महिला मताधिकार पर बहस : सन्दर्भ बिहार विधान परिषद ( १९२१ , १९२५, १९२९ )

डा मुसाफिर बैठा
डा मुसाफिर बैठा कवि और सामाजिक -सांस्कृतिक विषयों के चिन्तक हैं . सम्प्रति बिहार विधान परिषद् में कार्यरत हैं. संपर्क : 09835045947, musafirpatna@gmail.com

( बिहार विधान परिषद में महिला मताधिकार के प्रस्ताव तीन बार आये . १९२९ में महिला मताधिकार पारित करने वाला बिहार उन राज्यों में था , जो काफी हद तक इस अधिकार के खिलाफ  अड़ियल थे . १९२१ , १९२५ ,१९२९ में प्रस्ताव पर बहस में वे सारे पुरुषवादी विमर्श , कुतर्क और चालाकियां दिखते हैं , जो आज महिला आरक्षण बिल के सन्दर्भ में हमारे सामने हैं . अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद  और उसकी समीक्षात्मक प्रस्तुति कर रहे हैं डा. मुसाफिर बैठा .)

वाद-विवाद का यह भाग महिलाओं के मतदान के विषय में तीन मुद्दों पर बात करता है और यह उनके प्रतिनिधित्व के प्रश्न पर बहस का वृहतर हिस्सा बनता है.महिलाओं के शिक्षा, स्वास्थ्य-सुविधा से वंचित होने एवं बाल-विवाह की प्रथा से नकारात्मक रूप से प्रभावित होने के चलते बिहार की महिलाओं की स्थिति तत्कालीन पढ़े-लिखे बिहारी अभिजन वर्ग के लिए चिंतन का विषय थी. विगत शताब्दी के आरंभिक दशकों में, बंगाल तथा मद्रास एवं बॉम्बे प्रान्त के मुकाबले बिहार में महिलाओं की साक्षरता दर काफी कम थी. महिला साक्षरता के इस परिप्रेक्ष्य में बिहार के शिक्षित मध्यम वर्ग द्वारा विधान परिषद् एवं अन्य सार्वजनिक विमर्शों में बाल-विवाह पर रोक एवं महिलाओं के मताधिकार मिलने पर एक साथ जोर दिया जा रहा था.सन 1912में मोहन राय सेमिनरी में श्रीमती मधोलकर की अगुआई में आयोजित एक सभा में बाल-विवाह के अभिशाप को खत्म करने एवं महिलाओं के बीच शिक्षा का प्रसार करने के लिए कुछ जरूरी उपाय सुझाये गए.
बीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक के आते-आते महिलाओं का मताधिकार विधान विषयक एक केन्द्रीय मुद्दा बन गया था. 22 नवंबर1921को बाबू देवकी प्रसाद सिन्हा ने सदन में महिला-मताधिकार पर एक विशेष संकल्प लाया. यह इस अर्थ में ‘विशेष’ था कि सदन द्वारा इसके पारित होने के बाद सरकार के लिए यह बाध्यकारी हो जाता कि वह इस सम्बन्ध में जरूरी कदम उठाये.अपने भाषण के केन्द्रीय बिंदु पर आने से पहले इस मुख्य वक्ता ने दो बातों पर जोर दिया. प्रथम कि महिलाओं के मताधिकार की मांग पर अन्य मंचों पर  बहस एवं विचार-विमर्श हुए हैं. उन्होंने 1918 के उस वाकये की भी हल्की चर्चा की कि कैसे बॉम्बे की कुछ नामचीन महिलाओं ने महिला-मताधिकार के प्रश्न पर बॉम्बे प्रांतीय सम्मलेन में प्रतिनिधित्व किया और सम्मेलन ने इसपर अपनी मुहर लगाई. उन्होंने सदन को यह भी बताया कि 1918 में ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस एवं ऑल इण्डिया मुस्लिम लीग दोनों ने इसी तरह के एक संकल्प को अपनी स्वीकृति दी थी. उन्होंने एक महिला संघ की कुछ महिलाओं के एक प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करते हुए सरोजिनी नायडू के लन्दन दौरे का सन्दर्भ भी दिया जोमहिला-मताधिकार के मुद्दे पर समर्थन जुटाने के प्रयास में था. यह प्रयास फलीभूत भी हुआ. लन्दन की सदन (ब्रिटिश पार्लियामेंट) की संयुक्त समिति ने इस मुद्दे पर संज्ञान लिया.

अपने इस संकल्प में उन्होंने सदन के सदस्यों के उन पूर्वग्रहपूर्ण ‘भ्रांत धारणाओं’एवं ‘आशंकाओं’का भी संज्ञान लिया जो संकल्प के पारित होने के बाद के प्रभावों के बारे में थीं.पहला, सदन में लिंग की स्थिति में परिवर्तन का था जो अगले चुनाव के बाद विधान परिषद् में महिलाओं के बढ़ी संख्या में आने और बैठने के फलस्वरूप घटित होना था. दूसरे, ऐसी व्यवस्था लागूकरना सम्भव  होने पर ‘सामाजिक क्रांति’ घटित होती, क्योंकि तब महिलाएं अपनी नैसर्गिक/पुरुष निर्मित ‘घर की चहारदीवारी’ के अंदर ही सीमित नहीं रहती. तीसरे, यह भी महसूस किया गया कि चूँकि वे शिक्षा और उत्तरदायित्वों से वंचित हैं अतः वे गंभीर विमर्शों में हिस्सेदारी के योग्य नहीं हो सकतीं. चौथी धारणा यह रखी गयी कि महिलाओं को यदि निर्बाध मताधिकार दे दिया गया तो उन्हें पुरुषों के अनुपात से अधिक ही मताधिकार मिल जायेगा क्योंकि पुरुषों के मताधिकार पर कतिपय निर्बंध भी लगे हुए हैं.

