प्रतिरोध का सिनेमा उत्सव भी है ,और आंदोलन भी

अनुपम सिंह
अनुपम सिंह दिल्ली वि वि में शोधरत हैं. संपर्क :anupamdu131@gmail.com
जब  भारतीय संस्कृति के नाम पर सामंतवादी और पुरुषवादी मूल्यों के पुनर्रस्थापन  की बात ज़ोरों पर हो तो, ऐसे में उस संस्कृति के प्रतिरोध में एक वैकल्पिक संस्कृति की भूमि बनाना ,उसे जनता के बीच ले जाना,उस पर चर्चा-परिचर्चा करना आवश्यक हो जाता है । ‘जन संस्कृति मंच’ के द्वारा शुरू किया गया ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ऐसा ही एक वैकल्पिक मंच है, जहां अतार्किक ,भावुक,असहिष्णु ,एकांगी इस  संस्कृति का पुनर्मूल्यांकन किया जा सके । इसी कड़ी मे उदयपुर के  दूसरे फिल्मोत्सव का आयोजन किया गया था । यह  कार्यक्रम ख्वाजा अहमद अब्बास ,जैनुल आबेदिन ,ज़ोहरा सहगल और नबारुण भट्टाचार्य के उस क्रांतिकारी जज़्बे को समर्पित था ,जिससे भारतीय संस्कृति की सही पहचान की जा सकती है । इनके साथ ही यह कार्यक्रम उन तमाम तरक्की पसंद लोगों को भी समर्पित था  जिनसे प्रेरणा लेकर इस कार्यक्रम की शुरूआत संभव हो सकी थी । जब मैं उदयपुर पहुंची तो इस नयी संस्कृति के सृजन के उत्सव की शुरुआत हो ही रही थी ।एक बड़े से हॉल  मे जैनुल आबेदिन के चित्रों के साथ –साथ मुकेश बिजोले ,महावीर वर्मा के चित्रों की प्रदर्शनी को वहाँ पहुंचे हुये लोग उत्साहित हो कर देख रहे थे । वहीं दूसरे सटे हुये हॉल में उदयपुर फिल्म सोसाइटी के उत्साही युवा साथियों ने ‘बल्ली सिंह चीमा’ के गीत –“ले मशाले चल पड़े हैं लोग मेरे गाँव के ,अब अंधेरा जीत लेंगे लोग मेरे गाँव के” से इस तीन दिवसीय कार्यक्रम का आगाज किया ।दूसरे उदयपुर फिल्मोंत्सव के संयोजक शैलेंद्र प्रताप सिंह भाटी नें मंच पर बैठे हुए अतिथियों का परिचय कराते हुए इस कार्यक्रम को करने के उद्देश्य एवं महत्व पर सार-संक्षिप्त रूप में बात रखी।   उदघाटन सत्र के अध्यक्ष : नरेश भार्गव ,प्रमुख वक्ता : संजय काक ,विशेष अतिथि : अशोक भौमिक ,मुकेश बिजोले,महावीर वर्मा थे । मंच पर प्रतिरोध के सिनेमा के राष्ट्रीय संयोजक संजय जोशी जी भी उपस्थित थे ।

फिल्में कैसे अपने समय का प्रतिरोध रचती हैं  इस पर संजय जोशी ने विस्तृत रूप से अपनी बात रखी ।चर्चा नियमगिरी से शुरू होकर कुडनकूलम और फिलिस्तीन के लोगों के प्रतिरोध तक गयी ।बेदान्ता को डोगरिया कोंध आदिवासियों नें  नियमगिरी के जंगलो में  खनन करने से रोक कर अपने आने वाली पीढ़ियों के जीवन को भी सुरक्षित किया है , तो वही तमिलनाडु के तिरुनेलवली जिले मे कुडनकुलम परमाणु संयंत्र को हटाने के लिए चल रहे लोंगों के प्रतिरोध मे साथ होने की बात कही संजय जी ने । इन तीन दिनों के कार्यक्रम की रूप-रेखा देखकर आशुतोष कुमार की यह बात पुष्ट होती है की ‘जब हम फिल्मोत्सव मानते है तो वह सिर्फ फिल्मों तक ही सीमित नहीं होता है, बल्कि उसमे वे तमाम कला रूप शामिल होते हैं जिनसे प्रतिरोध की नयी जमीन को तैयार किया जा सके ,उसमे नयी पौध रोपी जा सके । ‘जन संस्कृति मंच’ ने सांस्कृतिक आन्दोलनों के अनेक रूपों को अपने इस प्रतिरोध के वैकल्पिक मंच के भीतर ही समाहित कर लिया है। ऐसा उयदयपुर के इस फिल्मोत्सव में देखने को मिला । फिल्म के साथ –साथ चित्र- प्रदर्शनी ,कविता ,कहानी ,गीत ,वाद –संवाद ,स्टैंड अप कॉमेडी आदि सांस्कृतिक विधाओं का प्रयोग इस फिल्मोत्सव में हुआ ।  