( कन्नड़ में किया गया यह अध्ययन अंग्रेजों के ज़माने से अपराधी करार दी गई जनजातियों में से एक  लंबाणी जनजाति की स्त्रियों के जीवन व्यवहार ,दैनंदिन में रची बसी कला से हमें परिचित कराता है ,प्रोफ़ेसर पी के खंडोबा द्वारा कर्नाटक और उससे सटे  महाराष्ट्र के  इलाकों  में बसे इस समुदाय की जीवन -कला किये गए इस अध्ययन का अनुवाद गुलबर्गा वि वि के हिन्दी  विभाग की  विभागाध्यक्ष डा परिमाला अम्बेकर के द्वारा  किया  गया है ,दक्षिण से  हिन्दी की विदुषी की भाषा में क्षेत्र का प्रभाव स्पष्ट है. )



लंबाणी जनजाति की एक  स्त्री
 अनुवादक की टिप्पणी

" किसी जनपद का या लोक जीवन का शास्त्रीय या तात्विक अध्ययन ऐसा ऐनक है, जिसमें प्रस्तुत लोक जीवन का शास्त्र और तत्व, मूल्य और मानवीयता के इंद्रधनुषी रंगों में तब्दील होने लगते हैं । भौतशास्त्र के थेयरी ऑफ़ रिफ्लेक्शन की तरह !! जैसे एक सफेद किरण,अपने में छिपे सतरंगी रेशों को फैला देता है!! प्रो पी.के.खंडोबा द्वारा प्रस्तुत लंबाणी जनजाती के दृश्य और प्रदर्शन कलाओं का शास्त्रीय और तात्विक अध्ययन ऐसा ही एैनक है, जो अध्ययन की शिष्टता के साथ साथ पाठकों को आगे बढकर लंबाणी जीवन शैली और संस्कृति की रंगीनियों को देखने और अनुभव करने की चेतना जगाती है। इस महत्वपूर्ण कन्नड कृति के हिन्दी अनुवाद के पीछे की चेतना भी यही रही है ।"

लंबाणी अथवा बंजारा जन भारतभर में बसे हुए हैं।  प्रादेशिकता की दृष्टि से भिन्न भिन्न व्यवसायों में जुटे हुये होने के कारण ,उन्हें उन उन प्रदेशों में अलग अलग नामों से पहेचाना जाता है । पहले  घुमंतू , आज दल या टोली में बसे हुये ये लंबाणी लोग समस्त भारत में गोरमाटी के नाम से अपने आप को पहचानते हैं । विशिष्ट संस्कृति एवं परंपरा को लिये हुय ये जन बंजार, लंबाणी, लंबाडी, सुकाली, लमाणि इत्यादि नामों से पुकारे जाते रहे हैं । अपनी वेशभूषा, आभूषण, आचार विचारों में पारम्परिकता  को बचाये रखने के लिए  नगरों से दूरस्थ प्रदेशों में ,अधिकतर पहाड ,गुफा, कंदराओं में ,अपना ही अलग से तांडाओं का निर्माण करके , वे रहते हैं और अपनी संस्कृति को बचाते आये  हैं । शतमानों के बीत जानेपर भी ये जन यथास्थिति में रह रहे हैं ।

स्वतंत्रता पूर्व, इस देश में जब वाहन आदि, का प्रचलन नहीं था, तब इन बंजारा लोगों ने, दूर –दूर से , से जंगल झंखाडों के रास्ते ,अपने मवेशियों पर खाद्य पदार्थो का रसद लादकर लाया  और भारतीय जन –जीवन का संरक्षण किया है। देश की स्वतंत्रता के लिए लडकर मरनेवालों में ये भी शामिल रहे हैं । ऐसे देशभक्त समाज पर कलंक लगाने हेतु अंग्रेज सरकार के द्वारा  इन्हें अपराधी जनजाति , ( क्रिमिनल ट्राइब्स )  के नाम से परिगणित करने के परिणाम स्वरुप  इनकी सामाजिक, शैक्षणिक और सांस्कृति अभिवृद्धि कुंठित हुयी । इस तरह से अलक्षित हुये इन लागों के आचार- विचार, परंपरा, संपद्राय , विवाह-उपनयन साथ में रीति-नीतियां बहुत ही विशिष्ठ बने हुये हैं । इनके द्वारा बोली जानेवाली भाषा की न कोइ लिपि है और न ही उनका लिखित साहित्य ही उपलब्ध है ।

