स्वप्न भी एक शुरुआत है

राजीव रंजन गिरि
युवा आलोचक राजीव रंजन गिरि इन दिनों ' अंतिम जन' के सम्पादन से जुड़े हैं. संपर्क : 09868175601,rajeev.ranjan.giri@gmail.com
वह बार -बार भागती रही
बार -बार हर रात एक ही सपना देखती
ताकि भूल न जाये मुक्ति की इच्छा
मुक्ति न भी मिले तो बना रहे मुक्ति का स्वप्न
बदले न भी जीवन तो जीवित बचे बदलने का यत्न

कवि अरुण कमल की एक कविता है - स्वप्न। इस कविता में एक औरत बार-बार ससुराल से भागती है। मार खाकर। कभी किसी मंदिर की सीढ़ी पर घंटों बिताती है। फिर अँधेरा होने पर उसी जगह लौट आती है। कभी किसी दूर के सम्बन्धी या परिचित के घर दो-चार दिन काटती है। कभी अपने नैहर चली जाती है। पर हफ्ता-महीना भर बाद, थक कर, उसी जगह लौटती है। बेहतर होगा यह कहना कि उसे हर बार लौटना पड़ता है। यह उसकी विवशता है। यह भी याद रखने की बात है कि वह हर बार मार खाकर ही भागती है और लौटने पर भी मार खाती है। तो क्या इस स्त्री को अपनी ट्रैजिक नियति का पता नहीं है? कविता बताती है कि उसे बखूबी पता है कि मार खाने के बाद जहाँ से भागती है, बार-बार उसे वहीं लौटना है। साथ ही लौट कर फिर मार खाना है। जानती थी वो कहीं कोई रास्ता नहीं है / कहीं कोई अंतिम आसरा नहीं है / जानती थी वो लौटना ही होगा इस बार भी। फिर भी भागती है। उसके यहाँ से गंगा भी ज्यादा दूर नहीं थी। रेल की पटरियाँ भी पास थीं। पर वह अपनी ट्रैजिक नियति को जानते हुए भी कि उसे फिर लौटना पड़ेगा, और मार खाना पड़ेगा, भागती है। कुछ दिन के लिए ही सही। वह मरण का वरण नहीं करती। आत्महत्या का रास्ता नहीं अख्तियार करती। लिहाजा गंगा नदी का ज्यादा दूर न होना या रेल की पटरियाँ पास होना उसके लिए कोई विकल्प नहीं रचता। मार खाने से बचने के लिए जीवन को समाप्त करना उसे गवारा नहीं है। क्योंकि वह बार-बार जीवन से मृत्यु नहीं, मृत्यु से जीवन के लिए भाग रही थी। भागती भी है तो खूँटे से बँधी बछिया-सी जहाँ तक रस्सी जाती, भागती / गर्दन ऐंठने तक खूँटे को डिगाती। आखिरकार वह औरत किस खूँटे से बँधी है, जिसे उखाड़ने की बार-बार असफल कोशिश करती है। गौर करें गर्दन ऐंठने तक कोशिश करती है और उस खूँटे को उखाड़ भले न पाये पर डिगा देती है। गर्दन ऐंठने तक कोशिश करना मानीखेज है। धीरे-धीरे यह खूँटा जड़ से उखड़ भले न पाये, टूटेगा जरूर। क्योंकि वह औरत बार-बार हर रात एक ही सपना देखती है। ताकि भूल न जाये मुक्ति की इच्छा। सपना है - मुक्ति न भी मिले तो बना रहे मुक्ति का स्वप्न और बदले न भी जीवन तो जीवित बचे बदलने का यत्न।


इस कविता में, जहाँ से वह औरत मार खाकर भागती है, वहीं उसे बार-बार लौटना तथा मार खाना पड़ता है। जाहिर है, यह उसकी ससुराल है। इसके लिए अरुण कमल ने 'घर' या 'परिवार' शब्द का प्रयोग नहीं किया है। क्या यह अनायास है? जबकि शादी के बाद, इस सामाजिक संरचना में, यही उसका 'घर' है या 'परिवार' भी। इस कविता में 'घर' शब्द एक बार आया है। जहाँ वह दो-चार दिन काटती है। कभी किसी दूर के संबंधी या किसी परिचित के घर। जाहिर है, यहाँ भी वह अपनी जिन्दगी के दो-चार दिन ही सही, जीती नहीं, काटती है। कभी भागकर नैहर जाती है। पर यहाँ भी कितने दिन के लिए? हफ़्ता या महीना। वहाँ से भी थककर लौटती है। आशय यह कि पीहर में भी जिन्दगी के कुछ दिन ही काट पाती है। भले ही परिचित या किसी दूर के रिश्तेदार के घर की तुलना में कुछ ज्यादा दिन। थक कर लौटना दो बातों की तरफ इशारा करता है। एक, जिन्दगी जी नहीं गयी है, काटी गयी है। दो, जो संरचना मौजूद है उसमें, उसके लिए नैहर अब विकल्प नहीं रह गया है। चाहे जो हो, उसे ससुराल में ही 'निबाहना' है। इस सामाजिक ढाँचे में माना यह जाता है कि डोली नैहर से उठी है तो अर्थी ससुराल से उठेगी। ऐसे में, वह ससुराल जहाँ बार-बार पीटी जाती है, शब्द के सच्चे मायने में 'घर' या 'परिवार' हो सकती है? हरगिज नहीं। वह उस स्त्री के लिए 'जगह' भर ही है। 
सावित्री बाई फुले
न तो 'घर' महज छत के नीचे का बसेरा है और न ही 'परिवार' - कुछ लोगों के साथ भर रह लेने वाली व्यवस्था। जब तक आपसी संवेदनात्मक रिश्ता और उससे पैदा होनेवाली ऊष्मा मौजूद नहीं हो, उसे 'घर' या 'परिवार' की संज्ञा नहीं दी जा सकती। आखिरकार, जब वह जगह 'घर' और वहाँ के लोग 'परिवार' नहीं हैं, तब वह वहाँ क्यों है? वह किस 'खूँटा' की मजबूत रस्सी से बँधी है जिसे गर्दन ऐंठने तक उखाड़ने या तोड़ने की हर बार कोशिश करती है? कहना न होगा कि यह खूँटा पितृसत्तात्मक व्यवस्था है। याद रखें पितृसत्तात्मक व्यवस्था के मायने परिवार में पुरुष का सिर्फ मुखिया होना नहीं है। यह महज इतना ही होता तो इसका 'खूँटा' कब का उखड़ चुका होता या इसकी 'रस्सी' टूट गयी होती। क्या यह कहने की जरूरत है कि इस ढाँचे की रचना धूर्तता और चालाकी के साथ की गयी है और आज भी हो रही है। आर्थिक, धार्मिक, राजनीतिक, वैधानिक, सांस्कृतिक व्यवस्था और मूल्यों-मर्यादाओं, संस्कारों, आदतों तथा चिंतन के विभिन्न रूपों, विचारधाराओं, निर्मितियों, गतिविधियों के जरिये बड़े महीन ढंग से रची-बुनी गयी है पितृसत्ता। इन सबके जरिये पितृसत्ता पुरुष को औरत की तुलना में श्रेष्ठ स्थापित करने का पाखंड रचती और फैलाती है। इसमें सफल भी हुई है।

