कंचन भारद्वाज की कवितायें

कंचन भारद्वाज
कंचन भारद्वाज जामिया मीलिया इस्लामिया वि वि ,दिल्ली, में पढ़ाती हैं. संपर्क :kanchanbhardwaz@gmail.com
( कंचन भारद्वाज की ये कवितायें अभिव्यक्ति , अर्थ और कहन के साथ बड़ी     कविताओं में शामिल होंगी .)

1. लड़कियाँ 

लड़कियों की किताबें कवर चढ़ी होती हैं
किताबों के कवर के भीतर वे रख लेती हैं प्यार

लड़कियों के बालों से लट निकली होती है
बालों से निकली लट को चिपका लेती हैं गाल से
उनके गाल से चिपका होता है उनका प्यार

लड़कियां अपनी चाय का रंग तय करती हैं
अपनी चाय के रंग में घोलकर पी लेती हैं प्यार
लड़कियां अपने हर रंग को ख़ास बनाती हैं

लड़कियों के पर्स में कई डिब्बियां होती हैं
अपने पर्स की डिब्बियों में न जाने
कितनी बार खोलती बंद करती हैं प्यार

प्रेम पर लिखने वालो तुम्हें पता भी है क्या
लड़कियां कहां कहां छुपा लेती हैं अपना प्रेम

तुम उन्हें गुलाब और गुलाबी गालों में तकते हो
किताब के सूखे फूलों में चुनते हो
तुम्हें क्या पता लड़कियां प्रेम में
कहां कहां होती हैं तुम्हारे भीतर

तुम्हारी चाय के कप में
तुम्हारे बालों की लट में
तुम्हारे कंधे की छांव में
तुम्हारी उंगली के पोर में
तुम्हारे क़दमों की आहट में

लड़कियां नहीं होती सिर्फ
सुर्ख गुलाब और गुलाबी गालों या
न किताबों के पन्नों के बीच रखे सूखे हुए फूलों में

जैसे रख लेती हैं अपने कानों के संगीत में अपना प्यार
तुम उन्हें अपने कैनवस के रंगों में उतार लो

प्रेम की क़लम को थामने से पहले
प्रेमिका के दिल की झन्कार से पहले
ज़रा जान लेना दिल थामकर
लड़कियां कहां कहां छुपा लेती हैं अपना प्रेम
तुम्हें कुछ पता भी है!

2. आहटों का तांडव 

तीन पग में पूरी धरती
नापने का सपना देखने वाली औरत
असल ज़िंदगी में एक सड़क तक
अकेले पार नहीं करती !…

जब आदेश मिलता है
तो अकेली होने पर ज़हरीले जंगल में भी
पाल पोसकर तैयार कर देती है
दो वीर योद्धा …

फिर जब आदेश मिलता है
अग्नि -परीक्षा देने का
तो धरती फोड़ उसमें समा जाने का
हौसला रखती है

हौसले के कारण तो
टांग काट दिए जाने पर भी
एक औरत एवरेस्ट पर चढ़ गयी
एक औरत धरती में समा गयी
एक औरत ने गायब कर दीं
सारी सड़कें अपने ख़वाब में
और नाप ली सारी धरती
तीन पग में।

तीन पग में
धरती नाप लेने वाली औरत
अपनी खिड़की से
सड़क पार का चाँद नहीं ताका करती
वह भर लेती है अपनी दोनों आँखों में
चाँद और सूरज एक साथ
उसके हांथों की उँगलियों से
एक साथ झर उठते हैं
आकाश के टिमटिमाते तारे
जुगनुओं से भर गया है मेरा अहाता
किसी भैरवी की नयी बंदिश
अभी उठने को है....

हौसलों का डमरू
मेरे बादलों में गूँजता है
आहटों के तांडव से थिरक उठता है
कोई नटराज नयी मुद्रा लिए हुए.

3.   ताला , राखी , भाषा , आंखें 

 ताला -
बेबस लटका रहा
घर के बाहर
चाबी के इंतज़ार में। ....

