प्रेमचंद का साहित्य और दलित स्त्री


( रानी कुमारी के द्वारा 'प्रेमचंद का साहित्य और दलित स्त्री' विषय पर आयोजित संगोष्ठी की रपट।  रानी दिल्ली वि वि में शोधरत  हैं.  )

 “ प्रेमचंद पर बात करना मुश्किल हैं। कहाँ से शुरू करें! इस विषय पर एक खुली बहस होनी चाहिए। यह पहली बहस है जो इस मंच पर हो रही है। पिछले कुछ वर्षों से दलित  साहित्यकारों में कथाकार प्रेमचंद को लेकर विवाद है। यह विवाद सच में कोई मायने रखता है या केवल विवाद के लिए विवाद है। यह गौर करने वाली बात है प्रेमचंद और उनके साहित्य पर आज दलित साहित्य व साहित्यकारों द्वारा तीन प्रकार से चर्चा हो रही है, प्रेमचंद पर चर्चा करने वाली सबसे पहली धारा उन साहित्यकारों की हैं, जो दलित साहित्य में प्रेमचंद के योगदान को अमूल्य मानते हैं। दूसरी धारा में वे दलित साहित्यकार आते हैं, जो प्रेमचंद की वैचारिकी पर प्रश्न-चिन्ह लगाते हुए उन्हें एक तरफ पक्के ‘गांधीवादी’ और दूसरी तरफ कट्टर ‘अंबेडकर विरोधी’ घोषित करते हैं। इस धारा के साहित्यकार प्रेमचंद की कहानियों के कथ्य, भाषा और विचार पर  सवाल खड़े कर उन्हें दलित चेतना की दृष्टि से खारिज करते हुए ‘ब्राह्मणवादी’, हिंदुवादी और न जाने किस-किस पदवी से विभूषित करते हैं।  तीसरी तरह की विचारधारा दलित साहित्य में उन संकीर्ण जातिवादी दलित लेखकों की है, जो साहित्यकार प्रेमचंद के योगदान को पूर्वाग्रही नजरिये से अपने ही कुतर्कों, मनगढ़ंत, कुपाठ और गलत पाठ करते हुए उनकी जाति कायस्थ होने की कसौटी पर कसकर उनकी व उनके साहित्य की घोर जातिवादी आलोचना कर रहे है।‘

उक्त बातें अपेक्षा के सम्पादक डॉ. तेज़ सिंह की स्मृति में ‘प्रेमचंद का साहित्य और दलित स्त्री’ विषय पर ‘साहित्य सवांद’ के द्वारा आयोजित संगोष्ठी में ‘साहित्य संवाद’ की संस्थापिका और लेखिका तथा सामाजिक कार्यकर्ता अनिता भारती ने कही.

फोटो : संघपाली अरुणा लोकशक्ति 


घर के ड्राईंग रूम से शुरु होकर डॉ. तेज सिंह की स्मृति में आयोजित ‘साहित्य संवाद’ की तृतीय संगोष्ठी गत शाम 28 जुलाई को गांधी शांति प्रतिष्ठान में सुगठित रूप से सम्पन्न हुई। हाल ही में स्थापित ‘साहित्य संवाद’ की यात्रा का विकास दिनोंदिन बढ़ रहा है। यह इसके लिए बहुत ही उत्साह की बात है। विकास यात्रा की कड़ी में “प्रेमचंद का साहित्य और दलित स्त्री” विषय पर आयोजित इस संगोष्ठी की अध्यक्षता रमणिका गुप्ता ने की तथा मुख्य वक्ता के रुप में सुमित्रा मेहरोल, वैभव सिंह, रजनी दिसोदिया, कवितेंद्र इंदु, गंगासहाय मीणा, प्रियंका सोनकर उपस्थित रहें। टिप्पणीकार के रूप में बहुत ही संक्षेप में विषय पर अपनी बात बजरंग बिहारी तिवारी और टेकचंद ने प्रस्तुत की। इस सारगर्भित संगोष्ठी के महत्वपूर्ण विषय से परिचय अनिता भारती ने करवाया। उसका सुनियोजित और सफल संचालन धर्मवीर सिंह ने. वहीं सभी अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापन जे.एन.यू शोधछात्रा आरती रानी प्रजापति ने कर इस संगोष्ठी का समापन किया।

