पश्चिम उत्तर प्रदेश : स्त्री की नियति

प्रेमपाल शर्मा
प्रेमपाल शर्मा सामाजिक -सांस्कृतिक चिन्तक हैं.संपर्क: 22744596(घर),23383315(कार्या),Email:prempalsharma@yahoo.co.in, Website www.prempalsharma.com

( प्रेमपाल शर्मा का यह आलेख पश्चिमी उत्तर प्रदेश के पितृसत्तात्मक समाज के दीर्घकालीन  स्त्रीविरोधी असर   की पड़ताल कर रहा है, जहां स्त्री के आजाद ख्याल का मतलैब है उसकी मौत ! दुखद है कि ये क्षेत्र  राष्ट्रीय राजधानी से बहुत दूर नहीं हैं.  )
देश के अलग-अलग हिस्सों से स्त्रियों पर होने वाले अत्याचार या हिंसा से अखबार भरे रहते   हैं । हिन्दी- भाषी राज्यों में तो हिंसा की ये घटनाएं छोटी-छोटी बच्चियों तक को अपनी चपेट में ले रही हैं । ऐसा नहीं कि ये हाल में बढ़ी हों । नयी बात सिर्फ यही है कि मीडिया और समाज की सजगता से अब इन्हें  छिपाया नहीं जा सकता । चालीस-पचास वर्ष पहले अपने बचपन के दिनों में उत्तार प्रदेश में जो स्त्री  की स्थिति थी आज उसका और भी भयानक रूप दिखता है । भले ही मोबाईल आ गया हो या कपड़ों की आजादी मिल गई हो । हिंसा की ये घटनाएं भारतीय लोकतंत्र के लिए एक चुनौती बनती जा रही हैं ।
   
कुछ दिन पहले क्षमा शर्मा का लेख ‘एक लेखिका का बनना’ पढ़ा था । लेखिका के संघर्ष से कहीं ज्याददा उसमें पश्चिमी उत्तार प्रदेश में स्त्री  विरोधी माहौल का मुकम्मिल बयान था । बहुत प्रामाणिक अनुभव थे और उसी सहज भाषा में । ‘ओये ! उसकी तरफ मत देखियो । यो मेरी है ।’ किसी भी लड़की को बदनाम कर देना और मजनू  पर आंच भी न आये । घूंघट और बुरके की पहरेदारी के बावजूद वे न घर में सुरक्षित हैं, न स्कूल, सड़क या कॉलिजों में । चालीस वर्ष पहले जो था वैसा आज भी है बल्कि और क्रूर । अब मोबाईल आ गया है तो उस पर पाबंदी, कपड़ों पर पाबंदी और मनमर्जी शादी के खिलाफ तो खाप पंचायतें हैं ही सूली पर टांगने के लिये । लोकतंत्र के सारे पायों को अगूंठा दिखाते हुए ।

हाल ही में भारत रत्न  से नवाजे वैज्ञानिक सी.एन.राव ने कहा है कि चांद पर यान भेजना या परमाणु विस्फोट करने से हम वैज्ञानिक देश की श्रेणी में नहीं आयेंगे ।बात तो तब है जब  हमारी रोजाना की जिंदगी में वैज्ञानिक चेतना आये । भावार्थ यह कि एक प्रधानमंत्री बनाना देश की स्त्री  की हैसियत का बयान नहीं है, बड़ी बात तब है जब वह निर्भीकता से देश के हर संस्था्न, कॉलेज में नजर आये । गांधी जी भी स्त्री  की स्थिति को किसी देश की प्रगति का पैमाना मानते थे । क्यों कि पश्चिमी उत्तीर प्रदेश में पला-बढ़ा हूं इसलिये उसी पक्ष पर कुछ और टीपें । 


