दलित स्त्रीवाद जैसी कोई अवधारणा नहीं है : तेजसिंह


( मंगलवार का दिन दूसरी परम्परा के लिए कई बुरी खबरों का दिन था . सुबह खबर आई कि ब्लैक अधिकारों के लिए लड़ने वाली नाबेल सम्मान से सम्मानित नदीन गोर्डिमर नहीं रहीं . फिर सुप्रसिद्ध कथाकार मधुकर सिंह और थोड़ी ही देर में सुप्रसिद्ध चिंतक/लेखक तथा ‘अपेक्षा’ के संपादक तेजसिंह के परिनिर्वाण की खबर आई . इन तीनों को श्रद्धांजलि  देते हुए हम  तेज सिंह से स्त्रीकाल के सम्पादन मंडल के सदस्य राजीव सुमन की बातचीत पर आधारित यह आलेख प्रस्तुत कर रहे हैं . यह स्त्रीकाल के ' दलित स्त्रीवाद अंक' में प्रकाशित हो चुका है . )

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तेज सिंह


क्या वास्तव में दलित आंदोलन में दलित स्त्रीवाद  जैसी कोई चीज है। दलित आंदोलन तो अम्बेडकरवादी आंदोलन का हिस्सा है, क्योंकि इसकी पृष्ठभूमि में अम्बेडकरवादी आंदोलन रहा है। आप जानते हैं कि इसका महाराष्ट्र में जन्म हुआ है। महाराष्ट्र में फुले से लेकर बाबा साहब तक इसका विकास हुआ। दलित स्त्री दलित प्रश्नों को लेकर काफी बातें उठती हैं फिर भी मैं मानता हूँ कि दलित स्त्रीवाद  कोई अवधारणा  नहीं है। महाराष्ट्र में 1942 के आसपास बाबा साहब ने एक भाषण दिया था। 1942 में  नागपुर में अखिल भारतीय सम्मेलन हुआ, उसमें अनुमान था कि 75000 लोगों में महिलाओं की उपस्थिति 25000 थी। मतलब एक ऐतिहासिक सम्मेलन रहा। बाबा साहब ने उसमें महिलाओं के बारे में कुछ बातें कहीं, जिसे मैं सोचता हूँ कि दलित स्त्रीवाद  आंदोलन के रूप में दावेदारी करने वाले आंदोलन को देखना जरूरी है। बाबा साहब ने कहा कि महिलाओं का एक संगठन होना चाहिए महिलाओं की तरक्की के लिए.  दूसरी बात उन्होंने ये भी कही कि वे महिला ही हैं ,जो सामाजिक बुराइयों को दूर कर सकती हैं। उनके बिना मुक्ति सम्भव नहीं हैं। सामाजिक बुराई को दूर करने में महिलाओं की बहुत बड़ी और गहरी भूमिका रही है। उसको ध्यान में रख के हम लोग बात करें तो शायद हम उस पूरे आंदोलन को समझ सकेंगे जो महाराष्ट्र से इधर आया है। डॉ. बाबा साहब ने एक बहुत अच्छी बात कही थी कि मैं समाज की प्रगति को इस बात से नापता हूँ कि उसकी महिलाओं ने कितनी प्रगति की है। महिला की प्रगति को बाबा साहब उस पूरे समाज के प्रति देखते हैं,  ये एक बहुत बड़ी बात है।

सबसे पहले जो बंगाल में नवजागरण आया, फिर महाराष्ट्र में नवजागरण आया, वह स्त्री  केन्द्रित रहा। सबने माना है कि बिना नारी शिक्षा के बिना  समाज देश प्रगति नहीं कर सकता.  एक केन्द्रीय विचार यहाँ से उठकर आया है। नारी शिक्षित होनी चाहिए, परिवार में नारी शिक्षित होगी तो परिवार का विकास होगा। फूले बार-बार कहते रहे हैं। इसलिए फूले ने ही पहली बार उस आंदोलन को आगे बढ़ाया ,नारी शिक्षा को लेकर।
इसको हम दलित स्त्रीवाद  नहीं कह सकते, इसे नारी सुधार आंदोलन कहना उचित होगा।

हम नारी अस्मिता की बात क्यों कर रहे हैं। मैं बार-बार कहता हूँ कि जब नारी चेतना नहीं आयेगी, उसकी अस्मिता भी आकार नहीं लेगी। सामाजिक-चेतना के बिना सामाजिक अस्मिता का कोई अस्तित्व नहीं होगा। आपका समाज में अस्तित्व कैसा है, उसके अनुरूप आपकी सोच बनती है, आपकी चेतना बनती है। घर का जो ढाँचा है, उसमें उसकी नारी की स्थिति क्या है, उसका सामाजिक आधार क्या है, उससे उसकी चेतना विकसित होती है। जो आधार है, उससे उसका अस्तित्व बनता है, उससे उसकी चेतना मनोनीत होती है। नारी को समानता का अधिकार चाहिए। जो अधिकार पुरुष को मिले हैं, वो अधिकार महिलाओं को भी चाहिए। इसलिए ये पूरा-पूरा आंदोलन नारी अस्मिता को लेकर आंदोलन है।

