स्त्री के विरूद्ध स्त्री कठघरे में ( !)

अनीता मिश्रा
अनीता मिश्रा स्त्री मुद्दों पर काफी सक्रिय रहती हैं . स्त्री के पक्ष में बेबाक टिप्पणियों के साथ सोशल मीडिया में इनकी उपस्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण है. संपर्क: anitamisr@gmail.com

( हाल के दिनों में कुछ घटनाएँ ऐसी रहीं , जो काफी चौकाने वाले थीं. स्त्री अधिकारों के लिए प्रतिबद्ध लोगों पर अलग -अलग आरोप लगे और उनके बचाव के तर्क वैसे ही थे जैसे किसी स्त्रीविरोधी मर्द के अपने बचाव के  होते रहे हैं. यह सब स्त्री अधिकारों की लड़ाई को कम से कम तीन दशक पीछे ले जाने वाले तर्क थे . हिन्दी के घोषित वाम रुझान ( !) वाले एक आलोचक और बी एच यू के प्रोफ़ेसर द्वारा अपनी पत्नी की प्रताड़ना के बाद के तर्क भी इसी परम्परा के थे . इस सन्दर्भ में अनीता  मिश्रा का यह आलेख .)

पिछले  दिनों एक मुद्दा सोशल मीडिया पर काफी चर्चित रहा। यह मुद्दा था ,हिंदी के लेखक-आलोचक प्रोफ़ेसर कृष्ण मोहन द्वारा अपनी पत्नी के साथ पीटते-घसीटते हुए करके घर से निकालने का। जैसे ही इस घटना का वीडियो सामने आया, बुद्धिजीवियों के बीच काफी हलचल मच गई। कुछ ही देर में मुद्दा कबड्डी के खेल में बदल गया। किस पाले में कितने लोग हैं। तमाम तरह के तर्क-वितर्क, कुतर्क शुरू हो गए। वीडियो में जो दृश्य था, उसे देख कर कोई भी संवेदनशील व्यक्ति नहीं कहेगा कि प्रोफ़ेसर साहब ठीक कर रहे हैं। बुरी तरह से लात-घूंसे खाती एक रोती-कलपती स्त्री को देखकर कौन कहेगा कि ऐसा करना उचित है। लेकिन हैरानी और चौंकाने वाली बात है कि कुछ लेखकों ने इस बात पर न सिर्फ प्रोफ़ेसर साहब का अश्लील बचाव किया, बल्कि उनके कदम को उचित ठहराया, यह कह कर कि मामले को पूरा जाने बिना प्रोफ़ेसर कृष्मोहन की आलोचना गलत है।

जो भी मामले पिछले कुछ दिनों में सामने आए हैं उन सब पर गौर करें तो हिंदी के कुछ बुद्धिजीवियों और लेखकों के बीच की एक खास तरह की प्रवृत्ति सामने आई है कि वे सही गलत का फैसला घटना देख कर नहीं, अपने संबंधों के आधार पर करते हैं। हम फलां को इतने दिनों से जानते हैं, वे ऐसे हैं, वैसे हैं आदि-आदि उनके व्यक्तित्व के तमाम उदहारण गिना डालते हैं। कुछ समय पहले जब एक युवती के साथ रेप की घटना हुई थी, तब यही हुआ था। सबने अपने संबधों का हवाला देकर एकतरफा फैसला सुना दिया था। तब ज्यादातर लोगों के तर्क थे कि ऊपरी तौर पर लग रहा है कि लड़की ही दोषी है। इस मामले में कहा गया कि ऊपरी तौर पर मार खाती स्त्री को मत देखिये, मामला अंदर तक समझिए। वाह! अपनी सुविधा से एक मामले को ऊपर से देखिए, एक मामले को अंदर तक समझिए। दोनों हाल में स्त्री को कटघरे में खड़ा कर दीजिये और एकतरफा फैसला सुना दीजिये।