इस विषय पर सोचना शुरू करते ही मेरे दिमाग में महिलाओं और लड़कियों की स्थिति को लेकर सैंकड़ों विचार ऐड़ मार रहे हैं । आप सभी से उन बातों को सांझा करने के लिए । किसी बेहतर रास्तेै, विकल्पं की तलाश में । भारतीय रेल के सौजन्यत से देश के दूसरे राज्यों में भी जब तब जाना होता है इसीलिए मैं पश्चिमी उत्तर प्रदेश, मेरठ यानि आगरा क्षेत्र की महिलाओं की स्थिति और गुजरात, बंगाल, केरल, तमिलनाडु के बरक्स के फर्क को और साफ-साफ देख पाता हूं । कभी-कभी तो अंदर एक पीड़ा भी उठती है कि इस क्षेत्र की महिलाओं को यूरोप, अमेरिका की स्त्री  के बराबर या कन्धों  तक पहुंचने में तो न जाने कितने दशक लगें, पहले यह क्षेत्र इसी देश के दूसरे प्रांतों की महिलाओं यानि कि केरल, बंगाल, गुजरात की बराबरी भी कर पाए तो कम से कम मेरे जीवन काल में (मैं अपने जीवनचक्र को अधिकतम 20-25 साल में पूरा करके दुनिया से कूच करने की तैयारी में रहूंगा) तब भी बहुत बड़ी बात है । आइए, मैं कुछ अनुभवों को आपसे सांझा करता हूं ।

सबसे पहले एक बहुत निजी अनुभव । मैं स्वयं पश्चिम उत्तर प्रदेश का रहने वाला हूं खुर्जा के पास । पिछली पीढ़ी के ज्यादातर पारम्पैरिक परिवारों की तरह बड़ा परिवार । पांच भाई और दो बहन, बाबा, दादी, चाचा और उनके परिवार में सात सदस्या । बहनें सबसे बड़ी थीं । उनको जैसे- तैसे पांचवीं तक पढ़ाया गया । एक कारण यह भी रहा होगा कि गांव में स्कूल सिर्फ पांचवीं तक था और आगे पढ़ने के लिए उन्हें  23 किलोमीटर दूर एक कस्बे में भेजना पड़ता । कस्बे तक उन दिनों भी एक पतली सी पक्की सड़क थी । पैदल भी जाया जा सकता था, लेकिन उससे बड़ी रुकावट शायद मानसिक रही होगी कि लड़कियों को क्यों पढ़ाया जाए ? सुरक्षा जैसे कारण भी निश्चित रूप से दिमाग में रहे होंगे और सबसे बड़ा कारण तो वही रहा होगा । हिन्दू और मुसलमान,दोनों ही धर्मों में समान रूप से व्याप्त, लड़कियों को परदे में घूंघट में छुपा कर रखा जाए और जितनी जल्दी हो हाथ पीले कर दिए जाएं यानि कि शादी । बहनें मुझसे उम्र में बड़ी थीं । इसलिए संभवत: उनकी शादी भी 15-16 वर्ष की उम्र में कर दी गई । हम पांच भाई लगातार उनसे छोटे थे । मैं आपके सामने हूं पोस्टए ग्रेजुएट, डाक्टरेट, सिविल सर्विसेज पास कर के रेलवे में नौकरी पाई । मेरे छोटे भाई ओमा शर्मा ने भी लगभग वही सब कुछ किया । मैं बार-बार इस प्रश्न से मुखातिब होता हूं कि यदि हमारे अंदर कुछ संभावनाएं बनीं तो वैसी संभावनाएं बहनों के अंदर क्यों नहीं बनने दी गई  ? निश्चित रूप से कह सकता हूं कि वे भी उतनी ही इंटेलीजेंट हैं या उस समय रही होंगी जैसे हम पांच भाई । लेकिन पूरे परिवेश में वह आजादी उनको थी ही नहीं । आज भी नहीं है । ऐसे किस्सा हमारे पूरे क्षेत्र के लिए एक सच की तरह हैं ।

