नीला आसमान : दूसरी किश्त

शोभा मिश्रा
साहित्यिक -सामाजिक संगठन फर्गुदिया की संस्थापक 'संचालक शोभा मिश्रा कवितायेँ और कहानियां लिखती हैं. ये सक्रिय ब्लॉगर के रूप में सम्मानित हैं और दिल्ली में रहती हैं. संपर्क : shobhamishra789@gmail.com

( शोभा मिश्रा की यह लम्बी कहानी भारतीय समाज के उस बडे हिस्से की कहानी है, जहां औरत तय भूमिकाओं के लिए गढ़ी जाती है. छोटे -छोटे वे हर प्रसंग यहाँ बारीकी से और सहज भाषा में शामिल किये गए हैं , जो उन भूमिकाओं को तय करते हैं . उसी  परिवेश की लडकी सुनैना अपने मायके में अपने वजूद और निर्णयों के लिए लड़ते हुए अपने ससुराल में हार जाती है. हालांकि इस हार के लिए मायका भी उतना ही जिम्मेवार है, जितना ससुराल, फिर भी मायके और माँ के स्नेह को वह अपना अंतिम राजदार बनाती है , आख़िरी पत्र के द्वारा . )

केनवास पर सीनरी और चद्दरों, रूमालों पर रंग भरकर अपने मास्टरजी से सुनैना खूब स्नेह पाती थी...उसकी बनाईं सीनरी रिश्तेदार और पड़ोसी कभी -कभी खूब सराहकर माँग लेते ...वह और उसके घर के सदस्य संकोचवश मना नहीं कर पाते थे लेकिन रंग, केनवास और कपड़ों का खर्च निकालने के लिए सुनैना कभी-कभी अपनी सीनरी बेच भी देती थी! मास्टर जी चाचाजी के दोस्त थे...रंगों की दुनिया की विभिन्न कलाओं, विधाओं में वे माहिर थे...कभी-कभी जब घर आते तो सुनैना को पेंटिंग की बारीकियों के बारे में सिखाते थे! एक दिन सुनैना मास्टरजी के घर गई...मास्टरजी ग्लास पेंटिंग्स से भरा आर्टरूम देखकर हैरान रह गई...ग्लास पेंटिंग देखते-देखते बिल्लियों के जोड़ेवाली एक पेंटिंग पर उसकी निगाह ठहर गई ...मास्टरजी से पेंटिंग की इस नई विधा की जानकारी लेने के बाद बिल्लियों जैसी पेंटिंग बनाने की इच्छा जाहिर की...मास्टरजी ने छोटे-छोटे पारदर्शी शीशे के टुकड़े देते हुए उससे कहा कि जैसे समझाया है अभी तुम इस पर फूलों और सब्जियों की आकृति बनाकर प्रेक्टिस करना सीखो! बिल्लियों की आँखों और बालों में रंग भरना ये ग्लास पेंटिंग्स के मँझे हुए पेंटर भी ढंग से नहीं कर पाते हैं! लेकिन सुनैना तो बिल्लियों की आँखों में मन ही मन रंग भर चुकी थी!

उस दिन मास्टरजी के घर से लौटकर सुनैना भूरी ...सफेद और काली बिल्लियों के पेयर के बारे में ही सोचती रही ...मास्टरजी ने ग्लास पेंटिंग कैसे बनाई जाती है,...कैसे पारदर्शी शीशे पर पहले आकृति की सूक्ष्म लाइनों और शेड्स में रंग भरने होते हैं और बाद में बेस में रंग भरना होता है...जो समझाया था उसी के बारे में सोचती रही!दूसरे दिन ट्यूशन से लौटते समय फोटोफ्रेम करनेवाले की दुकान के आगे उसके पाँव थम गए, आगे बढ़कर फ्रेम में लगाये जानेवाले शीशे का दाम पूछ ही लिया...छः बाई चार इंच के पारदर्शी शीशे की कीमत पाँच रुपये थी!





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घर आकर अम्मा से सुनैना ने अपने मन की बात कही, पहले भी पेंटिंग के लिए रंग और कपड़ों का खर्च तो देना ही पड़ता था, अम्मा शीशे का पैसा देने के लिए भी राजी हो गई! दूसरे दिन ही सुनैना ने शीशा खरीदा और मन में उतरी बिल्लियों की आँखों की लाल-नीली नसों को शीशे पर सबसे पहले प्रत्यक्ष रूप दिया उसके बाद उनके शरीर के भूरे...पीले...सफेद ... काले रोयें में रंग भरती गई! एक धुन में पूरी रात शीशे पर बिल्लियों में रंग भरने में डूबी रही! सुबह होने वाली थी ...खिड़की से बाहर हल्का नीला उजाला बिखरा हुआ था इधर सुनैना के सामने शीशे पर बनी बिल्लियों का जोड़ा मुस्करा रहा था!शाम को जब उसने मास्टरजी को अपनी ग्लास पेंटिंग दिखाई...खुशी से स्तब्ध मास्टरजी पेंटब्रश मुँह में दबाये बस पेंटिंग निहारते रह गए ...बोले कुछ भी नहीं! थोड़ी देर बाद सुनैना के सर पर हाथ रखकर बस इतना ही कहा कि ‘‘ऐसे ही आगे बढ़ती जाओ...मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है!’’

