राजेंद्र यादव के अंतर्विरोध , हंस और दलित स्त्री अस्मिता के सवाल

 मनीषा कुमारी / संजीव चंदन

( ३१ जनवरी को हंस का सालाना आयोजन है हंस के  पुनर्प्रकाशन दिवस और  प्रेमचंद जयन्ती के अवसरपर. राजेन्द्र यादव के सम्पादन में हंस के लगभग २८ वर्षों के प्रकाशन के दौरान ३५० अंकों के एक अध्ययन के द्वारा राजेन्द्र जी के वैचारिक अंतर्विरोध की पड़ताल करता यह आलेख . विशेष सन्दर्भ हैं  दलित स्त्री अस्मिता के सवाल . यह आलेख अनिता भारती और बजरंग बिहारी तिवारी के संयुक्त सम्पादन में प्रकाशित होने वाली किताब ' यथास्थिति से टकराते हुए दलित स्त्री जीवन से जुडी आलोचना' के लिए लिखा गया है . )
हिन्दी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर राजेन्द्र यादव, उदय शंकर के द्वारा ली गई तस्वीर

फरवरी 1994 के सम्पादकीय में राजेंद्र यादव जी हंस की नीति स्पष्ट करते हैं, जो  1986 के अगस्त से हंस के पुनर्प्रकाशन का मैनीफेस्टो भी है . प्रेमचंद के हंस का 34 सालों बाद पुनर्प्रकाशन हिंदी साहित्य जगत और हिंदी समाज के लिए एक मह्त्वपूर्ण परिघटना है , जिसकी बडी उपलब्धियों में से एक है दलित और स्त्री अस्मिता की आवाज को स्पेस देना और उसे हिंदी की चेतना मे अनिवार्य रूप से दाखिल  करा देना . 1994 के उस सम्पादकीय में राजेंद्र यादव राजेश जोशी के द्वारा अनूदित कैथरीन मन्सफ़ील्ड की कहानी को हंस में न प्रकाशित किये जाने के अपने निर्णय के संबंध में कहते हैं , ' मगर मेरी इच्छा है कि तीसरी दुनिया के संघर्षों को वाणी देने वाली कविताओं , कहानियों को ही रेखांकित करने की कोशिश की जाय तो बेहतर है .'
अब सवाल है कि 1986 के बाद , बल्कि उसके पहले से ही हकीकत बन चुके तीसरी दुनिया में अस्मिताबोधी आंदोलनों को लेकर हंस का क्या स्टैंड रहा है , यह समझना जरूरी है . हालांकि इस आलेख का उद्देश्य  दलित  स्त्री और स्त्रीवाद के प्रति हंस और राजेंद्र यादव के रिश्ते  और नीतियों  की पडताल तक ही सीमित है. आजतक लगभग 350 अंको के साथ अगस्त 1986 से निरंतर हंस के शुरुआती अंकों में ही एक स्पष्टता है , साम्प्रदायिकता के खिलाफ उसकी स्पष्ट मुहिम की शुरुआत प्रारम्भिक अंकों से ही है और देह केंद्रित स्त्री -यौनिकता की पक्षधरता की झलक भी प्रारंभिक अंकों में ही मिल जाती है. पहले ही अंक में अरविंद जैन के  आलेख 'प्रजापति कटघरे में' और वहीं अर्चना वर्मा के द्वारा प्रस्तुत इर्विंग वैलेस के 'सेवन मिंनट्स' के एक अंश के प्रकाशन के साथ साहित्य में अश्लीलता के विवादों पर हंस का अपना स्टैंड घोषित सा है. धीरे- धीरे हंस स्त्रीविमर्श और दलित विमर्श के लिए प्रतिबद्ध होता गया. उसकी यही खूबी बनी और उसके विरोधियों के लिए यह उसका दुर्गुण.