अगला किस्सा खुर्जा का जहां मैंने कॉलेज की पढ़ाई की ।1975 में मैंने बी.एस.सी. किया । विज्ञान की क्लास में लड़कियों की संख्या लगभग नगण्य ही थी । मुश्किल से 10 प्रतिशत और ये सारी लड़कियां खुर्जा शहर या बुलन्द शहर की ही थीं । उसका कारण स्पष्ट‍ था कि आस-पास के गांव से शायद ही कोई लड़की विज्ञान पढ़ने  बस, पैदल या साईकिल से सुबह खुर्जा आने की जुर्रत रखती होगी । प्रयोगात्म़क क्लासों के लिए जल्दी आना पड़ता था । यानि कि लड़कियों को पढ़ाएंगे भी तो उनको ‘आर्ट साइड’ यानि कि हिन्दी, समाज शास्त्र  आदि के वे सब्जेक्ट् ,जिन्हें वे कम से कम सुविधाओं और एक टालू ढंग से पढ़ाया जा सके । नाममात्र को यह दावा करने के लिए कि बी.ए. कर लिया है या एम.ए. कर लिया है । मकसद तो सिर्फ शादी करना है । क्या यहां भी यह मान लें‍ कि गांव की लड़कियों में शहर की लड़कियों से कम अक्ल होती है ? क्या वे सभी डॉक्टरी इंजीनियरी या विज्ञान के विषय वैसे ही नहीं पढ़ सकती थीं जैसे शहर की ? और यहां शहर की भी केवल 10 प्रतिशत लड़कियां ही क्यों  ? जब आबादी 50 प्रतिशत है तो यह लगभग इसी अनुपात में हर क्लास में क्यों नहीं दिखना चाहिए ? आप समझ सकते हैं कि परिवेश, धर्म, जाति और गैर-बराबरी की किन अदृश्य जंजीरों को ये अनुभव सामने लाते हैं ।


अगले अनुभव से पहले एक तथ्य । कुछ वर्ष पहले भोपाल के प्रसिद्ध संस्था एकलव्य ने एक टेबल कलैण्डर छापा था । टेबल कलैण्डर भारतीय महिला वैज्ञानिकों पर केंद्रित था । मैंने कलैण्डर पूरा देखने से पहले ऑंखें  बंद की और अपने दिमाग को कई बार दौड़ाया कि किसी महिला भारतीय वैज्ञानिक का नाम मैं भी जानता हूं या नहीं ? ऐसा नहीं कि बी.एस.सी. के दिनों में विज्ञान पढ़ाने वालों में कोई महिला नहीं थी ।  ज्यूलॉजी, बॉटनी दोनों में ही महिला प्राध्यापक थीं लेकिन मैं यहां बात प्रसिद्ध वैज्ञानिकों की कर रहा हूं । आप भी दिमाग दौड़ाएं और जरा कागज पर लिखें कि  कोई महिला नाम याद आ रहा है जिसका काम देश, दुनिया में जाना जाता हो ? मेरा दावा है एक भी नाम आप नहीं याद कर सकते । रेडियम की खोज करने वाली मैडम क्यूरी की कहानी मेरे पिताजी ने भी पढ़ी थी, मेरे दादाजी ने भी और मैंने भी । लेकिन हमारे समाज में मैडम क्यूरी या वैसी महिलाएं उतनी ऊचाइंयों तक क्यों नहीं पहुंच पातीं ? मामला वहीं आकर रुक जाता है कि पहुंचेंगी तो तब जब समाज उनको शिक्षा के ऐसे अवसर देगा । उन विषयों को पढ़ने की, उस आजादी से प्रयोग करने की या और भी आगे चलकर उस आजादी से उस क्षेत्र में शोध के लिए बाहर निकलने की । क्या इस क्षेत्र में कानून व्यवस्था  के हिसाब से भी लड़कियां, महिलाएं शोध के लिए गांव, शहर एक विश्वास, निडर भाव से आ जा सकती हैं ? मैं अपने प्रामाणिक अनुभव से कह सकता हूं कि आज भी स्थिति मेरे अपने कॉलेजों के दिनों से आज तक के 40 सालों में नहीं बदली है बल्कि और खराब हुई है । हर साल गॉंव में जाकर पूछता हूं कि क्या कोई लड़की बी.एस.सी., विज्ञान आदि में पढ़ने खुर्जा या बुलंदशहर जाती है ? उत्तयर ना में मिलता है । थोड़ी संख्या बी.ए., एम.ए. करने वाली लड़कियों की बढ़ी जरूर है लेकिन वह लगभग हिन्दी, इतिहास जैसे विषयों में और वह भी प्राइवेट पढ़ाई सिर्फ वार्षिक परीक्षा देने तक सीमित ।

