सांस्कृतिक ढकोसलों पर कुठाराघात करती फिल्म : ‘ क्वीन '

डॉ. महेश गुप्ता

डॉ. महेश गुप्ता
डा महेश गुप्ता कवि और कलाकार हैं . रंगमंच से भी इनका जुड़ाव रहा है , हिन्दी और गुजराती में मंचन, अभिनय दिग्दर्शन और नाट्य लेखन करते रहे हैं. इनकी गुजराती धारावाहिक सीरियल ‘जननी जोड़’ तथा गुजराती टेलीफिल्म ‘परिवर्तन’ में मुख्य भूमिका रही है . गुजराती नाट्य-पत्रिका ‘नांदीकार’ के सह संपादक. संप्रति : राजभाषा अधिकारी, भारतीय स्टेट बैंक,भोपाल.
( पिछले दिनों मार्च में रिलीज हुई फिल्म 'क्वीन' को स्त्रीवादी नजरिये से देख रहे हैं डा महेश गुप्ता . यह फिल्म मध्यम वर्गीय लड़की के लिए खुले आसमान का परिदृश्य उपस्थित करती है, उसकी  निर्धारित भूमिका , स्टीरियो टाइप से अलग . 'स्त्रीकाल'  के लिए फिल्मों की स्त्रीवादी समीक्षाएं आमंत्रित हैं. )

मध्यमवर्गीय भारतीय स्त्री की युवा मनोदशा को केंद्र में रखकर बोलीवुड फिल्म ' क्वीन ' न केवल भारतीय सिनेमा को बल्कि तथाकथित संस्कृति पर गर्व करनेवाले हमारे समाज को एक सही राह दिखाती है. यहाँ कल्पना, वास्तविकता एवं उद्देश्यपरक घटकों का कलात्मक संगम दृष्टिगोचर होता है.

फिल्म का कथानक कुछ इस प्रकार है : फिल्म की नायिका रानी , राजौरी गार्डन , दिल्ली में रहने वाली एक 21 वर्षीय पंजाबी लड़की है. वह एक बहुत ही रूढ़िवादी परिवार से है. उसका छोटा भाई सुरक्षा की दृष्टि से हर जगह उसके साथ रहता है. शादी से दो दिन पहले, उसका मंगेतर विजय उसे कहता है कि अब उसका विचार बदल गया है और अब वह उससे शादी करना नहीं चाहता. दोनों की जीवन शैलियों का परस्पर कोई मेल नहीं है. यह बताने के लिए वह उससे एक स्थानीय कैफे में मिलता है. इस घटनाक्रम से हैरान रानी एक दिन के लिए अपने आप को कमरे में बंद कर लेती है.

वह इस घटनाक्रम पर काबू पाने का फैसला करती है और अपनी पसंदीदा जगह पेरिस की यात्रा के लिए पहले से बुक करवाए हुए हनीमून टूर पर जाने की योजना बनाती है जो उसने पहले कभी नहीं देखा था. अपने मंगेतर विजय की पसंदीदा जगह, एम्स्टर्डम की यात्रा भी इसमें शामिल की जाती है. प्रारंभिक झिझक के बाद, उसके माता-पिता इस बात पर सहमत होते हैं और रानी रवाना होती है.पेरिस में उसकी मुलाकात विजयलक्ष्मी से होती है जो स्पेनिश / फ्रेंच माँ और भारतीय पिता की संतान है. रानी जिस होटल में रहती है वहीं विजयलक्ष्मी काम करती है. पेरिस में रानी को कुछ परेशानियों से भी दो - चार होना पड़ता है. एक बार स्थानीय पुलिस के साथ और एक बार एक किसी पॉकेटमार के साथ. रानी जल्द ही भारत लौटने का मन बनाती है. इस बीच विजयलक्ष्मी उसकी अच्छी दोस्त बन जाती है और उसकी विश्वासपात्र भी. दोनों पेरिस की सैर करते हैं , स्वतन्त्र रूप से मौज करते हैं. यहाँ रोमांच की एल लंबी श्रृंखला चलती है. एक बार खरीदारी करते समय , रानी द्वारा विदेशी वस्त्रों वाली अपनी तस्वीर गलती से विजयलक्ष्मी के बजाय विजय को भेज दी जाती है. विजय को अपनी गलती का एहसास होता है. विजय इस तस्वीर को देखकर बहुत प्रभावित होता है और उससे मिलने की कोशिश करता है.

रानी का एम्स्टर्डम जाने का समय हो आता है. एम्स्टर्डम पहुँचने पर उसे पता चलता है कि उसे होटल के कमरे को तीन अन्य लोग, ताका, टिम और ओलेकजान्डर के साथ साझा करना है. वह काफी परेशान होती है मगर जल्द ही, चारों अच्छे दोस्त बन जाते हैं. खरीदारी, सैर–सपाटा, क्लब, नर्तन आदि में समय गुजरता है. रानी को गोलगप्पे बनाकर बेचने का मौका मिलता है जिससे उसे आर्थिक लाभ तो होता ही है साथ ही आत्मविश्वास भी बढ़ने लगता है. अपने मित्रों की पृष्ठभूमि के बारे में जानकर उसे एहसास होता है कि दुनिया के अन्य भागों में लोग कैसी-कैसी विपरीत परिस्थितियों में भी मौज से जीते हैं. उसे जीवन का एक नया पाठ मिलता है.