लंबाणी जनजाति की स्त्री का  ड्रेस


लंबाणी जनजाति के विविध चेहरे से संबंधित अबतक के हुए अध्ययननों का अगर हम परिशीलन करेंगे तो , हम यह निश्चित तौर  पर कह सकते हैं कि इस जनजाति के दृश्य एवं प्रदर्शन कलाओं के दस्तावेजों का संग्रह और अध्ययन हुआ नहीं है । साहित्य, संस्कृति और भाषा से संबंधित कुछ  संभवित अध्ययन में प्रासंगिक तौर पर यहाँ  वहां  दृश्य और प्रदर्शन कला से संबंधित कुछा स्थूल विवरों का पाया जाना हम देखते हैं । संस्कृति के अध्ययन में सांस्कृति परिवर्तन , एक बहुत बडा अंश है । जनजातियों को नजर अंदाज करके , भारतीय संस्कृति की परिपूर्णता को मापा नहीं जा सकता । संस्कृतियों के निर्माण में इन जनजातियों के विशिष्ठ पात्र के होने को हम भुला नहीं सकते । भारत की ये जनजातियां , विश्वास, संप्रदाय, साहित्य, संगीत, कला, कुशलता आदि अनेक सांस्कृतिक घटकों  से भारत की संस्कृति को समृद्ध  किया है ।

निसर्गजीवी इन लंबाणी जनजातियों के दृश्य और प्रदर्शन कलाएं  अत्यधिक विशिष्ठ हैं । समग्र कला संसार में ही इन लंबाणी कलाओं के लिए विशिष्ठ स्थान, मान प्राप्त हैं । एैनक जडी कसूती कलाओं से सजी रंग रंगीन स्त्रियों के पहनावे , देहभर पहने जानेवाले वजनदार आभूषण , नागरिक समाज को अचरज में डाल ही नहीं देते, अपितु इस ढंग के आकर्षक और कलात्मक वेशभूषा को खुद भी धारण करने की इच्छा तक उनमें असूया का भाव जगाते हैं । हम इस बात को नहीं भुला सकते कि इन पोशाकों में कलात्मकता के साथ कठिनता और परिश्रम भी छिपा हुआ है । लंबाणियों के इन आकर्षक कला के लिए राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय बाजार मे अधिकाधिक मांग  बढने के कारण, इन  लंबाणी स्त्रियों  की  बडी मेहनत से, अपने हाथों से ,परिश्रम से बनाये हुये, इन पोशाकों को दुगने तिगने दामों में बेचने का दृश्य हर कहीं दिखायी दे रहा है ।

लंबाणी स्त्रियों के गीत , नर्तन आदि अत्यंत कलात्मक हैं और  अपनी एक अलग विशेषता रखते हैं । इन जनजाति के दृश्य कलाओं में कसूति, गुदायी, वाद्य वादन, रंगोली, घरों का विन्यास, केशालंकार और विवाहादि उत्सवों में विविध दृश्य बहुत ही अद्भुत हैं  , देखनेवालों की आंखों को तृप्त करते हैं । साथ ही इस जनजाति के प्रदर्शनकलाओं के विविध भंगिमाओं के नृत्य, आचरण और संस्कार आदि , जत्रा, पर्व, उत्सव आदि , क्रिडाए, और बयलाट ;ग्रामांतर प्रदेशों में खेले जाने वाले विशिष्ट जनपदी नाटकद,  हरेक को मंत्रमुग्ध कर देते हैं । ये सारे अत्यंत ही कुतुहलकारी और अध्ययनयोग्य विषय हैं । 

लंबाणी जनजाति के ये लोग जंगल का वास छोडकर गाँव ,शहर में आकर बसे जा रहे हैं । इसी कारण से आधुनिकता की हवा इन लोगों को भी प्रभावित करती है  और  ये लोग अपने आस -पास की संस्कृति के प्रभाव का शिकार हो रहे हैं । आज ये लोग अनिवार्यतया आधुनिकता के लिए अपने आप को खुला छोड रहे है । अन्य संस्कृति के अतिशय प्रभाव के शिकार इन लोगों के सामाजिक स्थान मान में भी काफी बदलाव आया है । इस आधुनिकता के परिणाम की तीव्रता एवं प्रभाव उनकी वेशभूशा पर, गीतवृन्दों पर, वाद्य वादकों के परिकरों पर, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक जीवन पर भी स्पष्टतया गोचरित होता है । इस दिशा में लंबाणी जनजाति के दृश्य और प्रदर्शन कलाओं का दस्तावेज और अध्ययन की आवश्यकता को पहेचानते हुए, यह  अध्ययन तय हुआ है  । लंबाणी जनजाति के दृश्य-प्रदर्शन कलाओं की वैशिष्टताओं को पहचानना, और आधुनिक संदर्भ में उनपर हुये प्रभाव एवं परिणामों को निर्दिष्ट  करना इय अध्ययन का प्रमुख उद्धेश्य रहा है ।
लंबाणी जनजाति की स्त्रियों  का पारंपरिक नृत्य


कर्नाटक के कुछ प्रमुख तांडाओं को और महाराष्ट्र के सीमावर्ती प्रदेशों में  स्थित कुछ लंबाणी प्रदेशों को, प्रस्तुत अध्ययन के लिए क्षेत्रकार्य के रूप में चुनकर सामग्री को संग्रहित किया गया है । साथ ही ‘‘ कर्नाटक के लंबाणी जन- एक सांस्कृतिक अध्ययन ‘‘ नामक मेरी पी.एच .डी शोधग्रंथ को साथ ही, ‘‘ कर्नाटक के लंबाणी जनजातियां ‘‘ नामक पुस्तक की आंशिक सहायता यहाँ  ली गयी है । प्रस्तुत अध्ययन को लंबाणी जनजाति के दृश्य एवं प्रदर्शन कलाओं का समग्र अध्ययन मानने की कोइ  भूल न करें । इस दिशा में यह एक ढंग का स्थूल अध्ययन मात्र है और भावी अध्ययनकर्ताओं के लिए एक निर्दिष्ट दिक्सूची भी है ।