हंस का एक महत्वपूर्ण विशेषांक

लेकिन हंस की इस घोषित प्रतिबद्धता के अंतर्विरोध  भी खूब हैं. सबसे बडा  अंतर्विरोध  राजेंद्र जी की प्रतिबद्धता और उनके ट्रेनिंग के बीच है . बाद के दिनों में समाजशास्त्री लीला दूबे को जवाब में लिखे अपने एक सम्पाद्कीय में  राजेंद्र जी यह स्वीकार भी करते हैं कि उनकी ट्रेनिंग शास्त्रीय नहीं है , अकादमिक नहीं है, इसलिए वे कामनसेंस के साथ मौलिक ढंग से सोचते हैं.  अभाव सिर्फ अकादमिक ट्रेनिंग भर का ही नहीं है; अभाव है तत्कालीन समविचारी आंदोलनों  से किसी जुडाव का भी या फिर प्रसंग है अपनी सामाजिक वर्गीय स्थिति में खुद के मानस निर्मिति का भी . यही कारण है कि जातिउत्पीडन के खिलाफ बाद में मुखर दिखते राजेंद्र जी जब हंस के पुनर्प्रकाशन के पांचवे  अंक में  ही युवाओं को संबोधित करते हैं, ' एक संदेश नई पीढी के नाम' में, तो वह संबोधन मध्यवर्गीय युवाओं को संबोधित करने तक सीमित रह जाता है ,और पूरे संदेश में जाति उत्पीडन कोई विषय नहीं होता है.  उसके ठीक दो महीने बाद फरवरी 1987 की संपादकीय में वे लिखते हैं, ' हमारे यहां सिर्फ गुंडागर्दी, बलात्कार, गावों में हरिजनों और स्त्रियों के 'वध' की कला  का विकास हुआ है .' 1987 में राजेंद्र जी जिस 'हरिजन' शब्द का प्रयोग कर रहे हैं , उसके प्रति दलितचेतना नफरत से भरी थी और राजेंद्र जी उसका बेधडक प्रयोग कर रहे हैं. इसके पहले वे अक्टूबर 1986 में शैलेश मटियानी का आलेख ' हरिजन होने का मतलब'  छाप चुके थे .  यह वह समय है, जब हिंदी पट्टी में भी कांशीराम जी के सायकल के पहिये घूमने लगे थे . महाराष्ट्र तो उग्र पैथर आंदोलन की वैचारिकी से पहले ही रु-ब-रु हो चुका था.

इस शास्त्रीय ट्रेनिंग या आदोलनों से दूरी या अपनी वर्गीय -जातीय निर्मितियों के कारण अपनी सीमाओं के बावजूद राजेंद्र जी ने अपने हंस के पन्नों पर अपना और हंस  का वैचारिक आगाज दे दिया था , वे हिंदू धर्म , हिंदू -हिंदी समाज की जडताओं पर प्रहार के लिए प्रतिबद्ध थे. इस प्रक्रिया में ही वे 1988 के जनवरी में डा. आम्बेडकर के द रिडल औफ राम ऐंड कृष्ण का अनुवाद प्रकाशित करते हैं. यहां भी यद्यपि वे कृष्ण की अपनी व्याख्या करते हुए इस मह्त्वपूर्ण आलेख के राम वाले हिस्से हो ही प्रकाशित करते हैं. धीरे-धीरे हंस में अनिवार्यतः स्त्री और दलित मुद्दे स्थान लेने लगते हैं, हंस 'देहमुक्ति' के अपने सिद्धांत की वकालत की राह पर भी चल निकलता है . जहां तक स्त्री और दलित रचनाधर्मिता के लिए प्लेटफार्म का सवाल है तो इस मामले में स्त्री रचनाधर्मिता भारी पडती है . दलित रचनाधर्मिता के लिए स्पेस के संदर्भ में पत्रिका पुनर्प्रकाशन  के 18 साल बाद पहला दलित विमर्श अंक ' सत्ता और दलित' के संपादक श्योराज सिंह बेचैन कहते हैं कि इतने सालों में हंस में 'दलित रचनाकारों की उपस्थिति 5% तक ही है' . दलित स्त्री रचनाकार तो नगण्य हैं ही .  हंस की अब तक की यात्रा में प्रकाशित स्त्री विमर्श और लेखन के विशेष अंकों में भी दलित स्त्री की भागीदारी और उसके संघर्ष के मुद्दों की प्रायः अनुपस्थिति सी है . दुःस्थिति तो यह भी है कि खुद श्यैराज सिंह के सम्पादन में प्रकाशित ‘ सत्ता और दलित अंक’ में दलित लेखिकाओं की भागीदारी भी नगण्य है. अतिथि संपादक इसके लिए संपादकीय में अपनीए मजबूरी इन शब्दों में बताते हैं, ‘ हमारे पास ख्याति प्राप्त लेखिकायें वास्तव में नहीं है.’ इस सफाई पर दलित स्त्रीवादी रचनाकार अनिता भारती की माकूल टिप्प्णी है , ‘ यह टिप्पणी दलित महिलाओं पर बिल्कुल उसी तरह की है ,जिस प्रकार सवर्ण मानसिकता से ग्रसित सवर्ण लेखक दलित लेखकों पर करते हैं.’ पृ . 215, समकालीन नारीवाद , अनिता भारती ).
राजेन्द्र जी की यह तस्वीर उनके विरोधियों और चाहने वालों के सामान रूप से प्रिय है .