यहां प्रश्न इन विषयों या विज्ञान के बड़े या छोटे का नहीं ये वर्गीकरण कुछ तथ्य बताते हैं ,लगभग पूर्व निर्धारित सत्य की तरह कि समाज निर्धारित कर रहा है कि आपको क्या पढ़ना है क्या नहीं, आपकी प्रतिभा नहीं । विज्ञान में आप चाहें कितनी भी अच्छी़ हों, मां-बाप की चिंता तो यह है कि जाएगी कैसे कॉलेज, रात को लौटेगी कैसे ?  जिस क्षेत्र की आधी आबादी इस चिंता से हर समय गुजरती हो वहां स्त्रीं का भविष्य कैसा होगा हम कल्पना कर सकते हैं ।

कुछ अनुभव इस क्षेत्र के बाहर के । उन्हें भी आपसे इसलिए साझा कर रहा हूं ,जिससे कि आप इस क्षेत्र की महिलाओं की दुर्गति का तुलनात्मक रूप से बेहतर अहसास कर सकें। लगभग 15 साल पहले की बात होगी मैं कलकत्ता  के मैट्रो स्टेशन पर था । सामने देखा तो एक परिवार के कुछ सदस्यों के बीच दो महिलाएं घूंघट में लिपटी अपने ससुर और पति के पीछे चल रही थीं । मैंने दोस्त से मजाक में एक बात पूछी- बताओ ये कहां की होंगी ? मेरे मित्र प्रश्न की गहराई नहीं समझ पाए । बोले क्यों ? मैंने बताया कि मैं दावे से कह सकता हूं कि यह परिवार मेरठ, आगरा, बुलंदशहर, खुर्जा या हरियाणा के सीमावर्ती क्षेत्र का होगा । हमने आगे बढ़कर अनौपचारिक रूप से पूछा तो सच निकला । क्यों ? अगर आप बंगाल भी जाएं तो घूंघट काड़े जो महिलाएं होंगी वे इसी क्षेत्र की होंगी । यानि कि बांगाल जैसे प्रांत में भी जहां गरीबी है, प्रतिव्यक्ति आय भी ज्यादा नहीं और भी कुछ पिछड़ापन हो सकता है लेकिन स्त्री  की स्थिति इतने निचले पायदान पर नहीं है कि उसके मुंह खोलकर चलने, फिरने की आजादी पर भी बंदिश लगाई जाए । आप कलकत्ता  और वहां के गांव देहात में भी जाएं तो भी आपको ऐसी ‘घूंघटिया संस्कृति’ नहीं मिलेगी । घूंघट या परदा शायद कई शताब्दियों पहले के एक अभिशाप की तरह हैं जिसे हिंदू कहते हैं हमने मुसलमानों से लिया है और मुसलमान पता नहीं आरोप किस पर लगाते हों । यदि ऐसा है तो वही घूंघट बंगाल में क्यों गायब हो जाता है  ? गुजरात में क्यों  नहीं दिखाई देता  ? केरल में तो बिल्कुल भी नहीं है । कहीं न कहीं समाज की इन बेडि़यों को काटने में ये राज्य , मेरठ आगरा क्षेत्र या उत्तेर प्रदेश जैसे राज्यों  से बेहतर साबित हुए हैं ।

