एक यायावर पत्रकार

राजेंद्र प्रसाद सिंह
भाषाविद राजेन्द्र प्रसाद सिंह हिन्दी आलोचना में अपने हस्तक्षेप के लिए जाने जाते हैं.  
यह लेख उनकी पुस्‍तक  ‘हिंदी का अस्मितामूलक साहित्य और अस्मिताकार’, में संकलित है। 
संपर्क : rpsingh.ssm65@yahoo.in .
राजेंद्र प्रसाद सिंह

पत्रकारिता सार्वजनिक दायित्व से परिपूर्ण एक प्रकृष्ट कला है जैसा कि कार्लांइन ने कहा है कि ‘महान है पत्रकारिता, लोकमानस को प्रभावित करने वाला होने के कारण पत्रकार क्या विश्व का शासक नहीं ? वास्तव में रोचक एवं चुनौतीपूर्ण इस पेशे में वही सक्षम सिद्ध होगा जिसमें कवि की कल्पना शक्ति, कलाकार की सृजनात्मक योग्यता, न्यायाधीश की विषयनिष्ठा, वैज्ञानिक की सुस्पष्टता और कम्प्यूटर मशीन की गति हो.’  प्रमोद रंजन पत्रकारिता के इन सभी गुणों से परिपूर्ण हैं.  भारत के इस यशस्वी पत्रकार की पत्रकारिता ने हिंदी पत्र-साहित्य में लोकप्रियता का अभूतपूर्व मानदंड स्थापित किया है. 

उनके द्वारा सामाजिक, राजनीतिक, साहित्यिक एवं अन्य विषयों पर लिखे गए लेख मील का पत्थर बन गए हैं. इस पत्रकार की उम्र अभी कम है, पर उम्र का कोई सीधा संबंध किसी क्षेत्र में उसके द्वारा किए गए उत्कृष्ट कार्यों से नहीं होता है. कई साहित्यकार-पत्रकार शतायु हुए, पर जरूरी नहीं है कि उनके द्वारा किए गए कार्य भी उत्कृष्ट हो. हिंदी में ही भारतेंदु ने सिर्फ पैंतीस साल की उम्र पायी थी लेकिन उन्‍होंने साहित्य में इतना काम कर दिया कि कई साहित्यकार सौ वर्षों में भी नहीं कर पाए. वे अल्पायु के बावजूद हिंदी साहित्य के युग-निर्माता बने. उनके नाम पर हिंदी साहित्य में एक कालखंड का नामकरण किया गया है.

प्रमोद रंजन

ख्यातिलब्ध पत्रकार प्रमोद रंजन का जन्म 22 फरवरी, 1980 को हुआ। उनका पैतृक गाँव बिहार के जिला अरवल में नदौरा है. नदौरा गाँव बिहार के कुर्था प्रखंड में स्थित है.यह वही कुर्था है, जहाँ  'बिहार के लेनिन' नाम से जाने जाने वाले जगदेव प्रसाद पुलिस की गोली से शहीद हुए थे. उन्होंने  दलित-पिछड़ों, आदिवासियों एवं शोषितों के हक की लडाई सामाजिक और राजनैतिक स्तर पर काफी मजबूती से लडी थी. यह संयोग है कि प्रमोद रंजन उसी भूमि से आते हैं, और उससे भी विस्मयकारी तथ्य यह है कि उनकी भी पत्रकारिता के क्षेत्र में संघर्ष दलित-पिछड़ों एवं शोषितों के पक्ष में है. किंतु प्रमोद रंजन का बचपन अपने पैतृक गाँव नदौरा में नहीं बीता. वे ननिहाल में पाले-पोसे गए. उनका ननिहाल नालंदा जिले के बेले गाँव में है. 