इस कविता में स्त्री के पास कहीं कोई रास्ता नहीं है और कहीं कोई अंतिम आसरा भी नहीं। जाहिर है, उसे अपना रास्ता खुद बनाना है और अपना आसरा भी खुद ही बनना है। इस स्त्री को इसका बोध है। इस बोध और गहरी जिजीविषा ने इसे रेल की पटरी पर या गंगा में जाने से रोका है। लिहाजा, ससुराल से मार खाकर बार-बार भागना महज पलायन नहीं है बल्कि विकल्प रचने के लिए, रास्ता बनाने की प्रक्रिया की एक कड़ी है। इसके साथ ही पीटने की पीड़ा का अहसास होते रहने के लिए जरूरी कदम भी। इस पीड़ा का अहसास होना बेहद जरूरी है। बगैर इस अहसास के न तो मुक्ति का स्वप्न याद रहेगा और न ही जीवन को बदलने के लिए यत्न करने की अभीप्सा बचेगी। इस अभीप्सा के बगैर वह गर्दन ऐंठने तक बार-बार खूँटे को डिगाने की असफल ही सही, कोशिश नहीं कर पायेगी।

पितृसत्ता ने एक तरफ स्त्री को घर के अंदर कैद किया है और उसके घरेलू श्रम का अवमूल्यन किया है। दूसरी तरफ विभिन्न मूल्यों-मान्यताओं और संस्कारों के जरिये शोषण को सहज एवं स्वाभाविक मान्यता के रूप में मन-मस्तिष्क में बैठाने की कोशिश की है। इस कविता की स्त्री का आर्थिक तौर पर स्वावलंबी नहीं होना और विभिन्न संस्कारों का मकड़जाल, अपना आशियाना अलग बनाने से, रोकता है। इन वैचारिक जकड़बंदियों का दबाव ऐसा मजबूत है कि जहाँ तक रस्सी जाती है (यानी मंदिर की सीढ़ी, नैहर या किसी रिश्तेदार के घर तक) वहीं तक भाग पाती है। फिर ससुराल में लौटकर आना इसकी ट्रैजिक नियति है। लेकिन बार-बार, हर रात मुक्ति का जो स्वप्न देखती है, उसके जरिये रास्ता जरूर बनेगा, मुक्ति जरूर मिलेगी, जीवन जरूर बदलेगा। इस कविता पर किंचित विस्तार के साथ विचार करने की वजह यह है कि इसमें एक आम स्त्री के जीवन का यथार्थ है और साधारण स्त्री की मुक्ति-कामना के साथ, खतरा मोलकर अपनी गर्दन ऐंठने तक कोशिश कर, यूटोपिया रचने का साहस भी।
रुकैया शेखावत हुसैन
 'स्वप्न' शीर्षक कविता की मार्फत विचार करने की एक वजह है कि यह कविता जिस स्त्री के जीवन पर हो रहे पारिवारिक अत्याचार को अपना विषय बनाती है, वह 'स्त्रीवाद' का सिद्धांत पढ़कर अपनी मुक्ति-कामना से लबरेज नहीं है, बल्कि जीवन-जगत के यथार्थ से उसमें यह मुक्ति-कामना पैदा हुई है। यहाँ यह स्पष्ट कर देना जरूरी है कि अगर कोई स्त्री 'स्त्रीवाद' या स्त्री-मुक्ति से सम्बन्धित धारणाओं को पढ़-सुन या समझकर अपनी मुक्ति की कामना करती है या इसके लिए अग्रसर होती है तो यह अपराध नहीं, बल्कि अच्छी बात है। इसी में मुक्तिकारी अवधारणाओं की सफलता भी है। यह उन लोगों के लिए कहा गया है जो 'स्त्रीवाद' और उससे जुड़ी धरणाओं को बदनाम करने के मकसद से अनर्गल प्रलाप करते हैं और मानते हैं कि आम औरतों का इससे कोई लेना.देना नहीं है। यह कविता पढ़कर समझा जा सकता है कि इस औरत पर पितृसत्तात्मक ढाँचे का भी असर है। इस संरचना के दायरे में जन्म लेने और उसकी परवरिश होने की वजह से यह स्वाभाविक भी है। काबिलेगौर बात है - इस ढाँचे के भीतर रहते हुए उसका 'स्वप्न' देखना और उस स्वप्न के लिए 'यत्न' करना। यही स्वप्न और यत्न उसे मुक्ति भी दिलाएगा।