बीस साल पहले का मुझे एक सर्वे याद आता है, जिसमें देश भर में केरल में इंजीनियरों की संख्या सबसे ज्यादा थी । बंगाल में शायद महिला डाक्टरों की । पिछले दो चार सालों में जब से पैसों को तराजू के पलड़े में भरकर उत्तमर प्रदेश में इंजीनियर बनाये जा रहे हैं तब एकाध प्रतिशत लड़कि‍यां इंजीनियरिंग  कर रही हैं । बीस वर्ष पहले तो उत्तर भारत के कॉलेजों में इंजीनियरिंग  के पेशे में तो महिलाएं ढ़ूंढे भी नहीं मिलती थीं । 1996 से लेकर 2001 तक मैं गुजरात के बड़ौदा शहर में रहा हूं । वहीं पता लगा कि देश भर की 25 प्रतिशत स्कूटी चलाने वाली संख्या अकेले अहमदाबाद और बड़ौदा शहर में है । क्याल यह लड़के लड़कियों की बराबरी और आजादी का पैमाना नहीं है ? स्कूटर या स्कूटी चलाना यानि कि आने-जाने की आजादी । घर, बाहर, कॉलेज, दफ्तर सभी जगह । क्यान कुछ सालों पहले तक आपको खुर्जा, आगरा जैसे शहरों में स्कूटी चलाती हुई महिलाएं मिलती थीं ? हरगिज नहीं । अधिकतर मिलेंगी भी तो अपने पति के स्कूेटर के पीछे गठरी की तरह बैठी हुई । मैं व्यक्तिगत  अनुभव को जोड़ूं तो मेरी पत्नी एक बैंक में नौकरी करती हैं । जब वे बड़ौदा में थीं तो उनके बैंक की दर्जनों सहकर्मी महिलाएं अपने-अपने स्कूटर से हमारे घर अकेली आती थीं । जरूरी नहीं है कि हर समय पति के साथ ही बंधी रहें। सेकुलरिज्म  की बहस में गुजरात पीछे हो सकता है लेकिन स्त्री की बराबरी और आजादी के मामलों में कम से कम आगरा और अवध क्षेत्र से कई गुना आगे है । घूंघट के पैमाने से नापूं तो यह लम्बा घूंघट गुजरात में भी शायद ही देखने को मिले । गुजरात के गरबा नृत्य का नाम आपने सुना तो होगा, जब आप देखेंगे तो अहसास करेंगे कि सांस्कृतिक क्षेत्रों में लड़के लड़कियों की बराबरी का क्या अर्थ है ?
क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि मेरठ, खुर्जा, आगरा, अवध क्षेत्र में लड़के लड़कियां मिलकर सांस्कृतिक नृत्य  करें ? किसी नाटक की रिहर्सल करते नजर आएं ? यह प्रश्न नैतिक अनैतिक, शलील-अश्लील जैसे जुमलों का नहीं है, बराबरी के हक और उसकी अभिव्यक्ति का है । स्वांग, नौटंकी आदि यदि आप देखते हो तो गांवों कस्बों  में पिछले दिनों भले ही इक्का -दुक्का स्त्री  पात्र आने लगे हों वरना पिछले 100-200 सालों से स्त्री  की भूमिका पुरुष ही करते रहे हैं । एक तरफ फिल्म  टेलीविजन पर इतनी आजादी लेकिन दूसरी तरफ अगर लडकी ने एक कदम भी बढ़ाया तो फांसी पर लटका देंगे ।

