धीय बिनु धरम न होय....!

जितेन्द्र विसारिया
युवा कथाकार जितेन्द्र विसारिया की यह कहानी भ्रूण हत्या के खिलाफ चुप्पी तोडती एक स्त्री की कहानी है . सम्पर्क : मोबाईल न : 09893375309
           
ठाकुर हर परसाद के आँगन में गाँव भर की जनीमाँसें रंग-बिरंगे गहने-कपड़ों में सजी-धजी, समवेत स्वर में सौहर गाने में मगन हैं। और गाती भीं क्यों नहीं, चार मोंड़ियों के बाद हुआ है छोरा ठाकुर के घर। बड़े दिनों बाद लड़कियों के सिर का ढकौंना पाकर अपने को धन्य मान रही हैं ठकुराइन। सारे नगरा गाँव में तीन दिन से होली-दिवाली जैसा माहौल बना हुआ है। ठाकुर ने बेटे के जनम पर उसकी सलामी में अटारी से माउजर के सात फैर करवाये हैं। पोरसा से लतीफ़ का बैंड और रेशमपुरा से पाँच बेड़िनियाँ आईं है बधाई डालने।....ठाकुर ने सातो जात में दस-दस रुपये और लड्डू घर-घर बँटवाए हैं। हरीरा और विसवार के लड्डुओं की महक से भरी गाँव की नाइन रामकली बुआ ‘ कौशिल्या के जनमें राम अजुद्धिया  फूलन छाय रही है; गीत गाती  पूरे गाँव में घर-घर बुलउआ देती चकरी-भौंरी बनी फिर रही हैं।

चँदा भी काकी के बुलावे पर अपनी सास के साथ ठाकुर के घर चली आई थी। ठाकुर की ठकुराइन का आज ‘ बहार ’ था। द्वार पर गोबर और जौ के दानों के प्रयोग से कलात्मक साँतिया बनाये गये हैं। सारा आँगन गेरू और गोबर से ढिंग देकर लीपा गया है।... आँगन के बीच में गाय के गोबर से बना अठकलियाँ चैक चैक पर ‘पाटा’ और पाटे पर चुनरियाऊ साड़ी में ठकुरायन अपने नव जातक के साथ घूँघट काढ़े खड़ी हुई हैं। अभी-अभी उनका छोटा देवर ज्ञान सिंह सौर से उनकी साड़ी का छोर पकड़कर चैक पर लाया है। ठकुराइन ने नेग में उसे सोने की अंगूठी  देने का वादा किया है।...साथ ही अपने पीठ-पीछे भाई लाने के कारण ठकुराईन की छोटी मोड़ी राधा की पीठ को भी घी-गुड़ से पूजा गया था !

 चँदा ने देखा कल तक चार बेटियाँ जनने के कारण लटे बरदा से कँधा डालकर न्यौहरें-न्यौहरें चलने वाली ठकुराइन बेटा जनने के कारण चैक पर तनकर खड़ी हुईं हैं। उनके गुलाबी घूँघट से फूटकर बिखरती हँसी जैसे पूरी बखरी में फैल गयी है। ठकुराइन को विहँसता देख वहाँ बैठी पुरा-पड़ौस से आईं सब औरतें सिहा उठीं। आँगन में जाजिम पर गड़रिया टोला से आकर बैठीं मंगलो आजी  उत्साहित होकर पीछे से अपनी पुरानी चाल का सौहर उन्सार दिया था- ‘ आज बधाये कौ दिन नीको बेटा जियाये को दिन नीको।‘ जिसके बोल तुरंत ही वहाँ बैठी सब जनीमाँसों ने उठा लिए थे, बड़ी गितार हैं मंगलो आजी। गाँव का कोई भी ब्याह-कारज मंगलो आजी के गाये गीतों के बगैर पूरा नहीं होता। ढोलक सप्तम पर चली गई थी।