 राखी-
 बंधी पड़ी  रही
पोस्टमैन के पास
कलाई के इंतज़ार में। …

 भाषा-
कतार में रही
उनकी जिद में
पहचान के इंतज़ार में । …

 आँखें-
 देर तक तकतीं रहीं
 सपने में आसमान
 इन्द्रधनुष के इंतज़ार में

4 . प्रतिकिया 

वह  प्रेम लिख रही थी ,
प्रतिक्रिया मिली - क्रांति लिखो

वह  क्रांति करने लगी,
प्रतिक्रिया मिली - प्रेम करो

वह बायो पढ़ने लगी ,
प्रतिक्रिया मिली -आध्यात्म जियो

वह घुँघरू की दुकान खोलकर बैठ गयी ,
 प्रतिक्रिया नहीं मिली

 इस बार कला जागी थी
 पोस्टर बनने  लगे,
 कविताएँ छपने लगीं ,
 घुंघरू की दुकान के सामने खड़ी स्त्री ने अचानक
 ब्रेकिंग न्यूज़ का बैकग्राउंड म्यूजिक बदल दिया है ,
 अब गिफ्ट में घुंघरू का चलन चल निकला है


5  . धीमी आवाज़ का शोर 

उसकी दबती धीमी आवाज़ को
तेज कर सकने की हिम्मत मुझे चाहिए

नहीं सुननी उसकी आवाज़ केवल अपने कान में
चाहती हूँ कि उसकी आवाज़ और उसकी पीड़ा से
गूँज उठे यह धरती और ब्रह्मांड्

उसे धीमे से कहने की आदत है
उसमें प्रतिष्ठित लोगों के सामने घबराहट है
वह चाहकर भी चीख नहीं पाया कभी
उसकी पीड़ा में घुट गयी उसकी आवाज़ की तेजी

उसने बच्चों को देखा तेज दौड़ते हुए
उसने बच्चों की तेज आवाज़ को भी सुना
उसने भी औरों की तरह तेज़ दौड़ना चाहा
उसने भी औरों की तरह तेज बोलना चाहा

लेकिन उसके पाँव औरों की तरह नहीं थे
उसे कोई नहीं दे सकता सामान्य पाँव
लेकिन उसकी दबी हुयी आवाज़ तो तेज हो सकती है

उसकी धीमी आवाज़ उसकी घुटी हुयी पीड़ा है
उसकी दबती आवाज़ को तेज किया जा सकता है
उसके हौसले को ऊँचा करने की कोशिश में
उसकी आवाज़ भी ऊँची उठती जायेगी क्या ?

उसकी आवाज़ को तेज चीखना सिखाना है
उसकी घुटन को उससे बाहर निकालना है
उसके बँधे हाथ कंधे से ऊपर तक खड़े करने होंगे
उसका हाथ सिर्फ़ कोहनी तक ऊपर उठता है

कितना संकोच है उसके हाथों में, उसकी आवाज़ में
उसके मन की पीड़ा में,उसके मन की जरूरतों में

वह धीमी आवाज़ में तेज़ गति से जल्दी से
अपनी बात कहकर चुप हो जाना चाहता है
लेकिन अपनी आँखों के सपनों में वह चुपचाप
ख़ुद को किसी ऊंचाई पर अकेले देखता है

सपने देखने वाली उम्र में बच्चे तो
"शोर वाली जेनरेशन" का ताना सुनते हैं
लेकिन वह तो तेज आवाज़ निकालने के संकोच में
धीमे से ही कुछ कहकर जल्दी से शांत हो जाना चाहता है

मैं उसकी धीमी आवाज़ से उठती
किसी आक्रामक बैचेनी में हूँ

उसकी दबती धीमी आवाज़ को तेज़ करने की हिम्मत चाहिए

6  . लाल ग़ुलाब ....!!

मुझे चाँद नहीं चाहिए तुमसे
न ही कोई लाल ग़ुलाब !
गुलाब की खेती मैंने कर ली है और
चाँद की ओर मैंने कदम बढ़ा दिए हैं
न मेरे होंठों को गुलाबी पंखुड़ियाँ कहो और
न अपनी उँगली से मुझे चाँद का ख्वाब दिखाओ
मेरे होंठों में सवालों के काँटे हैं और
मेरे ख़वाब में मेरा पूरा आसमान
मैं सिर्फ़ ग़ुलाबी और लाल रंग कब तक पहनूं
तुम मेरे लिबास का रंग तय न करो
स्त्री !! तो तुमने रच ली नयी
जो खुले आम तुमसे प्रेम करे
तुम मेरी आँखों में न देखो, न रंग भरो मुझमें
एक अपना नया चित्र खींचो, कोई नयी बात बोलो
नहीं चाहिए मुझे तुमसे कोई ग़ुलाब न कोई चाँद
न रंग, न कोई ख़वाब , न कोई स्वप्निल प्रेमकथा
न अपने लिए चाहिए तुम्हारी रची कोई नयी भाषा
मैं एक नयी भाषा के साथ तुमसे संवाद करना चाहती हूँ

7. अभी तो उसे पैदा होने दो !