उनकी प्रारंभिक शिक्षा इसी गाँव के सरकारी स्कूल में हुई. गाँव के स्कूल इतने उर्वर मस्तिष्क को पैदा कर सकते हैं, सहसा विश्वास नहीं होता, कारण कि प्रमोद रंजन की पैनी दृष्टि एक्स-रे मशीन की भाँति किसी तथ्य को आरपार देख लेती है. सामान्य लोगों में वह दृष्टि नहीं होती है, जो इनके पास है. उनक लेख इतने विचारोत्तेजक एवं मौलिक होते हैं कि आश्चर्य होता है कि क्या मानव-मस्तिष्क इतने गहरे में जाकर सोच सकता है. रंजन अत्यंत स्वाभिमानी पत्रकार हैं. इतनी कम उम्र में ही उन्होंने अनेक पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया. उनका संपादन-स्थल भी भारत के विभिन्न कोनों में रहा. शायद ऐसे भी स्वाभिमानी पत्रकार खूँटे में बंधकर रह भी नहीं सकते. वे निरंतर अपना कार्य-स्थल बदलते रहे मानो वे किसी ऐसे मुकाम की खोज में हों जहाँ से बहुजनों की लड़ाई लड़ी जा सके. संप्रति प्रमोद रंजन ‘फारवर्ड प्रेस’ के सलाहकार संपादक हैं और इस पत्रिका के माध्यम से बहुजनों के हित में लगातार लड़ाई लड़ रहे हैं. 

आज जिसे हिंदी का अस्मितामूलक साहित्य कहा जाता है, उसको समृद्ध करने में इनका अप्रतिम योगदान है. ‘फारवर्ड प्रेस’ ने अभी तक ‘बहुजन साहित्य’ पर केंद्रित तीन वार्षिक अंक प्रकाशित किया है. सभी अंक एक से बढ़कर एक हैं. इसी के एक अंक में प्रमोद रंजन ने भारत के हिंदी पुरस्कारों में व्याप्त सवर्ण कब्जे को पर्दाफाश किया है. कुछ मायनों वे पर्दाफाशी पत्रकार भी हैं. मुझे याद है उनकी एक पुस्तिका ‘मीडिया में हिस्सेदारी’ (2009), जिसमें बिहार के अखबारों और टीवी चैनलों में ‘फैसला लेने वाले पदों पर’ बहुजन पत्रकारों के नहीं होने का अदभुत  विवरण दर्ज है. पुस्तिका में हिंदी के प्रायः सभी प्रमुख समाचार-पत्रों का बहुजन दृष्टिकोण से विश्लेषण है. उसमें कई आँकड़े हैं जो साबित करते हैं कि बिहार ही नहीं, राष्ट्रीय  मीडिया के प्रायः सभी प्रमुख पदों पर सवर्णों का कब्जा है.

जैसा कि हम कह आए हैं कि प्रमोद रंजन कई अखबारों से जुड़े,  हटे और फिर नए-नए से जुड़ते गए. उन्होंने शिमला से प्रकाशित सांध्य दैनिक ‘भारतेंदु शिखर’ में बतौर संपादक कार्य किया. इस अखबार का ‘साहित्यिक विमर्श परिशिष्ट’ प्रमोद रंजन के संपादकत्व में काफी ख्यात रहा. यह बात कोई 2000 ई. की है. इसके बाद उन्होंने  शिमला से ही प्रकाशित ‘ग्राम परिवेश’ (साप्ताहिक) का संपादन किया, पर रंजन यायावरी पत्रकार हैं. मन नहीं लगा. वे कांगड़ा चले आए. यहाँ वे ‘दिव्य हिमाचल’ (दैनिक अखबार) से जुड़े. इसमें वे फीचर संपादक रहे. पर पत्रकार तो स्वतंत्रता का आकांक्षी होता है. उसे उन्मुक्तता की तलाश रहती है. खास तौर से रंजन जैसे स्वाभिमानी पत्रकारों की तो यह नियति है. वे जालंधर गए और ‘पंजाब केसरी’ (दैनिक) से जुड़े. पुनः वे शिमला आए तथा ‘दैनिक भाष्कर ’ से जुड़ गए. वे शिमला में ‘अमर उजाला’ से भी जुड़े. वे 2007 ई. में बिहार की राजधानी पटना आए. यहाँ वे प्रेमकुमार मणि के साथ ‘जन विकल्प’ (मासिक) का संपादन किया.  