अशोक भौमिक जी का कहना था कि, जब समाज में अनेक रूपों मे शोषण ,अत्याचार ,भ्रष्टाचार ,असमानता ,जातिवाद ,संप्रदायवाद आदि व्याप्त है तब केवल एक  कला माध्यम  सफल नहीं हो सकता । यह बात सच ही है । तभी तो  आज अनेक कला माध्यमों,साहित्यिक विधाओं, सोशल मीडिया आदि के द्वारा प्रतिरोध का  मंच तैयार करने की कोशिश देखने को मिल रही है ।



जैनुल आबेदिन के अकाल के चित्रों  पर  बात करते हुए भौमिक जी ने मेट्रो-कला का विरोध किया । और यह बात वहाँ  लगी मुकेश विजोले और महावीर वर्मा के चित्रों  की प्रदर्शनी से समझी जा सकती है । वर्तमान समय में  महानगरो को कलाओं का केंद्र मानने की जो प्रथा चल पड़ी है उस छवि को इन छोटे शहरों के कलाकार तोड़ रहे हैं। उदयपुर के लोगों के मन मे कला को लेकर अनेक जिज्ञासाएँ और अनगिनत सवाल थे जिसको उन लोगों ने मंच से साझा किया । दस्तावेजी फ़िल्मकार संजय काक जी मौजूद थे उनका कहना था  कि , आज प्रतिरोध की भाषा बदल गयी है ,प्रतिरोध की फिल्में भी अधिक बन रही हैं,परंतु मेरे जेहन में इस दुनिया को एक दिन में  बदलने का कोई तरीका नहीं हैं । संजय काक की इस बात से पूरी तरह सहमत हुआ जा सकता है।  जिस सभ्यता के विकास का  इतिहास इतना लंबा और दमनात्मक रहा हो कि, वह हमारी कल्पना में  ही न अटे सके तो उसके  संस्कृति कि लड़ाई उतनी  ही सूक्ष्म और लंबी लड़नी होगी । लेकिन इससे होने वाला परिवर्तन निःसंदेह स्थायी होगा । नरेश भार्गव का कहना था कि, आज दुनिया भर के समाजविज्ञानी ‘प्रतिरोध’ का समाजशास्त्रीय विश्लेषण कर रहे हैं । यह सही है कि, आज सिनेमा प्रतिरोध का एक सशक्त माध्यम है। शिक्षण संस्थाओं में फिल्मों पर काम करने का रुझान बढ़ा है,पिछले कुछ वर्षों में  सिनेमा से संबन्धित अच्छी पुस्तके भी आयी हैं । सिनेमा को  लेकर निम्न मध्यवर्गीय परिवारों में जो नकारात्मक भाव था, वह टूटा है । लेकिन सवाल यह है कि, प्रतिरोध के इस वैकल्पिक सिनेमा को  हम उन गाँव और घरों तक कैसे ले जाएंगे ? तो शायद इसका जवाब यही  होगा कि , उदयपुर फिमोत्सव की  तरह से ही  गाँव और  शहरों में  फिल्मोंत्सवों का  आयोजन  और छोटे –छोटे फिल्म क्लबों का निर्माण करके जनपक्षधर सिनेमा का विकास किया जा सकता है  ।उदयपुर का यह फिल्म महोत्सव तब और सार्थक हो जाता है, जब यह वैश्विक प्रतिरोध को अपने इस प्रतिरोध के मंच से जनता के सामने प्रस्तुत करता है। फिलिस्तीन के साथ –साथ दुनिया के किसी भी कोने में जो फिलिस्तीन रोज  घट रहा है ,ऐसे फिलिस्तीनीयों के जिजीविषा और प्रतिरोध के समर्थन मे रफीफ ज़िहाद द्वारा “वी टीच लाईफ सर”अंग्रेजी मे 5 मि॰ की वीडियो काव्य प्रस्तुति की गयी ।