हाँ ,उस माँ को मालूम है
बेटी के होने का मतलब
कितना समझाया उसे कि
बेटी भी पढ़ -लिखकर आगे
तुम्हारा सहारा बन सकती है
नहीं माना उसने एक बार भी
आँसू भी नहीं थम सके उसके
न ही उसने मुझे कहने दिया -
अभी तो उसे पैदा होने दो !
वह खुद ही लगातार
एक के बाद एक ,
कई-कई किस्से
सुनाये जा रही थी लगातार
जीने की कोशिश में मरती हुई
मारी जाती ,जलाई जाती हुई
जलती हुयी ,घुटती हुयी ,तड़पती हुई
लड़कियों के किस्से-दर-किस्से
उन्हें घर में ही मारा और
जला दिया जाता
बिना किसी डर के।
वह माँ थी
आज ही बेटी के
पैदा होने से पहले ही
उसे जवान होकर मरता हुआ देख रही थी
"जल्लादों ने बहुत तड़पाकर मारा उसे
उनकी माँगों का मुँह बंद ही नहीं होता था"
अपनी अजन्मी बेटी की
जवानी की मौत पर
ज़ार-ज़ार रोये जा रही थी.।
उसके आँसुओं ने
जबड़ा थाम लिया था मेरा ,
और शब्द बहे जा रहे थे
उसके आँसुओं से मिलकर।
मैं अपनी धुन में
किसी नदी की राह में
उन अनवरत आँसुओं को
मिला देना चाहती हूँ
जो सींच सके उस धरती को
जो लड़कियों की लाशों के मलबे से
हर तरफ बंजर हुयी जाती है
एक हरा भरा उद्यान जहाँ
लड़कियाँ चिड़ियों सी हँसे
और इन्द्रधनुष सी चमके
उनके उन्मुक्त आकाश को
कोई धुआं काला न कर सके
कोई चहक घुटन न बन सके
बस करो !
अभी उसे पैदा तो होने दो।
उसे जिन्दा रहने की लड़ाई आती है
उसके साथ पूरी नई फसल का भरोसा है।
वह मार दिए जाने वाले
इन आंकड़ों से नहीं डरेगी
यू .पी और बिहार में सबसे ज्यादा होती हैं
दहेज़ हत्याएं और
कन्या भ्रूण हत्या के आंकड़ों को तो
आँसू पोंछती माएँ रास्ता दिखा देंगी।

8 . बादलों के सफ़ेद फाये !

बंजर ज़मीन से टकराकर
बदहवास लौट आती है
दबी हुयी कोई चीख़
थके पांवों से बेहाल
छोड़कर अपनी चप्पलें
अपनी क़ैद में वापस !
फिर चढ़ जाती हैं नंगे पांव
ऊँचे ख़ूबसूरत पहाड़ों पर
लिपट-लिपट जाती है
हवा के किसी झोंखे से
उड़ जाती बादलों के फाये पर
बहने लगती है बेलगाम
तेज़ बहते पानी की लहरों संग
खिलखिला उठती है !
पानी की लहरों के बीच
किसी पत्थर पर बैठ
वह दबी हुयी चीख़
जो बरसों बाद
घर से बाहर भागती है.…
सुना नहीं गया उसे कभी भी !
न आज जब वह खिलखिला उठी
न तब जब उसे दबा दिया था जोर से
बहरे और गूँगे होने का चलन
अब हमारी चमकदार पहचान है
हम आबाद शहर के चौराहे पर हैं
जिसकी हर राह की मंज़िल
किसी वीरान बस्ती से मिलती है
जहाँ चीखें बेख़ौफ़ खिलखिलाती हैं
वीरान बस्ती का पता सबकी ज़ेब में है
ज़ेब में नन्हीं पाज़ेब खनकती है
ज़ेब में कोई लोरी सिसकती है
ज़ेब से जब निकल भागता है कोई मिल्खा
तब दुनिया के हाथों से ताली बज उठती है
वीरान बस्ती में हर रात
किसी थियेटर के मंच पर
यही रंगीन जश्न होता है
फ़िर कोई चीख बेख़ौफ़
खिलखिलाकर
बदहवास लौट आती है
किसी बंज़र ज़मीन से टकराकर
थके पांवों बेहाल
छोड़कर अपनी चप्पलें
अपनी कैद में वापस !
उसकी गोद में गिर पड़ते हैं
नीले बादलों के सफ़ेद फाये
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