 लंबाणी जनजाति की दृश्य कलाएं  : रंगीन वेशभूषा:

    संपूर्ण भारतभर में लंबाणी स्त्रियों की वेशभूषाओं के रंग और नमूने लगभग एक समान दीख पडते है । इन वस्त्रों में लाल रंग की प्रधानता होनेपर भी , नीले , हरे और सफेद कपडों के जोडन से चित्र विचित्र दिखने वाले उनके लहंगे  ,(फेटिया), ओढनी (छांटिया), चोली (कांचळि) आदि वस्त्रों को वे स्वयं तैयार  कर लेते हैं । इन वस्त्रों पर वे ढेर सारे सीसे के बने आभरणों का (रांग पारि), चांदी के आभरणों का, छोटे -छोटे कौडियों का, चांदी के सिक्कों का , छोटे- छोटे ऐनक के टुकडे (काचे)  इत्यादि के जोडन का काम करते हैं ।  रंग रंगीन धागों के सहारे जोडे ये चीजें वस्त्रों को और भी आकर्षक बनाते हैं।                  
               
                हम बणजारी गेणा गांटारी
                हम  बणजारी आचो कुलारी
                हम बणजारी बामणिघरेरि
                हम बणजारी राजा रामेरी
                हम बणजारी गेणा गांटारी (1998-116)

  इस गीत के बोल, अपने वस्त्र आभूषणों के प्रति  लंबाणी स्त्रियों के प्रेम और अभिमान को ही अभिव्यक्त नहीं करते साथ ही यह भी कहते हैं कि, वे अत्यंत ही ऊंचे  घराने के है, ब्राहम्ण जाति से संबंधित हैं, राजा महाराजाओं के क्षत्रियों के वंश के हैं, आदि भाव को भी सूचित करते हैं ।  ( वै.रूप्ला नायकः 1998: 116)

 लंबाणी शब्द के उच्चार मात्र से हमारी आँख  के सम्मुख एक ऐसे स्त्री का चित्र उभरकर आता है, जो हाथों में विचित्र ढंग की चूडियां भरकर, माथेपर झूलते बालों के लटों में चांदी के आभूषण झुलाते हुए, देहभरकर एैनकों से जडा लहंगा पहनी हुई  है, अधखुले पीठ की वह अपने गोरे बदन भर में गोदने के फूलों को सजाये खडी  है।  रंगीन कपडे, एैनक, चूडियां आदि आभरणों का अलंकार इन जनजाति की  स्त्रियों की मात्र विशेषता ही नहीं, उनका सौन्दर्य भी है । वे जहाँ  कहीं भी हो ,आसानी से उन्हे पहचाना जा सकता है । इन सब में विशेषता इस बात की है कि, भारत भर में किसी और जनजाति के लोग इस ढंग के सांप्रदाय सम्बद्ध  वेशभूषा एवं पोशकों को बचाए नहीं रख पाये हैं ।
 
लंबाणी स्त्रियों द्वारा धारण किये जाने वाले लहंगे  (फेटिया), ओढनी (छांटिया), चोली (कांचळि) , पैर का खडा, पटिया, वांक्य, घुगरि, टोप्ली, चोट्ली इत्यादि, इस जनांग के सौन्दर्य के कलश रूपी आभूषण हैं । इतना ही नहीं, प्रकार प्रकार के ये आभूषण, प्रकार प्रकार के ये पोशाक उस लंबाणी स्त्री की  श्रद्धा के संकेत भी हैं ।  यूं  देखा जाय तो लंबाणी स्त्रियों के पहनावे में अधिकतया  लाल रंग की ही प्राधान्यता रहने के बावजूद  दूसरे रंगों की भी कोई  कमी नहीं पायी जाती । दर्जी की सिलायी का काम कम हानेपर भी , ये स्त्रियां स्वयं उन कपडों में छोटे छोटे ऐनकों को जोडकर कशिदाकारी करती हैं । लंबाणी स्त्रियों द्वारा अपने हर कपडों में एैनकों को जोड लेना एक दृष्टि से अलंकारिक लगने पर भी , एक और दृष्टि से यह उनकी होशियारी को भी जताते हैं । कारण प्राचीन काल में इनके पूर्वज घोरअरण्य में वास जब करते थे , तब जंगल के क्रूर प्राणि सिंहादियों से अपनी रक्षा के लिए अपने शरीर पर यहाँ – वहाँ एैनक के टुकडे लगा लेने की रीति शायद रही होगी, ताकि क्रूर प्राणि इन कांच के टुकडों में अपना बिंब खुद देखकर भागें । इस प्रकार परंपरा से कांच के टुकडों को देह में धारण करने का कार्य चले आने के कारण , ऐनक लगाने का कार्य आज भी दिखायी पडता है ।
लंबाणी जनजाति की स्त्री  कढाई करती हुई