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अब तो ग्लास पेंटिंग बनाने में सुनैना का मन खूब रमने लगा...शीशे के लिए अम्मा कभी-कभी पैसे दे देती थीं लेकिन कभी-कभी पेंटिंग्स के लिए रंग और शीशे...कपड़े के लिए पैसे माँगने पर घर में माहौल बहुत बिगड़ जाता था! चाचाजी सुनैना को हमेशा यही नसीहत देते की तुम अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो ...बहुत मुश्किल से पास भर हो जाती हो, ये सब चित्रकारी-वारी में कुछ नहीं रखा है! चाचाजी की बातों का कभी वह विरोध नहीं करती थी लेकिन अकेले में यही सोचा करती कि पढ़ाई में होशियार होना और कक्षा में अव्वल आना ही सबकुछ होता है क्या? आज हमारी बनाई कितनी सीनरी बिक जाती हैं। कुछ ग्लास पेंटिंग्स और सीनरी मास्टरजी की पेंटिंग्स के साथ प्रदर्शनी में भी शामिल की गई! दिल्ली के एक बड़े चित्रकार मास्टरजी की पेंटिंग्स के साथ हमारी भी पेंटिंग्स खरीदकर ले गए थे! ये सब छोटी-छोटी मन को संतोष देनेवाली उपलब्धि कम हैं क्या?

एक दिन जब सुनैना को शीशे के लिए पैसे नहीं मिले तो वो बहुत रोई ...अम्मा उसे समझाती रहीं, ‘‘रो मत ... जब हमरे पास होगा तब हम तुम का पेंटिंग के सामान के लिए पैसा जरूर देंगे!’’ सुनैना के पास आयल कलर और ब्रश था लेकिन उसे पेंटिंग बनाने के लिए शीशे की जरूरत थी! एक दिन दोपहर में अम्मा के पास लेटी- लेटी सुनैना ने अम्मा का हाथ अपने हाथ में लेकर बड़े प्यार से उनसे बक्से में रखी उनकी कढ़ाई की हुई फोटो के बारे में बात करने लगी! ‘‘अम्मा! उस फोटो का क्या करोगी? इत्ते साल से उसको बक्से में काहे रखी हो? उसको कमरे में सजा क्यों नहीं देती दीवार पर?’’ अम्मा स्नेह से उसके सर पर हाथ फिराती हुई बोली, ‘‘वो फोटो हमारे मायके की याद है...गर्मियों की दुपहरिया में ओसारा में तुम्हारी नानी के साथ बैठकर...साँझ को छत पर सखियों के संग हँसी -ठिठोली करते हुए ... दूर खेतांे में डूबते सूरज को निहारते हुए वो सब फोटो हम काढ़े हैं...दीवार पर सजाकर रंग खराब होई ... गिरके टूट भी सकत है...एक बार मायके की यादन के सँजोई धरोहर खत्म हुई जाई तब कहाँ मिली?’’

अम्मा का मायके की यादों से जुड़ी अपनी कला के प्रति इतना मोह देखकर सुनैना से कुछ कहते नहीं बना...चुपचाप अम्मा का हाथ पकड़कर सो गई! लेकिन एक दिन दोपहर में जब अम्मा और चाची बुलउवा में गईं थी तब सुनैना ने अम्मा का बक्सा खोलकर उनकी काढ़ी हुई कुछ फोटो से शीशा अलग कर लिया ... बहुत दिन से वो अम्मा और चाचा से पेंटिंग के सामान के लिए पैसा माँग रही थी...अम्मा तो मजबूर थी लेकिन चाचा ने गुस्से में पैसा नहीं दिया! रुई और रंग-बिरंगे सिल्क के कपड़े पर काढ़े हुए राधा- कृष्णा, तोता, मछली और खरगोश को उसने शीशे से अलग कर दिया...कुछ सितारे...मोती और टिकुलियाँ काढ़े हुए कपड़े से निकलकर नीचे फर्श पर गिर गए! अम्मा बुलउवा से लौटी तो ये सब देखकर थोड़ा दुखी तो हुईं लेकिन सहमी हुई सुनैना को देखकर मुस्करा दीं!

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आज सुनैना स्कूल से लौटी तो अम्मा, चाची, दादी खुश होकर आपस में कुछ बातें कर रही थी ...अम्मा के हाथ में अंतर्देशीय-पत्र था! वो अपना बस्ता रखकर सीधा अम्मा के पास गई और उतावली होकर अम्मा से पूछने लगी ‘‘किसकी चिट्ठी है अम्मा?’’ उसे लगा मामाजी के गाँव से चिट्ठी आई होगी तो उसमें नानीजी का भी हाल-चाल होगा! अम्मा प्यार से उसकी तरफ देखकर मुस्कराने लगी...दादी बोल पड़ी, ‘‘तुम्हरी मौसी की चिट्ठी है हफ्तेभर बाद तुमका लड़केवाले देखने आयेंगे!’’सुनैना चुपचाप उठकर वहाँ से चली गई...पिछले दो साल से अपने लिए विद्रोह करके वो थक गई थी ...अब सबकुछ स्वीकार कर चुकी थी! हाथ-मुँह धोकर अम्मा के कमरे में नीचे चटाई बिछाकर लेट गई! थोड़ी देर में अम्मा खाना लेकर आ गईं ...सुनैना अपनी आँखों और माथे पर बाँह रखकर सोने का प्रयास कर रही थी ...अम्मा ने धीरे से उसकी बाँह हटाते हुए उसे प्यार से खाना खाने के लिए कहा! वह उठकर बैठ गई और खाना खाकर फिर लेट गई...आज अम्मा उससे बहुत बात करना चाह रही थी...अम्मा का मन भारी हो रहा था लेकिन बिटिया की मनःस्थिति का ध्यान रखते हुए वह उसके पास से हट गई! अम्मा के जाते ही सुनैना ने अपनी आँखें खोल ली और कुछ सोचते हुए छत पर धीरे-धीरे घूमते पंखे को निहारने लगी!


