लल द्यद की काश्मीरी वाख कविता

(  लल द्यद मध्यकालीन भक्त कवयित्रियों में प्रमुख नाम है . स्त्रीकाल के लिए फारूक शाह लल द्यद की कविताओं की प्रस्तुति कर रहे हैं , इन कविताओं के अनुवाद  फारूक शाह ने किये हैं.
मध्यकाल की भक्ति कविता पर काफी काम हो  रहे हैं , कुछ स्त्रीवादी भी. लल द्यद पर भी स्त्रीवादी कामों में एक उल्लेखनीय काम  है  , जयश्री काक का  . )

अनुवादक का नोट :

लल द्यद : ललमोज, ललारिफ़ा, लल्लेश्वरी आदि नामों से भी ख्यात काश्मीरी शैव धर्म (त्रिक, प्रत्यभिज्ञा दर्शन) की परंपरा से संबंधित संत कवयित्री है. काश्मीरी लोक की मौखिक किंवदंतियों में योगी सिद्ध श्रीकंठ, नून्द रुषी (शेख नूरुद्दीन वली) और पीर अली हमदानी के साथ जुड़ी हुई यह रहस्यवादी संत-कवयित्री का स्वीकार सभी धार्मिक वर्गों व जाति के लोगों में समान रूप से है. इसलिए कश्मीरी लोक में वे शैव योगिनी, सूफी दरवेश तथा अपने अपने समुदाय की मानी जाती हैं. सदियों से उनकी वाख (सूक्ति) कविताएँ मर्मी लोक के ह्रदयों में उजाला फैलाती आई है. ऐतिहासिक साक्ष्यों से जो जानकारी मिलती हैं उसके अनुसार : जीवनकाल 1317 से 1388 ई. के दौरान. जन्म-स्थान पाम्पोर के निकट पान्द्रेठन (वर्तमान सिमपोर). निधन श्रीनगर-जम्मू के मार्ग पर स्थित बिजबिहाड़ा गाँव में माना जाता है.

उन्होंने मानप्रतिष्ठा की सारी मर्यादाओं को तिलांजलि देकर सतचिंतन में निरत एक रमती-डोलती योगिनी के रूप में जीवन बिताया. भीतर की अंतरी चाल से अस्तित्व के उँचे मुकाम पार किये, सत्य के प्रदेशों को दूर तक जाना. साथ ही लल द्यद ने उस समय के प्रसिद्ध सूफ़ी नून्द रुषी और पीर अली हमदानी के साथ मिलकर हाशिये के ग्रामीण लोगों में बौद्धिक व प्रगतिशील चेतना जगाकर उनके उत्कर्ष का बहुत बड़ा काम किया था. वे ऐसे लोकशिक्षक के तौर पर सदियों से काश्मीर के लोक-हृदयों में बिराजती आईं हैं जिसने जीवन विरोधी प्रथाओं से मुक्त मानव-मूल्य आधारित समाज-व्यवस्था का निर्माण करने का प्रयत्न अपने युग में किया हो.

उनकी ‘वाख’ कविताओं में अस्तित्व के सत्य की खोजी एक स्त्री का संघर्ष, लोकशिक्षण की भूमिका और अस्तित्व के पूरे सत्य की ऊंचाई से उच्चरित पूर्ण मनुष्यत्व के बोध की अभिव्यक्ति – ये तीनों स्तर दिखाई देते हैं. लिखित व मौखिक परम्पराओं के जरिये सदियों का रास्ता तय करती हुई ये कविताओं में लल द्यद की प्रखर मेधाशक्ति की प्रतीति देते ऐसे सच की ध्वनि गूँज रही है जो पूरे भाव से अंतर्सिद्ध चेतना को जगाए. चौदवें शतक में लल ने कही हुई इन कविताओं को आज आधुनिक इसलिए मानें कि वे आज भी जीवंत रूप से बह रही हैं, अस्तित्व की स्वर्णिम संभावनाओं को संकेत करती... 
जार्ज ग्रियर्सन और डॉ. बर्नेट ने 1914 में लल-वाखों का संचय किया था. रिचर्ड टेम्पल ने भी वाखों का अंग्रेजी में अनूदित ग्रन्थ 1924 में दिया था. इन अनुवादों और मूल काश्मीरी पाठ की रोमन-देवनागरी प्रतियों के आधार पर यहाँ पर उनकी कुछ वाखों का रूपांतर हिन्दी में देखें :