चैक पर उधर सीराम पुरहेत की अम्मा रामा पंडिताइन रामकली बुआ के साथ काँसे की थाली में हल्दी, चावल, पाँच सुपारी, बतासे और काँस की नई सात सींकें लेकर जच्चा के सामने आकर खड़ी हो गई थीं। पंडिताइन ने पहले धोती के छोर में बेटे के साथ सगुन का नाज लिए खड़ी ठकुराइन के आँचल से वह अनाज चैक पर छुड़वाया। काँस की सींके लेकर जच्चा-बच्चा पर न्यौछावर कर चारो दिशाओं में उछालीं फिर अक्षत-हल्दी से जच्चा का तिलक कर बतासे से मुँह मीठा कराया और थाल बगल में खड़ी रामकली बुआ को देकर बच्चे की बलैयाँ ले पीछे हट गईं थीं। उसके बाद गाँव की अन्य स्त्रियाँ अपने साथ बिलिया-कटोरियों में लाई अनाज और पैसा बारी-बारी से जच्चा-बच्चा पर न्यौछावर कर चैक पर छोड़ती, थार से हल्दी-अक्षत लेकर ठकुराइन को तिलक लगाती, बच्चे की बलैयाँ लेती अपनी-अपनी जगह पर आ-आकर बैठने लगी थीं। कुछ देर बाद चँदा की सास की बारी आई। सास ने घर से लाये गेहुँओं का बेला एक हाथ में लिया और दूसरे हाथ के झाले से पास बैठी चँदा को उठाकर अपने साथ चैक पर चलने के लिए तैयार कर लिया था। चँदा बगैर कुछ कहे भोली बछिया सी चुपचाप उठकर सास के पीछे-पीछे चैक पर चली आई थी। चैक पर औरों की तरह चँदा की सास ने भी सबसे पहले अपने साथ लाये बेला के गेहुँओं को ठकुराइन और उनके बच्चे पर उसार कर चैक पर डाला, हल्दी-अक्षत से टीका किया और फिर थाल चँदा को सौंप दिया। चैक पर सुनहरे तारों से कढ़ी सितारों वाली गुलाबी साड़ी और ब्याह वाली सफेद चदरिया ओढ़े। गोद में रेशम के मखमली गदेले में नन्हें चूजे सा ओंठ खोले। आँख बंद किए। माथे पर ढिटौंना लगायें। वसंत में श्याम आभा लिए आम की गुलाबी कोपलों जैसा कोमल नर शिशु। जिसे देखकर मन ही मन हर्षाती चँदा की सास। बच्चे की बलैयाँ लेने के उपरांत ठकुराइन से अर्ज पर उतर आई थी-‘ दुलहिन! हमाई बहू कों हू आशीष देउ जाके पहलौठी में कुँअर कन्हआई होंय...’

आज उदारता की खान बनीं ठकुरायन ने मुस्कराते हुए चँदा के सिर पर हाथ रख दिया था-‘कौन सा महीना चल रऔ ए...’ ‘ दूसरा...।‘ ’चँदा ने भी अपनी साड़ी का पल्ला सिर पर डाल लिहाज के साथ झुककर ठकुराइन के पैर छू लिए थे। यह देख वहाँ बैठा सारा नारी-वृंद चंदा की सास से उसकी ऐसी हीरा-बहु  की  प्रशंसा  में पुल बाँध उठा था।  गाना-बजाना लगभग अब मद्धिम  पड़ चुका था। रामकली बुआ ठकुराइन को चैक से उठाकर पुनः सौर वाले मढ़ा में कर आयीं थीं। उधर हरप्रसाद की काकी धनकुँवरि और रामा पंडिताइन आज ही मुरैना से बायने के लिए मँगायी स्टील की नई कटोरियाँ और बूँदी के लड्डू उठाने तिवारे के भीतर चली गई थी। इधर फुर्सत के क्षण पाकर आँगन में बायने की आस में बैठी रह गई गाँव की लुगाईयाँ आपस में इते-उते की बातें कर उठीं थीं।