महिलाओं के मताधिकार की आवश्यकता के कारणों में विस्तार से जाते हुए उन्होंने अनुभव किया कि  महिलाओं के बीच पर्दा प्रथा के रहने के चलते समाज में उनकी व्यापक भागीदारी में बाधा हुई. दूसरे, लेकिन, उनके अनुसार,अगर सरकार में समुचित इच्छाशक्ति होती तो इससमस्या से पार पाया जा सकता था. उन्होंने यह बात भी जोर देकर कही कि प्रान्त के बुद्धिजीवियों का एक बड़ा तबका महिलाओं को मताधिकार मिलते देखना चाहता है .तीसरे, वे मद्रास और बॉम्बे की महिलाओं का उदहारण रखकर बताते हैं कि जब उन्होंने चुनाव में सफलतापूर्वक भाग लिया है तो कोई कारण नहीं है कि बिहार में उनकी समानधर्मा वैसा न कर सके. महिलाओं द्वारा सरकार को टैक्स देने और फलतः मत देने का अधिकार रखने के अन्तःसम्बन्ध की भी चर्चा की. इसके बाद उन्होंने मातृत्व, बल कल्याण, स्वच्छता जैसे मुद्दों पर सदन में अपेक्षाकृत अधिक प्रभावी तरीके से अपनी बात रखने की महिलाओं की क्षमता का भी ध्यान कराया.अपने आप में यह भी रोचक था कि महिलाओं तक मताधिकार का विस्तार करते हुए मद्यपान निषेध की नीति को सफलतापूर्वक लागू करने के विषय को भी उससे नत्थी कर दिया गया. उन्होंने अमेरिकी राज्यों के उदहारण के हवाले से कहा कि जिन जिन प्रान्तों में महिलाओं को मताधिकार मिला वहाँ मद्यनिषेध लागू करने में सफलता मिली क्योंकि महिलाएं मद्यपान की बुराइयों को महसूस कर सकती थीं. और, इसी परिपेक्ष्य में उन्होंने आगे अपना पर्यवेक्षण रखते हुए कहा कि ‘जहाँ जहाँ महिलाओं ने मताधिकार पाया वहाँ वहाँ मद्यनिषेध तुरंत लागू होता गया’. फिर, उन्होंने महिला मताधिकार के समर्थन में कुछ मानवतावादी पहलुओं का जिक्र किया. उन्होंने उदाहरणों से अपने तर्क को समर्थित करते हुए कहा कि ‘राजनीति में महिला एवं पुरुष के बीच समानता एक जाना-माना सिद्धांत रहा है, लेकिन जब उन्हें वास्तवमें मताधिकार सौंपने का समय आता है तो हम इस कथन का सहारा लेते हैं- अभी तुम इस अधिकार को पाने योग्य नहीं हुए हो’. इस भेदभाव का सबसे बुरा पक्ष यह था कि वर्तमान मताधिकार नियमों के तहत महिलाओं को विदेशी, अल्पव्यस्क, पागल एवं बदमाश की श्रेणी में रखा गया था जिन्हें मतदान का अधिकार नहीं था.
बिहार विधान परिषद् 

वाद-विवाद में हस्तक्षेप करते हुए राय बहादुर द्वारिकानाथ ने अपने युवा मित्र बाबू देवकी प्रसाद सिन्हा की उपर्युक्त बातों से अपनी सहमति जताई एवं उनकी भावप्रवण अपील की प्रशंसा की. उन्होंने अपनी त्वरित एवं सयानी टिप्पणी जड़ते हुए आगे कहा कि कोई भी युवा व्यक्ति इस तरह के परिवर्तनकारी संकल्प के लाये’ जानेपर गर्व महसूस कर सकता है. हालांकि लगे हाथ उन्होंने यह सुझाव भी दे डाला कि इस तरह के संवेदनशील मुद्दों पर हमें भावनाओं में न बहकर एक सतर्क रवैया अख्तियार करने की कोशिश करनी चाहिए.उनके अनुसार, ‘लिंगों की समानता’ एवं ‘बिना प्रतिनिधित्व के करअधिरोपन नहीं’ की संकल्पना वस्तुतः बहुत आकर्षक तो जरूर थी लेकिन, ‘प्रैक्टिकल पॉलिटिक्स’ के लिहाज से इनकी कुछ सीमाएं भी हैं. उन्होंने मशविरा दिया कि नगरपालिका के स्तर पर महिलाओं को मताधिकार प्रदान किया जा सकता है. और, इस प्रयोग के सफल होने पर परिषद् स्तर पर भी इसे विस्तारित किया जा सकता है.

मौलवी मलिक मुख्तार अहमद ने उक्त प्रस्ताव का का कुछ सतही एवं अगंभीर आधारों पर विरोध किया. उनका तर्क था कि पुरुषों एवं महिलाओं के बीच ‘कार्यों का बंटवारा’ सदियों से चला आ रहा है और उसी के अनुरूप महिलाओं को ‘गृह प्रशासन’ यानी घरेलू काम-काज की देखभाल का जिम्मा दिया गया है.महिलाओं के लिए घर की चहारदीवारी के अंदर रहना सर्वाधिक उपयुक्त है. दूसरी तरफ, राय बहादुर हरेन्द्र नारायण महाशय ने खुले ह्रदय से प्रस्ताव का समर्थन किया. उन्होंने बहस में हिस्सा लेते हुए कहा कि यद्यपि बंगाल में इसी तरह का एक प्रस्ताव अस्वीकृत हो गया था लेकिन बम्बई एवं मद्रास प्रान्तों के सम्मेलनों तथा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लगातार सत्रों में इस तरह के प्रस्ताव पारित किये गए हैं.

खान बहादुर ख्वाजा मुहम्मद नूर ने प्रस्ताव की मुखालफत इस आधार पर की कि बम्बई, मद्रास एवं बंगाल प्रान्तों के मुकाबले चूंकि बिहार में महिलाओं की साक्षरता दार काफी कम है अतः “उन्हीं स्थितियों एवं आधारों को लेकर पुरुषों की तरह महिलाओं को भी मताधिकार प्रदान करना व्यावहारिक नहीं होगा.”
बाबू उमेश चन्द्र बनर्जी ने भी प्रस्ताव का विरोध का विरोध किया और अपने निर्णय के औचित्य को आधार देते हुए कहा कि उन्होंने एक पुरानी अंग्रेजी कहावत का हवाला दिया जिसका आशय था कि ‘पहले योग्य बनो फिर पाने की इच्छा करो’. उन्होंने इस बात का भी ध्यान कि बिहार शैक्षिक दृष्टि से एक पिछड़ा राज्य है और ऐसे में बम्बई एवं मद्रास जैसे राज्यों के विकास से बराबरी की बात सोचना बैल के आगे गाड़ी को रखकर आगे बढने की बेतुका काम करने के समान है. प्रस्ताव का विरोध करने के क्रम में आये उनके कुछ तर्क तो अशोभनीय तक थे. जैसे, उन्होंने कहा कि ‘सच के प्रति महिलाओं में सम्मान-भाव कम ही होता है’ तथा ‘वे बहुत बातूनी होती हैं एवं गुप्त बातों व मंत्रणाओं को छुपा कर नहीं रख पातीं’. उन्होंने ‘स्त्री-बुद्धि प्रलयंकारी’ जैसी पुरानी कहावत का भी उद्धरण दिया.उनके अनुसार, महिलाओं के व्यवहार के ये नकारात्मक गुण उन्हें मताधिकार पाने के अयोग्य ठहराते हैं.