फिलहाल बात इस मामले की है जो लोग प्रोफ़ेसर साहेब के बचाव में तमाम तर्क गढ़ रहें हैं। उनका कहना है कि वह जबरन घर में घुस रही थी; वह काफी झगड़ालू स्त्री है; उनके बीच तनाव था और कि यह उनका निजी मामला है, सबको अपनी राय नहीं देनी चाहिए। पहली बात जब बात घर से सड़क पर आ गई और नेशनल चैनल पर दिखाई जा चुकी तो मामला निजी कहां रहा। दूसरे कि अगर दो पक्षों में किसी एक को अपनी पीड़ा किसी और से कहने की जरूरत पड़ी तो यह सिर्फ दो पक्षों के बीच का मामला कैसे रहा। इसके अलावा, अगर वह स्त्री दुनिया की सबसे बुरी स्त्री भी थी, तो भी पति या किसी और को उसे इस तरह मारने-पीटने का अधिकार कैसे है। अगर वाकई वह कुछ ऐसा कर रही थीं जो कानून के विरुद्ध था तो प्रोफ़ेसर साहब पुलिस को बुला सकते थे। अब उनके समर्थक जो लोग बोल रहें है कि बिना मामला समझे ठीक नहीं है। कल्पना कीजिये कि ये मामला अगर टी वी चैनेल की वजह से सामने नहीं आया होता और ये सारी हिंसा घर के अंदर हुई होती तब तो प्रोफ़ेसर साहेब के सारे समर्थक भी इस मामले की आलोचना करने वालों के पीछे लाठी डंडा लेकर पड़ जाते और ऐसे लोग सोशल मीडिया पर भी गलियां खा रहे होते।

मीडिया में वायरल हुए वीडियो से एक तस्वीर : प्रोफ़ेसर के द्वारा पत्नी की पिटाई 

यह बात सही है किसी के निजी जीवन को समझे बिना टिप्पणी करना ठीक नहीं है। लेकिन जो लोग भी प्रोफ़ेसर साहब की इस हरकत के खिलाफ बोल रहे थे, कोई उनके निजी जीवन पर  बात नहीं कह रहा था। सबका कहना यही था कि किसी भी सूरत में अपनी पत्नी के साथ इस तरह की हिंसा गलत है। मान लिया उनकी पत्नी ही मीडिया वालों को लेकर आई थी (ऐसा कहना है कुछ लोगों का) तो यह भी सोचने की बात है कि जबकि केस चल रहा था और गुजारा भत्ता वगैरह सब तय हो गया था फिर आखिर उनको क्यों इस तरह का कदम उठाना पड़ा। ज़ाहिर है, जो तय था उसमें कोई अड़चन डाली जा रही थी। इसके अलावा, तलाक की प्रक्रिया पूरी भी नहीं हुई थी कि उनके पति ने किसी अन्य के साथ रहना भी शुरू कर दिया था। मान लिया कि उनकी पत्नी तमाशा बना कर यही पक्ष सबको दिखाना चाहती थीं तो इसमें गलत क्या है। आखिर एक महिला के रूप में वह भुक्तभोगी हैं, सारी प्रताड़ना उनके हिस्से में आई है, एक प्रेम विवाह का दुखद अंत हुआ, घर छूटा है एक स्त्री का। जाहिर है वह रिएक्ट करेगी।

हालांकि यह एक अलग बहस का मुद्दा है कि जब प्रेम नहीं रहा, तब साथ रहने का क्या फायदा या फिर उस तीसरी औरत की बात भी करनी चाहिए। अगर इन सारे मुद्दों पर चर्चा होगी तब फिर बात दूर तक जाएगी। बात फिर प्रेम पर उलझ जाएगी जो किसी खास व्यक्ति के भीतर वाकई कोई शाश्वत भावना नहीं है या एक दफा हो गया तो दुबारा नहीं होगा। लेकिन यहाँ चर्चा का विषय है एक स्त्री के साथ सार्वजनिक रूप से की गई हिंसा जो किसी सूरत में उचित नहीं हैं। प्रेम चाहे कोई कितनी दफा करे, कोई किसे रोक सका है। लेकिन ध्यान रहे कि आप प्रेम किस कीमत पर पा रहे हैं। अगर प्रेम की कीमत एक स्त्री सार्वजनिक रूप से मार खाकर चुका रही है, तो इसका समर्थन किस हद तक किया जाएगा। दो शानदार इंसान भी एक दूसरे की ज़िंदगी साथ रहकर नर्क कर सकते हैं। वे अलग-अलग बेहतर होकर भी एक दूसरे के लिए बदतर हो सकते हैं। लेकिन हालात जो भी हों, किसी भी सूरत में इस तरह एक स्त्री को पिटते देख कर कोई तर्क देकर उसे जस्टीफाई करना या उसका बचाव करना निहायत हास्यास्पद है। मुझे वाकई ऐसे लेखकों और बुद्धिजीवियों पर तरस आती है जो घटना को सही गलत के परिप्रेक्ष्य में न देख कर अपने संबंधों के हिसाब से देखते हैं। यही नहीं, वे  एकतरफ़ा फैसला भी सुना डालते हैं। ऐसे में उन लेखकों की तारीफ करनी चाहिए जो सिर्फ साहित्य ही नहीं, जीवन में भी स्टैंड लेना जरूरी समझते हैं।

सोशल मीडिया में इस प्रकरण पर हुई बहस की एक झलक के लिए क्लिक करें : ( और यह स्त्री पक्षधर समाज है
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