बहरहाल, दुनिया के प्रत्येक समुदाय, सभ्यता, धर्म और मुल्क में पितृसत्ता मौजूद है। नतीजतन स्त्रियों को पुरुषों की तुलना में कमतर मानने की रवायत है - अपवादस्वरूप भले ही कुछ इससे मुक्त हों। यह दीगर बात है कि इन सबमें पितृसत्ता का एक समान या सर्वमान्य रूप नहीं है। अपने अलग-अलग गुण, धर्म के साथ इसकी मौजूदगी बरकरार है। समय-समय पर इसने विभिन्न शक्तियों से नापाक गठजोड़ करके अपना रूप भी बदला है। इसीलिए अलग-अलग देश-काल में यह एक जैसा नहीं दिखता।

कुछ लोगों को लगता है कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था सामंतवादी संरचना की उपज है और सिर्फ इसी सामाजिक ढाँचे में मौजूद रहती है। जाहिर है, ऐसा मानने वालों की समझ है कि पूँजीवाद के साथ यह खुद-ब-खुद समाप्त हो जाएगी। ऐसा सोचने वाले लोगों में, वे भी शामिल हैं, जो पितृसत्ता को दरकते देख दुखी होते हैं और वे भी हैं जो पितृसत्ता की शोषणकारी, अमानवीय रूप से दुखी होकर इसे बदलना चाहते हैं। इसके पक्ष में दुखी होने वाले लोग पितृसत्ता को मजबूत बनाने की कामना करते हुए पुराने दिनों को याद करते हैं तथा पूँजीवाद और इसके साथ आए बदलाव को कोसते हैं। जबकि पितृसत्ता के चालाक समर्थक, नित्य हो रहे बदलाव से, किसी भी तरह गठजोड़ करके इसे बरकरार रखने का प्रयास करते हैं। पितृसत्ता की मौजूदगी से आहत उपर्युक्त श्रेणी के लोग पूँजीवाद की भूमिका से कुछ ज्यादा ही अपेक्षा पालते प्रतीत होते हैं।

इतना तय है कि पितृसत्ता सिर्फ सामंतवादी व्यवस्था में ही मौजूद नहीं होती। अगर ऐसा होता तो विकसित पूँजीवादी मुल्क में पितृसत्ता को पूरी तौर पर समाप्त हो जाना चाहिए था। तथ्य तो यह बताता है कि ऐसी संरचना में भी पितृसत्ता की मौजूदगी बनी हुई है, भले ही बदले रंग-ढंग में। इसका आशय यह नहीं है कि सामंतवाद और पूँजीवाद औरतों के मामले में, पितृसत्ता की मौजूदगी को लेकर, एक समान हैं। निश्चित तौर पर पूँजीवाद की भूमिका इस लिहाज से कई कदम आगे की है। इसने पितृसत्ता को एक हद तक चोट पहुँचायी है, बदला है, औरतों को आजादी मुहैया करायी है। पर पितृसत्ता में अपना हित दिखते ही पूँजीवाद ने इसके साथ गठजोड़ कर लिया। पितृसत्ता के सहयोग से औरतों के श्रम को कम करके आँका गया। इससे पूँजीवाद का हित सधता है। इसी तरह स्त्री-देह का मसला है। पूँजीवाद और इसके कई उत्पादों ने स्त्री-देह को, एक स्तर पर, आजाद करने में भूमिका अदा की। लेकिन दूसरे स्तर पर अपने हित के लिए पितृसत्ता से गलबहियाँ कर स्त्री-देह को महज पण्य में भी बदलने की कोशिश की। स्त्री-देह की मुक्ति जरूरी है। स्त्रियों को अपनी देह पर पूरा-पूरा अधिकार होना चाहिए। लेकिन इस देह-मुक्ति का नारा देकर स्त्री-देह को अपने लिए, सबके लिए, उपलब्ध करने की चालाकी भी हुई है। दूसरे शब्दों में कहें तो देह की आजादी पितृसत्तात्मक बंधनों, मूल्यों, मान्यताओं से होनी चाहिए। पूँजीवाद के जरिए कई कदम आगे तक स्त्रियों को देह पर आजादी मिली है। स्त्रियों में यह चेतना भी विकसित हुई है कि अपनी देह पर खुद का हक है। पर आजाद देह को पुरुष-भोग के लिए 'उपलब्ध देह' बनाने की कोशिश अंततः पितृसत्ता को चोर दरवाजे से लागू करने का ही प्रयास है। यहीं एक बात और। पूँजीवाद के विभिन्न उपकरणों, मीडिया आदि ने स्त्री-देह को खूब दिखाया और भुनाया है। घर की चारदीवारी से बाहर निकलकर सार्वजनिक जगहों पर जाना, अपने आप में स्त्री-मुक्ति की दिशा में बढ़ा हुआ कदम है। पर यह भी गौर करना होगा कि इस बाहर आने में क्या सिर्फ स्त्री-मुक्ति के यूटोपिया को यथार्थ बनाया जा रहा है? अथवा पितृसत्तात्मक संरचना अपने को नए रूप में ढालकर स्त्री-देह का वस्तुकरण कर रही है? संभव है इसके पक्ष में ऊपरी तौर पर स्त्री की मर्जी भी दिखे। पर सोचने की बात है कि इस 'मर्जी' को कौन-सी सत्ता परिचालित कर रही है, नियंत्रित कर रही है? लिहाजा पितृसत्ता की दहलीज को कुछ लाँघने के बावजूद स्त्री-देह किसके नियंत्रण में है, कौन-सी ताकत इस दिशा में ठेल रही है। इस पहलू को नजरअंदाज करके स्त्री-मुक्ति का न तो यथार्थ समझा जा सकता है और न ही यूटोपिया की रचना हो सकती है। दरअसल, ये सारी परिस्थितियाँ इतनी जटिलताओं से युक्त हैं कि इसका एक पक्ष देखकर न तो इसे सीधे खारिज किया जा सकता है और न ही इसका पुरजोर समर्थन। लिहाजा, पूँजीवाद या इसके विभिन्न उपकरणों को उनकी प्रगतिशीलता का वाजिब श्रेय भी देना होगा। साथ ही इसके 'मुनाफे' के लिए बने शोषणमूलक तंत्र की जटिलता और पितृसत्ता के साथ रिश्ते को समझते हुए मुखालफत भी करनी होगा।