राय बहादुर पूर्णेंदु नारायण सिन्हा ने प्रस्ताव का भरपूर समर्थन किया. उनके तर्क सुगठित थे.उन्होंने तो प्रथमतः यह बात जोर देकर कही कि महिलाओं को मताधिकार से वंचित करना एक मनमानी निर्बंधता है और यह न तो ‘औचित्य के सिद्धांत और न ही नैसर्गिक न्याय’ पर आधारित है. उन्होंने यह भी कहा कि धार्मिक विधान भी पुरुषों एवं महिलाओं के समान अधिकार की हिमायत करते हैं. उन्होंने महिलाओं के पक्ष में यह भी जोड़ा कि ‘हम हिंदू अपनी नित-प्रति की प्रार्थनाओं में राम और सीता का नाम लेते लेते हुए सीता-राम कहते हैं, न कि राम-सीता.

मताधिकार का प्रयोग करती महिलायें 

बाबू निरसू नारायण सिन्हा ने प्रस्ताव का विरोध अपनी इस भावना के आधार पर किया कि महिलाएं ‘जनाना’ के भीतर रहकर अधिक सुरक्षित रह सकती हैं. उन्होंने जोर दिया कि यह उनके निवास-स्थान में शामिल है. ‘जनाना’ महिलाओं की पवित्रता की रक्षा का स्थान है न कि कोई कोई जेल.वे आगे भी अपने विचार रखते हुए कहते हैं कि यद्यपि वे खुद पर्दा-प्रथा के विरोधी हैं और यह सच्चाई है कि यह प्रथा राज्य में महिला-मताधिकार लागु करने में एक बड़ी बाधा है. उनकी यह धारणा भी सामने आई कि वंश को चलाने के लिए महिलाओं को साथ लेना एक प्राथमिक शर्त है. यद्यपि वे इस बात पर सहमत दिखे कि भविष्य में महिलाओं को मताधिकार दिया जाए लेकिन वे इस बात पर अड़े मिले कि अभी इसका उपयुक्त समय नहीं आया है. उन्हीं के शब्दों में,”भविष्य में जब लोग यह मान लेंगे कि अब वक्त आ गया है कि तो वे यह कर सकेंगे. हमारी अभी की कोई बात अथवा कार्य भविष्य पर बाध्यकारी नहीं हो सकता. और, परिवर्तित स्थितियों में लोग अपनी मर्ज़ी से कुछ भी करने को स्वतंत्र होंगे. लेकिन आज हमें इस तथ्य पर विचार करने की जरूरत है कि क्या अभी का समय ऐसे प्रयोगों के लिए उपयुक्त है?” जाहिर है, प्रस्ताव के प्रति उनका विरोध बड़ा जोरदार था. उन्होंने काफी बल देकर अपना पक्ष रखा. उनके शब्दों में, “मैं प्रस्ताव के विरोध में हूँ क्योंकि इस मत का हँथ कि उन्नत संविधान वाले किसी यूरोपीय राष्ट्र ने इस व्यवस्था को नहीं अपनाया है. मैं इसलिए भी इसका विरोध करता हूँ कि इंग्लैण्ड तक में महिला-मताधिकार अपना तो लिया गया है पर यह अभी वहाँ भी शैशवावस्था में ही है. और, कौन जानता है कि आगे इसके विरुद्ध कोई मत बन जाए? मैं इस कर्ण भी इसका विरोधी हूँ कि अभी बिहार महिला मताधिकार अंगीकृत करने के लिए तैयार नहीं है क्योंकि अभी पुरुषों ने ही बिहार की प्रतिनिधित्व-प्रणाली को ठीक ढंग से नहीं आजमा पाया है. अतएव, मैं इस प्रस्ताव का पूरा विरोध करता हूँ और साथ ही, आशा करता हूँ कि इसे अपने समाज में लागूकरने की सहमति देने के पूर्व हमारे दोस्त बार-बार सोचेंगे क्योंकि इससे समाज में उथल-पुथल मचाने की प्रबल शक्ति है.

मिस्टर ह्विटले ने मताधिकार के प्रस्तावक-पैरोकार बाबू पूर्णेंदु नारायण सिन्हा एवं प्रस्ताव के प्रमुख विरोधी बाबू निरसू नारायण सिन्हा के वाद-विवाद में सम्मोहक-प्रभावोत्पादक एवं ओजपूर्ण वक्तव्यों के सन्दर्भ लिए. उन्होंने कहा कि जिस पर्दा-प्रथा को महिला मताधिकार के प्रभावी होने में एक बढ़ा के रूप में देखा गया है, वह बहुत दमदार और विचारयोग्य तर्क नहीं है. उन्होंने इस बात भी बल देकर कही कि एक तर्क यह दिया जा रहा है कि बंगाल की विधान परिषद् ने इसे अभी नहीं अपनाया है. पर मैं समझता हूँ कि बिहार के मामले में इसको मद्देनजर रखने की कोई आवश्यकता नहीं है. उन्होंने एक शानदार प्रतिप्रश्न से सदन के समक्ष इस बात का जवाब यों रखा-“बिहार ही क्यों नहीं बंगाल के लिए एक पूर्वोदाहरण के रूप में सामने आये? सदन यह कदम उठा सकती है जिससे यह सन्देश जाए कि महिलाओं के चरित्र एवं क्षमताओं पर हमलोगों को भरोसा है”.
पी.के. सेन ने तो भारत के साथ-साथ समस्त संसार में ही महिला मताधिकार की मांगों में अन्तःसूत्रता जोड़ने पर बल देते हुए कहा कि मताधिकार की यह प्रक्रिया पूरे विश्व में ‘उद्भव का उत्पाद’ है न कि किसी किसी क्रांति की.और, इस मुद्दे कोप्रथम विश्व युद्ध ने निश्चित रूप से सामने लाया. वे आगे चर्चा करते हैं कि ‘प्रतिनिधित्व’ की संकल्पना हमारे देश में भी स्वीकृत हो चली है, और, इस परिप्रेक्ष्य में उन्होंने स्पष्ट रूप से बताया कि इस पूरी बहस में वे (विरोधी) महिलाओं के प्रतिनिधित्व के अधिकार पर निषेध के पक्ष में एकी भी तथ्यपरक एवं तार्किक उदहारण नहीं जुटा सके. अपनी बातों का समाहार करते हुए उन्होंने कहा कि ‘यह एक गंभीर प्रश्न है और मुझे आशा एवं विश्वास है कि प्रस्ताव के परिणाम को निर्धारित करने में किसी पूर्वग्रह से काम नहीं लिया जाएगा तथा इसमें कोई पक्षपात नहीं बरता जाएगा, बल्कि महिलाओं को उनके यथोचित अधिकार दिलाए जाने के लिए तथ्य एवं न्याय से काम लिया जा सकेगा.डी.एन. मदन ने बहस में हस्तक्षेप करते हुए मजबूती से अपना पक्ष रखा, कहा कि, स्वराज के लिए महिलाओं का शिक्षा एवं मताधिकार का पाना जरूरी है. इसके अलावा उन्होंने जोश-औ-जोर से कहा कि इन सवालों को ‘बिलकुल नयाय-दृष्टि’ से देखा जाना चाहिए.