स बीच विजय उसे ढूँढता हुआ वहां आ पहुंचता है. वह माफी मांगता है और संबंधों पर पुनर्विचार करने के लिए कहता है. वह रानी को हड़पने की कोशिश भी करता है जिस पर रानी के दोस्त प्रतिकार करते हैं लेकिन रानी उन्हें विजय को छोड देने को कहती है. रानी विजय से कहती है कि वह दूसरे दिन मिलेगी. दोनों अगले दिन मिलते हैं. मुलाकात सुखद नहीं रहती और रानी कहती है कि उसे रॉक शो जाना है और वह उससे दिल्ली में बात करेगी. रॉक शो में वह अपने दोस्तों के साथ आखिरी बार मिलती है. भारत लौटने पर, वह विजय के घर अकेले मिलने जाती है. बिना कुछ कहे, बस उसे उसकी सगाई की अंगूठी लौटाती है और गले मिलकर धन्यवाद कहती है. रानी अपने घर की ओर आगे बढ़ती है, एक राहत के साथ, सुकून के साथ, प्रसन्नचित्त.

कथानक के माध्यम से एक मध्यम वर्गीय स्त्री  की मनोदशा और सामाजिक विडम्बना को भलीभांति चित्रित किया गया है. यहाँ प्रश्न केवल पुरुष प्रधान उस समाज का नहीं जहाँ वह स्त्री को जॉब करने तक की आज़ादी देने से भी कतराता है, बल्कि उस संकुचित मनोदशा वाले पुरुष समाज का है जो स्त्री के रूप तक ही अपनी सोच को मर्यादित रखता है. यहाँ सहज ही याद आ जाती हैं सुशीला टाकभौरे की कुछ पंक्तियाँ :

मुझे अनंत असीम दिगंत चाहिए
छत का खुला आसमान नहीं
आसमान की खुली छत चाहिए

निश्चित तौर पर यहाँ रानी को आसमान की खुली छत प्राप्त हो पाती है, और प्राप्त हो पाती है वह स्वतंत्रता जो किसी भी स्त्री  का एक दमित स्वप्न है. भारतीय सिनेमा में इस प्रकार की फिल्म का बनना एक संयोग के साथ-साथ आशा की चिंगारी भी है. फिल्म को जिस प्रकार रेटिंग प्राप्त हुई एवं दर्शकों ने जिस तादाद में इसे देखा वह इस बात को उजागर करता है कि भारतीय समाज ब करवट ले रहा है. मीडिया का सदुपयोग करते हुए एक ताकतवर मनोहर अभिव्यक्ति कैसे की जा सकती है इसका प्रमाण है यह फिल्म. फिल्म के कथानक से भी अधिक महत्वपूर्ण बन पड़े हैं वे छोटे छोटे दृश्य जो सहज ही बहुत कुछ कह जाते हैं और मजबूर कर जाते हैं भारतीय समाज को आत्ममंथन हेतु. शादी के बाद अपने आप को कमरे में बंद कर लेने वाली रानी जब सुबह मिठाई के पैकेट से एक मिठाई खाती है तब वह वास्तविक धरातल पर खड़ी उस नारी-सी दिखाई देती है जिसे शादी टूटने का दुःख अवश्य है लेकिन दिल के किसी कोने में जिन्दा रहने की तमन्ना अभी शेष है. शादी टूटने को जिस गंभीरता से वह लेती है उतनी गंभीरता से उसके परिवार के अन्य सदस्य कहाँ ले पाते हैं. परिवार के लिए यह घटना केवल इज्जत के सन्दर्भ में ही अधिक महत्वपूर्ण है. रानी जब नॉन वेज प्लेट को टेबल पर देख कर भागती है और बाहर जाकर उल्टी करने लगती है तो लोग उसकी तस्वीर लेने लगते हैं जैसे ऐसा दृश्य पहले कभी देखा ही न हो. शराब के नशे में चूर रानी जब बाहर आकर कार के पास खड़े हुए व्यक्ति के समक्ष तरह-तरह की हरकतें करने लगती है, तब उस व्यक्ति का पूर्णतः अन्यमनस्क रहना और रानी की ओर ध्यान तक न देना व्यक्ति स्वातंत्र्य की घोषणा नहीं तो और क्या है ? उम्र के दायरों से बाहर व्याप्त यौन कुंठा पर फ़िल्मकार तब आघात करता है जब नेट के माध्यम से रानी से बात करते हुए रानी के पिता और उसका छोटा भाई विजयलक्ष्मी के विषय में दिलचस्पी दिखाने लगते हैं और उसकी दादी इसे ब्लू फिल्म करार देती है .