लल द्यद की कविताएं :

आ गई सीधी राह से
लेकिन वापस न जा सकी
सीधी
चली जा रही थी बीच के पुल पर
कि दिन ढल गया
जेब में हाथ डाला तो
मिले न एक पैसा भी
अब पार उतरने के लिए
नाविक को
दूँ भी तो क्या दूँ ?


O

किस दिशा
और किस मार्ग से आई
नहीं जानती
किस दिशा और किस मार्ग से जाऊँगी
यह भी नहीं जानती
कोई तो मुझे सच बता दे
केवल प्राण–साधना का आधार तो
किसी काम का नहीं


O

बाण मिला
काठ के धनुष के लिए
तो वह घास का
बढ़ई मिला राजमहल बनाने
तो वह भी निपट बुद्धिहीन
मेरी दशा तो हो गई
बीच बाज़ार में
बिना ताले की दुकान हो ऐसी 
रही मेरी देह तीर्थ-विहीन
भला, कौन समझ सकता है
मेरी इस लाचारी को ?


O

सड़क पर चिपक गया 
पैर के तलुवों का मांस 
तभी दिखाया
मुझे जिसने मार्ग 
जो उस एक का नाम सुनेंगे 
वे क्यों न पागल हो जाए ? 
लल ने तो निकाल ली 
सौ बातों में से
सार की एक बात
O

मैं एक थी
अनेक हो गई
पास रहकर भी रही दूर
अंदर–बाहर
दिखाई देता था एक
पर ये चौपन चोर (1)
सब कुछ खा-पी गए  
और   
मुझे धोखा देकर चले गए


O

सूई की नोक
या बाल जितनी भी
कभी पीछे न रही
मैंने भीतर के अंधकार को
पकड़ लिया
पकड़ के उसे चीर डाला


O

प्रेम की ओखली में
मैंने हृदय को कूटा
मेरी कुवृत्ति नष्ट हो गई
मैं हो गई बिलकुल शांत
बाद में
इस हृदय को भूना-पकाया 
और चखा

अब मैं यह न जानूँ
मर जाउँगी
या जीवित रहूँगी ?


O

आई संसार में
तप करने के लिए
बुद्धि के प्रकाश में
पाया सहज (2) को      
न मेरा कोई मरेगा
न तो मैं
किसी के लिए मरूँगी
मरूँ भी तो वाह
जीवित रहूँ भी तो वाह !

O

हृदय का सारा मल
जला डाला
जिगर का भी किया अंत
उसकी दहलीज पर अंचल पसार 
बैठ गई अडिग
तभी कहीं जाकर हुआ
मेरा ‘लल’ नाम प्रसिद्ध


O

तन मन से खो गई
उसके ध्यान में
मुझे सत की घण्टी बजती
सुनाई दी

मैंने धारण कर लिया
अपनी धारणा को
और
आकाश-पाताल का भेद
जान लिया


O

पठन सरल
पर पालन मुश्किल
मुश्किल है सहज की खोज भी
अभ्यास के घने कुहरे में
भूल गई सभी शास्त्र
तब पा लिया चेतन आनंद को


O

अभी देखी
बहती नदी 
और अभी देखा
उस पर न कोई सेतु
या पार उतरने
छोटी-सी कोई पुलिया भी

अभी देखी
फूलों से लची हुई डाली
और अभी देखे
उस पर
न फूल, न तो काँटे


O

कौन सोया हुआ है
और कौन जागा हुआ ?
कौन सा वह सरोवर है
जिससे रिसती है बूंद बूंद ?
वह कौन सी चीज़ है
जो हर के लिए आराधनीय है ?
और वह कौन सा परमपद है
जो प्राप्त होता है ?