बाबू गणेश दत्त सिंह ने यह मत रखा कि प्रस्ताव में अभी वैचारिक कच्चापन झलक रहा है. अभी की स्थिति में अधिक जरूरी स्त्री मृत्य दर में कमी और स्त्री शिक्षा में प्रसार करना है. स्त्री-शिक्षा पर बात करने के क्रम में उन्होंने कहा कि “मैं कहूँगा कि आप उन्हें मताधिकार दिलाने की बजाये शिक्षा दिलाएं एवं तत्पश्चात, शिक्षा के परिणामस्वरूप मताधिकार उन्हें स्वतः मिल जाएगा”. प्रस्ताव पर विरोधी मत रखते हुए उन्होंने आगे कहा कि “तत्कालीन मतदान-प्रणाली के चलन एवं सामाजिक स्थितियों से प्राप्त अनुभवों के आलोक में इस मुद्दे पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए”. उन्होंने यह भी कहा कि महिला मताधिकार पर जिस तरह से सदन ने फोकस किया है उसी गंभीरता से सदन ने उन दमित जातियों पर ध्यान नहीं दिया जो मताधिकार सम्बंधित समूह का बड़ा हिस्सा हैं. उन्होंने मशविरा दिया कि महिला मताधिकार के विचार को सबसे पहले नगर निकायों एवं डिस्ट्रिक्ट बोर्डों में अजमाया जाए.

मधुसूदन दास ने वाद-विवाद में भाग लेते हुए जोर दिया कि नारी सभी दैवी एवं ईश्वरीय तत्वों को समावेशित करने वाली है, उसका जीवन बलिदान का दूसरा नाम है. उनके अनुसार, महिलाओं के वोट देने कि अयोग्यता ने राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में बाधा पहुंचाई है, अतः इस परिपेक्ष्य में यह संगत होगा कि उनतक मताधिकार का विस्तार किया जाए. लेकिन बाबू अम्बिका प्रसाद उपाध्याय ने उनके इस प्रस्ताव को ‘अव्यवहारिक, अनावश्यक एवं नितांत अपरिपक्व करार दिया”. हालाँकि अपने विमत को वे संतुलित करने का प्रयास भी करते नजर आये, क्योंकि उन्होंने महिला मताधिकार की संकल्पना को सैद्धांतिक रूप से उचित माना. इसमें उनका तर्क था कि ‘प्रैक्टिकल-पॉलिटिक्स’के ख्याल से यह करना अभी संभव नहीं है. उनके अनुसार, मुट्ठीभर महिलाओं की मांग को प्रान्त की समस्त महिलाओं की प्रामाणिक आवाज नहीं माना जा सकता.
उधर, बाबू छोटे नारायण सिंह प्रस्ताव से सहमत दिखे. उन्होंने यह मत व्यक्त किया कि सभ्यता के विकास में हर व्यक्ति को अपना विकास करने का अधिकार है तथा महिलाओं कि नैसर्गिक मेधा को पुष्पित-पल्लवित करने के लिए मताधिकार एक प्राथमिक पूर्व शर्त की तरह है. मौलवी सैय्यद मुबारक अली ने प्रस्ताव को अस्वीकार करते हुए कहा कि महिलाओं को ब्रिटिश शासकों के संपर्क में नहीं आने देना चाहिए.कहा कि वे पर्दा के भीतर रहते हुए ही अपने गुणों एवं लाज को बचाए रख सकती हैं. हालांकि वे इस बात से इत्तिफाक रखते मिले कि स्वराज प्राप्ति के बाद महिला-मताधिकार को लागू किया जा सकता है.

महिलाओं का राजनीतिकरण : अधिकार लेने की पहल 

बाबू श्याम नारायण शर्मा ने संक्षिप्त पर प्रभावी हस्तक्षेप करते हुए पूरे वाद-विवाद पर अपनी सार-टिप्पणी रखी. सर्वप्रथम उन्होंने यह निष्कर्ष रखा कि प्रस्ताव के समर्थक अपने विचारों के गंभीरी अथवा सार्थकता से सदन को आश्वत करने में सफल नहीं रहे हैं. न तो महिलाओं के बारे में आये संकीर्ण विचारों एवं पूर्वग्रहों को काटने में वे सफल हुए हैं और न ही बहस के विषय की गंभीरता को वे समझ सके हैं. उनके अनुसार, इतिहास का निर्णय महिलाओं के विरुद्ध है. उन्होंने आगे बताया कि पुरुषों की नजर में राजनीति से उनके बहिष्करण को नैसर्गिक माना जाता है और इसे महिलाओं पर पुरुषों का सामंती वर्चस्व एवं अन्याय में शुमार नहीं किया जाता. और, इस तरह, उन्होंने प्रस्ताव के विरोध में अपना मत दिया.बाबू देवकी प्रसाद सिन्हा, संकल्प के प्रस्तावक, अपने विचार पर अंत तक अडिग रहे. उन्होंने इस तथ्य को रेखांकित किया कि यहाँ तक कि मताधिकार से विरोध करने वाले भी इस बात पर सहमत हैं कि यह सिद्धांत सही है परन्तु वे सावधानी बरतने पर जोर देते हुए इस ख्याल के हैं कि महिलाओं को पहले शिक्षित हो जाना चाहिए. लेकिन उन्होंने यह भी ध्यान कराया कि जो महिला-शिक्षा को पूर्व शर्त के रूप में रखने की वकालत करने वाले लोग हैं स्वयं उन्होंने महिलाओं को शिक्षित करने कि दिशा न के बराबर काम किया है तथा शिक्षा पर फोकस किये जाने परजोर दिए जाने के मूल में प्रस्ताव को निष्क्रिय करने की एक चाल है. उन्होंने यह भी कहा कि “पहले शिक्षा” का तर्क अब गलित सिद्धांत में आता है. मैं नहीं समझता कि बीसवीं शताब्दी में किसी के हाथों में इस मताधिकार को नकारा भी जा सकता है.