सरिजिनी नायडू
 इन दो व्यवस्थाओं के अलावा समाजवादी / साम्यवादी मुल्कों में पितृसत्ता की क्या स्थिति रही? क्या यह बिल्कुल समाप्त हो गई? फिलहाल यहाँ इस पर बहस किए बगैर कि वे मुल्क कितने समाजवादी या साम्यवादी थे। यह सवाल इसलिए पूछा जाना जरूरी है, क्योंकि कुछ लोगों का मानना है, समाजवाद आते ही स्त्री-मुक्ति का मकसद अपने आप पूरा हो जाएगा।

असल में, 'आधार' और अधिरचना की यांत्रिक समझ के कारण ही कुछ लोग ऐसा समझते हैं। स्त्री-मुक्ति का सवाल ही नहीं बल्कि जाति के सवाल को भी काफी समय तक ऐसे ही देखा जाता रहा है। कुछ लोग स्त्री-मुक्ति (जेंडर के संदर्भ में) के सवाल को सिर्फ 'अधिरचना' से सम्बद्ध मानते हैं। ऐसे लोगों को लगता है कि 'क्रांति' के बाद जब 'आधार' ही बदल जाएगा तो अधिरचना का बदलना अवश्यम्भावी है। लिहाजा स्त्री-मुक्ति का प्रश्न ही नहीं बचेगा। पितृसत्ता बिल्कुल समाप्त हो जाएगी। ऐसे लोग 'आधार' के साथ पितृसत्ता के जटिल रिश्तों को नजरअंदाज करते हैं। जबकि कुछ लोगों को पितृसत्ता का भौतिक आधार ही ज्यादा दिखता है। लिहाजा, ऐसे लोग इसे सिर्फ 'आधार' से जुड़ा मानते हैं। इस समझ का प्रतिफलन इस रूप में विकसित होता है कि जब उत्पादन का सम्बन्ध बदल जाएगा, उत्पादन प्रक्रिया बदल जाएगी तो फिर स्त्री-मुक्ति तो अपने आप हो जाएगी। ऐसे में यह कहना जरूरी है कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था का भौतिक आधार और सांस्कृतिक अधिरचना दोनों के साथ चोली-दामन का रिश्ता है। एक को दूसरे पर तवज्जो देना इसके जटिल अंतर्संबन्धों को नजरअंदाज करना होगा। यह भी याद रखने की जरूरत है कि 'आधार' के बदलने मात्र से 'अधिरचना' भी पूरी तरह नहीं बदलती। आधार और अधिरचना के बीच इस तरह का सरल सम्बन्ध होता तो कई समस्याएँ खुद-ब-खुद मिट गयी होतीं। आधार और अधिरचना के द्वन्द्वात्मक सम्बन्ध को नजरअंदाज करके इनकी परस्परता को नहीं समझा जा सकता। बहरहाल, समाजवादी मुल्कों में गोकि पूर्णतः स्त्री-मुक्ति न हुई, पर स्त्रियों के हालात बेहतर हो गए थे। पूँजीवाद की तुलना में स्त्री-मुक्ति के लिए समाजवादी व्यवस्था ज्यादा माकूल है।