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आज अम्मा सुनैना को अपनी शादी में मिली सितारे जड़ी गुलाबी साड़ी पहनाकर तैयार कर रही थीं, सुनैना के लम्बे बालों को समेटकर अम्मा ने एक सुन्दर लम्बी छोटी गूंथ दी थी, माथे पर छोटी सी लाल बिंदी सजा दी और कानों में अपने सोने के छोटे झुमके पहना दिए! चाची ने उसके दाहिने हाथ में अपने आर्टिफिशियल सुन्दर कड़ों का सेट पहना दिया, एक हाथ में सुनैना को शादी में देने के लिए घड़ी जो पहले ही खरीद ली गई थी वो अम्मा ने पहना दी! सावन के महीने में अगर दिनभर बरसा हुआ आसमान साफ हो तो वो शाम कुछ गुलाबी आभा लिये हुए मासूम सी सुन्दर सी नवयौवना लगती है, सुनैना वैसी ही शाम की तरह सुन्दर राजकुमारी जैसी लग रही थी!

एक अजीब उदासी सुनैना के चेहरे पर छाई हुई थी, वो बस लगातार शून्य में कुछ निहारे जा रही थी, अम्मा ने उसकी ठोढ़ी को अपने अंगूठे और अनामिका उँगली से ऊपर उठाकर उसका चेहरा अपनी तरफ किया...अम्मा और सुनैना की आँखंे मिली...अम्मा ने सुनैना की और सुनैना ने अम्मा की आँखों में उदासी के घिरे बादलों को देख लिया...इससे पहले कि सुनैना की आँखों के बादल बरसते ...अम्मा ने खटिया पर बैठी सुनैना का सर अपनी गोद में समेट लिया...अंकवार में भरकर धीरे से बस इतना ही बोल पाई, ‘‘देवी जइसन ... बिटिया हमार!’’
भीतर मन में तो दोनों के हृदय के धरातल पर बिछोह के बादल लगातार बरस रहे थे लेकिन दोनों ने ही आँखों में घिर आये बादलों को अभी फटने नहीं दिया था! अम्मा सुनैना का सर अपनी छाती से लगाए उसके माथे पर स्नेह से हाथ फिरा रहीं थी और सुनैना ने अम्मा की छाती में अपना चेहरा छिपाकर आँखें बंद कर ली थी!
‘‘ए ताईजी! वो लोग आ गए।’’

अम्मा ने हड़बड़ाकर सुनैना को अपने से अलग किया और गुडुआ से बोली, ‘‘ए बाबू! तुम्हरे पापा तो दरवज्जे पर हैं ना उनके स्वागत के लिए?’’ गुडुआ बहुत उत्साहित था अपनी ताईजी की बात सुनकर ये कहता हुआ घर के द्वार की तरफ भागा। ‘‘हाँ ताईजी ... पापा वहीं हैं!’’चाची भी भागकर घर की खिड़की से बाहर झाँकने लगी...अम्मा रसोई की तरफ दौड़ी...घर में सभी उत्साहित होकर लड़केवालों की आवभगत के लिए इधर-उधर दौड़- भाग करने लगे! दादी बड़बड़ाती हुई अम्मा को धीमी आवाज में नसीहत देने लगी - ‘‘ई रोना-धोना बाद में करिहो बहुरिया... अब ही तो मेहमान न के खातिरदारी करो जल्दी जायके।’’

चाचीजी और एक अनजान पुरुष की हँसी के साथ कुछ आवाजें सुनैना और उसकी अम्मा के करीब आती गईं!‘‘रस्ते में कोई परेशानी तो नहीं हुई?’’ ये चाचाजी की आवाज थी!‘‘नाही ... सुबह बहुत जल्दी -जल्दी करने के बाद भी घर से निकलने में दस बज गए ... रस्ते में दो जगह रुके ... लम्बे सफर में रिंकू की माँ की तबियत थोड़ी बिगड़ जाती है।’’अम्मा और चाची रसोई में मेहमानों के चाय-पानी के इंतजाम में व्यस्त थी...उदासी और घबराहट के मिलेजुले भाव के साथ बैठी सुनैना की आँखें जिज्ञासावश खिड़की की तरफ उठ ही गईं ...मार्च के महीने की हलकी गर्मी में सीलिंग फैन चल रहा था ...खिड़की पर लगा पर्दा पंखे की हवा से कभी-कभी ऊपर उठ जाता! करीब पैंतालिस साल की उस महिला की छवि गरिमामय थी लेकिन चेहरे पर मुस्कराहट के बाद भी एक हल्के अहंकार का भाव था...अधेड़ उम्र के हिसाब से उन्होंने खूब चटख बैंगनी रंग की साड़ी पहनी थी... सुनैना ने अंदाजा लगा लिया कि ये उसकी होनेवाली सासू माँ हैं! मौसी ने अम्मा...दादी ... चाची और नानी के सामने इनकी तारीफों के पुल बाँध दिए थे, पढ़ी- लिखी हैं ... घर सलीके से रखती हैं और बहुत शांत भाव की हैं! साथ में जो पुरुष थे उन्होंने सलेटी रंग की सफारी पहनी हुई थी, पैंतालिस के आस-पास उनकी भी उम्र होगी...चाचाजी से बात करते हुए उनके व्यवहार में सरलता झलक रही थी... चेहरे पर गंभीर भाव थे!

