घर की प्रताड़ना से फोटोग्राफी की मंजिल तक

( चर्चित फोटोग्राफर सर्वेश ने घरेलू हिंसा की असहनीय पीड़ा से मुक्त होकर फोटोग्राफी को अपनी मंजिल  चुना और मुकाम तक  पहुँची भी  . सर्वेश से परिचित करा रही हैं कवयित्री दीप्ति शर्मा  )


यह एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मी एक ऐसी लडकी की कहानी है, जिसने अपना रास्ता खुद बनाया तमाम
बंदिशो ,कठिनाईयोँ को लांघकर वह आज एक अलग मुकाम पर खडी है.  बचपन से ही सर्वेश का सपना वकील बनने का था, वह कानून की पढाई करना चाहती थी पर 12 वीँ पास करते ही  ( बाद में उन्होंने बी ए की डिग्री ली . उसकी शादी पक्की कर दी गयी . वह  इस शादी के लिये तैयार नहीँ थी , परिवार ने उसे इस इनकार के लिए प्रताड़ित किया और उसकी शादी उसकी  बिना मर्जी के सन 1976 में  एक ऐसे व्यक्ति से कर दी  ,जो औरत को अपनी जरुरतेँ पूरी करने वाली एक मशीन समझता, बात बात पर पिटाई,गाली -गलौच मानो उसकी नियती बन गयी हो.



 राहत पाने की चाह में एक दिन माता-पिता के पास पहुंची ,तो उन्होंने भी वह नरक भोगने की सलाह दी और कहा शादी हो गयी है ,अब निभाना ही पडेगा। सर्वेश ने कई बार महसूस किया कि उसका आत्मसम्मान, सुरक्षा के लिए  भी उसका पति तैयार नहीँ था ।


एक बार बालकानी से फेँका कूडा वहां से गुजर रहे एक व्यक्ति पर गिर गया ,वह व्यक्ति बहुत गुस्से में ऊपर घर पर आ पहुंचा बहुत मांफी मांगने पर भी वह आदमी अभद्र भाषा का प्रयोग करता रहा , गाली- गलौच करता रहा बॉलकानी से नीचे फेँक देने की धमकी भी दे डाली और उसका पति चुपचाप यह सब देखता रहा ,उसने कोई बीच-बचाव नहीँ किया .

इस घटना से  सोती हुई औरत जाग गयी और एकदम कडक आवाज़ में बोली " हाथ लगाकर तो देख " इस पर वह आदमी बुदबुदाता हुआ वहां से चला गया । यह सब देखकर वह समझ गयी थी की अब आगे उसे क्या करना है तो फिर क्या था नवम्बर सन 1988 में पति का घर छोड वह निकल पडी अपनी मंज़िल तलाशने ।

   
धीरे धीरे बहुत से लोग उसके सम्पर्क में आये . छोटे -मोटे रोजगार भी मिले .  नए दोस्तों के बीच वह किताबे पढ़ती . लेकिन जिन्दगी का अहम पड़ाव था एक दोस्त के द्वारा भेट किया गया कैमरा . शायद वह सर्वेश के अंदर छुपे हुनर को जान गया था ,इससे सर्वेश का पुरुष जाति पर फिर से भरोसा हुआ , उस कैमरे ने उसके जीवन की दिशा ही बदल दी . वही उसका साथी हो गया हर सुख दुख का।
     
उसने अपने कैमरे से कई मृतप्राय वस्तुओँ में जान डाल दी . सर्वेश का  पहला professional फोटोग्राफ हिमाचल टाइम्स देहरादून में प्रकाशित हुआ । सन 1991 में उत्तराखंड में भूकंप के दौरान लिये गये फोटोग्राफ से उसकी एक अलग पहचान बनी , उसके  फोटो ग्राफ अधिकतर अखबारोँ में प्रकाशित हुए । पुरुष प्रधान समाज़ में जहाँ इस क्षेत्र में पुरुषों का दबदबा अधिक दिखायी पडता है ,वहाँ उसने  हिम्मत नहीँ हारी और उत्तराखंड में डटी रहीं, एक  सप्ताह रोड पर सोकर गुजारा .  उस दौरान लिये गये तकरीबन ५० फोटोग्राफ देश के प्रमुख अखबारोँ में प्रकाशित हुए।


कारगिल  की लड़ाई में भी सर्वेश ने साहसिक फोटोग्राफी की . वहाँ खींचें गये 100 से अधिक फोटोग्राफ देश के महत्वपूर्ण अखबार एवं पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए. कई औरतोँ बच्चोँ के जीवन की तमाम कडियोँ को उन्होनेँ अपने कैमरे में कैद किया। कोयले की अँधेरी खानोँ में उसके सम्वेदनशील कैमरे ने नयी जान डाल दी,  उसने   कई दंगों में ,हिमालय कार रैली, लद्दाख के त्यौहार, हर जगह पर अपने कैमरे का करतब दिखाया ।

गुजरात भूकम्प और सूखे की स्थिति हो या कुम्भ मेला  हरिद्वार या इलाहाबाद की तस्वीरें, मुरादाबाद के दंगे हो या उतरांचल का प्रसिद्ध नंदा राज जाट त्यौहार हर जगह सर्वेश के कैमरे ने अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज की .


सर्वेश ने फोटोग्राफी  के लिए श्रीलंका , यू.के. भूटान ,नेपाल आदि देशोँ की यात्रा की .  फोटोग्राफी की कई किताबों की इस लेखिका के फोटोग्राफ  women in the time of flux  सीरीज के तहत दिल्ली, भोपाल, बरेली, मेरठ,लखनऊ और मैसूर में प्रदर्शित हुए .  मुम्बई, अहमदाबाद, कोच्चि, चेन्नई, कलकत्ता में की भी प्रदर्शनियों में सर्वेश की प्रमुख भागीदारी रही .  एकल प्रदर्शनी ' children in times of flux 'के नाम से IIC ,दिल्ली, में  फरवरी 2008 में बहुत सफल और महत्वपूर्ण रही ।

कारगिल में ली गई एक तस्वीर के लिए सर्वेश भारत सरकार से सम्मानित हो चुकी हैं .हिन्दी अकादमी सहित विभिन्न संस्थानों से सम्मानित हो चुकी हैं . सर्वेश 'गॉड फ्रे' सम्मान से सम्मानित हैं .  आजकल वे एक सफल फ्रीलांस ( स्वतंत्र ) फोटोग्राफर के रुप में सक्रिय हैं।







अब तक सर्वेश एक बहुचर्चित नाम  हैं ,जिसे शायद आज हम सब बखूबी


जानते हैं.  एक आम लडकी जो अपने पति की प्रताडना से परेशान थी यहां तक कैसे पहुंची ? निश्चित ही अपने डर और अपने औरत होने के मनोविज्ञान पर काबू पाकर .



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