  लंबाणियों की वेशभूषाओं में पुरूषों की तुलना में स्त्रियों की वेशभूषाए ही अधिक विशिष्ठ हैं साथ ही ये उनकी परंपरा के भी द्योतक हैं । अपनी वेशभूषा से ही लंबाणी स्त्रियां पहचानी जाती है , इस हदतक उनके पेाशाक समाज में चिरपरिचित हैं । मुझे लगता है शायद इन वर्णरंजित लंबाणीयों के समान कोई  और जनजाति अपनी आकर्षक वेशभूषा से हमारा ध्यान आकर्षण कदाचित  ही करती होगी ।उन्हें पहचानना बहुत सुलभ है ।  इन लंबाणी स्त्रियों द्वारा धारण किए जाने वाले कपडों में कला के साथ साथ कठिनता का भी होना हम देख सकते हैं । उनके पहनेजानेवाले लहंगे, चोली और घुंघट इत्यादियों को तय्यार करना अधिक मेहनत का काम है । इन पोशाकों की तय्यारी में महीने के महीने लग जाते हैं , इसमें कोयी अतिशयोक्ति नहीं । इन्हें बनाने में अधिक पैसे भी लगते हैं और अधिक परेशानी भी उठानी पडती है ।
फेटिया:

लंबाणी स्त्रियों द्वारा धारण की जानेवाली लहंगा फेटिया कहलाता है । यह कमर से लेकर पैरों तक की लंबायी में आवृत्त रहता है , पैरों के आभूषण को ढंकता  नहीं । इन लोगों द्वारा पहने जाने वाला लहंगा, लाल रंग के जाडे कपडे से सिला जाता है । कमर की घेरायी  लंबायी में लगभग 9‘‘ की चैडे नीले रंग के कपडे को तरह तरह के  कशीदे के धागे से लहंगे को जोडकर सीते हैं । इसे ‘‘घेरों ‘‘ कहते हैं । इसपर चित्ताकर्षक ढंग से सफेद रंग के कपडे के गोट सीते हैं । इस फेटिया के किनारे पर भी और कमर के निचले भाग में भी रंगरंगीन धागों से, सीसा  के आभरणों से, कौडियों से , एैनक के टुकडे इत्यादियों से इस तरह सिला जाता है, जिससे देखने वालों की आँखें  चुधिया सी जाती हैं । लहंगे को कमर में कसकर बांधने के लिए धागों की दो लडियां होती हैं , जिसे वे ‘‘डोरी‘‘ कहते हैं । ब्याहता स्त्रियां इस डोरी के कोने को कौडियों और लच्छों से सिलकर उसे कमर में बांध लेती हैं, कौडियों और लच्छों से सजी डोरी को वे ‘‘सडकेवाळ डोरी‘‘ कहते हैं ।लहंगे को ऊपर  से नीचे की ओर क्रमशः पाच भागों में विभाजित करते हैं । हरेक भाग, विभिन्न नाम और गुणलक्षणों से और विशिष्टता से सजे रहते हैं ।
1    लेपो
2    काळेर् घेरो
3    रातडो घेरो
4    चीट् और
5    लावणी
इसे तय्यार करने के लिए 9‘‘ का चैडा और 9 मीटर लंबा नीले/काले रंग का कपडा  (काळो छांटियार् घेरो) , 12‘‘ चैडाई  का 6 मीटर लंबा किसी रंग का कपडा और 4‘‘ चैडाई  का 6 मीटर लंबी पट्टी (लावणी)  की जरूरत है और उूपर की ओर एक मोटी कमरपट्टी , साथ ही बीच बीच में छोटे छोटे कपडों के कतरन, छोटी छोटी ऐनकें लगती हैं जिन्हें ढालकर कशीदाकारी की जाती है ।

लेपो
  सुंदर और वर्णरंजित ढंग से कशीदाकारी से भरा यह कपडा कमर में बांधी जाने वाली पट्टी (ठमसज) है , जिसे वे लेपो कहते हैं । ‘लेपो‘ लहंगे का उूपरी किनारे का भाग होकर अत्याकर्षक रहता है । इसकी सिलायी के लिए 3-4 परतों का फ्याब्रिक लाल कपडे का उपयोग करते हैं । गोलाकर के एैनक के टुकडे और अल्यूनियम् के बटनों को डालकर , वैविध्यमय धागों से इसपर कशीदे का काम किया जाता है । उनके पोशाकों में ही यह भाग अत्यंत कलात्मक और विशिष्ट बना रहता है । बिना एक इंच भी छोडे कसीदे के सारे प्रकारों को यहा प्रयोग करते हैं । यह लगभग 1 मीटर लंबी और 6.7 ‘‘ चैडी पट्टी है जिसे कमर पर कसकर बांध लिया जाता है । इस पट्टी के दायें और बायीं ओर नाडा डालकर बायीं ओर बांध लेते हैं । लहंगे का बायां भाग भी एक हत्था भर लंबा खुला रहता है ।
इस लेपो को तैयार  करने के लिए लगभग एक दो महीने के समय की जरूरत पडती है । अनेक विशिष्ट प्रकार के कसीदा कलाकृतियों का यहाँ ं प्रयोग करने के कारण और यह काम अधिक ही सूक्ष्म होने के कारण इसकी तैय्यारी  धीमी  गति से चलती है । इसीकारण इसके लिए अधिक समयावकाश की जरूरत पडती है । यहाँ  की कसीदाकारी के लिए विविध रंग के चमकीले धागों का प्रयोग किया जाता है । इसपर कढीजाने वाली कसीदे  के चित्र इतने होती हैं कि पीछे से लेपों का कपडा जरा सा भी दिखता ही नहीं। यहाँ  कढी कसीद का प्रयोग वे और किसी जगह उपयोग नहीं करते हैं । उनके संपूर्ण पोशाक में लेपो का काम अत्यंत ही क्लिष्ट और परिश्रम भरा काम होने के कारण, यह बहुत ही कीमती वस्तु है ।