महिला मताधिकार’ पर दूसरा संकल्प बिहार विधान परिषद् के 20 मार्च, 1925को डी.एम. मदन द्वारा लय गया. उन्होंने कहा कि ‘महिला मताधिकार’ के समर्थकों को इसके पक्ष में बात-बहस करने की कोई जरूरत नहीं है बल्कि समर्थन को निर्योग्यता की समाप्ति तथा जो वर्ग इस निर्योग्यता को महिलाओं पर थोपने के लिए सबसे पहले उत्तरदायी ठहराए जा सकते हैं उनके द्वारा एक स्वतंत्रतादायी युक्ति की ओर बढा एक कदम समझा जाए. प्रस्ताव के समर्थन में अपने तर्क रखते हुए उन्होंने अपने विचार सामान्य तौर पर व्यक्त किये. प्रथमतः उन्होंने इस तथ्य की ओर ध्यान आकृष्ट कराया कि चूँकि महिलाओं को संपत्ति एवं भूमि रखने का अधिकार प्राप्त है अतः उन्हें मताधिकार देने की गरज से भी पुरुषों के समान माना जाना चाहिए. उन्होंने यह भी कहा कि अगर महिलाएं बड़े जमीन-जायदाद को सुचारू रूप से सँभालने में सक्षम हैं और वे उनपर कर-अदायगी करने के काबिल हैं तो उन्हें मताधिकार नहीं सौंपने का कोई तर्क नहीं बनता, क्योंकि यह सर्वमान्य सिद्धांत है कि ‘अगर कोई कर-अदायगी के लिए जिम्मेवार है तो उसे प्रतिनिधित्व का अधिकार भी जरूर दिया जाना चाहिए. उन्होंने आगे कहा कि मतदाता सूची में महिलाओं को दर्ज कर लेने मात्र से यह अर्थ कतई ध्वनित नहीं हो जाता कि सभी महिलाएं अपने मताधिकार का प्रयोग करने को बाध्य ही हो जाएंगी. और अगर, अपने विविध सामाजिक पूवग्रहों एवं दकियानूस चालानों के चलते उनमें से अधिकतर अपने मत का उपयोग नहीं करना चाहतीं, तो अपेक्षाकृत कम जनसँख्या वाली इस महिला आबादी के मताधिकार को अतिक्रमित भी नहीं किया जाना चाहिए. उन्होंने एक अभूत ही संगत सवाल बहस में सहभाग करते विधायकों के समक्ष रखा कि “क्या आप सर्वथा उपयुक्त उस व्यक्ति को केवल इस आधार पर वोट देने के अधिकार से वंचित कर देंगे कि अभी बहुत से लोग वोट देने में रूचि नहीं रखते.

उन्होंने आगे सन 1921 के वाद-विवाद का सन्दर्भ दिया जिसमें यह कहा गया था कि बिहार और उड़ीसा में महिलाओं को मताधिकार सौंपने से पहले वे देश के विभिन्न हिस्सों में महिला मताधिकार के प्रभावों का आकलन करना चाहेंगे. इस परिपेक्ष्य में उन्होंने इंग्लैण्ड तथा अन्य भारतीय प्रान्तों से अनेक उदहारण दिए जिनमें पटना उच्च न्यायलय का ‘बार’ सीनेट एवं विभिन्न विश्वविद्यालयों के सिंडिकेट आदि पुरुष-वर्चस्व वाले संस्थाओं में महिलाओं को सम्मिलित किया गया है. उन्होंने कहा कि कहीं भी यह नहीं देखा गया है कि इन विशेषाधिकारों का कहीं गलत उपयोग अथवा दुरूपयोग हुआ है. उन्होंने पुनः दुहराया कि महिला मताधिकार न प्रदान कर विधायक बलात निर्योग्यता थोपने की कोशिश कर रहे हैं जबकि यह सब करने का कोई कारण नहीं रह गया है. बल्कि इसका प्रतिफल उस प्रांत विशेष के विकास को अवरुद्ध करने वाला है.
तीसरे, उन्होंने कहा कि महिलाओं को मताधिकार नहीं प्रदान करने में एक बहुत बड़े मानवतासमूह को सताना-दबाना हो जाता है.और,यह प्रांत के विकास की गति को कमतर करने वाला है. उन्होंने कहा कि ऐसे में यह समस्या उत्पन्न करेगा क्योंकि एक राष्ट्र के रूप में भारत को विकसित करने के प्राथमिक लक्ष्य की प्राप्ति हमारे विधायकोंको कभी नहीं हो सकेगी. इस लक्ष्य की प्राप्ति तभी हो सकेगी जब भारत के सभी प्रान्त इस दिशा में प्रयत्नशील होंगे.

चौथे, उन्होंने महिला मताधिकार के प्रायोगिक पहलुओं की विवेचना करते हुए कहा कि मैं यह नहीं कह रहा कि प्रान्त की समस्त वयस्क महिलाओं के नाम मतदाता सूची में दर्ज हो ही जाएँ बल्कि मैं इस विचार का हूँ कि एक ऐसी व्यवस्था हो जिसमें मताधिकार पाने की इच्छुक महिलाओं को अपना नाम दर्ज कराने का मौका मिले.उन्होंने आगे अपनी बात रखते हुए कहा कि इससे पहला काम यह होगा कि सरकार के संसाधन का अनावश्यक रिसाव रुकेगा, दूसरे, समाज में मताधिकार की वास्तविक मांग एवं इच्छा करने वालों का पता लग सकेगा. उन्होंने यह भी कहा कि इससे “शिक्षित नारियों, मेधावी एवं संस्कारी नारियों’ का सामने आना सुनिश्चित हो सकेगा. उन्होंने यह भी बताया कि इससे यह भी सुनिश्चित हो सकेगा कि वैसी महिलाएं (जैसे कि पर्दानशीं महिलाएं) जो इस मत-प्रणाली में भाग नहीं ले सकेंगी उन्हें मतदातासूची के तैयार होने की प्रक्रिया में किसी असुविधा का सामना नहीं करना पड़ेगा. उन्होंने यह भी जताया कि यद्यपि मैं सामाजिक मूल्यों एवं पूर्वग्रहपूर्ण प्रचलनों के प्रति अत्यंत सम्मान-भाव रखता हूँ पर एक समाज सुधारक के रूप में इन प्रचलनों को उन महिला-समूहों पर जबरदस्ती थोपने पर अपनी सहमती नहीं दूँगा. अतः मताधिकार के प्रयोग के मामले में सभी महिलाओं को खुद ही निर्णय करने का अधिकार दिया जाना चाहिए. इसके बाद उन्होंने इस बात की विवेचना की कि कोई सरकार उन लोगों से मिलकर ही बननी चाहिए जिनपर शासन किया जाना है, और, इस हिसाब से मताधिकार के प्रश्न पर महिलाओं को अपवाद में रखना सही नहीं हो सकता. उन्होंने बतलाया कि अन्य मामलों में भी शैक्षणिक स्थिति काफी निम्न है, और ऐसे में अगर महिलाओं को अपना प्रतिनिधि खुद चुनने दिया जाता है तो इनसे जुड़ी समस्याओं का हल निकालने में काफी मदद मिल सकती है. और, इसके बाद उन्होंने अंतत अपना अंतिम निष्कर्ष विधायकों को इस तरह से संबोधित करते हुए रखा, “क्या आप महिलाओं को वह समानता का अधिकार, खुद को अपने प्रतिनिधियों द्वारासुने  जाने का अधिकार, अपना काम खुद अपने हाथ से करने का अधिकार तथा स्वयं को शासित करने  के अधिकार देने से मना कर सकते हैं जिसपर उनका हक बनता है?”
बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री के साथ महिला विधायक 