स्त्री-मुक्ति के यूटोपिया की रचना इसलिए भी ज्यादा जटिल है कि स्त्री की पहचान सिर्फ और सिर्फ स्त्री के तौर पर नहीं है। हो भी नहीं सकती। लिहाजा स्त्री की समस्याएँ भी कई स्तर भेदों से जुड़ी हुई हैं। स्त्री अपने आप में कोई 'वर्ग' नहीं है। स्त्री होने मात्र से सारी स्त्रियों की न तो सभी समस्याएँ एक हो सकती हैं और न सबका हित एक हो सकता है। हाँ, किसी-न-किसी रूप में सभी स्त्रियाँ शोषण का शिकार होती हैं। मसलन, अमीर स्त्री और गरीब स्त्री दोनों का शोषण होता है। पर एक वर्ग का न होने के कारण इनका साझा वर्गीय हित-अहित नहीं हो सकता। संभव है, अमीर स्त्री अपने परिवार, समुदाय में पितृसत्ता का शिकार हो और अपने वर्गीय हित में गरीब स्त्री का शोषण कर रही हो। दूसरे शब्दों में कहें तो जाति, धर्म, वर्ग के साथ स्त्री अपनी अलग 'कैटेगरी' भी बनाती है। तो क्या यह कहा जा सकता है कि सेक्स और जेण्डर के हिसाब से ऊपरी तौर पर समान होने के बावजूद ये स्तर-भेद 'सार्वभौम बहनापा' के मार्ग में अवरोध हैं? क्या इन स्तर भेदों को बिल्कुल नकारा जा सकता है? प्रसंगवश, स्त्री-मुक्ति विमर्शकारों के यहाँ 'सेक्स' और 'जेण्डर' एक नहीं है। अब हिन्दी में इसके अनुवाद की समस्या हो सकती है। इन दोनों का अनुवाद 'लिंग' करने से उनके साथ का अर्थवृत्त नहीं आ सकता और अवधारणा भी स्पष्ट नहीं हो सकती। लिहाजा जब तक उस अवधारणा को स्पष्ट करने वाला शब्द नहीं मिलता, तब तक सेक्स के लिए लिंग और जेण्डर के लिए जेण्डर का उपयोग करने में क्या दिक्कत है? कुछ अन्ध हिन्दी-प्रेमी दूसरी भाषा के शब्दों को बिल्कुल लेना नहीं चाहते। नतीजतन ऐसा शब्द बना देते हैं जो उस अवधारणा को स्पष्ट करने में कहीं से कारगर नहीं होता। गौरतलब है कि लिंग (सेक्स के अर्थ में) एक बायोलॉजिकल कंस्ट्रक्ट है और जेण्डर एक सोशियोलॉजिकल कस्ट्रक्ट। यानी सेक्स जैविक या प्राकृतिक होता है। जबकि जेण्डर जैविक या प्राकृतिक नहीं होता। जेण्डर की रचना विभिन्न सत्ताओं ने ऐतिहासिक रूप से सामाजिक, सांस्कृतिक मूल्यों, मान्यताओं के तौर पर किया है। मतलब कि स्त्री 'सेक्स' के लिहाज से पुरुष से भिन्न है। 'जेण्डर' की यह भिन्नता पितृसत्ता ने, अपने स्वार्थ के लिए, स्त्रियों को विभिन्न 'भूमिका' देने के मकसद से और कमतर ठहराने के लिए किया है। इस लिहाज से देखें तो 'सेक्स' और 'जेण्डर' में बड़ा फर्क नजर आएगा। पितृसत्ता ने 'जेण्डर' को भी प्राकृतिक, स्वाभाविक गुण के रूप में प्रचारित-प्रसारित किया है। स्त्री-मुक्ति इसी 'जेण्डर' से मुक्ति में है। बहरहाल, स्त्री-मुक्ति का यूटोपिया रचने वालों को स्त्री के स्तर-भेदों को ध्यान में रखना होगा। स्त्रियों के भीतर मौजूद परस्पर विरोधी पहचान के कई रूप हो सकते हैं। इन पहचानों को रेखांकित करने से स्त्री-मुक्ति का यूटोपिया कमजोर नहीं बल्कि ज्यादा सार्थक, विश्वसनीय और कारगर होगा। अलबत्ता यह स्तर भेद चुनौती जरूर पेश करेगा पर मुक्ति का मजबूत और चौड़ा रास्ता इसी से निकलेगा। जाति और वर्ग दोनों से निरपेक्ष जेण्डर की समझ मुक्तिकारी यूटोपिया की पुख्ता जमीन तैयार नहीं कर सकती। साथ ही इस यूटोपिया की संरचना तब तक पूर्णतया सफल नहीं हो सकती जब तक तमाम स्त्रियों के लिए इसमें जगह न हो। कहने का आशय यह है कि स्त्री-मुक्ति के यूटोपिया की बाबत यह नहीं कहना होगा कि फिलहाल इस श्रेणी की स्त्री मुक्त होगी और उस श्रेणी की स्त्री बाद में मुक्त होगी। आपसी परस्पर विरोधी भेदों के बावजूद सारी स्त्रियाँ पितृसत्ता का शिकार हैं और सबके लिए मुक्तिकामी यूटोपिया की दरकार है।

जब भी स्त्री-मुक्ति की चर्चा होती है, पितृसत्तात्मक व्यवस्था के अलमबरदार इसे खतरे के तौर पर प्रचारित करते हैं। ऐसे लोग यह फैलाते हैं कि मुक्ति की आवाज उठाने वाली ये औरतें पुरुषों से नफरत करने वाली, परिवार तोड़ने वाली, परकटी समुदाय की हैं। इनकी कोई देशी जमीन नहीं है। अव्वल तो यह है कि स्त्री-मुक्ति का सपना देखने वाली या इस दिशा में चिंतन-मन्थन करने वाली औरतों की कोई एक धारा नहीं है, न ही स्त्री-मुक्ति सम्बन्धी कोई एक अवधारणा। हर बड़े मकसद की तरह इसमें भी तरह-तरह की वैचारिक सरणियों में यकीन रखने वाले लोग सक्रिय हैं।