जाजिम पर चंदा की सास के बगल बैठीं कछियाने से आई लछिमन की अम्मा ने ही सबसे पहले बात उन्सारी-‘देख लओ रामदत्त  की अम्मा! बेटा भए पे ठकुरायन को मुँह कैसो दिपदिपाय रहो तो विचारी के दिन फिर गए कहाका ने साँची ई कही है-‘ बिटिया जियायें दुःख बिटिया ब्याहें दुःख। बेटा जियायें सुख बेटा ब्याहें सुख...’ ‘ हाँ! साँची कह रही हो लछिमनू की अम्मा पहलौठी में बिटिया पैदा करके ठकुरायन के दिना बड़े कसाले में कटे हैं। ...न मायके में दर न ससुरार में!! सुन्यौ है अपना ठाकुर हू नशा करके रोज़ रात ठकुराइन की धुनाई देत तो, ‘ ससुरी जे धिधरियाँ पैदा कर-कर कैं धरत जाय रही हैं, कौन-कौन के द्वार पे नाक रगड़ेंगे इनके रिश्ते के काजैं...दारी पे तमाखू धरकें या खटिया के पाये के नीचें दबाय कैं नहीं मारी गईं। मद उतर जाता तो ठाकुर मोंड़ियन के भोले मुख देखकें उन्हें इकठौरी कर गरे से लगाकर रोता भी सुना है-कोट नवें,पर्वत नवें,बाबुल कौ सिर तब नवै जब घर साजन आवें!!! क्या करे विचारा लाचार था ठाकुर...।‘तभी सबसे पीछे चमार टोला से आई बिरखे की लुगाई भी इनकी बातें सुनकर थोड़े और आगे सरक आई थी। उसने धीरे से इसमें एक नई बात और जोड़ दी-‘ बहन! अपने गाँव के ठाकुर तो हू भले हैं। मेरे श्यौपुर में तो इनको एक गाँव ऐसो है, जहाँ अबै तक काऊ दूसरे गाँव की बरात नहीं चढ़ी!! मोड़ियन की होते ई घिटी मसक देत हत्यारे!!! फिर बहुँए भलेई ले आये माराष्ट-बिहार ते बा में इनके कुल की नाक नीची नई होत...’ आगे-पीछे सारी जाजिम स्तब्ध।

इन बातों को कहने-सुनाने का कोई मकसद नहीं था, ना ही यह बाते आगे बैठी चँदा को सुनाकर कहीं गईं थीं,पर उसने यह बातें अच्छी तरह से सुन ली थीं। ...सुनी तो उसने रात में अपने पटवारी जेठ और सास द्वारा पति को अपने कमरे में बुलाकर चुपचाप कही यह बात भी है-‘ रामदत्त  बहू की महतारी के पहलौठी में जा समेत तीन मोड़ी ई मोड़ीं भई हैं सो हमें पूरा-पूरा-अंदेशा है कि बहू के हू पहलौठी में मोड़ी ई होवेगी, कल तैं धौलपुर जायके बहू की सोनोग्राफी काराय लिया मोंड़ी होय तो वहीं... अपने पोस्से-मुरैना में तो भारी कड़ाई है...और न इतनी अच्छी सुविधा.’  चँदा के मन में तब से ही एक गहरी फाँस बैठ गई है। उसे लगता है जैसे कोई उसके प्राण खींच रहा हैं। कोई उसके मन का सबसे सुन्दर और शुभ चुराना चाहता है। छीनना चाहता है उसके हिस्से की प्यास। निचोड़ लेना चाहता है उसकी आत्मा का रस।... मानो वह हजारों-हजार नख-दंत वाले मादा-भक्षी हिंसक जानवरों में आ फँसी हो।...

