मजदूर-वर्ग के दृष्टिकोण से स्त्री-मुक्ति : १५-१६ नवम्बर,२०१४, गाँधी- आश्रम , सेवाग्राम, में दो दिन का कार्यशाला


विषय प्रवेश:

आज विश्वस्तर पर महिलाओं की स्थिति को समझने के लिए
हमें गहरे विश्लेषणात्मक साधनों की आवश्यकता नहीं है. यह स्पष्ट है कि सबसे अच्छे स्थिति में महिलाएं आज  दोयम दर्जे की नागरिक हैं एवं सबसे बदतर स्थिति में बलात्कारी पुरुषों के हवस की सामग्री हैं! स्त्री एवं पुरुषों के बीच श्रम का सामाजिक विभाजन, यही स्त्रियों की गुलामी की स्थिति के केंद्र में है,जिसकी अभिव्यक्ति शारीरिक हिंसा, सामजिक अलगाव एवं लिंग-भेद आधारित थोपी गई भूमिकाओं को वैधता प्रदान करने में होती है.



निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्रों में जनवादी अधिकारों के सन्दर्भ में महिलाएं आज बड़े पैमाने पर पुरुषों के द्वारा बनाये गए नियमों के अधीन हैं.आज की स्थिति में महिलाओं के लिए विवाह तथा वेश्यावृत्ति के  बंदीशाला से छुटकारा पाना कठिन हैं, क्योंकि ऐतिहासिक रूप में  वे मजदूर वर्ग के भीतर एक अधीनस्थ  भूमिका निभाते हैं एवं ‘परिवार’ अथवा घरेलू /पुनरुत्पादन के क्षेत्र में बिना मजदूरी के काम करने के लिए मजबूर हैं. इस सन्दर्भ में पूंजीवाद ने एक साथ  दो काम किये हैं---आधुनिक कारखानों एवं अन्य कार्यक्षेत्रों मे स्त्रियों   को काम देकर एक ओर उनकी आर्थिक परिस्थिति में सुधार लाया है तो  दूसरी ओर उनके शोषण-उत्पीडन में बृद्धि की है, और साथ ही मुक्ति के लिए उनके अपने प्रयासों को  हिंसा के जरिये कुचलने का प्रयास किया है ,क्योंकि परिवार एवं पूंजी के खिलाफ स्त्रियों का संघर्ष ‘उत्पादन’ एवं ‘पुनरुत्पादन’ क्षेत्र के विभाजन को समाप्त करने का संघर्ष है. पूंजीवादी उत्पादन पद्धति (CMP) ने परिवार नाम के संस्था का कायापलट करने ,अर्थात नकारात्मक  ढंग से नष्ट करने में भी सफल रही है—जिसका खामियाजा स्त्रियों  को ही अधिक भुगतना पड़ रहा है –जो अक्सर बच्चों के साथ अकेले छोड़ दी जाती हैं.

विकसित पूंजीवादी देशों में (अर्थात पूंजी के केन्द्रों में) स्त्रियों को बड़े पैमाने
पर वेतन-व्यवस्था में शामिल कर लिया गया है-जहाँ घरेलू  काम का आंशिक रूप में सामाजिकरण एवं मशीनीकरण किया गया है, जिसके फलस्वरूप इन देशों के स्त्रियों को पूंजीवादी उत्पादन पद्धति के अंतर्गत कुछ हद तक “स्वतंत्रता” एवं “समानता” मिली है; उदहारण के लिए मजदूर वर्ग की  स्त्रियों को विवाह न करने की आजादी मिली है(बावजूद इसके कि उनमे गरीबी का प्रमाण अधिक है) अथवा पूंजीपति वर्ग की स्त्रियों को बड़ी कंपनियों के संचालन का मौका मिला है.लेकिन मजदूरी के क्षेत्र में आम तौर पर स्त्रियों  को निचले दर्जे का काम दिया जाता है, जहाँ औसत मजदूरी पुरुषों के मुकाबले कम से कम २० प्रतिशत कम है.दूसरी ओर स्त्री होने के नाते इन महिलाओं को आज भी घरेलू  काम का अधिकतम बोझ उठाना पड़ता है, जिसका अर्थ यह है कि उन्हें डबल ड्यूटी करनी पड़ती है,साथ ही पूंजीवादी समाज में स्त्रियों को पुरूषों के द्वारा उनके शरीर, मन, लैंगिकता के वस्तुकरण, बाजारीकरण के साथ  समझौता करना पड़ता है. उन्हें आज भी रोजाना परिवार के भीतर एवं परिवार के बाहर, ‘कार्यक्षेत्रों’ में एवं सम्पूर्ण समाज में हिंसा का सामना करना पड़ता है.