इस प्रस्ताव पर बाबू बिशुन प्रसाद ने अपना विरोधी मत रखा. उनका तर्क था कि पर्दा प्रथा के कारण मतदाता सूची तैयार करने वाले कर्मचारियों सेघरों के ‘जनाना’ के बीच संपर्क कराय जानाचूँकि संभव न होगा अतः ऐसी मतदाता सूची का तैयार किया जाना वस्तुतः संभव न होगा. इसी तरह उन्होंने कहा कि चूँकि प्रस्तावक बिहारी समाज से नहीं आते अतः उनके प्रस्ताव-विषयक उनके अधिकांश तर्क बिहार के सन्दर्भ में उपयोगी नहीं जंचते.और, अन्तः में उन्होंने यह दलील भी दी कि महिलाओं को मताधिकार सौंपने से पहले शिक्षित किये जाने की जरूरत है ताकि वे मताधिकार अमल में लाने के प्रभावों को समझने के काबिल बन सकें.

बी.ए. कॉलिंस ने भी प्रस्ताव के विरोध में अपनी बातें रखीं. उन्होंने कहा कि भारत और इंग्लैण्ड की यहाँ तुलना करना अनावश्यक प्रतीत होता है क्योंकि दोनों देशों की परिस्थितियाँ बिलकुल अलग-अलग हैं.उन्होंने बताया कि ब्रिटेन में तो पढ़ी-लिखी एकल जिंदगी जीने वाली महिलाओं की अच्छी-खासी संख्या है जो अपने जीविकोपार्जन के लिए काम करती हैं, वहाँ इस तरह के विधान उनकी जिंदगी को सीधे-सीधे प्रभावित करने में सक्षम हैं.लेकिन भारत में यह बात लागू नहीं होती क्योंकि यहाँ संयुक्त परिवार की परिपाटी में परिवार के पुरुष की कमाई पर महिलाएं आश्रित होती हैं और इसलिए ऐसे विधानों से महिलाओं को प्रत्यक्षतः कोई लाभ नहीं मिलने वाला.उनका यह भी कहाँ था कि यहाँ इस प्रांत में महिला-मताधिकार की वस्तुतः कोई मांग उठी भी नहीं है. जहाँ तक इंग्लैण्ड की बात है, तो वहाँ युद्ध के प्रभाव में महिला-मताधिकार को लागू किया गया जबकि अभी भारत में इस तरह की कोई बात है भी नहीं. अंत में उन्होंने महिला-मताधिकार को लागू किये जाने परसंभावित नकारात्मक प्रभावों की चर्चा करते हुए कहा कि चूँकि महिलाओं में अधिकतर अशिक्षित ही हैं अतः मत प्रयोग के सिद्धांतों की बहुत समझ नहीं हो सकती और ऐसे में राजनेताओं एवं उनके एजेंटों द्वारा उन्हें बहलाना, फुसलाना और भरमाया जाने का डर हमेशा बना रहेगा, और ऐसा होने पर लोकतंत्र और कमजोर हो जाएगा. अंत में, प्रस्ताव पर वोट कराए जाने के पूर्व बाबू राजीव रंजन प्रसाद ने भी प्रस्ताव का विरोध करते हुए अपनी बात रखी. उन्होंने कहा कि पुराने समय में महिलाओं को मताधिकार देने अथवा राज-काज चलने में उनको हिस्सेदारी सौंपने की कोई जरूर नहीं महसूस की गयी क्योंकि महिलाओं को पुरुषों का अभिन्न अंग ही माना जाता रहा है, और अब भी ऐसा ही है, अतः महिलाओं को अलग से मताधिकार देने की कोई आवश्यकता नहीं है.और, अपने तर्क के समर्थन में में उन्होंने भारतीय सन्दर्भ के ‘अर्द्धांगिनी’ शब्द  का हवाला दिया जिसको विवाहित स्त्रियों के लिए पति के आसंग में प्रयुक्त किया जाता हैऔर जिसका शाब्दिक अर्थ ‘आधा अंग’ होता है.

और, इसके पश्चात प्रस्ताव पर मतदान कराया जाता है जो अस्वीकृत हो जाता है.