हाँ चँदा का कोई भाई नहीं है। जो हुआ था वह तमाम इलाज़ के बाबजूद बचाया नहीं जा सका। समाज में बिना भाई की बहन और नठिया बाप की बेटी होने का लाँछन सुनते-सहते चँदा और उसकी बहने बड़ी हुई हैं । उसकी माँ पति के वंश को एक कुलदीपक न दे पाने की हीनग्रंथि के चलते सार्वजनिक पर्व-उत्सव और नाते-रिश्तेदार से कब का कनाव काट बैठी है।... घर में यदि किसी ने हार नहीं मानी तो उसके सहृदयी किन्तु दृढ़ निश्चयी दद्दा ने, जिन्होंने माँ के सहयोग से अपनी तीनों बेटियों की परवरिश कुछ इस तरह से की कि चँदा को फिर कभी किसी भाई की ज़रूरत महसूस नहीं हुई थी। दद्दा ने किसी के लाड़ले बेटों की तरह ही उसे मुरैना से लेकर ग्वालियर तक पढ़ाया और अपने साथ पढ़कर ही टीचर बने लड़के के संग उसी की मर्जी से शादी भी कर दी थी।ब्याह में “ ‘भतैया’ लेते समय एक बिन भैया की बहन कुँअल ठाड़ी रौवे,  जैसे अँसुआ ढरकाऊ गीत और भाँवरों के समय “मड़यै के नीचे बरातियों से-सारे बिना सूनी ससुरार “ जैसी मन फटाऊ लोकोक्ति सुनकर शर्मिन्दा हुए पति को देख द्रवित हुई चँदा ने जब अन्य लड़कियों की भाँति विदा के समय अपने दद्दा के गले लग हिलक कर रोना चाहा था। तब दृढ़-निश्चयी पिता ने उसे उसी समय बरज दिया था- “ बेटा! रोना निबल की निशानी है, और तुम तो हमारी नाहर हो काहे रोतीं!! भीख सा माँगकर जो भात-पछ भैया से लेतीं और भौजाई के ताने सुनतीं,बाकी भरपाई तो हमने तुम्हें अपनी संपत्ति का वारिस बनाकर पहले ही पूरी किए देत हैं। ...हम जब तक जिन्दा हैं तब तक हम तिहारे नीके-बुरे में शामिल हैं ई और मर गए तब हमारी जाजाइत तिहारे संग रहेगी ही!!! ...और बेटा! दुनिया में धन-दौलत नाते-रिश्तेदार तो आदमी के संग-साथ होते भी है और नहीं भी, मनुख का सबसे गाढ़ा सगा और संपत्ति  तो उसके अपने मन का भरोसा है, उसे बनाये रखियो.” 

पर चंदा के मन का वह भरोसा आज टूट क्यों रहा है ? क्यों वह उसी समय अपने जेठ से प्रतिवाद नहीं कर सकी कि “ दादा! बेटी-बेटा सब बराबर होते हैं, ईश्वर हमें जो देगा उसे अपना आँचल पसार कर ले लेंगे।...जब दोनों एक ही माँ-बाप के रक्त-बिन्दु से पैदा होते हैं और दोनों एक ही हाड़-माँस-मज्जा से बने फिर यह दुभाँति क्यों...”  क्यों आज वह इस उत्सव की रंगीनियों में अपने मन का भरोसा खोये दे रही है। ...एक स्त्री के लिए केवल पुरूष पैदा करना ही यदि दुनिया का सबसे बड़ा गौरव है, तो यह गौरव उसे अस्वीकार क्यों नहीं ! माँटी मिल गई उसकी सारी पढ़ाई-लिखायी। व्यर्थ गया उसका शिक्षक बनना। चँदा मन ही मन रो पड़ी थी। कुछ देर बाद पता नहीं फिर  मन में क्या आया कि वह सास की आज्ञा लिए बगैर ही वहाँ से उठ खड़ी हुई और घर के लिए चल दी थी।... ठाकुर हर प्रसाद का आँगन तब तक पुत्र जन्म के अवसर पर बँटने वाले लड्डुओं की महक और नई कटोरियों की खनक से भर चुका था। चंदा को यों एकाएक चुपचाप उठकर जाता देख जाजिम पर वहाँ बैठी रह गईं अन्य स्त्रियों से न रहा गया। उन्होंने उसे लक्ष्य करते हुए इस अवसर पर गाया जाने वाला यह सौहर छेड़ दिया था-
‘अबै तो मेरे धिय नहीं जनमी
जनमें आछे लाल.............!
अबै तो मेरी दौरानी बड़ी जू
तुम काहे कों रूठी जाओ
अबै तो मेरे मायके के हरवा
सो लयें घर जाओ..........!
अबै तो मेरे धिय नहीं जनमी
जनमें आछे लाल............!