दलित साहित्यकार अनिता भारती ने इस विषय की गंभीरता, उस पर विमर्श की आवश्यकता और उस पर विवाद आदि इन बिंदुओं पर बात करते हुए प्रेमचंद को बिना किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित एक सजग लेखक के रूप में समझने की बात कही। उन्होंने सवाल उठाया कि हमें उन पर आरोप लगाने से पहले यह सोचना चाहिए कि क्या प्रेमचंद स्त्री को स्त्रीत्व के सभी गुणों के साथ चित्रित करना चाहते थे और क्या वह ऐसा कर पाये हैं? उन्होंने कहा कि दलित साहित्य का अर्थ केवल प्रतिकार करना भर नहीं है। सुमित्रा मेहरोल कहा कि प्राय: दलित स्त्रियाँ जाति और पितृसत्ता से पीड़ित दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद के यहाँ दलित स्त्रियों केवल डर, हीनता ही नहीं मिलती बल्कि उनमें निर्भीकता भी देखी जा सकती है। वैभव सिंह ने कहा कि प्रेमचंद के विश्लेषण का अर्थ है कि उनके समय का विश्लेषण। सेवासदन में उनकी जो संवेदना सवर्ण स्त्रियों के प्रति दिखाई देती है वह आगे चलकर दलित स्त्रियों के प्रति भी देखी जा सकती है। रजनी दिसोदिया ने कहा कि प्रेमचंद और हिंदी दलित आलोचना एक चलता सिक्का है जिसे हर कोई चलाता आ रहा है। हिंदी आलोचना की एक बनी बनाई पद्धति से किसी भी निष्कर्ष पर तुरंत पहुँचकर उसे सिद्ध सत्य मान लेना गलत है। उन्होंने ‘कफन’ कहानी में बुधिया के प्रसव के दौरान बेखबर और अनुपस्थित स्त्री समाज की मानवीयता पर सवाल उठाया। कवितेंद्र इंदु ने कहा क्या दलित स्त्रियों का सवाल स्त्रियों के सवाल से हटकर हैं? दलित स्त्रीवाद और प्रेमचंद में जरुर कुछ सामान है तभी दलित स्त्री पर यहां बात की जा रही है। जे.एन.यू से डॉ. गंगा सहाय मीणा ने प्रेमचंद साहित्य में एक दो स्थान पर मामूली रूप से चित्रित आदिवासी समाज के मुख्य या कहें तो गंभीर समस्या के रूप में चित्रण से नादारद पर गहरी चिंता जताई। उन्होंने बताया कि प्रेमचंद के समय में भी व्यापक स्तर पर कई आदिवासी आंदोलन चल रहे थे, जिनका कहीं कोई चित्रण प्रेमचंद की लेखनी नहीं कर पायी। जे.एन.यू. शोधछात्रा प्रियंका सोनकर ने कहा कि प्रेमचन्द को केवल दलित विरोधी मानना ठीक नहीं है। उन्होंने कहा प्रेमचंद के पूरे साहित्य में शोषितों वंचितों के प्रति संवेदनाएं ही चित्रित की हैं, जो उन्हें दलितों के पक्ष में भी खड़ा करती हैं।
फोटो : संघपाली अरुणा लोकशक्ति 


वरिष्ठ आलोचक तथा संगोष्ठी की अध्यक्षा रमणिका गुप्ता प्रेमचंद को इस मामले में गलत नहीं ठहराती हैं उनके अनुसार कोई भी सजग से सजग लेखक समाज के सभी मुद्दों पर बात करें यह कोई जरुरी नहीं। ऐसे नियम लेकर आप किसी भी साहित्यकार का मूल्यांकन नहीं कर सकते। कहानीकार टेकचंद ने प्रेमचंद को अपने समय के आईने में ना देखने के बजाय उनके समय के आईने में देखने पर जोर दिया। वरिष्ठ दलित आलोचक बजरंग बिहारी तिवारी ने कहा कि इस संगोष्ठी में उठे गंभीर मुद्दे और निकले परिणामों को देखते हुए इस विषय पर किसी पत्रिका का विशेषांक जरुर आना चाहिए ताकि इससे जुड़े सभी बिंदु एक जगह देखे जा सके। उनके हिसाब से यह विषय एक केवल संगोष्ठी में संपूर्णता नहीं पा सकता यह इसकी शुरुआत हो सकती है अंत नहीं। इस तरह गंभीर और व्यापक विमर्श की मांग करती हुई यह संगोष्ठी सावन की हल्की-फुल्की रिमझिम की सौंधी महक के साथ समाप्त हुई।




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