राजेंद्र जी दलितों और स्त्रियों की साझी लडाई की बात करते हैं , दोनों की पीडा वे एक सी बताते हैं. 2002 के संपादकीय में वे लिखते हैं, ' साहित्य में स्त्रियों और दलितों का साथ आना एक साझी क्रांति का प्रारंभ है, क्योंकि दोनों ही सही अर्थों में सर्वहारा हैं, इनकी वास्तविक मुक्ति भी सर्वहारा क्रांति के दर्शन से उदित होगी .' नवम्बर 2002 में वे फिर लिखते हैं, ' स्त्री और दलित दोनो ही अन्य हैं, वह समानांतर दुनिया में रहती है . चूकि हमारे और उनके बीच की अंतर्क्रिया निरंतर बनी रहती है इसलिए उसकी चेतना और अभिरूचियों का विकास हमारी ही बोली बानी  में होता है .' इसके पहले भी 1994 के नवंबर -दिसंबर अंक  'औरत उत्तर कथा 1' के संपादकीय में वे जहां धर्म और जाति दोनो को ही स्त्री के उत्पीडन में समान रूप से सक्रिय बताते हैं , वहीं दलित स्त्री को भी 'स्त्री अस्मिता' के वृहद आकार में शामिल मानते हैं, ' धर्म और जातिगत बलात्कारों के बीच अपने को साधे रखना शायद औरत के लिए सबसे बडी अग्निपरीक्षा है. देह के बलात्कार द्वारा कुचल जाने या पूरी तरह ध्वस्त हो जाने से इन्कार करने वाली तो न जाने कितनी भंवरी बाइयां समाज और साहित्य में उठ खडी हुई हैं.' राजेंद्र जी की दलित और स्त्री की एक लडाई की वकालत यूं ही निर्विवाद भी नहीं थी . 1993 के अप्रैल में हंस में ही मृदुला गर्ग उनकी इस धारणा को दुरुस्त करने की कोशिश करती हैं, ' पर आप निराश न हों आपकी हमदर्द -हमख्याल बीसियों औरतों को मैं जानती हूं, जो हर तरह से स्वतंत्र -सम्पन्न होने के बावजूद खुद को दलित बतलाती है. बकायदा रोती -कलपती -झीकती हैं , पर दलित वर्ग की स्त्री के लिए तनिक सोच-विचार करने को तैयार नहीं हैं. स्त्री जाति में भी दो वर्ग हैं , ' दलित और गैर दलित , उसी तरह पुरुषों में भी दो वर्ग हैं : दलित और गैरदलित.' यहां मृदुला जी राजेंद्र जी को ठीक -ठीक सामजिक हकीकत बता रही हैं, जिस हकीकत की भूमि पर ही दलित स्त्रियों ने अपनी आवाज गैरदलित स्त्रियों और दलितों से अलग बनाई. जब यह आवाज बनने लगी तो राजेंद्र जी अपने ही अंतरविरोध के साथ फिर उपस्थित हुए. उस वक्त मृदुला गर्ग की उन्होंने खूब खबर ली , उन्हें अपने टार्गेट के कुछ लोगों में शामिल कर लिया . मृदुला जी उन गैर दलित स्त्रियों से एकदम अलग और सही स्टैंड पर हैं, जो उनके समर्थन में इसलिए आईं कि उन्हें दलितों से अपनी तुलना में अपना अपमान दिख रहा था, जबकि मृदुला जी राजेंद्र यादव के साथ -साथ गैरदलित स्त्रियों को भी समाज की वास्तविकता पर आधारित समाजशास्त्रीय विश्लेषण बता रही थीं , वे गैर दलित स्त्रियों की आत्मग्रस्तता की खूब खबर ले रही थीं अपनी इस स्थपना में .