कांचळी (चोली)
 लंबाणी स्त्रियों द्वारा पहने जाने वाली चोली , पीठभाग में खुला रहकर , यह छाती और पेट के भाग को ढकता है और यह पीठ-पीछे नाडों से बांधे जाने वाली चोली है । इसके सामने वाले भाग में और भुजाओं पर, रंगीन धागों से अनेक प्रकार की कशीदे कढी जाते हैं । इसपर  ‘ रांग पारी‘ नाम के सीसे के आभरण, चांदी के सिक्के, ऐनक के टुकडों को सिला जाता है । इस कांचळी की छाती पर झूलने वाले लगभग 4‘‘ चैडे , 5‘‘ लंबे मोटे कपडे को सिलकर इसे पूरा ‘रांग पारी‘ सीसे के आभरणों को एैनक के टुकडों को रंगीन धागों से चित्र विचत्र ढंग से सीकर ढका जाता है । इस चोली के उभय भुजाओं से नीचे आस्तिनों पर झूलते हुये दो ‘ खविया‘ होते हैं । इनपर रांग पारी कौडिया आदियों से सिला जाता है । ये लगभग पिछले जमाने में युद्ध के सैनिक द्वारा धारण किये जाने वाले लोहे के कवच के नमूने जैसे लगते हैं । युद्धवीर लंबाणी जन, प्राचीन काल में समय आने पर अपने आत्मरक्षण के लिए , लंबाणी महिलाएं  भी आयुधधारी बनकर, अपनी छाती और आस्तिनों के रक्षण के लिए चोली पर धारण करने के के कारण  इन खविया को सीने का चलन यहा जाहिर होता है ।
 यह वस्त्र ट आकार के गलापट्टा से युक्त होकर, भुजापट्टियां, कांख के उॅपर आस्तिनों को ढंकने के कारण दिखने में बडे ही अलंकारिक लगते हैं । दायें भाग की भुजापट्टी (खव्या) एैनक की कसीदे से और सिक्कों से अलंकृत रहता है , बायें भाग की भुजापट्टी ओढनी में छिपा रहनें के कारण इसपर खव्या नहीं होता। छाती और पेट के भाग को पूरी तौर पर ढंकने वाले इस वस्त्र पर , एैनक के सिक्कों से धातू के सिक्कों से और लच्छों को भरकर कशीदाकारी की जाती है । यह विविध आकार और रंगों की छातीपट्टा, भुजापट्टा, उदर पट्टा और आंतडियों की पट्टिों से जोडे रहकर ज् आकार का बना रहता है । यह वीरयोद्धा के युद्ध कवच की तरह होता है।  इस ढंग की चोली को विवाहित स्त्रियां मात्र धारण करती हैं। अविवाहित युवतियां इसे धारण नहीं करती। साथ में विधवायें भी बिना खव्या के निरालंकृत साधारण चोली पहनती हैं
  इसे तय्यार करने के लिए छाती के माप की पट्टी (छातीर पेट), पेट के माप की पट्टी, आस्तिन पट्टी, पीठ के लिए दोनो भागों में 3‘‘ चैडी पट्टी (,खडपा)  की आवश्यकता है । साथ ही छाती पर दोनो ओर ‘ कांटली‘ , दायी भुजापर खव्या, चोली भर में कसीदा कढने के लिए छोटे छोटे ऐनक, टिन के बटन, उून के लच्छों ( फुंदा) की जरूरत पडती है । चोली पर इन सारे कसूती के काम के साथ साथ उसके किनारे पर छोटे छोटे घुंघरू की लडियों को पिरोया जाता है । यह लाल, नीला, हरा और काले रंग के कपडों के टुकडों को जोडकर सिला हुआ वस्त्र होने के कारण, इसपर, इन रंगीन वस्त्रों पर फबने वाले रंग रंगीन धागों से ही कसूती की सिलाई  भरी जाती है । 
छांटिया ( ओढनी)
पैर के नीचले हिस्से में यह आभूषण पहनती हैं लंबाणी जनजाति की स्त्रियाँ