कोई और होता तो सखियों की इस चुहल और गीत की आत्मीयता देखकर मगन मन वहीं फिरक लेकर नाच उठता, पर चँदा ने ऐसा नहीं किया...। उसने अपनी धोती के ऊपर ओढ़ रखी चदरिया को थोड़ा और ठीक किया, द्वार से सटकर रखे सेंडिल पहने और आगे बढ़ गई थी। चंदा की सास को उसका इस तरह उठकर जाना अपना कम ठकुराइन और वहाँ बैठे सखी समाज का अपमान ज्यादा लगा। वह वहीं से खड़े होकर चिल्लायी थी- “ बहूऽऽ नेक और रुक जाऽ हमहू तो चल रहे?थोड़ी ही देर की तो बात हैं बटौना तो ले लें...” पर उसने नहीं सुना। सास ने सबके सामने बहाना बनाया- “घर कौ पूरो काम-धाम करकें स्कूल पढ़ाइवे जात है बैठें-बैठें चक्कर आने लगे होंयगे...।“  तब औरों की अपेक्षा सहज विश्वासी हर प्रसाद की काकी ने आँगन से चलकर पौर तक जा पहुँची चँदा को लड्डुओं से भरी नई कटोरी हाथ में ले जाकर थमा दी थी- “ बहूऽ जे का अनर्थ करती हो अपनो बायना तो लेके जाओ...।“  चंदा ने बगैर किसी प्रति-प्रश्न के काकी का मान रखते हुए मुस्करा कर कटोरी हाथ में ले ली , “ ऐसी कोई बात नहीं है आजी! बैठे-बैठें मूँड़ में घुमेर उठी सो चल दए...।“ काकी ने भी उसकी मज़बूरी समझकर क्षमा कर दिया था-“ जाओ बेटा! घरे आराम करो...पेटहूली जनीमान्स के संग जे समस्या आवत ई है --राम करे दूधो हनाओ पूतों फरौ...!” चंदा के मन में काकी के इस निरापद स्नेह और आशीष पर एक साथ श्रद्धा और घृणा जागी!!! जिसमें से उसने एक को दबाकर गाँव की उस सम्मानीय वृद्धा को प्रणाम किया और अपने में ही खोई वहाँ से चलकर गली में निकल आई थी।