क्याा दुनिया में कोई प्रांत, प्रदेश ऐसा होगा जहां हमउम्र  लड़के-लड़कियों को मोहब्बत या शादी करने पर पंचायत के फैसले उनको फांसी पर लटका दें या मां-बाप ही अपने बच्चों का कत्ल कर दें और मीडिया टेलीविजन पर सामने आकर फख्र भी करें । लगता है इस क्षेत्र में हिन्दू हो या मुसलमान, दोनों में ही यह होड़ लगी हुई है कि वे अपने-अपने धर्म की महिलाओं को कितना जीने की मोहलत देते हैं । कुछ बरस पहले मेरठ के पास घटी इमराना और गुडि़या की घटना जिसमें पति के गायब हो जाने पर दूसरी शादी कर ली थी, इस भेदभाव को जानने के लिए पर्याप्त है कि पूरा क्षेत्र किस ढंग से धर्म मर्यादाओं के नाम पर एक ऐसी जकड़बंदी की हद में है । इसे किसी बड़े शैक्षिक, सांस्कृतिक आंदोलन से ही बदला जा सकता है ।

सांस्कृतिक पक्ष का एक उदाहरण बराबरी की अभिव्यक्ति का बहुत अच्छा उदाहरण बंगाल प्रांत है । क्या हमारे इस पूरे क्षेत्र में किसी लड़के, पुरुष को आपने गाने, नृत्य या संगीत की शिक्षा लेते हुए देखा  है ? इस सब को यह क्षेत्र पहले तो कुछ ‘जनाने’ किस्म  के, निम्न श्रेणी के काम मानता है । लेकिन यदि इस काम को जनाना भी माना जाए तब भी इतने परिवार अपनी बेटियों को नृत्य , संगीत की मुकम्मिल शिक्षा की तरफ भेजते हैं ? वैसे जैसे बंगाल में बेटियों को नृत्य या दूसरी ललित कलाओं में शिक्षा दी जाती है । मैंने कलकत्ता के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में लड़कियों और स्त्रियों की भागीदारी देखी है उसकी बराबरी गुजरात, केरल, महाराष्ट्र में तो संभव है अवध, आगरा प्रांत में नहीं । सिर्फ विज्ञान पढ़ने,पढ़ाने के मामले में ही हम पीछे नहीं हैं, सांस्कृलति पक्षों पर भी स्त्रियों के प्रति भेदभाव पीड़ादायक है । यही रुढि़यॉं आगे चलकर अपने बच्चों को पंचायती फरमान से फांसी पर चढ़ाती हैं ।

एक किताब के संक्षिप्त उल्लेख के बाद मैं अपनी बात समाप्त  करना चाहूंगा । हाल ही में विज्ञान अकादमी ने एक पुस्तक छापी है जिसका नाम है ‘Lilavati’s Daughters’ यानि लीलावती की बेटियां । लीलावती , प्राचीन भारत की एक परम विदुषी थीं । इस पुस्तक में 100 महिला वैज्ञानिकों के अनुभव और कामों का लेखा -जोखा है । देश की सबसे बड़ी आबादी वाला प्रांत उत्तर प्रदेश है । बिहार या उत्तर प्रदेश या इस लेख के क्षेत्र तक सीमित अवध, आगरा को रखें तो शायद ही उनमें कोई इस क्षेत्र की महिला शामिल है । कम से कम जिसने यहीं पढ़-लिखकर अपने काम आगे बढाया हो । आजादी मिले साठ साल तो हो ही गये । सामाजिक शैक्षिक पैमाने पर यह क्षेत्र और पिछड़ा है ।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश की तरह ही देश के कुछ और कोने भी होंगे । हम सबको आगे बढ़कर इन अनुभवों को शब्द देने होंगे । इस अंधेरे की पहचान करनी होगी । जब दुनिया भर की महिलाएं इन सारी बाधाओं, अंधेरों को पार करके आगे आ रही हैं तो कोई कारण नहीं कि यह क्षेत्र भी पीछे रहेगा। हमें इतिहास से यही सबक सीखना है। 
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