दो कमरों के बीच की दीवार की खिड़की से उठते-गिरते परदे से कभी-कभी सुनैना घरवालों द्वारा चुने हुए अपने ससुराल वालों को निहार लेती कभी अपने छोटे से कमरे की बाहरी दीवार की खिड़की से बाहर खड़ी फिएट को देख लेती ...क्रीम रंग की फिएट की तारीफों के पुल बाँध दिए थे मौसी ने, वो लोग बहुत अमीर हैं ... अपना बड़ा घर है... जमीन है ... कार है ... सुख और धन की कमी नहीं है घर में ... अपनी बिटिया राज करेगी उस घर में। गुडुआ अपने हम उम्र दोस्तों के साथ कार के आस-पास ही मंडरा रहा था ...सुनैना का मन हो रहा था कि जाकर उसको दो थप्पड़ लगा आये लेकिन दादी पास बैठी थी और अम्मा ने सख्त हिदायत दी थी कि जब तक लड़के वाले घर में रहे तुम बाहर मत निकलना!

तभी उसे चाचाजी की आवाज सुना ई दी, ‘‘जाइये ... आप भीतर जाकर बिटिया से मिल लीजिये।’’ कहकर चाची को आवाज लगाने लगे ...चाची और अम्मा उन लोगों को चाय नाश्ता कराने के बाद इसी इंतजार में बैठी थी कि शुक्लाईन (सुनैना की होनवाली सासू माँ) कब सुनैना बिटिया को देखने अन्दर आएँ!कमरे के दरवाजे का पर्दा हटाकर शुक्लाईन कमरे में दाखिल हुई...उन्हें देखते ही सुनैना खटिया पर से उठ गई और एक किनारे सर झुकाकर खड़ी हो गई...दादी ने पहले से ही सिखाया था कि उनके पैर छूले ना लेकिन सुनैना ने आज तक अपने घरवालों के अलावा किसी के पैर नहीं छुए थे ...उसे हिचकिचाहट हो रही थी लेकिन जब उसकी नजर दादी से मिली तो वो सहम गई ...दादी आँखें बड़ी करके उसे घूर रही थी और शुक्लाईन का पैर छूने का इशारा कर रहीं थी! सुनैना ने आगे बढ़कर पैर छू लिये ...सुनैना के दोनों कंधे को हाथ लगाकर शुक्लाईन ने उसे उठाया और कहने लगी, ‘‘अरे! जीती रहो ... आओ इहाँ हमरे पास बयिठो।’’

 सुनैना खटिया पर उनके पास बैठ गई ...दादी नीचे पाटा लेकर बैठ गई ...चाची और अम्मा दरवाजे पर अपने आँचल को पकड़कर खड़ी थी! शुक्लाईन चाची और अम्मा की तरफ इशारा करती हुई बोली कि, ‘‘आपो लोग बईठ जाओ।’’ अम्मा और चाची भी नीचे चटाई बिछाकर बैठ गई! इधर-उधर घर- परिवार की बातें होती रही...बीच-बीच में शुक्लाईन सुनैना से बात करके उसकी पढ़ाई-लिखाई और दूसरे हुनर के बारे में उससे पूछतीं रहीं...दादी ने जैसे-जैसे समझाया था वैसे ही सुनैना उन्हें जवाब देती गई! दादी तो जैसे उतावली हुई जा रही थी कुछ ऐसा सुनने के लिए जिससे वो आश्वस्त हो जाएँ कि शुक्लाईन को सुनैना पसंद है! एक बार तो वो बोल ही पड़ीं कि बिटिया आपके घर की हुई...अब ईका अपने घर लई जाओ!

सुनैना चुपचाप दादी की बात सुनकर मन ही मन कुढ़ती रही! तभी दूसरे कमरे से शुकुलजी ने शुक्लाईन को आवाज लगाई, ‘‘अरे अब चला जाए ... घर पहुँचते-पहुँचते देर रात होई जाई।’’ शुक्लाईन उठते हुए अपने बड़े पर्स में से अंगूठी निकालकर सुनैना को पहनाती हुई बोली, ‘‘अब हमरे रिंकू ने तो बहुरिया को पसंद ही कर लिया है तो हम कैसे मनाकर सकते हैं ... आपकी बिट्टो (मौसी) ने हमरे बेटे पर न जाने कौन सा मंत्र मारा है कि उ ब्याह के लिए इत्ती छोटी उम्र मा तैयार हो गया...। नाही तो अब ही हमरे बिटवा की उम्र ही कित्ती है ... खेले-खाए ... पढ़े-लिखे की उम्र माँ हमरे बिटवा को प्रेम का रोग लग गया।’’ शुक्लाईन मखौल वाली हँसी हँस पड़ीं!सुनैना को उनकी बात नागवार गुजरी लेकिन करती भी क्या...चुप रह गई! वो तो अपनों से हारी थी! अँगूठी पहनाने के बाद शुक्लाईन फिर बैठक में चली गईं। बैठक में बैठे चाचाजी और शुक्लाजी कुछ संकल्प की बात कर रहे थे...सुनैना को ये बातें कुछ कम समझ आ रही थी वह ध्यान से उनकी बातें सुनने लगी ...चाचाजी याचना करते हुए कह रहे थे, ‘‘बीस हजार हम आपको कैश देंगे उसके बाद शादी का खर्च भी तो है...आप जिद पर न अड़े रहिये!’’

