अरुण देव की कवितायें

अरुण देव
युवा कवि और आलोचक अरुण देव चर्चित वेब पत्रिका समालोचन के सम्पादक हैं. संपर्क :09412656938,devarun72@gmail.com

मेरे अंदर की स्त्री

तुम्हारे अंदर जो अँधेरा है
और जो जंगल है घना, भीगा सा
उबड खाबड से बीहड़ हैं जो दु:स्वप्नों के
उसमें मैं एक हिरन की तरह भटकता हूँ
कोई गंध मुझे ढूंढती है
किसी प्यास को मैं खोजता रहता हूँ

यहाँ कुछ मेरा ही कभी मुझसे अलग होकर भटक गया था
मैं अपनी ही तलाश में तुम्हारे पास आया हूँ

कब हम एक दूसरे से इतने अलग हुए
की तुम स्त्री बन गई और मैं पुरुष
क्या उस सेब में ऐसा कुछ था जो तुमने मुझे पहली बार दिया था

उस सेब के एक सिरे पर तुम थीं
मुझे अनुरक्त नेत्रो से निहारती हुई और दूसरी तरफ मैं था आश्वस्त...
कि उस तरफ तुम तो हो ही

तब से कितनी सदियाँ गुज़री
कि अब तो मेरी भाषा भी तुम्हें नहीं पहचानती
और तुम्हारे शब्द मेरे ऊपर आरोप की तरह गिरते हैं
तुमने भी आखिरकार मुझे छोड़ ही दिया है अकेला
अपने से अलग
हालाकि तुम्हारी ही अस्थि मज्जा से बना हूँ



तुमसे ही बनकर तुम्हारे बिना कब खड़ा हो गया पता ही नहीं चला
तुम्हारे खिलाफ खड़ा हुआ
यह मेरा डर था या शायद मेरी असहायता
कि मेरा प्रतिरूप तुम तैयार कर देती थी
जैसे कोई जादूगरनी हो
देवि.... दुर्गा.... असीम शक्तियों वाली
सुनो !. तुम्हारे कमजोर क्षणों को मैंने धीरे धीरे एकत्र किया

जब मासिक धर्म से भींगी तुम नवागत की तैयारी करती
मैं वन में शिकार करते हुए तुम्हें अनुगामी बनाने के कौशल सीखता
जब तुम मनुष्य पैदा कर रही थी मेरे अंदर का पुरुष तुम्हें स्त्री बना रहा था

और आज मेरे अंदर का स्त्रीत्व संकट में है
मैं भटक रहा है जंगल-जंगल अपनी उस आधी स्त्री के लिए जो कभी उसके अंदर ही थी.


हत्या

उसकी हत्या हुई थी. सड़क से गाँव के रास्ते का एक हिस्सा सुनसान था. खेतों से होकर गुजरता था. वही से वह गायब हुई. वही गन्ने के खेत के पीछे उसका शव मिला, कई दिनों बाद. चेहरा झुलसा हुआ. कपड़ो से पहचानी गई.

पिता ने ज़ोर देकर कहा कपड़ो से पता चलता है उसके साथ दुष्कर्म नहीं हुआ है. लड़की ने मरते मरते भी कुटुंब की लाज़ बचाई.

कहीं बाहर नौकरी करता भाई आया था. चेहरे पर थकान. जैसे किसी झंझट में पड़ गया हो.

घर के लोग अब जो हो गया सो गया का भाव लिए कुछ आगे करने के बारे में संशय में थे.     एक पड़ोसी ने यह भी कहा कि क्या जरूरत थी जवान लड़की को पढाने की.

वह सिपाही बनना चाहती थी. कोचिंग करने समीप के नगर में जाती थी. अन्त समय उसने मोबाईल से जिनसे बातें की वे भी उसके मौसरे भाई, चचेरे भाई थे. ऐसा उस लड़की की  जाति-बिरादरी के लोग कह रहे थे. बार-बार




अगर लड़की किसी के प्रेम में होती और तब उसकी हत्या होती तो इसे स्वाभाविक माना जाता, उसके इस स्वेछाचार का अन्त यही होना था, इसी किस्म से कुछ कहा जाता. और कुटुंब के लिए यह बदनामी की बात होती.

