विपिन चौधरी की कविताएं

विपिन चौधरी
विपिन चौधरी युवा कविता की महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं.विश्व की दूसरी भाषाओं से अपनी रुचि के साहित्य का अनुवाद भी करती रही हैं.संपर्क: vipin.choudhary7@gmail.com

( ये कवितायें प्रकृति ,प्रेम और मानव अस्तित्व की  कवितायें हैं.  युवा लेखन के इस महत्वपूर्ण स्वर के लिए इन कविताओं की चार पंक्तियों से बेहतर कोइ कथन नहीं हो सकता. इस बार नए साल को /वसंत के भरोसे छोड़ दो /बहुत हुआ अब /पंडित, जन्मपत्री और हाथ की रेखाओं का लेखा-जोखा )

1.

इन बची-खुची यादों को,
बारिश के लिए बचा कर रखो
बारिश में मन से धुँआ कुछ ज्यादा उठता है
बारिश में  छाते के साथ,
भीगने को मन करता है
बारिश में काई से अटी दीवारों पर  प्यार आने लगता है
बारिश का भरा-पूरा संसार
हमें अपने भीतर ले लेता है


2.
सूखे पौधे को निहारता हुआ
एक स्वस्थ फूल,
यूँ उदास है जैसे
उसने ही सूखे पौधे का जीवन चुराया हो
सच उदासी,
सब पर एक सी छाया डालती है

3.

ईमानदार माली,
नीचें तक जमीन को खोदता हुआ चला जाता है
ककड़, पत्थर और अवशेषों के बाहर
निकल आने के बाद
जमीन की सासें तेज़ी से चलने लगती  है
और फिर कुछ दिन बाद माली देखता है
पत्तियों में और अधिक हरापन
फूलों में और अधिक चमक

4.

तुम्हारे भीतर ही
कुछ चीज़ें बिना तुम्हारी इज़ाज़त के  भी  चली आती हैं
जैसे अभी तुम्ने कहा
 'मैंने कभी मिट्टी नहीं चखी'
 लेकिन उस वक़्त भी मिट्टी तुम्हारी ज़ुबान पर थी


5.

इस बार नए साल को
वसंत के भरोसे छोड़ दो
बहुत हुआ अब
पंडित, जन्मपत्री और हाथ की रेखाओं का लेखा-जोखा

6.

वह रोशनी के लिए नहीं
पेड़ों के लिए जंगल में आया था
रोशनी तो खुद उसके पीछे लगी हुयी थी
जैसे दुःख जीवन के पीछे लग जाता है
और फिर उसे अपना हमराही बना लेता है

7.  

जब पृथ्वी पर ऐसा कुछ भी नहीं था
थोड़ी नमी भी नहीं
तब भी
आकाश में एक पक्षी उड़ रहा था
जैसे देख रहा हो धरती का मरुस्थल
और सोच रहा हो कुछ
आगे की कहानी यहीं  से शुरू होती है
जब धरती पर उम्मीद नहीं थी
लेकिन आकाश तब भी उम्मीद का एक नाम था

8.

 जैसे कि कल था ही नहीं
जो कुछ है वो आज ही है
ठस
पेचीदा
कुहासे भरा
कल की उम्मीद नहीं थी
आज सम्भावना ही न   था
तब शायद  पत्थरों की पौ बारह थी
जो कुछ भी था वह पत्थर जैसा
वैसा ही नुकीला चपटा और सुगंधहीन
तभी सफ़ेद कपड़ों में कुछ लोग आये
कहने लगे कल कल कल
सब्जबागों में डूबे हम
कल से मिलने को आतुर
पर कल होता तो मिलता
जो कुछ भी था आज ही था


9.

पहली बार जब नाव ने
समुन्दर की देह को
स्पर्श किया
और उसकी देह पर उसी  झुरझुरी  का पता मुझे मिला
जो हमारे प्रेम के पहले स्पर्श की तरह ही थी
तब बचपन के दिनों में पढ़ा
लिविंग और नॉन लिविंग का भेद
खत्म हो गया

10.