इस बार सुनैना शुक्लाईन की बात सुनकर क्रोध और घृणा के भाव से भर गई! हँसकर शुक्लाईन चाचाजी से कह रही थी कि तब आप रहे दियो पाड़ेजी हमर बिटवा कौनो मछली नाही है ,जो सड़ जाई!इस बार के व्यंग्य से सुनैना ने दादी और अम्मा को घूरकर देखा...अम्मा आश्वासन में एक हाथ उठाकर दूसरे हाथ की उँगली चुप कराने के संकेत में अपने होठों पर रखती हुई सुनैना को चुप रहने का इशारा किया! उसके बाद सुनैना वहाँ से उठकर रसोई में कपड़े बदलने चली गई! चाचाजी उन लोगों के साथ कुछ देर बात करते रहे उसके बाद बैठक में सभी लोग लड़केवालों को विदा करने के लिए इकट्ठे हो गए! विवाह की तारीख की कुछ बातें करते-करते सभी घर से बाहर निकल गए! सुनैना खिड़की से बाहर उन्हें वापस जाता हुआ देखती रही!

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अम्मा-बाबा के साथ साथ गुड्डे-गुड़िया का, सखियाँ, बचपन सब पीछे छूट गया! दादी की इस सीख, ‘‘बिटियाँ! ससुराल में सबके खूब इज्जत करिहो ... मायके जइसन गुस्सा ससुराल माना करिहो...बिटिया! नई बहुरिया कुछ साल धीरज धरके बड़न के सेवा-सत्कार करीले और छोटन के स्नेह दे तो बाद मा ससुरालवाले ओका सर-आँख पर बईठा के रखत हैं...सोवे से पहिले सास के गोड़ जरूर दबायो ... सर मा तेल रखि के दबा दिहा करियो ... एक बार रसोई ढंग से सँभाल लिहो तो ससुराल माँ राज करिहो!’’ के साथ सुनैना मायके से विदा हो गई ...मायके की यादों के साथ उसी की बनाईं सीनरी, चद्दरें, रूमाल, मेजपोश और गिलास पेंटिंग अम्मा और दादी ने एक अलग बक्से में रख दिया ... रंगों से सजे अपने भविष्य के सपनों को वो अपने साथ दूसरी दुनिया में ले जा रही थी इस उम्मीद के साथ कि उसके सपनों की बेल जिसकी नर्म, नन्ही टहनियाँ आतुर हैं एक मजबूत सहारे को...वो उसे एक ना एक दिन जरूर मिलेगी और उसके सपनों की बेल ऊँचे आसमान की ओर बढ़कर अपने रंगों की छटा बिखेरेगी!

सुनैना को विदा करते समय अम्मा तो एक बार फिर जैसे मानसिक प्रसव पीड़ा से गुजरी...!पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार ससुराल में द्वार से ही खूब मान-सम्मान के साथ के साथ सुनैना को घर के भीतर लाया गया ...सफर की थकान ... अपनों से दूर होने के दुःख के साथ पियरी साड़ी में लिपटी बुत बनी सुनैना को उसकी नन्द और दूसरी औरतें स्नेह से सँभालकर हँसी-ठिठोली करती हुई घर के भीतर ले गईं ... बाँस की और मूँज की हाथ से बनी रंग-बिरंगी डलिया में पैर रखकर घर के भीतर जाती हुई सुनैना अपने पाँव के नीचे से अपने ही वजूद की जमीन से छीनी जानेवाली मिटटी से अनजान जो जिस दिशा ले गया ... उसी ओर बढ़ती गई!
कोहबर पूजन की रस्म के बाद मुँह दिखाई की रस्म हुई ... टोले-मोहल्ले और परिवार की औरतों सुन्दर बहुरिया को देखकर खुश थीं ...‘‘शुक्लाइन! अब तो तुम आराम करो...बाजार-हाट और बुलउवा घूमो ... तुम्हार घर और रसोई सँभालेवाली आ गई!’’

शादीशुदा नन्द और उनकी जेठानियाँ उसे अकेली देखकर पास में बैठकर अम्मा-चाची के जैसे सासु को खुश रहने के तरीके समझाती...अपनी नन्द की एक बात उसकी समझ नहीं आई, ‘‘देखो बहुरिया! रात का कमरे में आये के देरी मत करिहो ... दिनभर घर के बहुत काम होत है... रसोई के काम निपटावे लगो तो पूरी रात बीत जाए...रात के बर्तन एक किनारे रख दिहा करिहो...मरद-मनई राती के अपनी मेहरारू समय से पास देखा चाहत हैं!’’ वो बस चुपचाप कभी अपनी नन्द का कभी उनकी जेठानी का चेहरा देखती रही! थकी-हारी, उँघती सुनैना ये सब बातें सुनती रही ... जमीन पर बिछे गद्दे पर बैठी ना जाने कब उसे नींद आ गई...!