 किसी भी अस्मितावादी, मुक्तिकामी समूह का, अपने ऊपर अत्याचार करने वाले लोगों के प्रति नफरत पैदा कर, अपनी अस्मिता की तरफ ध्यान खींचने और इस 'अन्य' के बरअक्स 'अपने' लोगों को एकजुट करना आसान होता है। नोट करने की बात है कि अगर यह नफरत की प्रवृत्ति बढ़ती गई तो कोई भी मुक्तिकामी परियोजना, सफल होने के बजाय एक-दूसरी, वर्चस्वकारी शक्ति में तब्दील हो जायेगी। फिर यह एक लोकतांत्रिक व्यवस्था बनाने के बजाय, इन मूल्यों के लिए खुद भी चुनौती बन जायेगी। इसलिए किसी भी मुक्तिकारी समूह के स्वप्न में उसके 'अन्य' के लिए क्या भाव-स्थान है, इसके जरिए उस यूटोपिया की जाँच बिल्कुल जरूरी होती है। यह अच्छी बात है कि स्त्री-समूहों में अपने 'अन्य' (पुरुष) के लिए नफरत का भाव नहीं है। इनकी स्पष्ट समझ है कि हमारा संघर्ष पितृसत्ता के विविध आयामों से है, न कि पुरुष की व्यक्ति-सत्ता से। स्त्री-मुक्ति के यूटोपिया में पुरुषों के लिए भी बराबर अधिकार और जगह होगी। अलबत्ता, ये औरतें नफरत फैलाने वाली नहीं हैं, बल्कि समाज में बराबरी, प्रेम और सौहार्द को स्थापित करना चाहती हैं। हाँ, अगर परिवार का ढाँचा अपने को बदलकर लोकतांत्रिक नहीं बनाता, पितृसत्ता से चिपका रहना चाहता है, तो इसका बना रहना क्यों जरूरी है? पितृसत्ता पर आधारित मौजूदा 'परिवार' में लोकतांत्रिक बनने की प्रक्रिया के दौरान दरार आयेगी और एक बेहतर परिवार की रचना होगी। इस नए बने 'परिवार' (या इसका कुछ नया नाम पड़ जाए) में स्त्री-पुरुष समानता होगी। दोनों को बराबर हक होगा। क्या यह कहने की जरूरत है कि ऐसा होना सिर्फ स्त्री के लिए नहीं बल्कि पुरुषों के हित के लिए भी आवश्यक है?

जिस 'ब्रा-बर्निंग' की चर्चा बार-बार होती हैं, उसे भी समझने की जरूरत है। असल में, मुक्तिकामी स्त्रियों ने ब्रा को 'जेण्डर' के साथ जोड़कर देखा था। अमेरिका में सम्पन्न एक विश्व सुंदरी प्रतियोगिता के दौरान स्त्रीवादियों ने अपनी-अपनी ब्रा उतारकर एक कूड़ेदान में फेंक दी थी। इन लोगों ने स्त्रियों से यह अपील भी की कि ब्रा गुलामी का प्रतीक है; अतः इसे फेंक दें। इन स्त्रियों का मानना था कि स्तन बच्चे के दूध पीने के लिए हैं, न कि पुरुष के उपभोग की खातिर। पुरुष-सत्ता ने इसे भोग की वस्तु बनाकर खास 'आकार' में रखने के मकसद से ब्रा का ईजाद किया है। आशय यह कि स्त्री 'सेक्स' के इस अंग को 'ब्रा' ने 'जेण्डर' में तब्दील कर दिया है। लिहाजा, गुलामी की इस निशानी को फेंककर जला देना आवश्यक है। गौर करने लायक बात यह है कि आज का स्त्रीवाद इस समझ से काफी आगे बढ़ चुका है। दूसरा, 'ब्रा-बर्निंग' के मुद्दे पर इतनी हाय-तौबा की दरकार भी नहीं है। यह भी ऐसी ही घटना है जैसा कि गर्भपात के अधिकार के लिए हो रहे आंदोलन के दौरान सीमोन सहित फ्रांस की अनेक स्त्रीवादी महिलाओं ने अपने दस्तख्त कर सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि उन्होंने अपने जीवन में गर्भपात कराया है। गर्भपात कराना उनका हक है और यह अधिकार कानूनी तौर पर उन्हें मिलना चाहिए। कानूनी हक मिलने के साथ समाज में गर्भपात को लेकर मौजूद 'टैबू' भी इससे दूर हुआ। अतः इतिहास की इन घटनाओं को उसके संदर्भ में ही देखने से ही इन्हें ठीक से समझा जा सकता है। बहरहाल ऐसी अपेक्षा तो स्त्री-पुरुष समता में भरोसा रखने वालों से की जा सकती है, पितृसत्ता के अलमबरदारों से नहीं।