सवाल है किये दलित आंदोलन से टकराता है कि नहीं। मैं समझता हूँ कि ये नारी अस्मिता का जो आंदोलन है,वो दलित आंदोलन से टकराता नहीं है बल्कि उसका विकास करता है। ये पूरा आंदोलन अस्मिता के संघर्ष का रहा है। 1850 से देखो, 1857 के बाद पूरे भारत में अस्मिता संघर्ष शुरू हुआ, जो प्रत्येक समाज में  दिखता है। ये पूरी शताब्दी अस्मिता-संघर्ष की शताब्दी रही है।दलित अस्मिता का सवाल भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से शुरू हुआ। पहला अस्मिता आंदोलन हिन्दू परिवार को लेकर हुआ, दलित परिवार को लेकर नहीं। हिन्दू परिवार में सती प्रथा, बाल विवाह प्रथा विधवा प्रथा आदि थीं। ये तीनों समस्याएं  उच्च वर्ग की रही हैं। ये दलित-समस्या नहीं रही है। दूसरा आंदोलन जो होना चाहिए था जाति प्रथा के विरुद्ध, उसको समाज सुधारकों ने एजेण्डा नहीं बनाया। इसके विपरीत महात्मा फुले का एजेण्डा, बाबा साहब का एजेण्डा जाति प्रथा के विरुद्ध आंदोलन करना था। बहुजन समाज का एजेण्डा जाति प्रथा का उन्मूलन करना था।

दलितवाद का अर्थ क्या निकाला जाए, आज ये शब्द कामन हो गया । 10-12 साल पहले हम लोग दलित शब्द का स्वागत करते थे। दलित शब्द और दलितवाद दोनों अलग है। दलित हमारी पहचान और अस्मिता है। दलितवाद एक व्यवस्था बन जाती है। दलितवाद कहने से दलित समाज में हीनता बोध भर जाता है इसलिए मैं दलितवाद का विरोध करता हूँ। दलितवाद से निर्बल ,कमजोर, हीनता, दीनता का भाव निकल कर आता है इसलिए दलितवाद का विरोध करता हूँ। हमारे सामने दलितवाद नहीं बल्कि अम्बेडकरवाद है जो हमें चिंतन विचार देता है। दलितवाद में परिवर्तन नहीं है, बल्कि इससे दलित समाज हीनता का भाव उत्पन्न होता है। दलितवाद उसी व्यव्स्था को स्वीकार कर लेता है. हालांकि दलित शब्द और दलितवाद में अंतर जरूर है, लेकिन मैं दलितवाद का विरोध करता हूँ।