इस गर्मियों में उगा वह आखिरी गेंदा  था
उसके बाद गुलदावदी  का मौसम शुरू होगा
अब बाग़ के  तेवर अलग होंगे
अब गुलदावदी,
गुलदान और जुड़े में महकेगा
गेंदे के दिन पीठ मोड़ कर आगे जा चुके होंगे

11.

वह प्रेम,
जैसे  मिट्टी के जन्म के भी पहले का था
वह मौसमों की तरह ही वस्त्र बदलता था
उसकी भी अपनी दिक्कतें थी
उसे भी गर्मी के पसीना आता था
वह भी इंसानों की तरह झूठ बोलता था
वह प्रेम था आखिर एक इंसान ही
सांस लेता,
धड़कता,
कांपता,
और धरती पर आंसू टपकता हुआ

12.


छड़ी के अंत में लगी गंदगी
कुछ और नहीं
यह जताने भर की कोशिश है
कि देह और मन की  सारी गंदगी
 आपके तलवों पर इक्कट्ठी हो गयी है
इसीलिए सोने से पहले अपने पांवो को
अच्छे से धो लो

13 .

तेज़ हवाएँ,
पेड़ो का इम्तिहान है
आज, फिर पेड़
 इम्तिहान से गुज़रेंगे
आज फिर  पेड़ जीतेंगे

14.

पहाड़ों को फतह  करने के लिए
तुम्हे नदी से होकर गुज़ारना होगा
और जो नदी ने अपनी आँखों के आंसूं लाते हुए
तुम्हे रोक लिया
तो तुम फतह की इच्छा को खत्म कर
वापिस मैदान की राह हो लोगे

15 .

मेरी आत्मा का कद,
प्रेम के कारण  बढ़ा
मन का आयतन,
चौड़ा किया खुशबुओं ने
देह की ऊंचाई,
अनुवांशिकी ने दी
कभी मैंने आत्मा को सीढ़ी माना
कभी मन को
और  कभी देह को
और एक दिन आसमान पर जा पहुंची
जहाँ यमराज मेरी बाट में हाज़िर पाये गए

16.

जहाँ तुम नहीं थे वहां दूर तक पसरा बंजर था
और बंजर का भी एक मौसम हुआ करता है
एक बार को तो हम
कई दिनों तक बंजर के मेहमान हो गए
तुम को लगभग भूले हुए से

17.

बाग़ के बगल से यूहीं

मत गुज़रों

फूलों  को सूँघो,

कुछ देर वहीं ठहरों

जीवन की खुश्बूंओं

को अपने भीतर यूँ जगह दो

18 . .

साँझ को जब घंटी बजाती गायें घर लौट आती है
जो जैसे जीवन फिर महकने लगता है
घर की उदासी,
अपना कोना पकड़ लेती हैं
फिर बछड़ा रम्भाता हुआ
गायों के थानों से लग जाता है
शायद जीवन में बहार  इसे ही  कहते हैं
शायद जीवन का हरापन इसे ही कहते हैं

19.

उसके दुःख की परछाई बड़ी थी
तब
वह ठीक से खड़ी भी नहीं हो पाती
और अब देखो, उसका थिरकना
सच है
ख़ुशी अपने साथ नृत्य ले कर आती है

20.

 उन दिनों जब गेहूं से भूसा अलग करने के दिन थे
और दिन थे हमारे बिछुड़ने के
फिर अगला मौसम था सरसों का
लेकिन भीतर का इंतज़ार जस का तस
फिर जैसे मौसम आते है वैसे ही आये और गए
सूरज और धरती का मोह बना रहा
उसने इर्द-गिर्द चक्कर लगाना नहीं छोड़ा
इसी बीच जीवन में अपनी परतें कई बार उलट- पलट की
पर इंतज़ार जैसे पत्थर हो चला था
न उसे हवा की परवाह थी
न बारिश की
एक बार इंतज़ार पत्थर हुआ तो फिर जीवन में वापिस प्रवेश न कर सका

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