स्त्रीवाद और स्त्री-मुक्ति के यूटोपिया के समर्थकों पर आरोप लगाया जाता है कि इनकी देशी जड़ें नहीं हैं। ऐसा कहकर इस विचार को फैलाने की पुरजोर कोशिश होती है कि ये विदेशी धरणाएँ हैं और इनका यहाँ के अतीत, सभ्यता और संस्कृति से लेना-देना नहीं है। यहाँ की आम औरतों का भी इस 'मुक्ति' से कोई सरोकार नहीं है। अव्वल तो यह सवाल है कि कोई भी विचारधारा, वैचारिक सरणि अपने मुल्क में नहीं जन्मी तो क्या इसे नहीं अपनाना चाहिए? क्या लोकतंत्र और आधुनिकता सरीखी धारणाओं का जन्म जिन मुल्कों में नहीं हुआ, उन्हें इन धारणाओं को त्याग देना चाहिए? ऐसी कूपमंडूकता के खरतनाक मंसूबों को हमेशा याद रखना होगा। दूसरी बात यह कि स्त्री-मुक्ति की देशी जड़ें यहाँ मौजूद रही हैं। स्त्रीवादी बुद्धिधर्मियों ने इसकी गहरी पड़ताल कर हमारी इस महत्त्वपूर्ण विरासत का विवेचन-विश्लेषण किया है। जब से पितृसत्ता का अंकुश कायम हुआ है, इसके प्रतिरोध में स्त्री-आवाजें भी आई हैं। क्या इन आवाजों में मुक्ति-कामना नहीं झलकती? अपनी पीड़ा का अहसास कराती इन आवाजों में मुक्ति की गहरी लालसा का मार्मिक राग भी लबरेज है। गार्गी, थेरी गाथा की स्त्रियाँ, आंडाल, अक्का महादेवी, मीराबाई, सहजोबाई से लेकर रमाबाई, ताराबाई शिंदे, महादेवी वर्मा सरीखी अनेक स्त्रियों की आवाज में, अपनी पीड़ा और पितृसत्ता की मुखालफत शामिल है। पितृसत्ता ने कई स्तरों पर काम किया है। इनकी आवाज को दबाने से लेकर इनके विचारों को नष्ट करने तक। पितृसत्ता की प्रत्यक्ष हिंसा तो दिखती है, पर चुप कराने वाली परोक्ष हिंसा जल्द दिख नहीं पाती। आलम यह रहा है कि निकट अतीत में 'सीमंतनी उपदेश' की महान रचनाकार 'एक अज्ञात हिंदू औरत' ही बनी रही। आज तक उस साहसी स्त्री का नाम पता नहीं चल पाया है। क्या यह उस परोक्ष हिंसा का एक बुरा नतीजा नहीं है? ऐसा नहीं है कि पितृसत्ता की मुखालफत करने वाली ये स्त्रियाँ सिर्फ भारत या यूरोप में हुई हैं। जिस तरह हर मुल्क में पितृसत्ता थी, उसी तरह इसकी विरोधी भी थीं। मसलन, काफी पहले न जाकर निकट अतीत, उन्नीसवीं सदी, में गौर करें तो चीन में जिउ जिन, श्रीलंका में सुगला तथा गजमन नोना, इण्डोनेशिया में कार्तिनी, ईरान में कुर्रत उल ऐन सहित अनेक महिलाएँ हर मुल्क में मिल जाएँगी। यह अलग बात है कि पितृसत्ता का विरोध करने के साथ-साथ, मौजूदा दौर के हिसाब से देखने पर, इनकी सीमाएँ भी सामने आती हैं। अपनी इस विरासत को न तो नकार कर और न ही बढ़-चढ़कर तारीफ करके, समझा जा सकता है। विरासत के सर्जनात्मक विकास के लिए, खूबियों-सीमाओं को ध्यान में रखते हुए, इसके साथ जिरह जरूरी होता है और कारगर भी।

 अपने देश में स्वाधीनता आंदोलन ने स्त्रियों को घर की दहलीज से बाहर निकाला। इसी दौरान बड़ी तादाद में स्त्रियों ने सामाजिक-राजनीतिक कार्य में हिस्सा लिया। राजनीतिक प्रश्न के तौर पर स्त्रियों का सवाल इसी दौर में उभरा। स्त्रियों का, घर की चारदीवारी से बाहर आकर, सामाजिक-राजनीतिक कामों में हिस्सा लेना, सभा-संगोष्ठी में जाना, अपने आप में स्त्री-मुक्ति की दिशा में बढ़ा हुआ कदम था। इसके लिए स्वाधीनता-आंदोलन की अगुआई करने वाले नेताओं को वाजिब श्रेय देना चाहिए। पर, यह भी याद रखना चाहिए कि दलितों, मजदूरों और किसानों के सवाल की तरह स्त्रियों का प्रश्न भी उनके लिए स्वाधीनता-आंदोलन का ही मसला था, अलग से स्त्री-मुक्ति का सवाल नहीं। आशय यह कि उस दौर के राष्ट्रवादी नेताओं ने स्त्रियों के मसले को अपने नजरिये से, स्वाधीनता आंदोलन की जरूरत के नजरिये से, उठाया। स्त्रियों को घर से बाहर लाकर आंदोलन से जोड़ना उनकी ऐतिहासिक जरूरत थी। यही वजह है कि 1917 में सरोजिनी नायडू की अगुआई में, स्त्रियों के एक प्रतिनिधिमंडल को, मांटेस्क्यू से मिलकर कांग्रेस, मुस्लिम लीग और काउंसिल के उन्नीस गैर-सरकारी सदस्यों द्वारा उठाए गए स्वराज्य की माँग को अपना समर्थन देते हुए भी, स्त्रियों के सवाल को अलग से उठाना पड़ा। स्वाधीनता आंदोलन के अगुआ खुद 'जेण्डर' की धारणा से ग्रसित थे। उन्हें लगता था कि स्वाधीनता आंदोलन में जो काम पुरुष कर सकते हैं, स्त्रियाँ नहीं कर सकतीं। इसे समझने के लिए महात्मा गांधी द्वारा आहूत नमक सत्याग्रह को याद किया जा सकता है। गांधीजी स्वाधीनता आंदोलन में स्त्रियों को भाग लेने के लिए प्रेरित करते थे, परंतु नमक सत्याग्रह के लिए हुए दांडी मार्च में हिस्सा लेने से रोक रहे थे। इन्हें लगता था कि इतना दूर चलने से स्त्रियाँ थक जाएँगी। गांधीजी की इस मनाही का सरोजिनी नायडू सहित कुछ स्त्रियों ने मुखर विरोध किया और दांडी मार्च में शामिल होने हेतु जिद की। इनकी जिद के सामने झुककर गांधीजी ने बाद में अपनी हामी भरी। दांडी मार्च और इसकी परिणति नमक सत्याग्रह में शामिल स्त्रियों ने, गांधीजी की पूर्व मान्यता को गलत साबित करते हुए, पुरुषों की तुलना में ज्यादा काम किया। इस तरह की कई घटनाएँ बताती हैं कि स्वाधीनता-आंदोलन के नेताओं की मानसिक बनावट में 'जेण्डर' की पितृसत्तात्मक मान्यताओं का कितना असर था। इसी के साथ कुछ ऐसी बातें भी हैं जिनमें भारत की स्त्रियों को, अपने हक के लिए यूरोप की महिलाओं की तुलना में काफी कम संघर्ष करना पड़ा। यूरोपीय महिलाओं को अपने राजनीतिक हक, 'वोट देने का अधिकार' पाने के लिए लंबी जद्दोजहद करनी पड़ी थी।