अम्मा, नानी और चाची की नसीहत के अनुसार सुनैना ने ससुराल की गृहस्थी सँभाल ली...दस-बारह सदस्यों के संयुक्त परिवार का भार उसने अपने नन्हे कन्धों पर उठा लिया...सुबह पाँच बजे उठकर पूरे घर का झाड़ई-बुहारू करने के बाद नहा -धोकर दादी सास की पूजा की तैयारी और फिर उसके बाद रसोई में का काम खत्म करके सफाई- करते दोपहर हो जाती ... थकी - हारी कुछ देर आराम करती फिर से शाम की रसोई...देर रात तक दादी-सास और सासू-माँ के पैर दबाकर बिस्तर पर निढाल ऐसे गिरती जैसे मीलों पैदल ऊँचे पहाड़ की चढ़ाई चढ़कर आई हो! उस रात नींद आँखों से कोसों दूर थी लेकिन ब्रह्ममुहूर्त में एक चिड़िया की आवाज सुनकर देह और उससे भी ज्यादा मन के घाव भूलकर सुनैना ने आँखें खोल लीं ... ये एक नया अनुभव था, जिसके बारे में चाची, दादी और अम्मा किसी ने भी नहीं समझाया था। अम्मा के कहे अनुसार रिंकूजी बहुत ही सभ्य और शालीन थे। सुनैना के हर सुख-दुःख में उसका खयाल रखते थे लेकिन बीती रात क्या हुआ था उन्हें ... रिंकूजी जानते थे कि वो तीन दिन से बुखार से तप रही थी...अन्न का एक दाना भी उसके मुँह में नहीं गया था...अपनी तरफ से बस हलका विरोध भरकर सकी थी लेकिन रिंकूजी की जिद के आगे उसे झुकना पड़ा...कमजोर शरीर ये अप्रत्याशित नोच-खसोट सह गया लेकिन आत्मा कहीं भीतर तक छिल गई! उसे बचपन में सुनी नानीजी की कहानियाँ याद आ गई... राजकुमारी और राजकुमार की कहानी में एक राक्षस भी होता था जो राजकुमारी पर हमेशा बुरी नजर रखता था और उनसे दुर्व्यवहार करता था...राजकुमार उस राक्षस से राजकुमारी की रक्षा करता था...वह कहानी सुनते-सुनते नानीजी को बीच में ही रोककर पूछती बैठती कि बुरी नजर क्या होती है नानी ...दुर्व्यवहार क्या होता है। नानी राक्षस को बुरा बताते हुए कहती कि बाबू! राक्षस ने राजकुमारी के साथ बुरा किया...उस पर बुरी नजर डाली।



आज रिंकू में सुनैना को नानी जी की कहानियों वाला राक्षस नजर आया ... देर तक अपनेे बिस्तर पर बैठी रोती रही ... समझ ही नहीं पा रही थी कि किससे क्या कहे।बगल में ही बिस्तर पर रिंकू बेसुध सो रहे थे ...आज पहली बार रिंकूजी के साथ वह भयभीत थी। खुद में ही सवाल-जवाब और वेदना में डूबी उसकी तंद्रा तब टूटी जब रिंकू के हाथों का स्पर्श उसने अपने पैरों में महसूस किया। रिंकू उसके पैरों के पास बैठे फूट-फूट कर रो रहे थे ... रिंकू का यह रूप देखकर वो हैरानी और असमंजस में पड़ गई ,‘‘पति परमेश्वर होता है,’’ दादी, चाची और नानी ने अभी तक यही पाठ पढ़ाया था ... झट से रिंकू जी को कंधों से पकड़कर उठाती हुई सुनैना बोली...‘‘ये आप क्या कर रहे हैं? हम पर पाप चढ़ाएँगे क्या?’’ रिंकूजी को अपनी रातवाली गलती का अहसास था!
अम्मा और नानी से चिट्ठी में ससुराल की हर बात का जिक्र करने वाली सुनैना आज रात का जिक्र कैसे करती? आज उसे शादी के पहले दिन अपनी नन्द और उनकी जेठानी की कही बात याद आ गई कि- ‘‘मरद-मनई अपनी मेहरारू के राती में समय से अपने पास देखा चाहत हैं!’’कुछ ही दिनों में रिंकू जी की सरकारी नौकरी लग गई दूसरे शहर में...कुछ महीने बाद घर देखकर वे उसे अपने साथ ले जायेंगे...जाते समय सुनैना को ये दिलासा दे गए थे।

