे और उनके औलाद भी नहीं थी लेकिन औदाल होने से पहले ही रिश्ता तय कर रहे थे। कुछ ने तो एक-दूसरे को समधी कहना भी शुरु कर दिया था। बकरा पक चुका था। होश में जो थे, उन्होंने तो बोटियां खा मारी, कुछ को झोल हिस्से में आया और कुछ मदहोश राठौड़ हांडी चाट रहे थे। लगभग चार बजे के आसपास सारा मजमा लुढ़क चुका था।

सूरज निकलने से उजास हो गया था। सारे राजपूत रेत पर सोये हुये थे। आसपास कहीं-कहीं हड्डियां बिखरी हुई थी जिनको खाने के लिये कुतों का एक पूरा दल तैनात था। कुछ कौवे भी मंडरा रहे थे कि उन्हें भी कुछ नसीब हो जाये। किसी का पाजाम गोबर में लथपथ हो गया था तो किसी की धोती अधिकांश खुल चुकी थी। बस, अपकी बार पसवाड़ा पलटा की नरुका और शेखावत, सब नंगे। पास से गुजरती पणिहारी घूंघट उठाकर यह दृश्य देख रही थी। तभी किसी ने यह खबर ठाकुरों की हवेली में यह खबर पहुंचाई कि ठाकुर जंग में जाने की बजाय ड्योढ़ी में लौट रहे हैं। मूंछें तो सबकी रेत और गोबर से रंगी हुई हैं। यह सुनते ही बन्नेसिंह की ठकुराईन आयी और उससे झकझोरा। ठाकुर मुश्किल से होश में आ पाया। आते उसने जो नजारा देखा तो चुपचाप उठकर हवेली की अंदर की तरफ भागा। धीरे-धरे सब ठाकुर उठकर अंदर गये और नहाकर फिर उसी रंगत में आ गये। बोतलें आ गई, महफिल सज गई और वही बहस शुरु। जंग कहां, कब और कैसे की जाये। कुछ होश और बेहोशी के आलम में भी लोग अपनी-अपनी जिद्द पर डटे हुये थे। सारे लोग तीन धड़ों में बंट गये। एक में शेखावत थे, जो उसी गांव के थे और उनमें कुछ आसपास के गांवों के भी थे। दूसरे गुट में राठौड़ थे, जो बीकानेर और जोधपुर से आये हुये थे और तीसरे में मेड़ता के मेड़तिया राजपूत थे। नरुका निष्पक्ष थे। उनका कहना था कि सारे लोग जो भी तय करेंगे, वे उसको मानने को तैयार हैं।

बन्नेसिंह ने हस्तक्षेप करते हुये कहा, ‘‘यह राड़ शेखावतों की है। घरों में घुसकर मारेंगे।’’
‘‘खाली शेखावतों की नीं है राड़ इब। सारी राजपूत जाति की राड़ है। मैदान में बुलाकर लड़ेंगे।’’ राठौडा़ें में से रायसिंघ बोला। फिर वैसी ही तकरार हो गई। कोई भी राय न बनने के कारण बन्नेसिंह के रिश्तेदारों के रिश्तेदार अपने घर लौट चुके थे। अंदरवियर घर में अकेला शराब पी रहा था। चौधराईन और गिरधारी रास्ता भटक गये। जयपुर पहुंचेचे ही नहीं। गांव वालों का कहना है कि वे मीरा से मिलने नहीं, मटरगस्ती करने गये थे। जाटों का काफिला जरूर जयपुर पहुंच गया था और जब वे मीरा के हाॅस्टल में गये तो गार्ड ने चाय वाले को पूछने को कहा। सारी भीड़ ने रोहित को घेर लिया। उसने बताया, ‘‘कल रात को मीरा जयपुर छोड़कर चली गई। यहां आयी थी। उसे फ्रांस सरकार ने फैलोशिप दी है। वह जाती हुई, वही पुराना गाना गा रही थी।'


सांझी सजना प्रित है ।
तू ना थाणेदार।।  
धोरां माथे साबूत हैं।
मिलणे के निशाण।।
ना तू समझयो मोय को।
ना मै समझी तोय।।
न तन द्यूं, न बदन द्यूं।
मर्जी अपणी ऐथी होय।।
सांझी सजना प्रित है ।
तू ना थाणेदार।।  
आपको कहीं कोई मीरा मिले तो इस कथाकार का ‘सलाम’ कहना।
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