 सामान्यतया यह लाल रंग के कपडे की बनी रहती है और लगभग 6 फूट लंबा और 4 फूट चैडाई  को लिये रहती है ।  इसके एक छोर को कमर के दायें भाग में लहंगे में खोसे रहकर , कपडे के दूसरे छोर को याने अतिरिक्त भाग को दाये भाग से घेरते हुये सर पर ओढाकर बायीं भुजापर लाकर लटकते हुये छोडा जाता है । लगभग 6 फूट चैडे और 3 फूट लंबे लाल कपडे पर विशेष कसीदे की कढायी की जाती है , उसपर रांग पारी सीस के गहनों को, चांदी के सिक्कों को, ऐनक के टुकडों को, कौडी आदियों को रंग रंगीन धागों से चित्रविचित्र ढंग से सीकर सजाया जाता है और उसे उूपरी घूघट के लिये सिर के दोनों भागों में समान लंबायी के आकार से सिया जाता है । इसे घुंघटो कहा जाता है । छांटिया के बायें छोर में मोटे स्तन के आकार की छोटी सी कसूती कढी थैली सिली रहती है। इसे ‘अढोछेडा‘ कहा जाता है और थैली को ‘ छेवटिया‘ कहा जाता है । इस ‘अढोछेडा‘ छोर को बांयी भुजा के नीचे से होते हुये छाती पर ओढकर दायीं भुजा के उूपर आंचल की तरह ओढते हैं ।
 इसकी तैयारी में तीन मीटर का लाल कपडा, 6 भीगा लंबा और 4‘‘ चौड़ा  हरा कपडा, उसपर ऐनक की कसूती कढी पांच  चैकाकार के एक ही प्रमाण के फूल ( पांचफूल)  , 2‘‘चैडायी के 2 पट्टिया (पाटा), और एक भारयुक्त मोटा घुंघटों का जोडा लगता है । घुंघटो पर अत्यंत कलात्मक ढंग से ऐनक ढालकर कसीदे का काम किया गया रहता है । साथ ही  वहा, गुंडिया, चांदी का चैन और पुराने सिक्के को कतार में जोडकर भारयुक्त बनाया जाता है । उूपरी ओढन यानी घूंघट के अस्तर भाग में अलंकार के हेतू, यहाँ  ववहाँ  रंगीन त्रिकोनाकार के छोटे टुकडों को (खापली ) जोडा जाता है । छांटिया के बाएँ  छोर पर एक छोटी सी कसूती कढी थैली को मोटे स्तनाकार में सिलाजाता है । इसे अडोछेडा कहते हैं और थैली को छेवाटिया कहा जाता है । इसपर अलंकारिक ढंग से कसीदा की जाती है ।  छेवटिया में एक सिक्का रहता है । जिसके वजन से छांटिया दायीं भुजा से सरकता नहीं है । लंबाणी स्त्रिया नमस्कार करते समय इस छेवटिया थैली को हाथ में धरकर नमस्कार करती हैं । यह छेवटिया रंग रंगीन धागे की कसूती के काम से अलंकृत रहता है ।

फुल्या- गण्णो: 
 इनका प्रयोग विशेष संदर्भो में किया जाता है । सरपर धारण करने के लिए , कौडियों से और रंग रंगीन धागे की कसीदे से अलंकृत सिंबी (गाला) और उसके उूपर ओढने के लिए सिला गया ‘फुल्या‘ नामक चित्ताकृत चैकाकार का कपडा  नदी नालों से पानी लाते समय घूल नही पडे इसलिए उसपर ढाकने के लिए ‘गण्णों‘ (गरणौ) नामक कसीदा और कौडियों से तय्यार किया हुआ कपडा चित्ररंजित होता है ।

स्त्रियों के आभरण:     हाथों के आभरण
1    हाथीदांत की चूडिया, (चूडीद) एक एक हाथ में
2    भुजाओं में चूडो ( बलिया )
3    चूडियों के बीच में एक एक काली चूडी (बोद्लू)
4    कसोट्या ,( विविध मनको से कसीदा  कढी चूडी)
5    हाथ की उुंगली में तांबा/चांदी के सिक्को की अंगूठिया
6    विशेष संदर्भो में हथेली पर गजरा, भुजापर पचेला, हथेली पर माट्ली, भुजाओं में घुंघरू का चैन (बाजूबंद) ।

   पैरों के आभरण
1    चांदी/लोहे की धातू से बना बिछुआ
2    पीतल का टेढामेढा वांकडी
3    चैकाकार का कस्सा
4    चांदी/लोहे की धातू का बना चैन
5    पैर की उुंगली में चांदी के मिंचुवा, तांबे की चटकी पित्तल का अंगुतळा और अंगुठे में शरभरी
6    विशेष संदर्भ में पैर में पहनेजाने वाला  चांदी का चैन
7    गरतणि ।

   गले के आभरण
1    गले में पीले रंग के मणियों से गुंथी  गयी पटिया
2    पुराने सिक्कों का हार (रपियार हार )
3    चांदी की हांसली, मंदेळिया, वांक्या
4    विविध मणियों से गुंथा गया मणिमाला ।