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आज सुनैना की अम्मा की खुशी का ठिकाना नहीं था...मास्टर जी जो खुशखबरी लेकर आये थे उससे वह खुशी से फूली नहीं समा रही थी...मास्टर जी ने अपनी पेंटिंग की प्रदर्शनी में सुनैना की जिन पेंटिंग्स को भी शामिल किया था उसमें से बिल्लियों के जोड़े वाली ग्लास पेंटिंग्स को एक प्रतिष्ठित अकादमी द्वारा सम्मानित करने के लिए चुना गया था! अम्मा ने चिट्ठी में ये शुभ संदेश लिखकर सुनैना को भेज दिया! अम्मा अब सुनैना के भविष्य को लेकर आश्वस्त थी...उनकी बिटिया के सपनों को सतरंगी आसमान मिल गया था...उसके हुनर को एक दिशा मिल गई थी...अम्मा के मन में एक उम्मीद की किरण दिखाई दी कि शायद इस उपलब्धि से सुनैना के परिवार वालों का मन भी बदल जाए...चिट्ठी पढ़कर उनकी फूल-सी बिटिया कितनी खुश होगी ... इसका अंदाजा वह लगा सकती थी... आखिरकार उसकी माँ जो थी...

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ससुराल में सुनैना के हाथ से रंग और ब्रश तो जैसे छूट ही गया था...कभी-कभी दोपहर में रंग-ब्रश लेकर बैठती भी तो जान बूझकर सासू-माँ कोई न कोई काम उसे बता देतीं... मायके की बनाई पेंटिंग सुनैना ने ससुराल की घर के सभी कमरों की दीवार पर सजा दिया...सासू-माँ के कहने पर चद्दरें और मेजपोश भी बिस्तर और मेज पर बिछा दिए...घर और रसोई के कामों से कभी भी सासू माँ संतुष्ट नहीं होती थी ... कुछ न कुछ कमी निकलकर सुनैना और उसके मायके वालों की उसी के सामने खूब इज्जत उतारती थी! लेकिन सुनैना को विश्वास था कि एक दिन सब ठीक हो जायेगा...चिट्ठी में अम्मा से अपनी सासू माँ के बुरे व्यवहार का जिक्र तो करती थी लेकिन मानसिक और शारीरिक रूप के प्रताड़ना की असह्य पीड़ा को छिपा ले जाती थी ... अम्मा पत्रों के जवाब में यही दिलासा देतीं कि एक दिन जब रिंकू जी की नौकरी लग जायेगी तब सब ठीक हो जायेगा!

एक शाम सासू-माँ कहीं पड़ोस में गई थी...घर में कम ही लोग थे...सुनैना आज बहुत दिन के बाद ऑयल कलर लेकर बैठी थी...शीशे पर ऊँचे बर्फ से ढँके पहाड़, चिनार-देवदार के वृक्ष और गहरी नील झीलवाली सीनरी अभी पूरी ही होने वाली थी कि उसे सासू-माँ की तेज चीख सुनाई दी...सब कुछ छोड़कर वो रसोई की तरफ भागी...चूल्हे पर दूध उफन कर नीचे बह गया था... जल भी गया था... वह रंगों में इतनी ज्यादा खोई थी कि उसे दूध जलने कि महक भी नहीं आई!सासू-माँ क्रोध से काँप रही थी... लगातार चीख रही थी... ‘‘कौन बुरे कर्म किये थे कि ई दिन देखे पड़त है... जब से ई घर माँ आई है ... एक्को दिन हमार चैन से ना बीता...रोज कौनो न कौनो बर्बादी ... अरे हमहूँ तो इत्ता बड़ा परिवार सँभाले रहे...कब्बो केहू हमरे काम पर उँगली नाही उठाया।’’ बड़बड़ाती हुई सासू माँ उसके कमरे के बाहर आकर रुक गई ... फर्श पर रंग की शीशियाँ और ब्रश देखकर उनका गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया...कमरे के भीतर जाकर अपने पाँव से सारे रंग बिखेर दिए ... पूरे कमरे में पानी और रंग बिखर गया... उससे भी उनका गुस्सा शांत नहीं हुआ बिस्तर और मेज पर चढ़कर दीवार से सारी पेंटिंग्स उतारकर फेंकने लगी...उसके कमरे के बाद बाकी दूसरे कमरों से भी उन्होंने पेंटिंग्स उतार कर नीचे फर्श पर पटक दी...इससे पहले कि सुनैना कुछ समझ पाती ... सासू-माँ सबकुछ चकनाचूर कर चुकी थी...घर के सभी लोग उसे ही बुरा-भला कह रहे थे ... सासू-माँ को दिलासा दे रहे थे...वह खुलकर रो भी नहीं सकी...कुछ देर बाद झाड़ू लेकर पूरे घर को साफ करने लगी ... काँच के टुकड़े समेटते हुए उसे अम्मा बहुत याद आई...उसे बिखरे कांच के टुकड़ों के पीछे से झाँकती अम्मा की बनाईं रोती-बिलखती फोटो नजर आ रह थी...मानो कह रही हों कि तुमने अपनी अम्मा के मायके की यादों को मिटा दिया...आँसुओं से भरी आँख से भी स्मृतियों के साफ आसमान पर उसे अम्मा की शादी से पहले बनाई हुई फोटो साफ दिख रही थी!
 रात का काम खत्म करके वो रसोई में ही बैठ गई...देर रात घर में सभी लोग सो चुके थे...पेंटिंग के साथ-साथ उसके भीतर बहुत कुछ टूट गया था...घुटनों में मुँह छिपाकर वो खूब रोई ... विक्षिप्त, बदहवास ...कोई उसे सँभालने वाला नहीं था... ना जाने कब तक अकेली रोती रही... अचानक उठकर अनाज के ड्रम में कुछ ढूँढ़ने लगी... अनाज के ड्रम से छोटी-छोटी पुड़िया निकालकर जल्दी से हाथ में उसकी गोलियाँ ले ली... कुछ देर गोलियों को देखकर कुछ सोचती रही उसके बाद सारी गोलियाँ झटके से मुँह में रख ली ... आधा गिलास पानी पीकर सर दीवार से टिकाकार आँखें बंद करके बैठ गई...अचानक उसे अपनी अम्मा और नानी का ध्यान आया ... अपने प्रति भी मोह जागा लेकिन शायद अब देर हो चुकी थी...एक कागज और कलम लेकर बैठ गई और अपनी अम्मा को चिट्ठी लिखने लगी...