विजयलक्ष्मी का पात्र स्वच्छंद अवश्य है लेकिन अश्लील कतई नहीं. यह फिल्म अपने परिवार की हिदायतों को आँख मूंदकर अपनाने वाली रूढिवादी, भोलीभाली नायिका रानी के रूपांतरण की यात्रा की यात्रा है जो अपने मंगेतर द्वारा प्यार से दी गई उपाधि के कारण ही नहीं वरन सही मायने में ' क्वीन ' सिद्ध होती है. कॉमेडी, ट्रेजेडी, नात्यात्मकता और भावना से भरपूर यह फिल्म हमें सामाजिक परिवेश और नारी स्वतंत्रता के विषय में गंभीर रूप से विचार करने हेतु मजबूर करती है.

एम्स्टर्डम में रानी जब एक कमरे में अन्य पुरुषों के साथ कमरा साझा करने से कतराती है और कमरे से बाहर सो जाती है एवं टीम द्वारा उठाए जाने पर जब वह चीखती है तब जिस तरह टीम उसे संभालता है या जिस तरह टीम सहित कमरे में रहने वाले अन्य पुरुष पात्र ( ताका और ओलेकजान्डर ) कमरे से बाहर सोने को तैयार हो जाते हैं वह प्रसंग सांस्कृतिक भिन्नता को सहर्ष स्वीकार करने का एक अनुकरणीय उदहारण प्रस्तुत करता है. जब रानी खाना खाते समय मिर्च वगैरह की मांग करती है, तब जिस प्रकार होटल का मालिक उस पर बिदकता है और सभी व्यंजनों को मिर्च मसाले से भर देने के भारतीय रवैये पर आश्चर्य व्यक्त करता है वह हास्य के फौवारे तो उपस्थित करता ही है लेकिन जब वह रानी के पैसे लौटाने लगता है तब व्यावसायिक नीतिमत्ता के अनुकरणीय मानदंड स्थापित करता है. इतना ही नहीं वह रानी को अपने अनुसार व्यंजन बनाकर बेचने हेतु ऑफर भी देता है. गोल गप्पे बनाए जाते हैं. कुछ समय तक कोई नहीं खाता लेकिन फिर नए स्वाद पर जब भीड़ उमड़ पड़ती है तब किसी भी नए स्वाद या विचार के स्वीकार हेतु सहर्ष प्रस्तुत लोकसंस्कृति के दर्शन होते हैं. हींग का अंग्रेजी समानार्थी जानने के लिए जब रानी फोन करती है तब अंत में मिलने वाला जवाब कि हींग को अंग्रेजी में हींग ही कहते है, हास्य की सृष्टि का सर्जन करने के साथ-साथ विदेश में रहने वाले भारतीयों के भाषाई ज्ञान पर भी एक करारा व्यंग्य है. जिस प्रकार रानी के आगमन पर विदेश स्थित परिचित परिवार के सदस्य झूठी भावनाएं व्यक्त करते हैं और अलग कमरे में रानी को शगुन में दी जाने वाली राशि पर जो चर्चा करते हैं उससे यही सिद्ध होता है कि व्यक्ति भारत में रहे या विदेश में, उसकी मानसिक दरिद्रता वही बनी रहती है.

कुल मिलकर स्त्रीवादी आन्दोलन, महिला सशक्तिकरण या समाज सुधार हेतु किसी उपन्यास से कहीं अधिक ताकतवर अभिव्यक्ति होकर उभरती है फिल्म ' क्वीन '. अपने जीवन को जीने के चुनाव हेतु भारतीय महिलाओं को प्राप्त स्वतंत्रता पर यह फिल्म कई प्रश्न खड़े करती है. यह फिल्म हमारे समाज को आत्ममंथन हेतु मजबूर करती है एवं विवश करती है यह सोचने पर कि हमें कहाँ और क्या सुधार करने की आवश्यकता है. रानी तो एक प्रतीक है उस समाज के दलित स्त्री पात्रों का जिन्हें आवश्यकता है जागृत होने की, अपने जीवन के विषय में सोचने की और उस सोच को कार्यान्वित करने हेतु हिम्मत करने की.
एक गंभीर विषय को लेकर चली यह फिल्म दर्शकों को कहीं भी बोझिल नहीं लगती वरन मुक्त हास्य की संभावनाएं हर जगह साथ लिए रहती है. दिमाग को घर पर रखकर देखी जाने वाली बोलीवुड की फिल्मों के बीच एक अर्से के बाद एक अर्थपूर्ण फिल्म की प्रस्तुति बोलीवुड से और अधिक अर्थपूर्ण फिल्मों की प्रस्तुति हेतु आशास्पद माहौल तैयार करती है जिससे सामाजिक परिवर्तनों का पथ प्रशस्त हो सके.

Blogger द्वारा संचालित.