छोटे शहरों में एवं ग्रामीण क्षेत्रों में(अर्थात पूंजी के सीमान्त क्षेत्रों में)  स्त्रियों को मजदूर एवं स्त्री होने के नाते बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है.विवाह-बंधन को स्वीकारने के लिए वे अत्यधिक सामाजिक एवं आर्थिक दवाव में होती हैं, अक्सर ऐसे पुरुषों के साथ ,जिन्हें उन्होंने खुद नहीं चुना है. इस वजह से वे परिवार की ‘इज्जत’ एवं अपनी ‘पवित्रता’(सतीत्व) बनाये रखने के लिए हमेशा सामजिक दबाव में रहती है. अक्सर उन्हें गर्भ-धारण,गर्भ-निरोध,गर्भपात के मामले में निर्णय लेने की आजादी नहीं होती.आज सम्पूर्ण विश्व में स्त्रियों को शारीरिक हिंसा का शिकार होना पड़ता है.यहाँ तक कि बड़े पैमाने पर वे हत्या के शिकार होते हैं, अक्सर जन्म लेने के साथ ही.शिक्षा के क्षेत्र में उन्हें कम अवसर प्राप्त है; आर्थिक स्वायत्तता उन्हें आज तक नहीं मिल पाई है.
केवल पूंजीवादी समाज में ही नहीं,बल्कि प्राक-पूंजीवादी समाजों में भी स्त्री गुलाम थी.वास्तव में स्त्रियों की गुलामी मानवजाति के शुरूआती दौर से ही,अर्थात जबसे स्त्री-पुरुष के बीच पहला श्रम-विभाजन ने मानवजाती के पुनरुत्पादन प्रक्रिया  में अपना घर बना लिया है-तबसे मौजूद है. ‘परिवार’ इस संस्था ने स्त्री-पुरुष के बीच इस श्रम-विभाजन को अधिक मजबूती प्रदान की है.

पूंजीवादी उत्पादन पद्धति के भीतर स्त्री का मजदूर के रूप में शोषण एवं स्त्री के रूप में उत्पीडन विशिष्ट स्वरुप अख्तियार करता है.इसलिए आवश्यक यह है कि विभिन्न कार्यक्षेत्रों में स्त्रियों  की स्थिति      (शिक्षा,ट्रेनिंग,काम का विभाजन,मजदूरी का स्तर, श्रेणी विभाजन इत्यादि) ) पर हम विशेष रूप में ध्यान दें. साथ ही परिवार संस्था(अर्थात विवाह,यौन-जीवन,गर्भ-धारण/गर्भ-निरोध,घरेलु काम,बच्चों का पालन-पोषण, इत्यादि) पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है. इनके आलावा,उत्पादन-पुनरुत्पादन की महत्वपूर्ण प्रक्रिया की ओर भी ध्यान देने की आवश्यकता है कि इनके बीच किस तरह के परस्पर सम्बन्ध हैं, ताकि हम पूंजीवाद के भीतर स्त्रियों  की स्थिति को ठीक से समझ सकें. साथ ही इस बात को ध्यान में रखते हुए कि पूंजीवादी उत्पादन पद्धति ने स्त्रियों की स्थिति को हर जगह एक जैसा नहीं बना दिया  है, विभिन्न देशों में स्त्रियों  की स्थिति पर विस्तृत अध्ययन की आवश्यकता है, ताकि हम उनके उत्पीडन के विशिष्ट स्वरूपों को समझ सके--जैसे उदहारण के लिए भारत में,जहाँ जाति-प्रथा के चलते स्त्रियों के उत्पीडन को एक विशेष आयाम मिला है.

कम्युनिस्ट दृष्टिकोण से हमारी मान्यता यह है कि स्त्रियों की मुक्ति (एवं सम्पूर्ण मानव समाज की मुक्ति) पूंजीवादी उत्पादन पद्धति  के भीतर हासिल नहीं हो सकती—बावजूद इसके की इस उत्पादन पद्धति के भीतर कुछ सकारात्मक परिवर्तन दिखाई देती है. हम भी इनेस्सा अरमंड(रूसी कम्युनिस्ट क्रन्तिकारी) के साथ कह सकते  हैं: “अगर कम्युनिज्म के बिना स्त्री-मुक्ति संभव नहीं है ,तो स्त्री-मुक्ति के बिना कम्युनिज्म भी असंभव है”.लेकिन कम्युनिस्ट क्रांति अथवा पूंजीवाद का खात्मा अपने आप में समस्या का समाधान नहीं है ,क्योंकि पूंजीवाद के पहले भी स्त्रियों का उत्पीडन मौजूद था. एक उत्पीडित समूह के रूप में स्त्रियों को स्त्री-मुक्ति के इस निरंतर संघर्ष को अपने कन्धों पर लेना है.इस संघर्ष में उन्हें अपने पुरुष सहयोगिओं को भी साथ में लेना होगा और कभी उनके खिलाफ संघर्ष भी करना पड़ेगा, क्योंकि पुरुषों में  स्त्रियों की अधीनता की स्थिति का फ़ायदा उठाने की वृत्ति मौजूद रहती है. स्त्रियों की आज़ादी सम्पूर्ण मानव समाज की मुक्ति का मार्ग है.