   मुख के आभरण
1    गालों के दोनों ओर बालों के साथ झूलते हुवे चांदी/लोहे के बने घुगरी, टोप्ली, कड्डी, आडिसांकळी, जिसे ‘चोट्ला‘   भी कहा जाता है ।
2    नाक में सोने का मुकुर (भुरिया) 
3    कानों में लोहे के बने कनियाँ झूलते हैं ।
4    कानों में झुमकी पहनते हैं ।

    कमर के आभरण
1    कमर में बाँधधकर उसे पैर की लंबाई तक लटकता हुआ छोडा गया कौडियों से बना सडक्
        
इस तरह , बंजारा औरतों द्वारा पहनी जानेवाले गहने, अपार हैं । ‘पटिया‘, नामक गले का पट्टा, बडे बिछुवे के आकार का चांदी का हांसली नामक गले का पट्टा, रंग रंगीन मणियों के हार (मुंगा लाल्दी)  बालों को जोडकर पिरोया गया घुगरी, चोट्ला नामक चांदी के आभरण  स्त्रियों के दोनों गालों पर झूलते रहते हैं । ‘घुगरी‘ नामक गहने को केवल विवाहित स्त्रियाँ  ही मात्र पहनती हैं । पती के मौत पर उन्हें उतार दिया जाता है ।नाकपर भुरिया नामक सोने की नथनी पहनते हैं । कानों पर तरह तरह के चांदी के आभरण  पहनते हैं। अपने हाथों की उँगलियों  में भी, पैरों की उंगगलियों में भी चांदी और पीतल के गढे नमूने नमूने के अंगूठियों को धारण करते हैं , ये जन हाथों की चूडियां और पैरों की चूडियां भी पहनने की रूढी रखते हैं ।
   
कोल्डा, कस्सा, माट्ली, वांकडी, विंचुवा, अंगुतला, चटकी , शरभरी , फूला, मींटी नामक अनेक प्रकार के गहनों को हाथ एवं पैरों की ऊँगलियों में भर भर कर पहनी हुयी लंबाणी स्त्रियाँ  पायी जाती हैं । वांकडी नामक गहना, घुडसवार, घोडे की दौड लगाने के लिए धारण करने वाले कोंडे जैसा रहकर, इनसे नन्हे नन्हें घुंघरुओं  की आवाज भी निकलती है।
  कलई में और भुजाओं में सींग की बनी बंगडियों पहनती हैं । भुजाओं में सिंग की बंगडियों के नीचे रंग रंग के कौडियों से सिले ‘पेचेला‘ नामक लच्छा बांध लेते हैं। कलई में ‘माट्ली‘ नामक चूडियां पहनती हैं ।
  अनब्याही स्त्रियां , इन सिंग के बने बंगडियों को केवल कलई में ही भर लेती हैं । शादीशुदा लेकिन, पति को खोयी हुयी स्त्रियां केवल भुजाओं में ही इन सिंग की बनी बंगडिया (बळिया, बोद्लू)  पहनती हैं । अविवाहित स्त्रियां गले में चीडा नामक कालेपोते डालकर, पैरों में घुंघरू का चैन याने पाजेब और ‘गरतणि‘ नामक काले मनके की लडी को, कलई में चूडी नामक सिंग के बने चूडियों को और कौडिया पिरोकर गुंथी गयी ‘सडक्‘ नाक दो तीन मोटे लडियों को कमर से बांधकर नीचे की ओर लटकता छोड देती हैं । ब्याहिता स्त्रियाँ पैरों में पाजेब, ‘गरतणि‘ और ‘चीडा‘ नामक काले मनके नहीं पहनती हं ।
शरीर पर गोदाना की परम्परा

   कशीदाकारी कला का विन्यास  :

लंबाणी दृश्यकलाओं में कशीदे की कला अत्यंत प्रमुख है । अगर हम कहें कि लंबाणी औरतें बिना कशीदा कढे कपडे पहनते नहीं है तो कोई  आश्चर्य की बात नहीं । वे अपने पोशाकों की तय्यारी के समय , कपडों में विविध नमूने के कपडों के टुकडों को जोडकर वर्णमय ढंग से कशीदा काढते हैं।वर्णमय बनेरहे उनके पोशाक सचमुच में कलात्मक लगते हैं। महिलाओं द्वारा पहनेजानेवाला लहंगा, चोली, और ओढनी आदि को अनेक कपडों के टुकडों से जोडकर, बीच बीच में छोटे छोटे ऐनकों को जोडकर कशीदे से सजाते हैं । इतना ही नहीं साथ में गोंडई, गुंडिया, धातू के सिक्के , घुंगरू  इत्यादियों को जोडकर कशीदा काढते हैं । लंबाणी औरतें अपने फुरसत के समय में कभी बेकार बैठकर समय व्यर्थ नहीं करते। किसी भी प्रकार के कसूती के काम में अपने आप को व्यस्त रखते हैं । उन्हें अपना पोशाक खुद को तय्यार कर लेने की अनिवार्यता होने के कारण लंबाणी की हर महिला कशीदे की कला सीखी हुयी रहती है । लेकिन इसके लिए बहुत अधिक समय और व्यवधान की आवश्यकता पडती है । उनके द्वारा पहने जाने वाले तीन वस्त्र को तय्यार करने के लिए कम से कम महीने दो महीने के समय की आवश्यकता पडती है ।
  लंबाणी औरतों से अगर हम कशीदा कहते हैं तो उसे वे समझ नहीं पायेंगी क्यूकि वे इस कला को खिलण्, तून्, कामकरेरो आदि नाम से जानती हैं । वर्णमय और अलंकारिक बने उनके पोशाकों पर कढी जानेवाली कशीदे को वे विभिन्न नामों से बुलाते हैं ।