 इसके विपरीत राजेंद्र जी उन्हें उन स्त्रियों का प्रतिनिधि बताकर अपना प्रतिपक्ष बना लेते हैं, जो दलितों की तुलना से नाक -भौं सिकोड रही थीं. और जब दलित स्त्रियों का अपना पक्ष उनसे अपना हिस्सा मांगता है, दलित स्त्रीवाद उन्हें अपनी लडाई की मशाल थमाना चाहता है, तो वे अपने ही कंफ्युजन के साथ प्रतिक्रिया देते हैं. दलित स्त्रीवाद और दलित स्त्री अभिव्यक्ति पर आधिकारिक काम करने वाले बजरंग बिहारी तिवारी के अनुसार उनका लेख वे यह कहते हुए लौटा देते हैं कि ' दलित स्त्रीवाद दलितों और स्त्रियों की लडाई को कमजोर करेगा.' अपने इस तर्क के समर्थन में वे अपने सहयोगी संजीव को भी शामिल बताते हैं. ऐसा करते हुए राजेंद्र जी यही भूल जाते हैं कि  कभी हंस को उन्होंने तीसरी दुनिया के संघर्षों को वाणी देने का प्लेटफार्म बताया था. ब्लैक और दलित स्त्रीवाद इस दुनिया की एक बडी हकीकत के रूप में था, जिसे वे अपने ही बनाये कारणो से नकार रहे  थे. नकार का यह तर्क जबकि अस्मिताबोधी सारी आवाजों के खिलाफ जाता है, हां, स्त्री और दलित आवाजों के खिलाफ भी. कम्युनिष्ट पार्टियों में सक्रिय स्त्रियों ने जब अपनी आवाज बनाई तो उनके खिलाफ ऐसे ही तर्क दिये गये थे और दलितों की लडाई और आवाज को भी ऐसे ही तर्कों के साथ वर्ग संघर्ष के मार्ग में रोडा बताया गया था. राजेंद्र जी की तुलना में मृदुला गर्ग राजनीतिक रूप से ज्यादा करेक्ट पोजीशन पर दिखती हैं.
राजेंद्र जी और हंस स्त्री विमर्श के मामले में भी अपना ही संसार रचते हैं. इनके लिए स्त्री की मुक्ति का मार्ग 'देहमुक्ति' से तय होता है और ' देहमुक्ति' को वे यौनप्रसंगों तक सीमित कर देते हैं. हंस के शुरुआती पन्नों में ही साहित्य  में यौन प्रसंगो के डीटेल पर खूब सारी बहसें और सम्पादकीय पसरे पडे हैं. राजेंद्र जी अपनी इस जिद्दी समझ को खाद पानी अपनी जिस समझ से देते हैं , उसकी अभिव्यक्ति वे जुलाई 1993 के अपने संपादकीय में करते हैं , ' स्त्री अपनी बौद्धिक  या अन्य उप्लब्धियों के लिए चाहे जितनी हाय तौबा मचाती रहे, पुरुष की जिद्द् है कि साम दाम दंड भेद से वह उसे कमर , कूल्हे , नितंब , छातियों से ऊपर नहीं उठने देंगे.' इस जिद्दी समझ का ही आलम था कि बाद के दिनों में रचनाओं में यौन प्रसंगों के डीटेल हंस में छपने की गारंटी बनने लगे.  राजेंद्र जी को खुद ही पता नहीं चला कि उन्होंने खुद को और हंस को कब पुरुषों के उसी अभियान में शामिल कर लिया जिसमें उसकी जिद्द है कि साम दाम दंड भेद से वह उसे कमर , कूल्हे , नितंब , छातियों से ऊपर नहीं उठने देगा.' हंस के पुनर्प्रकाशन की योजना में शामिल और पहले ही अंक से नियमित लेखक अरविंद जैन इस जिद्द को चिह्नित करते हुए कहते हैं कि ' मैंने खुद को उसी दिन हंस से अलग कर लिया जब उसके एक अंक में छपी बलात्कार की आधा दर्जन से अधिक कहानियों में पीडिता को बलात्कार की घटना के बाद अनिवार्यतः आइने के सामने निर्वस्त्र होते पाया. यह सारी कहानियों में महज संयोग नहीं हो सकता , यह विकृति थी, यह एक योजना बद्ध प्रकाशन था.'फिर सवाल है कि दलित स्त्रीवाद आलोचना के आइने में हिंदी की एक मह्त्वपूर्ण उपस्थिति को कैसे देखा जायेगा.