उदयपुर की फिल्म सोसाइटी द्वारा जिन फिल्मों का चुनाव किया गया था  उसमे- ‘गुलाबी गैंग’,’विकास के नाम पर’,’माटी के लाल’,’छिपा हुआ इतिहास’,’व्हेयर हैवयू हिडन माय न्यू क्रिसेंट मून’, ’फ़ंड्री’, ’धरती के लाल’, ’इज्जतनगरी की असभ्य बेटियाँ’, ‘कैद’ ,’कंचे और पोस्टकार्ड’, ’ए घेटो फॉर द डेड’, ‘इन सिटीलाइट’, ‘भोभर’, ’आँखों देखी’,आदि थी। अभी हाल मे ही मुख्य धारा के सिनेमा ने भी ‘गुलाब गैंग’ नाम से फिल्म बनाई थी। उदयपुर में  जब मैंने निष्ठा जैन द्वारा निर्देशित ‘गुलाबी गैंग’फिल्म देखी तो दस्ताबेजी फिल्मों और मुख्य धारा की फिल्मों के पूरे चरित्र को बड़ी आसानी से समझने का अवसर मिला  । मुख्य धारा की फिल्मों में जिस तरह रंग –रोगन लगा कर समस्या का उपचार किया जाता है, वह पूरी तरह बाजार,पूंजीवाद और पारंपरिक भारतीय जनमानस को ध्यान मे रख कर ही किया जाता है । उनका प्रथमतः और अंततः उद्देश्य पैसा कमाना ही होता है । इस देश में जहां पुंषवाद ही सम्पूर्ण संस्कृति का निर्माता और निर्देशक हो वहाँ ‘गुलाबी गैंग’, ‘इज्जतनगरी  की असभ्य बेटियाँ’जैसी दस्ताबेजी फिल्में बनानी  अति आवश्यक है ।


‘इज्जतनगरी की असभ्य बेटियाँ’ का निर्देशन नकुल सिंह साहनी ने किया है । यह फिल्म हरियाणा के जाट समुदाय मे ’खाप पंचायत’ नाम की  सामाजिक पहरेदारी करने वाली संस्था के प्रतिरोध में बनी हैं । वर्तमान समय में इस फिल्म की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है।  जब ‘लब जेहाद’ जैसी राजनीतिक रणनीति के माध्यम से इस देश में  स्त्रियों की आजादी को छीनने की कोशिश कुछ सांप्रदायिक संस्थाएँ कर रही हो ।’लब जेहाद’ और ’खाप पंचायत’जैसी संस्थाएँ एक समान उद्देश्य से चलायी जा रही है।  आजादी के इतने दिनों बाद भी इस देश मे स्त्री ,दलित ,आदिवासी आदि के लिए स्वाभिमान और आत्मसम्मान  के साथ जीवन जीने की कोई झलक नहीं दिखाई देती । दलितों की स्थिति में जो भी परिवर्तन हुआ है वह नाकाफी है । आज भी जो दलित साहित्य आ रहा ,जो फिल्में बन रही हैं उससे उनके विकास की सही पोल खुलती है । मराठी में जो आत्मकथाएं लिखी गयी हैं वह उनके जीवन का सही प्रमाण देती हैं  । और सिनेमा के माध्यम से उस यथास्थिति,असमानतापूर्ण नारकीय जीवन का यथार्थ चित्र उसके पूरे अंतर्विरोधों के साथ  ‘फ़ंड्री’ फिल्म( नागराज मंजुले द्वारा निर्देशित है) में दिख रहा है । उदयपुर फिल्मफेस्टिवल मे ‘फ़ंड्री’ के प्रोडयूशर विवेक कजरिया के साथ –साथ नकुल सिंह साहनी ,मोहम्मद गनी(कैद के निर्देशक ),सौरभ व्यास(सिटी लाईट्स, कंचे और पोस्टकार्ड),गजेन्द्र श्रोत्रिय (भोभर)  रामकुमार से संजय जोशी की बात-चीत ,जो फिल्म के विषय-चयन ,उसके वितरण ,खर्च आदि को लेकर थी वहाँ बैठे दर्शक साथियों मे उत्साह भरने वाली थी , मोहम्मद गनी से बात करके दर्शक-दीर्घा मे बैठे कई  साथियों का मानो फिल्म बनाने का सपना पूरा हो गया हो इस कदर उत्साह से भर गए । इस कार्यक्रम कि महत्ता इसके समवेशी चरित्र के कारण और  अधिक बढ़ जाती  है। जो इस कार्यक्रम कि प्रतिबद्धता भी है।  संजय काक द्वारा निर्देशित फिल्म ‘माटी के लाल’ देखने  के बाद दर्शको नें फिल्म में दिखाये गए आदिवासियों के जल ,जंगल, जमीन अर्थात जीवन को बचाने कि लड़ाई को, जो कि ‘माओवाद’ के नाम से जानी जाती है से संबन्धित कई सवाल पुछे। संजय काक का कहना था कि लड़ाइयाँ तो पंजाब ,कश्मीर ,उड़ीसा,छत्तीसगढ़ ,झारखंड, नार्थईष्ट सभी जगह लड़ी जा रही हैं,हाँ लड़ाइयों का रूप अलग हो सकता है।