तीसरी बार महिला-मताधिकार के अनुमादन के लिए बिहार विधान परिषद् में 06 फरवरी, 1929  को प्रस्ताव लाया जाता है.वाद-विवाद की शुरुआत करते हुए बाबू गोदावरी मिश्रने कहा कि इसी तरह के प्रस्ताव पूर्व में दो बार सदन में लाए जा चुके हैं. उन्होंने जोर देते हुए कहा कि ‘पुरुषों की दासता’ से उबार कर महिलाओं का सशक्तिकरण करने के प्रयास वाले अनेक आन्दोलन दुनिया भर में फ़ैल गए हैं और पुरुषों की तरह ही नारियां भी सार्वजनिक जीवन में दखल पाने के लिए कृतसंकल्पित हो रही हैं. उन्होंने आगे कहा कि राजनीति में महिला भागीदारी की अनुपस्थिति के चलते नीति निर्धारण में महिला हितों की अनदेखी हुई है जिसे राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया के एक महत्वपूर्ण तत्व में शामिल होना चाहिए था. उन्होंने बताया कि राजनीतिक हलके में महिलाओं की भागीदारी उनकी राजनीतिक समझदारी एवं नेतृत्व क्षमताको बढाएगा. उन्होंने बल देते हुए कहा कि इसी पृष्ठभूमि में बिहार और उड़ीसा प्रांत में महिलाओं को मताधिकार प्रदान किया जाना चाहिए.
प्रस्ताव के समर्थन में कृष्ण महापात्र पहले वक्ता थे. उन्होंने कहा कि प्राचीन काल में भारत में महिलाओं को बतौर राजनीतिज्ञ महत्वपूर्ण हैसियत प्राप्त थी लेकिन उनपर सामाजिक निर्योग्यताएं थोपे जाने के फलस्वरूप उनकी इस स्थिति में ह्रास आया है. उन्होंने बताया कि प्रांत में पर्दा विरोधी आंदोलन एवं अखिल भारतीय नारी सम्मलेन जैसे होने वाले आयोजन राज्य की महिलाओं के प्रगति-पथ पर अग्रसर होनेके सुबूत हैं.और, ऐसे संकल्पों के देश के अन्य हिस्सों में पारित होने को दृष्टिगत रखते हुए मैं इस पक्ष में हूँ कि यह प्रस्ताव बिहार विधान परिषद् में भी पास किया जाए.

शरत चंद्र राय ने भी इस प्रस्ताव का यह आधार लेते हुए स्वागत किया कि अब वह समय नहीं रहा कि महिलाओं को चुनावोंमें मतधिकार से वंचित रखा जाए.उन्होंने ‘दकियानूस मुस्लिम तुर्की’ एवं भारत के अन्य प्रान्तों द्वारा महिलाओं को मताधिकार दिए जाने के उदाहरणों को रखते हुए इस बात पर खास जोर दिया कि अगर यह नहीं होता है तो बिहार की छवि एक दकियानूस एवं पिछड़े प्रांत की बनेगी. लेकिन उन्होंनेयह भी कहा कि चूँकि संपत्ति धारण करने की सामान्य अर्हता अधिकांश महिलाओं में नहीं है अतः इसी अनुरूप अर्हता में भी बदलाव किया जाना चाहिए तथा इसमें न्यूनतम शैक्षिक अर्हता विषयक कोई परंतुक डाला जाना चाहिए. ब्रजनंदन दास ने भी प्रस्ताव का समर्थन किया और कहा कि महिलाओं को वोट देने का अधिकार प्रदान कर हम पुरातनपंथी समाज की जकड़नों से उन्हें मुक्त करने, उन्हें शिक्षित करने एवं एक सम्मानपूर्ण जीवन जीने की दिशा में उनके प्रयासों में उत्साहवर्द्धन कर सकेंगे.
केसरी प्रसाद सिंह संकल्प का समर्थन करते हुए इस मत के थे कि महिलाओं को मताधिकार से वंचित रखकर हम स्वराज नहीं प्राप्त कर सकते क्योंकि स्वराज के लक्ष्य की प्राप्ति में महिलाओं का साथ लिया जाना नितांत आवश्यक है. उन्होंने यह भी कहा कि यह पुरुषों के हित में है कि महिलाओं को जल्द से जल्द मताधिकार मुहैया किया जाए न कि हम इस बात का इंतज़ार करे कि अंग्रेजी आन्दोलन की तरह हमारी महिलाएं भी मताधिकार के लिए कोई आन्दोलन छेड़े.

लेकिन सर गणेश दत्त इस प्रस्ताव के पुरजोर विरोध मेंउतरे. उन्होंने सबसे पहले यह कहा कि चूँकि महिलाएं अभी शैक्षणिक दृष्टि से काफी निम्न स्तर पर हैं, राजनीति की वास्तविकताओं का उन्हें ज्ञान नहीं है और पर्दा प्रथा चल रही है अतः अभी वेवोट देने का अधिकार रखने के योग्य नहीं हैं. उन्होंने कहा कि केवल कुछ महिलाएं ही मताधिकार पाने की इच्छुक हैं और व्यापक मताधिकार पाने हेतु उन्हें पहले अपने आपको इस अधिकार पाने लायक बनाना चाहिए तथा इसके बाद ही उन्हें इसकी चाह करनी चाहिए. उन्होंने प्रस्ताव के सम्बन्ध में आने वाली कुछ प्रत्यक्ष कठिनाओं की ओर भी ध्यानाकर्षण कराया. मसलन, संपत्ति रखने के अधिकार विषयक बंधन के चलते बहुत कम ही महिलाएं मताधिकार की योग्यता पा रही थीं. दूसरे, पर्दा प्रथा के चलन के चलते पूरी मतदाता सूची तैयार करना संभव न था. और, उन्होंने यह भी तर्क रखाकि महिलाओं को वोट देने का अर्थ उन्हें राजनीति के लिए और अधिक समय खर्च करने का अवसर देना तथा अपने घरेलू दायित्वों को नज़रअंदाज़ का मौका देना होगा.

जी.ई. ओवेन ने संकल्प का पक्ष लिया. उन्होंने कहा कि यूँ तो महिलाओं को मताधिकार सौंपने मात्र से समग्र राजनीतिक परिदृश्य में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं लाएगा पर यह महिलाओं के विकास, सामाजिक उत्थान एवं शिक्षा विषयक विधेयकों पर विचार-विमर्श पर जरूर सकारात्मक प्रभाव डालनेवाला साबित हो सकता है. उन्होंने यह भी कहा कि प्रान्त में महिलाओं को जकड़ रखने वाली पर्दा प्रथा एवं तमाम अन्य दुर्बलताओं का खात्मा भी इसके परिणामस्वरूप हो सकेगा.

द्वारिका नाथ, जिन्होंने इसी भाव के पिछले दो प्रस्तावों का विरोध किया था, इस बार पक्ष में बोले. उन्होंने कहा कि मैं पिछले दो मौकों पर प्रस्ताव के विरोध में रहा क्योंकि तब मुझे लगा था कि बिहार और उड़ीसा प्रान्त की महिलाएं आमतौर पर उतना विकसित एवं शिक्षित नहीं हो सकी हैं कि वे मताधिकार पा सकें, लेकिन राज्य में विभिन्न पर्दा प्रथा विरोधी आंदोलन एवं महिला सम्मेलनों को देखते हुए मुझे यह एहसास हो चला है कि अब हमारे प्रदेश की आम महिलाएं विकसनशील शील हैं और इसलिए मैंने महिला-मताधिकार के पक्ष में मत देने का फैसला लिया है. उन्होंने यह भी कहा कि इससे विधान परिषद की सदस्यता तक पाने और ऐसे तमाम अन्य राजनीतिक अधिकार लेने की उनकी योग्यता की परीक्षा भी हो सकेगी.