अम्मा!

हम बहुत बुरे हैं अम्मा, हमने तुम्हारी सीसे मढ़ी हुई रुई की मछरी ...खरगोश... सुग्गावाली कलाकृतियाँ अपने लिए उधेड़कर- बिखेर दीं थी, आज बहुत दुःख हो रहा है। अम्मा, लाल टिकुली से तुमने सुग्गे की आँख बनाईं थी, लाल रिबन से बना उसके गले का घेर कितना सुन्दर था, छोटी-छोटी रंग-बिरंगी मोतियों से उसके हरे पंखों को तुमने सजाया था! अम्मा! तुम्हारी मायके की यादों को नोच-नोचकर हमने नष्ट कर दिया, सिर्फ अपना स्वार्थ सोचती रही, रुई से बनी कलाकृतियों में तुम्हारी आत्मा बसती थी, अपनी कला को निखारने के लिए तुम्हारी बुनी हुई कला को मिटाती रही! तुमने उफ तक नहीं किया अम्मा! आधा तुम्हारा... आधा हमारा मिलकर भी कुछ पूरा नहीं बन सका अम्मा! जानती हो? जिस पेंटिंग के लिए हमने तुम्हारी सुन्दर फ्रेम में शीशे मढ़ी रुई से बनी पक्षियों, जल-जीवों को खंड-खंड बाँट दिया था और उस शीशे पर सुन्दर आयल पेंटिंग बनाई थी आज वो सारी पेंटिंग सासू माँ ने गुस्से में तोड़ दी! मेरा तो कुछ नहीं बचा अम्मा, सख्त संगमरमर की फर्श पर गिरते ही शीशे की पेंटिंग चूर-चूर हो गई। लेकिन हमको ध्यान है अम्मा, जब हम तुम्हारी बनाई फोटो में से शीशा अलग कर रहे थे तब सूत पर रुई से बनाईं कलाकृतियों को हमने फर्श पर लापरवाही से फेंका था और शीशे को अपने लिए सहेज लिया था, जो हमने फेंक दिया था वह टूटा-बिखरा नहीं था, जो सहेजा था आज वो सब चकनाचूर हो गया!
तुम तो हर चीज सँभालकर रखती थी न अम्मा? हमको उम्मीद है जो हमने फेंक दिया था वो तुमने सँभालकर रखा होगा! हम तो तुम्हारी बिगड़ी संतान पहले से ही थे, ब्याह के सात साल बाद भी कुछ नहीं सीख पाए, तभी तो आज हमको ये सजा मिली है, अम्मा! तुम नहीं जानती, उस पेंटिंग के साथ हम भी आज चूर-चूर हो गए, आज हम हार गए अम्मा...किसी भी इंसान की रुचियाँ, उसका हुनर शायद उसकी आत्मा होता है...हम अपनी काया के भीतर अपनी आत्मा को बचाये रखने के लिए संघर्ष करते रहे...लेकिन अंततः उसको बचा नहीं सके ... अब काया को कब तक ढोएँ? तुम होती तो उदासी और हताशा में हमारा सर सँभाल लेतीं लेकिन बिखरे-बिखरे आज हम को होश नहीं कि हमने कितनी बार दीवार में अपना सर पटका है, बहुत दर्द हो रहा है अम्मा! तुम तो हमको समझाई थी कि जब भी दुखी होना ... हमको चिट्ठी लिख देना, वही चिट्ठी लिख रहे हैं अम्मा! तुमसे और नानी से बहुत कुछ बतियाने का म...न्न्न् ,इसके बाद सुनैना की आँखों के सामने से अपने ही लिखे अक्षर धुँधलाने लगे...
अवचेतन में भी उसे नानीजी का स्नेहिल स्पर्श महसूस हो रहा था...रुँधे स्वर में अम्मा की पुकार मानो उसे रोक लेना चाहती थी ! नीला आसमान ...हरे-भरे वृक्षों वाली सीनरी ... तन्मयता से रंग भरी बिल्ली के जोड़ों वाली पेंटिंग्स...मास्टर जी की हौसला-आफजाई...चद्दरें ... मेजपोश के रंग! उसे उम्मीदों के नए आसमान में ले जाना चाहते थे लेकिन चाहकर भी वो उन रंगों को ज्यादा देर तक देख नहीं सकी। धीरे-धीरे उसकी आँखों के आगे स्याह अँधेरा छाता जा रहा था। शून्य विराम की... एक अनंत यात्रा की शुरूआत थी ये...शायद...।
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