उसकी बस हत्या हुई थी. उसका किसी से प्रेम या शारीरिक सम्बन्ध नहीं था. यही राहत की बात थी.

एक लड़की जो स्त्रीत्व की ओर बढ़ रही थी
इसी के कारण मार दी गई

उसके लंबे घने काले केश जो इसी दुनिया के लिए थे

उसका चमकता चेहरा
जिसकी रौशनी में कोई न कोई अपना दिल जलाता

वह एक उम्मीद थी
उसे अपना भी जीवन देखना था

अगर वह प्रेम में होती, बिनब्याही माँ बनने वाली होती, उसके बहुत से प्रेमी होते
या वह एक बेवफा महबूब होती
तो क्या उसकी हत्या हो जानी चाहिए थी

क्या अब हम हत्या और हत्या में भी फर्क करेंगे.


छल

           
अगर मैं कहता हूँ किसी स्त्री से
तुम सुंदर हो

क्या वह पलट कर कहेगी
बहुत हो चुका तुम्हारा यह छल
तुम्हारी नज़र मेरी देह पर है
सिर्फ देह नहीं हूँ मैं

अगर मैंने कहा होता
तुम मुझे अच्छी लगती हो
तो शायद वह समझती कि उसे अच्छी बनी रहने के लिए
बने रहना होगा मेरे अनुकूल
और यह तो अच्छी होने की अच्छी – खासी सज़ा है

मित्र अगर कहूँ
तो वह घनिष्ठता कहाँ
जो एक स्त्री-पुरूष के शुरूआती आकर्षण में होती है
दायित्वविहीन इस संज्ञा से जब चाहूँ जा सकता हूँ बाहर
और यह हिंसा अंततः किसी स्त्री पर ही गिरेगी

सोचा की कह दूँ कि मुझे तुमसे प्यार है
पर कई बार यह इतना सहज नहीं रहता
बाज़ार और जीवन-शैली से जुडकर इसके मानक मुश्किल हो गए हैं
और अब यह सहजीवन की तैयारी जैसा लगता है
जो अंततः एक घेराबंदी ही होगी किसी स्त्री के लिए

अगर सीधे कहूँ
कि तुम्हरा आकर्षण मुझे
स्त्री-पुरूष के सबसे स्वाभाविक रिश्ते की ओर ले जा रहा है...
तो इसे निर्लज्जता समझा जायेगा
और वह  कहेगी
इस तरह के रिश्ते का अन्त एक स्त्री के लिए पुरूष की तरह नही होता..

भाषा से परे
मेरी देह की पुकार को तुम्हारी देह तो समझती है
भाषा में तुम करती हो इंकार

और सितम कि भाषा भी चाहती है यह इंकार.


चाँद , पानी और सीता

स्त्रियाँ अर्घ्य दे रही हैं चन्द्रमा को
पृथ्वी ने चन्द्रमा को स्त्रियों  के हाथों जल भेजा है

कि नर्म मुलायम रहे उसकी मिट्टी
कि उसके अमावस में भी पूर्णिमा का अंकुरण होता रहे

लोटे से धीरे-धीरे गिरते जल से होकर आ रहीं हैं चन्द्रमा की किरणें
जल छू रहा है उजाले को
उजाला जल से बाहर आकर कुछ और ही हो गया है
बीज भी तो धरती से खिलकर कुछ और हो जाता है



घुटनों तक जल में डूबी स्त्रियों को
धान रोपते हुए, भविष्य उगाते हुए सूर्य देखता है
देखता है चन्द्रमा
स्त्रियाँ सूरज को भी देती हैं जल, जल में बैठ कर
कि हर रात के बात वह लौटे अपने प्रकाश के साथ

