कला, धर्म, बाजार और स्त्री का द्वंद्व है रंग रसिया

 युवा पत्रकार रूद्रभानु प्रताप सिंह स्त्री और दलित की दृष्टि से हालिया प्रदर्शित फिल्म ' रंगरसिया' देख रहे हैं.




 ऐसे समय में जब देश में बहुमत को आधार मान कर संस्कृति और अश्लीलता की परिभाषा तय करने की कोशिश की जा रही हो. इतिहास को बदलने का सिलसिला चल रहा हो. एक शंकराचार्य दलितों के मंदिर में प्रवेश पर पाबंदी लगा रहा हो. विश्वविद्यालय जैसी संस्थाओं से महिलाओं के खिलाफ तुगलकी फरमान जारी हो रहे हैं, नैतिकता व धर्म के ठेकेदारों को रोकने के लिए ‘किस ऑफ़ लव’ की मुहिम जोर पकड़ रही हो, तमाम प्रगतिशीलता के बावजूद एक स्त्रीवादी संस्थान से लगातार महिला उत्पीड़न की खबरें आ रही हों और प्रगतिशीलों की चुप्पी वैचारिक दोगलेपन की तरफ इशारा कर रही हो. ऐसे समय की रंग रसिया का प्रदर्शन किसी प्रतिरोध से कम नहीं है. केतन मेहता ने धर्म, कला, बाजार और स्त्री के द्वंद्व को बहुत बारीकी से पर्दे पर उतारा है. फ़िल्म जहां ख़त्म होती है वहीं से नई कहानी शुरू हो जाती है. राजा रवि वर्मा की कलाकृति को आजादी के बाद बाजार नीलाम करता है. कला प्रेमी बढ़-चढ़ कर बोली लगाते हैं. कला बिकती है मगर दशकों बाद भी हालात वही हैं. धर्म के ठेकेदार अपनी नैतिकता की चाकू से उस कलाकृति को फाड़ देतें हैं, जिसे रवि वर्मा ने उर्वशी और पुरुरवा की कहानी को आधार मान कर बनाया था. उर्वशी की तरह ही यहां भी सुगंधा छली जाती है. उसका वह स्वप्न टूट जाता है जो रवि वर्मा ने अपनी महत्वाकांक्षा या यूँ कहें कि कलाजन्य महत्वाकांक्षा के लिए दिखाया था– ‘जवानी और सौन्दर्य तो ढल जाएँगे, रहेगी तो बस कला’. उसका भ्रम तो उस समय भी टूटता है जब रवि वर्मा कहता है ‘मेरी कल्पना के बाहर तुम कुछ भी नहीं’.


फ़िल्म में  स्त्री के प्रति कलाकार के नजरिये को भी दिखाया गया है. यह कलाकार कभी दलित स्त्री और वेश्या को अपनी प्रेरणा बनता है तो कभी महिलाओं के साथ भोगविलास में डूब जाता है. वह एक वेश्या को देवी बनाता है. समाज और धर्म से संघर्ष करता है लेकिन मुसीबत के समय (प्रसिद्ध होने की लालसा भी रहती है) वह उसे बाज़ार में बेच देता है. बाज़ार उस कला को पैसे के लिए इस्तेमाल करता है और सालों अमर होने की आश लगाए बैठी सुगंधा आत्महत्या कर लेती है. रविवर्मा तो फिर भी आधुनिक भारतीय कला के जनक के रूप में चर्चित हो जाते हैं पर धर्म के ठेकेदार सुगंधा की उस अमरत्व की इच्छा का भी गला घोट देते हैं. आधुनिक युग में कला अश्लीलता और नैतिकता की भेंट चढ़ जाती है. क्या यह सवाल आपको आश्चर्य में नहीं डालता कि उर्वशी और पुरुरवा की कहानी और देवताओं का छल धर्मग्रथों में ‘अश्लील’ क्यों नहीं है? क्यों माध्यम बदलते है उसे अश्लील बना दिया जाता है?


फ़िल्म ने और भी कई पहलुओं पर प्रकाश डाला है. दलित विमर्श भी
इसका एक अहम् हिस्सा है. रवि वर्मा की पेंटिंग की  बदौलत की सदियों से मंदिरों में कैद और दलितों की पहुँच से दूर रहने वाले देवता बाहर आते हैं और दलित उनका दर्शन करते हैं. यह वही समय होता है जब देश में ज्योतिबा फुले छुआछूत के खिलाफ मुहिम चला रहे होते हैं. उनके प्रयास और रवि वर्मा के प्रयास में साफ अंतर है. एक तरफ समानता की लड़ाई होती है तो दूसरी तरफ अपनी कला को प्रतिष्ठा दिलाने की कोशिश. जब रवि वर्मा अपनी पेंटिंग के सामने उस बूढ़े को झुकते देखता है तो अपनी कला को विश्वव्यापी बनाने के लिए बाजार से हाथ मिलाता है. हो सकता है कि रवि वर्मा की सोच में कहीं दलित विमर्श के कुछ तत्व हों पर उसका व्यापारिक साझेदार इस बात को अच्छी तरह जानता है कि इस देश में धर्म से ज्यादा कुछ भी नहीं बिकता. तभी तो धर्म का सबसे बड़ा ठेकेदार रवि की कलाकृति देख कर पहले उसे अपनी संस्था में शामिल होने का लालच देता है पर जब वह इनकार करता है तो उसे धर्म विरोधी और अश्लील करार दे दिया जाता है.


अदालत में रवि वर्मा सवाल करता है ‘ये कौन लोग हैं जो यह तय करते हैं कि मेरी कला अश्लील है,
इन्हें यह अधिकार किसने दिया.’ यही सवाल संघ मुख्यालय के सामने खड़े होकर ‘किस ऑफ़ लव’ में शामिल हजारों युवक भी पूछ रहे हैं कि हमें नैतिकता का पाठ पढ़ाने, पार्कों में गुंडागर्दी करने और प्रेमी जोड़ों का मारने का अधिकार तुम्हे किसने दिया ? जज अपने फैसले में रवि वर्मा को बाइज्जत बरी करता है मगर यह पूछता है कि क्या कला को कैद किया जा सकता है? क्या इस देश में कला, धर्म और विज्ञान एक साथ विकास नहीं कर सकते? इसका जवाब तो बस यही है कि यह कामसूत्र का देश है जो हमें अपनी कमाना का, अपनी आत्मा का और अपनी मानवता का उत्सव मनाना सिखाता है.
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