कशीदाकारी के प्रकार:   
1    काचे कशीदा (एैनक जडी कसूती)
2    लबानी कशीदा
3    चकचुनि कशीदा (गरि)
4    गाडरे कशीदा (कांड)
5    पोचे कशीदा
6    कलोणी कशीदा
7    रेलामाकी कशीदा (मीन की हड्डी)

     गोदना कला का विन्यास 
   
लंबाणी स्त्रियाँ  मुखपर, हाथों पर सुई से जो टीका गुदवाती हैं वे एक प्रकार के अलंकारिक चिन्ह की तरह होते हैं । सामान्यतया ये लोग नाक के दाये भाग में गोदना का टीका लगाते हैं , हाथों कों और पैरों को गोदना से सजाते हैं । जनजातीय समुदायों में औरतें और पुरूष, आँखों  की दृष्टि के परिहार्य के लिए डिढौने के रूप ही सही , सौन्दर्य के चिन्ह के रूप में ही क्यूं  नहो या शौर्य के चिन्ह की तरह ही क्यूं नहो, गोदना गुदवा लेते हैं । रंगीन पत्ते, फूल , बेलबूटों के चित्रों को , अपने नामों को अथवा कुछाध प्राणियों के चित्र या अनेक चित्ताकार चित्रों को हम उनके गोदन की कला में देख सकते हैं. लंबाणी महिलाओं में सामान्यतया, माथा, गाल, आस्तिन , जांघ , पैर, पाद , हथेली , ठोडी, भंवों के दोनों ओर, छाती, कमर, घुटना,पीठ और पैरों के मीनखंड, इस प्रकार  देह के विविध भागों पर अत्यंत कलात्मक ढंग से रेखाकृतियों  को गुदवाने की परिपाटी  पायी जाती है ।

लंबाणी महिलाए, इतर स्त्रियों की तरह अपने सौभाग्य के प्रतीक के रूप में माथे पर कुंकुंम का टीका लगाते नहीं है। बदले में माथे पर गोदना का टीका गुदवा लेते हैं । विवाहपूर्व में ही गोदन से गुदवालेने की प्रथा इनमें परंपरा से चली आई  है ।  पेड, बेल, सेहरा, राम का झूला, सांप, बिच्छू, मछली, रेंगता कीडा, गेहू के बीज, सिंह का नख, चूल्हा, मोगरा और कमल के फूल इत्यादी चित्र विन्यास के गोदने से वे अपने को अलंकृत करते हैं ।  केवल गोदने के बलपर ही लंबाणी स्त्रियों को पहचानने का विधान लंबाणी जनजातियों में प्रचलित है। गोदना उन्हें बहुत सरलता से अन्य स्त्रियों से भिन्न दिखाता है ।

गोदना पर आधारित कुछ रूढ़ियाँ  और विश्वास

1    हथेली के बगल में गेहू के  दाने के गोदने से उस औरत के हाथ का पका भोजन सडेगा नहीं ।
2    बिच्छू इत्यादी विषजंतुओं के चित्र को गुदवाने से उन्हें वे काटेंगे नहीं ,अगर काटें भी तो उन विषजंतुओं का विष चढेगा नहीं ।
3    मान्यता यह है कि मरने पर अपने साथ केवल गोदना ही रहता है ,अतिरिक्त कोई  भी संपत्ति  साथ नहीं आयेगी ।
4    लडकी का ऋतुमति होने से पहले ही गुदवाया गोदना धर्म की मुद्रा है, ऋतुमति होने के बाद गुदवाया गोदना पाप की मुद्रा के समान है ।
5    जो गोदना गुदवाते हैं , उन्हे पांच  दिनों तक स्नान नहीं करना है और इन पांच  दिनो तक उन्हें हल्दी डाला गया भोजन नहीं खाना है ।
6    गोदना गुदवाये पुरूषों को राश के कण में प्रवेश निषिद्ध  है । उनके प्रवेश से फसल की राशी में उभार नहीं आयेगी ।
7    रोग के कारण हाथ पैर अगर दर्द करते हैं , हड्डियों के जुडाव में अगर सूजन है  या दर्द है अथवा वात हुआ हो तो उन स्थानों पर गुदवाने से , रोग कम हो जाने का विश्वास बंधा हुआ है ।
8    बुरी नजर से बचने के लिए भी शरीर पर गोदना गुदवाते हैं ।



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