धरती पर पौधे को पहला जल किसी स्त्री ने ही दिया होगा
तभी तो अभी भी हरी भरी है पृथ्वी
स्त्रियाँ पृथ्वी हैं
रत्न की तरह नहीं निकली वें
न ही थी किसी मटके में जनक के लिए

अगर और लज्जित करोगे
लौट जायेंगी अपने घर

हे राम !
क्या करोगे तब…


पर्यायवाची

गुलमोहर आज लाल होकर दहक रहा है
उसके पत्तों में तुम्हारे निर्वस्त्र देह की आग
मेरे अंदर जल उठी है

उसके कुछ मुरझाये फूल नीचे गिरे हैं
उसमें सुवास है तुम्हारी
मुझे प्रतीक्षा की जलती दोपहर में सुलगाती हुई

यह गुलमोहर आज मेरे मन में खिला है
आओ की आज हम दोनों एक साथ दहक उठे
की भीग उठे एक साथ की एक साथ उठे और
फिर गिर जाएँ साथ साथ

मेरी हथेली पर तुम्हारे नाम से निकल कर एक अक्षर आ बैठा है
और तबसे वह जिद्द में है कि पूरा करू तुम्हरा नाम



शेष तो तुम्हारे होठों से झरेंगे
जब आवज़ दोगी अपने होठों से मुझे मेरी पीठ पर

उन्हें ढूढता हूँ तुम्हारे मुलायम पहाडो के आस-पास
वहाँ मेरे होटों के उदग्र निशान तुम्हें मिलेंगे
तुम्हारे नाभि कुण्ड से उनकी तेज़ गंध आ रही है

मैं कहाँ ढूंढू उन्हें जब कि मैं ही अब
मैं नहीं रहा

तुम्हारे नाम के बीच एक-एक एक करके रखूं अपने नाम का एक-एक अक्षर
कि जब आवाज़ दे कोई तुम्हें
मेरा नाम तुम्हे जगा दे कि उठो कोई पुकार रहा है
अगर कहीं गिरो तो गिरने से पहले बन जाएँ टेक
और अगर कहीं घिरो तो पाओ उसे एक मजबूत लाठी की तरह अपने पास
कि अपने अकलेपन में उन्हें सुन सको
कि जब उड़ो ऊँचे आकाश में वह काट दे
काटने वालो की डोर

वैसे दोनों मिलकर पर्यायवाची हो जाएँ तो भी
चलेगा
अर्थ के बराबर सामर्थ्य  वाले दो शब्द
एक साथ.


आटे की चक्की

पम्पसेट की धक-धक पर उठते गिरते कल-पुर्जों के सामने
वह औरत खड़ी है
पिस रहा है गेहूं

ताज़े पिसे आटे कि खुशबू के बीच मैं ठिठका
देख रहा हूँ गेहूं का आटे में बदलना


इस आंटे को पानी और आग से गूँथ कर
एक औरत बदलेगी फिर इसे रोटी में



दो अंगुलिओं के बीच फिसल रहा है आटा
कहीं दरदरा न रह जाए

नहीं तो उलझन में पड़ जायेगी वह औरत
और करेगी शिकायत आंटे की
जो शिकायत है एक औरत का औरत से
वह कब तक छुपेगी कल-पुर्जों के पीछे


इस बीच पीसने आ गया कहीं से गेहूं
तराजू के दूसरे पलड़े पर रखना था बाट


उसने मुझे देखा छिन्तार
और उठा कर रख दिया २० किलो का बाट एक झटके में
पलड़ा बहुत भारी हो गया था उसमें शमिल हो गई थी औरत भी

उस धक-धक और ताज़े पिसे आंटे की खुश्बू के बीच
यह इल्हाम ही था मेरे लिए

की यह दुनिया बिना पुरुषों के सहारे भी चलेगी बदस्तूर.

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