पितृसत्ता पूरे विश्व में समान रही है,लेकिन सवाल उठता है  कि एशिया की पितृसत्ता और भारत की पितृसत्ता दोनों में अंतर क्या रहा है। बाबा साहब ने बार-बार कहा ये जो पितृसत्ता बनी, उसका बड़ा कारण रहा है। अगर हम इसको देखें आर्य समाज, वैदिक काल,  बुद्ध काल और बाद में मनुस्मृति का काल देखें तो समझ में आ जायेगा कि पितृसत्ता कैसे परिवर्तित और विकसित होती रही है। इसका एक उदाहरण हमारे सामने है रामायण का। मातृसत्ता पितृसत्ता में कैसे रूपान्तरित हो रही, इसका  रामायण का उदाहरण हमारे सामने है। शूर्पनखा की जो नाक काटी जाती है। मातृसत्ता का पितृसत्ता में रूपान्तरण हो रहा है। नाक हमेशा पुरुष-महिला के अस्तित्व प्रतिष्ठा का सवाल रही है। सीधे नाक काटने का मतलब है कि मातृसत्ता का पितृसत्ता में रूपान्तरण हो रहा है। बहुत बड़ा उदाहरण है, इसलिए पुरुष शूर्पनखा की नाक काटता है उसका अपमान करता है। ये जो रामायण का प्रसंग है,ये कहीं न कहीं मातृसत्ता से पितृसत्ता में परिवर्तन का प्रसंग है।
बाबा साहब का  एक बड़ा लेख रहा : ‘ क्रान्ति-प्रतिक्रान्ति’। इसमें बड़े विस्तार से बताया है कि वैदिक काल में आर्यों में कितनी नैतिकता रही है। यौन नैतिकता का विकास वैदिक काल और पौराणिक काल में कैसा रहा। आर्यों के समाज में नैतिकता नहीं थी, बल्कि बर्बरता और अनैतिकता थी। आर्यों के समाज में एक बड़ी प्रथा थी, बहुपतित्व प्रथा। एक स्त्री  कई पति रख सकती थी। स्त्री  किसी भी पुरुष के साथ सम्भोग कर सकती थी। सेवा कर सकती थी। बाबा साहब ने कहा,वैदिक काल में आकर इस बहुपतित्व प्रथा का बहुपत्नी प्रथा में रूपान्तरण हो जाता है। ये बड़ा अन्तर है। ये बिल्कुल उल्टा है, रूपान्तरण है। ये शुरुआत है,जहां से पितृसत्ता ब्राह्मण पितृसत्ता में रूपान्तरित होती जा रही है। यहां क्योंकि पुरुष को सब अधिकार मिल जाते हैं। वहां स्त्री  को अधिकार थे मगर यहां स्त्री जो है, वो पुरुष के अधीन हो जाती है। इस व्यवस्था को मनु ने एक संस्था का रूप दे दिया, जो राजसत्ता द्वारा संचालित की गयी है। यहां से ब्राह्मण पितृसत्ता का सही रूप सामने आ जाता है, जो संस्थागत हो जाती है. इसको राजसत्ता का सहयोग मिल जाता है,क्योंकि मनु ब्राह्मण था। बाबा साहब ने कहा कि मनुस्मृति जो लिखी गयी थी वो पुष्यमित्रा के कहने से लिखी थी मनु ब्राह्मण नहीं था, लेकिन पुष्यमित्र ब्राह्मण था, उसके कहने से ही मनुस्मृति लिखी है।

आर्यों में क्षत्रिय राजा बनता था। उसको युद्ध का अधिकार था, ब्राह्मण को अधिकार नहीं था। यहां से परिवर्तन आता है कि मनु ने इसको उलट दिया। इस पूरी व्यवस्था को मनु ने उलट दिया, यहां ब्राह्मण केन्द्र में आ गया। ब्राह्मण ही राजसत्ता के केन्द्र में आ गया। राजा ब्राह्मण ही बन सकता है। मनु ने ब्राह्मण सत्ता को सत्ता का रूप दे दिया। यूरोप में पितृसत्ता लिंग के आधार पर है। ब्राह्मणी पितृसत्ता जाति और लिंग के आधार पर है। ये बड़ा अंतर है। ब्राह्मणी पितृसत्ता में जाति और लिंग है। जो शूद्रों और नारी दोनों के खिलाफ जाती है।

दलित आंदोलन को अम्बेडकरवादी आंदोलन कहना चाहिए। उसमें दलित स्त्रीवाद जैसी कोई चीज नहीं है। उसमें स्त्रीसत्ता की बात की जा रही है। हमें स्त्री  को भी पुरुष के समान बराबर का अधिकार चाहिए। समानता का आधार,आर्थिक आधार चाहिए।  हमारी लड़ाई दलित और स्त्री  के लिए समानता और बराबरी की है। बराबरी आनी चाहिए। आर्थिक बराबरी आनी चाहिए। इसलिए ये बड़ा अंतर है। दलितस्त्रीवाद की विचारधारा कौन सी है। इसकी कोई विचारधारा नहीं है। जब स्त्रीवाद कहते हैं तो इसकी विचारधारा सामने आयेगी। दलितवाद की विचारधारा सामने आयेगी। इसलिए मैं इसको दलित स्त्रीवादन कहकर, इसको स्त्री - आंदोलन कहना चाह रहा हूं।दलित स्त्री  दलित आंदोलन से पूरी तरह से जुड़ नहीं पायी है। जुड़ना चाहिए, क्योंकि उसके लिए पहली शर्त है शिक्षा की. नारियां शिक्षा प्राप्त कर रही हैं। नारियां शिक्षित हो रही हैं। महाराष्ट्र में देखें  तो नारियों  में चेतना आ चुकी है। बाबा साहब ने कहा है कि बिना शिक्षा और राजनीति के बिना बराबरी का अधिकार नहीं प्राप्त होगा,इसलिए नारियों को शिक्षा और राजनीति से जुड़ना होगा, तभी बराबरी का अधिकार आ पायेगा। नहीं तो बहुत कठिन हो जायेगा।