“द्ददा! क्या बेटे अपने मैया-बाप को साँचे हू मोक्ष दिवात हैं...”  उसने एक दिन बातों ही बातों में अपने द्ददा से यह प्रश्न पूछ धरा था। तब उसके द्ददा ने बड़े ही व्यंग्यात्मक रूप में हँसते हुए उसे समझाया  “ नहींऽ री! यह सब चतुरन के चोचले हैं, मद्द को जनी से बड़ा बनाये रखने की चाल! ...जो ईसुर को नहीं मानत वे कहत हैं कि मनुख के करम परछाँही की नाईं सदा उसके पीछे लगे रहत हैं वह उसका फल यहीं पाता है न कहूँ सरग है और ना नरक.!! ...जई बात दूसरी तरह से ईसुरवादी भी मानत हैं कि यह सिंसार करम पिरधान है, जो जैसे करम करता है ईसुर उसे वैसा ई फल देता है!!! ...जब कोई किसी के करमन का भागी ही नहीं फिर उसका बेटा मोच्छदाता कैसे हुआ री” चँदा ने तभी से यह बात अपनी गाँठ बाँध ली है। द्ददा द्वारा समय-समय पर उसके मन के ज़िरह-बख्तर में इस तरह के विचारों की जो छुरी-कटारियाँ खोंसी गई थीं, अब तक वह उन्हीं से अपना बचाव करती आई है। रात में जेठ द्वारा पति को रामचन्द्र जी की तरह आज्ञा देते और उस आज्ञा को पति द्वारा लक्ष्मण-भरत भाईयों की तरह शिरोधार्य करते उसे कार्यरूप रूप में परिणित करने को तत्पर देखा है। चँदा को तभी से अपने प्रिय द्ददा और उनके द्वारा कही वे बातें ही याद आ रही हैं। बड़ा भरोसा है उसे अपने द्ददा की बातों पर।

रास्ते में किस का घर पड़ा, किसने देखा और किसने टोका, चँदा को इसका कुछ भान नहीं था। ...पेट में अपने होने का अहसास कराते नये मेहमान की चिंता उसे साल रही थी। वह हर कीमत पर उसे बचाना चाहती है। इससे क्या फर्क पड़ता है कि वह बेटा है या बेटी, वह हर स्थिति में उसकी अविभावक है। वह उसकी हत्या नहीं होने देगी। वह उस हर शख्स से लडे़गी, जो उसकी कोख में पल रहे अंश को जरा सी भी क्षति पहुँचाने की चेष्टा करेगा...! यह चंदा नहीं उसके मन का भरोसा बोल रहा था। उस भरोसे में बैठे बोल रहे थे उसके अपने द्ददा, जिन्होंने उसके साथ कभी कोई दुर्भाव नहीं किया। ...फिर भला वह अपनी औलाद के बीच दुभाँति कैसे होने दे !    
इस उधेड़-बुन में  उलझते-सुलझते जाने कब घर आ गया, चँदा को पता ही नहीं लगा। द्वार के सामने गली में लगे हेंडपम्प पर मोटर साइकिल धोकर पोंछ रहे पति ने जब हाथ में लड्डुओं की कटोरी लिए चली आ रही चँदा को देखा,तो उसकी आँखें में एक अजीब तरह की चमक थी। वह प्रसन्न होकर बोला- “चलो अच्छा हुआ तुम आय गईं तुम्हें टिराने अभिहाल लोहरी जिज्जी को हम पहुँचाय ई रहे थे . अम्मा तो जहाँ जायेंगी वहाँ मेल के ही रह जाती हैं--हमें अभईं धौलपुर चलना है”
“ नहीं...”

पति ने जिस स्नेह,लगाव और दृढ़ता के साथ अपनी बात कही, चँदा ने ठीक उसी प्रकार निर्विकार होकर अपना पक्ष रख दिया था। चँदा की कत्थई बनारसी साड़ी के भीतर आत्मविश्वास और दृढ़ता परिपूर्ण गोरे मुख से प्रस्फुटित तेजोदीप्त आलोक ने घूँघट से बाहर का सारा वातावरण अपने प्रभाव में ले लिया था।
दो घर दूर पाँच नुकरिया बेटों के होते हुए भी गाँव में अकेली और बेसहारा रह रहीं बूढ़ी राधा काकी अपनी सूनी देहरी पर बैठीं-बैंठी गौरैयों को चुगा चुनाती एक पुराने गीत की कड़ी दोहरा रहीं थीं-

“घी बिन होम दहीं बिन टीका सो धीय बिनु धरम न होंय”
 कि हाँ जू धिय बिन धरम न होंय...!”

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