चर्चासत्र

१५ नवम्बर :

सत्र १:   स्त्री-पुरुषों के बीच लैंगिक एवं सामाजिक श्रम-विभाजन के मद्देनजर, आदिम साम्यवाद एवं वर्गीय समाज के उदय के सन्दर्भ में, स्त्रियों के उत्पीडन के आदि-कारण(उद्गम) को मार्क्स,एंगेल्स की  कृतियों  के आधार पर कैसे समझें? 

सत्र २:   स्त्रियों के शोषण एवं उत्पीडन  के  स्वरुप निर्धारण में पूंजीवादी उत्पादन पद्धति (CMP) की विशेषताएँ क्या है? मार्क्सवादी अर्थनीति के निश्चित विचार-प्रणाली के मुताबिक पूंजीवाद ने कार्यक्षेत्र में एवं परिवार में स्त्रियों की स्थिति पर   क्या असर डाला है एवं आज भी डाल रहा है? श्रम-शक्ति के पुनरुत्पादन एवं  मूल्य तथा अतिरिक्त मूल्य के पूंजीवादी उत्पादन, इनके बीच क्या रिश्ता है? दुसरे शब्दों में पूंजीवादी उत्पादन पद्धति किस तरह स्त्री-मजदूरों का उपयोग करती है (उदहारण  के लिए “अतिरिक्त श्रम” के बतौर) जिसका प्रभाव मजदूरी के स्तर पर पड़ता है? एक पृथक घरेलु क्षेत्र की मौजूदगी किस तरह पूंजीवादी उत्पादन पद्धति (CMP) को फ़ायदा पहुंचती है, जहाँ ‘श्रम-शक्ति का पुनरुत्पादन’ मुफ्त में होता है?

१६ नवम्बर :

सत्र १:  भारत में कार्यक्षेत्रों एवं परिवार में स्त्रियों की स्थिति क्या है? मजदूरवर्ग, पूंजी-पति वर्ग एवं उच्च-जाति की स्त्रियों के अनुभवों में भिन्नता एवं साम्य क्या है? पुनरुत्पादन क्षेत्र के नियमन के लिए राज्य की भूमिका क्या है? क़ानूनी एवं आर्थिक साधनों के जरिये स्त्रियों की शोषित उत्पीडित परिस्थिति को बनाये रखने में राज्य की भूमिका क्या है? स्त्रियों के खिलाफ हिंसा से पूंजीवादी उत्पादन पद्धति किस तरह लाभान्वित होती है? इस विषय पर राज्य की क्या प्रतिक्रिया होती है?

सत्र २:  क्या हम २०१२ भारत में उभरे बलात्कार-विरोधी विशाल आन्दोलन( जो आज भी जीवित है ) को क्रन्तिकारी जनवादी आन्दोलन कह सकते हैं? राज्य पर दबाव डालने के दृष्टि  से इस तरह के आन्दोलन  क्या अवसर प्रदान करते हैं एवं इन आन्दोलनों की सीमारेखा क्या है? अंतिम प्रश्न: स्त्रियों के उत्पीडन को समाप्त करने के लिए कौनसे कदम उठाने होंगे एवं किस तरह हम स्त्रियों को स्वतंत्र रूप से एवं वर्गीय आधार पर संगठित होने में मदत कर सकते हैं?

स्त्री -मुक्ति एवं मजदूर-मुक्ति के लिए कार्यरत सभी (स्त्री एवं पुरूष) कार्यकर्ताओं को हम आगामी १५-१६ नवम्बर २०१४ को सेवाग्राम में आयोजित इस दो-दिवसीय कार्यशाला में आमंत्रित करते है.दो-दिन का यह चर्चासत्र यात्री निवास, गाँधी-आश्रम, सेवाग्राम में १५ नवम्बर सुबह १० बजे शुरू होगा एवं १६ नवम्बर शाम ५ बजे तक जारी रहेगा.इस आमंत्रण-पत्र  में  उल्लेखित विभिन्न पहलूओं पर जो साथी पेपर भेजना चाहेंगे उनसे अनुरोध है कि वे अपना पेपर १५ अक्टूबर तक हमारे पास भेजने का कष्ट करें. दो दिन के इस कार्यशाला को आयोजित करने में जो खर्च आयेगा उसे सभी साथिओं को मिलकर उठाना है.

मजदूर-वर्गीय राजनीति पर सेवाग्राम--नई दिल्ली चर्चासत्र आयोजन समिति.
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