1928 ई. में हुए मुंबई (तब बम्बई) कांग्रेस में सरोजिनी नायडू ने काउंसिलों के चुनाव में स्त्रियों के मताधिकार का प्रस्ताव रखा। इस प्रस्ताव का मदन मोहन मालवीय ने मुखर विरोध किया था। हालाँकि, मालवीय के विरोध के बावजूद, यह प्रस्ताव पास हो गया। आशय यह है कि स्त्रियों के पक्ष में, भले ही कुछ कदम आगे बढ़कर साथ देने के लिए, स्वाधीनता-आंदोलन में शामिल शिक्षित मध्य वर्ग सामने आता था।

भारत में स्त्रीवाद और स्त्री-मुक्ति के हिमायतियों ने सिर्फ स्त्रियों का सवाल उठाकर, उसके लिए ही जोखिम भरा संघर्ष नहीं किया है। बोधगया मुक्ति आंदोलन, चिपको आंदोलन और आंध्र प्रदेश में शराब के खिलाफ हुए आंदोलन, जिसकी वजह से सरकार गिर गई थी, स्त्रियों द्वारा किए गए आंदोलन हैं जिसमें अपनी-अपनी तरह की स्त्रीवादी महिलाएँ शामिल रही हैं। इन सारे संघषों में स्त्रियों को काफी सफलता भी मिली है। इस लिहाज से गौर फरमाएँ तो भारत के स्त्री-मुक्ति आंदोलन की यह निजी खासियत है और इसके विस्तार तथा व्याप्ति का सूचक भी।

स्त्री-मुक्ति का एक यूटोपिया, एक सदी पहले, रुकैया सखावत हुसैन ने अपनी कहानी 'सुल्ताना का सपना' में रचा था। इसके हिसाब से पुरुष घरों में सारा काम कर रहे हैं और औरतें बाहर के सारे काम को कर रही हैं। इस यूटोपिया को लागू करने की प्रक्रिया नफरत आधारित नहीं थी, परंतु इसमें सारा क्रम सिर्फ उलट दिया गया था। मौजूदा स्त्री-मुक्ति-विमर्श, इस समझ से, काफी आगे बढ़ चुका है। अब क्रम को सिर्फ उलटा नहीं जाता बल्कि सहभागिता, स्वतंत्रता और समता को सुनिश्चित किया जाता है।

नोट करने लायक बात यह है कि यथार्थ और यूटोपिया एक-दूसरे से बिल्कुल अलहदा नहीं होते। दोनों के बीच द्वन्द्वात्मक रिश्ता होता है। यथार्थ के घात-संघात और समझ से यूटोपिया आकार ग्रहण करता है तो यूटोपिया हमें यथार्थ को जाँचने-समझने की समझ भी देता है, जिससे यथार्थ की जटिल संरचना में निहित वर्चस्वकारी रूप को जानकर उसे दूर करने की दिशा में बढ़ते हैं। स्त्री-मुक्ति का यूटोपिया यथार्थ के विभिन्न आयामों को समझे बगैर नहीं रचा जा सकता। व्यवस्था के विभिन्न पहलुओं के साथ पितृसत्ता ने अन्योन्याश्रित सम्बन्ध बना रखा है। इसलिए इन सारे पहलुओं को ध्यान में रखकर ही स्त्री-मुक्ति के यूटोपिया का खाका निर्मित हो सकता है। पितृसत्ता के इस मकड़जाल को देखते हुए ऐसा लगता है कि बगैर पूरी व्यवस्था बदले पूर्णतः स्त्री-मुक्ति संभव नहीं। एक न एक दिन स्त्री-मुक्ति का यूटोपिया यथार्थ जरूर बनेगा। मुक्ति का स्वप्न इसे हकीकत तक जरूर पहुँचाएगा। कवि वेणु गोपाल की कविता का सहारा लेकर कहें तो -

न हो कुछ भी
सिर्फ सपना हो
तो भी हो सकती है शुरुआत
और यह एक शुरुआत ही तो है
कि वहाँ एक सपना है।
Blogger द्वारा संचालित.