O

अपनी चमड़ी को काटकर
तूने गाड़ दिए खूंटे
शरीर में चारों ओर
बोया नहीं भीतर ऐसा कोई बीज
मिले जिससे फल
अब तुझे समझना तो ऐसा 
जैसे शिखर पर कंकर फेंकना
या बैल को गुड़ खिलाना 


O

एक ज्ञानी को देखा
भूख से मरता
मानो पोष के पवन से जर्जर होता
और देखा
एक रसोइये को
मूर्ख के हाथों पीटता

मैं लल,
उस घड़ी की राह देखने लगी
जिसमें मेरा भवबंधन छूटे 


O

देव पत्थर
देवल भी पत्थर
ऊपर – नीचे
एक समान ही स्थिति
रे पंडित,
इसमें किसकी करेंगा तू पूजा ?
इसीलिए कहती हूँ
अपने मन और प्राण को
एक कर दे !


O

जानते हुए भी
बन जा मूढ़
देखते हुए भी अंध
सुनते हुए भी बन जा बधिर
और जागते हुए भी जड़
जो जैसा बोले
उसके साथ वैसा ही बोल
यही अभ्यास है तत्त्वविद्‌ का


O

सर्वत्र व्याप्त है शिव
बारीक जाल बिछाये
कैसे वह रच-पच गया है
सबके शरीर में
उसे जीते जी नहीं देखेगा
तो क्या मरकर देखेगा ?
विवेक और मार्गचिंतन से काम ले
और ढूँढ़ निकाल उसे
अपने अंदर ही

O

वहाँ नहीं
वाणी, मन, कुल या अकुल
मौन मुद्राओं का भी
वहाँ प्रवेश नहीं
शिव और शक्ति भी
वहाँ रहते नहीं
तुम्हारे पास
बचा है जो शेष
वही परम उपदेश है


O

शील और मान तो
टोकरी में जल भरने जैसे
हाँ,  जो पवन को
मुट्‌ठी में बंद कर सके
और हाथी को
एक बाल से बाँध सके
वह हो जाएगा निहाल


O

अभ्यास से विस्तार का
लय हो जाए
तब दिखाई देने लगे
सगुण और गगन एक
शून्य भी हो जाता है नामशेष
बच जाता है केवल
अनामय शिव (3)
हे पंडित,
यही एकमात्र उपदेश है


O

छ: वनों को पार करके
मैंने शशिकला (4) को जगाया
मुझे पवन से प्रकृति को
सुखाना पड़ा
तब कहीं जाकर मैं
अपने शिव को पा सकी


O

तन पर
ज्ञानवस्त्र धारण कर
लल ने कहे जो पद
उन्हें हृदय में उतारना
प्रणवधून (5) के वाद्य पर
जैसे लल हो गई लीन
वैसे ही तेरे भीतर भी प्रकट होगी
मृत्यु की भ्रांति को नष्ट करती
जाग्रत ज्योत   


O

शून्य का एक असीम मैदान
पार किया
तब मुझे, लल को
न बुद्धि रही न होश
सहज का भेद पाकर
कीचड़ में उगे कमल जैसी
हो गई


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1. ज्ञानेन्द्रियाँ-मनोवृत्तियाँ और विकार आदि चौपन पिण्ड व मनोगत घटक 2-3. समस्त अस्तित्व का पूरा सच, पूर्ण सत्य 4. शैवतंत्र अनुसार समस्त अस्तित्व के परम सत्य की ओर जाने वाला स्थान 5. उस सत्य की अनादि ध्वनि, अनाहत नाद, नाम, इस्मे-आज़म

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