फिर सवाल यह भी है कि इस उपस्थिति को देखने की जरूरत भी क्या है और क्यों है? निस्संदेह भागीदारी की कसौटी पर हंस दलितों और दलित स्त्रियों ,दोनो की दृष्टि से कमजोर है. सैद्धांतिक स्तर पर भी राजेंद्र जी बहुत से  वैसे दलित और स्त्री रचनाकारों के साथ खडे दिखते हैं , जो दलित स्त्री की आवाज को दलित और स्त्री आंदोलनों के उद्धेश्य में बाधा पाते हैं. इनमें से कुछ तो दलित स्त्रियों की सक्रियता को डा धर्मवीर की शैली में हिकारत से देखते हैं . ' सत्ता विमर्श और दलित' अंक में खुद डा धर्मवीर अपनी इस शैली का नमूना ' दोहरा अभिशाप कितना दोहरा : एक डायनासोर  औरत ' में पेश करते हैं, प्रसिद्ध लेखिका कौश्ल्या वैसंत्री की लानत -मलानत करते हैं, और इसके समर्थन में प्रभा खेतान जैसे स्त्री संघर्ष के पैरोकार को उद्धृत करते हैं, ' दलित आंदोलन इसलिए ज्यादा सशक्त है कि वहां कांशीराम हैं, डा धर्मवीर हैं, इसलिए नहीं कि वहां मायावती और कौश्ल्या वैसंत्री हैं.'इस सीमा के बावजूद देखना यह होगा कि लगभग 350 अंकों  और लगभग 10 विशेषांकों में फैले हंस के पुनर्प्रकाशन में राजेंद्र जी और हंस ने क्या जाति -धर्म और साम्प्रदायिकता के खिलाफ मुहिम इमानदारी से चला रखी है , क्या समाज में जेंडर विभेद के खिलाफ इमानदारी से  मुहिम छेड रखी है ! इन कसौटियों पर हंस खरे उतरता है और इस लिहाज से इसकी उपस्थिति  हिंदी में दलित स्त्रीवाद के लिए पृष्ठभूमि सी भी है. जरूरत पडने पर दलित स्त्री की आवाज और मुद्दों को दलित और स्त्री आंदोलन के खिलाफ मानने वाले राजेंद्र यादव डा धर्मवीर की नैतिकता और  उनके दलित स्त्रीविरोधी मंतव्यों को अपने संपादकीय में आडे हाथ लेते  भी हैं.  हालांकि यह भी सही है कि इस संपादकीय के लिए अनिता भारती , बजरंग बिहारी तिवारी और श्रीधरम ने राजेंद्र जी को तैयार किया था , उनका मन बनाया था .राजेंद्र यादव  अपने अंतरविरोधों से भरे हैं, उससे संचालित होते हैं, और उसका ही प्राकट्य उनके संपादन और संपादकीय नीतियों में हुआ है, जिससे अनिवार्य मुठभेड और सम्वाद  दलित स्त्रीवादी अस्मिता के लिए जरूरी है.

Blogger द्वारा संचालित.