स्त्रीवादी आंदोलन की समस्या और दलित आंदोलन की समस्या अलग है। दोनों आंदोलन की समस्या अलग है। सवर्ण हिन्दुओं का आंदोलन सवर्ण स्त्रिायों के हाथ में है। अब दलित स्त्री   कोशिश कर रही हैं कि इस से हटकर कुछ नेतृत्व लेकर,अपनी संस्था को आगे रखें। सवर्ण स्त्रिायों के हाथ से दलित स्त्री  को नेतृत्व लेना पड़ेगा, तब जाकर दलित स्त्री  आंदोलन के साथ न्याय हो पायेगा।इसका विस्तार होना चाहिए, हमें लेखन तक सीमित न होकर इसका विस्तार करना चाहिए। हमें समाज, राजनीति,धर्मक्षेत्र आदि में जाना चाहिए। सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक, साहित्यिक आंदोलन बिना राजनीति के आगे बढ़ ही नहीं सकते। इसलिए मैं बार-बार कहना चाहता हूं कि ज्ञानसत्ता, धर्मसत्ता,राजसत्ता प्राप्त करनी चाहिए। अगर हमें समाज में बराबर का अधिकार चाहिए तो ज्ञानसत्ता, धर्मसत्ता,राजसत्ता पर कब्जा करना पड़ेगा, क्योंकि हजारों सालों तक ब्राह्मणों ने इन तीनों पर कब्जा रखा है। राजसत्ता को ब्राह्मणों ने अपने हित पर सपोर्ट किया है। इसलिए ये सत्ता संघर्ष है। दलित ज्ञानसत्ता में काफी आगे बढ़ चुका है, अब धीरे-धीरे धर्मसत्ता और राजसत्ता की तरफ बढ़ रहा है। लेकिन अभी ये शुरुआत है। ज्ञानसत्ता वो है, जो चोट दे सकती है। ज्ञानसत्ता ने हमेशा धर्मसत्ता और राजसत्ता को चोटें दी हैं। ब्राह्मणों ने इसलिए ज्ञानसत्ता पर कब्जा किया। ब्राह्मणों ने पहला काम क्या किया, ज्ञानसत्ता पर कब्जा किया।

कांशीराम ने जो आंदोलन खड़ा किया, उन्होंने पूरे पक्ष को लिया। कांशीराम ने बामसेफ खड़ा किया। बामसेफ का मतलब है सामाजिक आंदोलन। कोई भी राजनीतिक आंदोलन आगे नहीं बढ़ सकता, जब तक सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन खड़ा नहीं करेगा। कांशीराम ने पहला काम सामाजिक आंदोलन खड़ा किया। बाबा साहब शुरुआत कर चुके थे, फुले शुरुआत कर चुके थे। फुले का अपना आधार है, इसको बाबा साहब ने आगे बढ़ाया। बाबा साहब ने उसको बाद में जोड़ा। कांशीराम उसको राजसत्ता की तरफ ले गये। ये पूरी चेन फुले से लेकर कांशीराम तक आयी। कांशीराम ने उस राजसत्ता का स्वाद लिया। उसको मायावती के हाथ में देकर सत्ता जगायी। जब कांशीराम मरे तो अपना उत्तराधिकारी मायावती को बनाया। उन्हें उम्मीद थी कि मायावती इसे आगे ले जायेगी,लेकिन मायावती की अपनी सीमाएं हैं। वो इस समय बाहर नहीं निकल पाती हैं। पहली बात तो कि मायावती दलित बुद्धिजीवियों पर विश्वास नहीं करती हैं। अगर उस पर विश्वास करेंगी तो आगे बढ़ सकती हैं, क्योंकि बिना बुद्धिजीवी वर्ग के कोई सत्ता आगे नहीं बढ़ सकती है. हमेशा हर आवश्यकता में बुद्धिजीवी की जरूरत होती है। बिना चिंतन के विचारधारा नहीं बनेगी। विचारधारा ही आधार देती है। मायावती ने जो नारा दिया था, बहुजन से सर्वजन, वो राजनीतिक मामला था। सामाजिक मामला नहीं है। अगर ये सामाजिक आंदोलन बनता तो बेहतर होता। राजनीतिक आंदोलन समाज से मिलता है, सांस्कृतिक आंदोलन से बनता है, लेकिन मायावती ये सब काट कर देखती हैं। तो सर्वजन का नारा देना एक राजनैतिक हिस्सा, सत्ता प्राप्ति का हिस्सा है, इससे समाज में बदलाव नहीं आयेगा। राजनीतिक बदलाव नहीं आयेगा। समाज को जोड़ना पड़ेगा, संस्कृति को जोड़ना पड़ेगा, बुद्धिजीवी को जोड़ना पड़ेगा। बिना बुद्धिजीवी वर्ग के कोई भी आंदोलन आगे नहीं बढ़ सकता है।

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