पिछले दो अवसरों पर सदन में आये इस तरह के प्रस्तावों का जिन निरसू नारायण सिन्हा ने विरोध किया था, इसबार वे भी संकल्प के पक्ष में उतरे. उन्होंने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि पूर्व के ऐसे अवसरों पर संकल्प के विरोध में मत डालने का मेरा कारण यह था कि मैंने देखा था कि अभी तो विकसित देशों में भी महिलाओं को यह मताधिकार प्राप्त नहीं है, लेकिन इस समय तक अधिकांश विकसित राष्ट्रों ने महिलाओं को वोट का अधिकार प्रदान कर दिया है और उन्होंने यह सिद्धांत स्वीकार कर लिया है कि महिलाओं को पुरुषों के सामान ही राजनीति में भाग लेने का स्वाभाविक अधिकार है तथा इन अधिकारों से उन्हें वंचित रखना पुरुषों का अन्याय है. उन्होंने महिलाओं को बौद्धिक रूप से पुरुषों की बराबरी में रखते हुए कहा कि अगर शैक्षिक योग्यता को अगर अनिवार्य किया जाता है तो भारतीय आबादी का एक काफी बड़ा हिस्सा राजनीति में भागीदारी करने के अधिकार से वंचित रह जायेगा, अतः साक्षरता दर के कम होने के बहाने से इस मताधिकार को सीमित नहीं किया जाना चाहिए. निम्न साक्षरता स्तर, पर्दा प्रथा, राजनीति का जमीनीज्ञान आदि की निर्योग्यताओं के आधार पर वोट के अधिकार को स्थगित करने के सर गणेश दत्त की हिमायत का विरोध करते हुए उन्होंने कहा कि इन निर्योग्यताओं की प्रकृतिचक्रानुगामी होती है क्योंकि ये निर्योग्यताएं आम महिलाओं के राजनीतिक अधिकारों की वंचना के आधार पर पलती हैं. उन्होंने एक वैधानिक स्थिति का हवाला दिया जिसके तहत महिलाओं एवं पागलों को वोट देने का अधिकार नहीं है. उन्होंने एक बेहद तर्कसमृद्ध सवाल प्रतिभागी पार्षदों के समक्ष रखा कि “क्या आप किसी नियम के तहत अपने घर की महिलाओं को पागलों के साथ रखते देखना पसंद करेंगे?” उन्होंने अपनी बातों का समाहार करते हुए कहा कि यदि यह प्रस्ताव महिला समुदाय के लिए विशेषतः एवं समग्रतः देश की प्रगति के उद्देश्य से लाया गया है तो पार्षदों को इस संकल्प के पक्ष में वोट करना चाहिए.

इस संकल्प का सैयद अब्दुल अज़ीज़ द्वारा विरोध किया गया. उनका कहना था कि महिलाओं को मताधिकार प्रदान करने का अभी उपयुक्त समय नहीं आया है क्योंकि महिलाओं को वोट का अधिकार दिए जाने से उनके विकास एवं उत्थान में पुरुष अपना समर्थन देने में उदासीनता बरतने लगेंगेऔर इससे इन आन्दोलनों को धक्का लगेगा. उन्होंने यह भी बताया कि बिना समुचित विकास किये महिलाओं को मताधिकार दिलाने पर उन्हें चुनावी धंधेबाजों द्वारा आसानी दिग्भ्रमित किये जाने एवं बहलाए-फुसलाये जाने की सम्भावना रहेगी. अतएव, उन्होंने निष्कर्ष रखा कि महिला-मताधिकार प्रदान करने का समय अभी नहीं आया है. और, इस प्रकार से संकल्प/प्रस्ताव पर वाद-विवाद/बहस पूरी हुई एवं यह 14 के मुकाबले 47 के बहुमत से पारित हुआ.
ऊपर विश्लेषित किये गए तीनों वाद-विवादों में पहला, जो 1921 में घटित हुआ, तर्क-वितर्क की विविधता, भावनाप्रण/ज़ज्बाती अपीलों, तीव्र राजनीतिक तथ्यबयानी के साथ साथरूढ़िवादीअभिव्यक्तियों के ख़याल से एक शानदार दस्तावेज़ है.हम महसूस करते हैं कि इन वाद-विवादों का प्रकाशन और पहले होना चाहिए था क्योंकि स्त्री-इतिहास का कोई छात्र अथवा स्त्री विषय पर काम करने वाला कोई सामाजिक कार्यकर्ताआरंभिक चरणों के महिला-मताधिकार के एजेंडे की सघनता को इन बहसों में उतरे बिना नहीं समझ सकता.यद्यपि कि 1921 में आया यह प्रस्ताव गिर गया था लेकिन दीवार पर इसके द्वारा लिखी गयी इबारत का सन्देश साफ़ था, कि इस विचार को अपनाने का समय आ गया था. इसे कुछ समय के लिए टाला तो जा सकता था पर इसकी अनिवार्यता को झुठलाया कतई नहीं जा सकता था. आगे हुए 1925 एवं 1929 के वाद-विवाद इसका विस्तार मात्र थे जिससे यह ध्वनित हो रहा था कि महिला-मताधिकार को सहमति देने वाले स्वरों की संख्या में उतरोत्तर बढ़ोतरी ही नहीं हो रही थी बल्कि यह अधिक सकारात्मक आकार ग्रहण कर रही थी.

वाद-विवाद में संकल्प/प्रस्ताव के पक्ष-विपक्ष में रहे प्रतिभागी पार्षदों के नाम :

वर्ष 1921
प्रस्ताव के पक्ष में                                        मत प्रस्ताव के विपक्ष में मत
(21 वोट)                                                                    (31 वोट)


वर्ष 1925

प्रस्ताव के पक्ष में मत                                                                प्रस्ताव के विपक्ष में मत
    (18 वोट)                                                                                       (32 वोट)


वर्ष 1929

प्रस्ताव के पक्ष में मत                                                                प्रस्ताव के विपक्ष में मत
(47 वोट)                                                                                    (14 वोट)


(बहस की यह प्रस्तुति अरुण नारायण के अतिथि सम्पादन और नीलिमा सिंह के सम्पादन में प्रकाशित ' निरंजना ' में प्रकाशित हुई थी . )
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