पुष्पा गोस्वामी की कवितायें

पुष्पा गोस्वामी
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. अलाव में स्त्रियाँ
दहकते , सुलगते
गृहस्थी के अलाव में भुनती हैं
ताउम्र स्त्रियाँ
काली स्याह रातों में
सर्द उम्मीदों ,
उंघते सपनों
और ठिठुरती आत्मा से
सहेजती हैं
खोया हुआ पाने
और पाए हुए को न खोने की इच्छाएं
वे तमाम इच्छाएं
जो आशाओं और आशंकाओं के मध्य
चटखती , सुलगती है दिन रात
कमबख्त न कोयला बनती हैं
न होती हैं राख .

२. देह भर हैं वे
ये कैसी आग है
जिसमें
केवल देह बन कर
भुनती हैं स्त्रियाँ
रिश्तों , मान्यताओं और संस्कारों से परे
जिनका कोइ नाम
नहीं होता ,
सुर्ख़ियों में ढलकर
वे रोज आती हैं
अखबारों के पहले पन्ने पर,
वितृष्णा उपजाते हुए
वे बनती हैं केवल नगरवधू
न राधा , न सीता , न दूर्गा
न कोइ दूसरा नाम
चटखारों , गलीज मान्यताओं
और भद्दी कल्पनाओं के बीच
वे बस माध्यम भर बन जाती हैं
एक प्रक्रिया का ,
एक गलीज प्रक्रिया का !
३. सबक
ठोकनी होगी
कुछ मजबूत कीलें
पृथ्वी के ताबूत में ,
आँखें मूंदे –मूंदे
सूरज के चक्कर काटते हुए
थक चुकी है वह ,
उनींदे सपनों  से जागकर
कुनमुनाने लगी है,
और तो और
तारों को भी बताने लगी है
कि प्रकाश का जादू तो
हमारे स्वयं के भीतर होता है ,
सूरज के उजाले का उधार चुकाए बिना ही
उसने तोड़ दिया है सप्तपदी का घेरा ,
सूरज समझता है सब
तान ली है इसीसे से
उसने भस्म कर देने वाली दृष्टि 
पृथ्वी को सबक सिखाने के लिए ,
इसी से दिन ब दिन बढ़ती जा रही है
पृथ्वी की गरमी इन दिनों !
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