इस कार्यक्रम में  बच्चों से जुड़ा एक पूरा सत्र ही था। जिसमें  बच्चों द्वारा बनाए गये चित्रों कि प्रदर्शनी लगी थी। बच्चों के नन्हें हाथों से खींची गयी आड़ी तिरछी रेखायेँ बहुत ही सुंदर लगी । संजय मट्टू ने बच्चों को बहुत ही रोचकीय ढंग से ‘ डॉ॰ ज़ाकिर हुसैन’ कि कहानी सुनायी। कहानी सुनते समय बच्चे कभी तो आश्चर्य से  भर उठते तो कभी खुश होकर संजय मट्टू के साथ कहानी दुहराते ।कहानी से संबन्धित सवालों के जवाब भी बच्चों ने बड़ी समझदारी के साथ दिया।    बच्चों के साथ मेरा भी मन बचपन कि उन स्मृतियों में खो गया जब कहानी सुनने के लिए सबकी टहल बजाती थी । बच्चों के लिए चुनी गयी फिल्म ‘कंचे और पोस्टकार्ड; बहुत ही अच्छी फिल्म थी । जिसमें बच्चों के खेल-खिलौने , उनके दोस्तों की दुनिया और उनके मनोविज्ञान को समझने के लिए एक सरहनीय प्रयास था । आज का  बचपन बस्ते के नीचे दम तोड़  रहा है ,उनके खेल-खिलौने का निर्धारण पूरी तरह से बाजार के हाथों मे चला गया है ,दोस्तों की दुनिया  घर के कुछ सदस्य  तक सीमित हो गयी है। ऐसे समय मे यह बचपन बचाने की एक सफल शुरुआत है ।इसी  तर्क को  यदि आगे बढ़ाया जाय तो कई और भी सवाल पैदा होते हैं, जिनको मोहम्मद गनी द्वारा निर्देशित फिल्म ‘ क़ैद ‘मे उठाया गया है। स्कूलों और घरों में बच्चों के प्रति बरती जाने वाली  किसी भी तरह की  असंवेदनशीलता कैसे उनको मनोरोगी बना देती है। उस पर यदि परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर हो तो अशिक्षा ,अंधविश्वास जैसी कई बुराइयाँ घर के भीतर जड़ जमा लेती हैं । गनी की फिल्म को देखकर वहाँ बैठे शिक्षक ,अभिभावक और स्वयम बच्चों ने भी अपने –अपने अनुभव साझा किए। एक और बात का संकेत इस फिल्म में है जिसकी तरफ शायद दर्शकों का ध्यान नहीं गया ,वह यह की शिक्षा के निजीकरण होने से शिक्षको के जीवन मे अस्थायित्व आया है।  जीवन मे असुरक्षा का बोध बढ़ा है, जिसके चलते कर्तव्य बोध टूट है  और पेट भरने ,बढ़ी हुयी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए वह अन्य माध्यमों से भी  पैसा बनाने की कोशिश करता है। मेरी दृष्टि में यह फिल्म- शिक्षक ,शिक्षार्थी और अभिभावक के आर्थिक सम्बन्धों को विश्लेषित करती है।  उदयपुर फिल्मोत्सव में युवा ‘वालेंटियर’ साथियों की सहभागिता,उनके सवाल ,जिज्ञासाएँ उनकी टिप्पणियाँ सुनकर लगा की इस देश में एक ऐसी  युवा पीढ़ी का उभार हो रहा है, जो मानव विरोधी संस्कृति और प्रतिगामी विचारों के खिलाफ सजग है ।  इस कार्यक्रम कि बहुत सारी स्मृतियाँ बाकी हैं, जिसको लिखना संभव नहीं हो पा  रहा है। लेकिन अंत मे वरुण ग्रोवर कि कॉमेडी का जिक्र करने से खुद को रोक नहीं पा  रही हूँ । कॉमेडी  के नाम पर खूब  कूड़ा- करकट उड़ रहा है।  स्त्रियों के प्रति बहुत ही  सूक्ष्म भाषिक हिंसा कि जा रही है।  ऐसे मे वरुण ग्रोवर कि राजनीतिक समझदारी, कॉमेडी और व्यंग को नयी दिशा दे रही है ।    

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