इस पत्रिका के विभिन्न अंकों में प्रमोद रंजन के अनेक लेख छपे. सभी लेख मौलिक एवं विचारोत्तेजक हैं. इस पत्रिका मे लिखे गए उनके प्रमुख लेख हैं-उपभोक्तावाद और परिवार (मई, 2007), आज के तुलसीगण (अगस्त, 2007) और 'ब्राह्मणवाद की पुनर्स्थापना  '  का षडयंत्र (अक्टूबर-नवंबर, 2007). प्रमोद रंजन के जन-विकल्पकालीन लेखों में ‘आज के तुलसीगण’ सर्वाधिक महत्वपूर्ण है. इसमें उन्होंने सप्रमाण साबित किया कि तुलसीदास जैसे कवि आज भी मरे नहीं हैं. वे जिंदा हैं. उन्होंने इसमें कई कवियों की कविताओं को उद्धृत करके बताया है कि तुलसीदास का बहुजन विरोधी संस्कार कैसे रूप बदलकर आज भी हिंदी कविता में जीवित है.
दुर्भाग्य से ‘जन विकल्प’ का प्रकाशन अल्पावधि में ही बंद हो गया. पत्रकार प्रमोद रंजन 2008 ई. में ‘प्रभात खबर’ (दैनिक) से जुड़े. इसी समय में उनकी एक और पुस्तिका प्रकाशित हुई - ‘बाढ़: अनकही कहानियाँ’. वस्तुतः यह पुस्तिका एक प्रकार का रिपोर्ताज है, जिसमें कोशी नदी की विभीषिका का वर्णन है.

बिहार के मधेपुरा, सुपौल, कटिहार जैसे जिलों के बाढ़ से हुई तंगो-तबाही का इसमें जीवंत चित्रांकन है. निश्चय ही वे विभिन्न विधाओं और विषयों के पत्रकार हैं. बिहार में जब सवर्ण आयोग का गठन हुआ तो उसका विरोध उन्होंने किया . उनकी पुस्तिका ‘नीतीश के सवर्ण आयोग का सच’ इसी का नतीजा था. उन्होंने सत्ता से हमेशा अपने को दूर रखा. सत्ता जहाँ भी गलत करती है, पत्रकार प्रमोद रंजन उसका विरोध करते हैं. वे सौ प्रतिशत बेफिक्र पत्रकार हैं. सत्ताधीशों की लाठी का डर उन्हें नहीं सताता है. वे चिंता भी नहीं करते हैं कि कोई बेईमान सत्ताधीश मुझे बिगाड़ लेगा. पत्रकारिता का  जोखिम उठाना उनकी प्रकृति और नियति है. मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक के गलत कार्यों का वे पर्दाफाश करनेवाले पत्रकार हैं. एकदम निडर और बेखौफ. कभी-कभी उनकी तल्ख टिप्पणियाँ बड़ों-बड़ों को तिलमिला देती हैं. अरुण कमल जैसे कवि और प्रभाष जोशी जैसे पत्रकार से वे अकेला ताल ठोकते हैं.

इस पत्रकार की कलम में जितनी ताकत है, उतनी ही ताकत उनके आंदोलन में भी है. वे आंदोलनकारी भी हैं. भगाणा की गैंग-रेप पीड़िताओं के पक्ष में उन्होंने ने काफी सक्रियता दिखलाई. वे उनके आंदोलन में शामिल भी हुए. वस्तुतः  प्रमोद रंजन ने बहुजनों की लोक परंपरा, मिथक और लोकगाथाओं से लेकर बहुजन राजनीति एवं साहित्य तक के विषयों पर खूब कलम चलाई है. बतौर संपादक अन्य बहुजन चिंतकों से उन्होंने ऐसे विषयों पर लिखवाया भी है. अभी हाल ही में वाणी प्रकाशन से तीन खंडों में ‘हिंदी की आधुनिकता: एक पुनर्विचार ’ नामक पुस्तक आई है. इसमें प्रमोद रंजन का ‘मीडिया में हिस्सेदारी’ विषय पर वह व्याख्यान और उस पर हुई लंबी बहस शामिल है, जिसे उन्होंने भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला में दिया था. वे बहुजनों के सर्वाधिक लोकप्रिय पत्रकार हैं और बहुजनों के लिए निरंतर कार्य कर रहे हैं. यह प्रमोद रंजन ही हैं, जिन्होंने बहुजनों के पर्व-त्योहारों को नई दृष्टि से मूल्यांकित किया है.


 उनकी एक और पुस्तिका है-‘किसकी पूजा कर रहे हैं बहुजन (महिषासुर: एक पुनर्पाठ)’। यह पुस्तिका 2013 ई. में प्रकाशित हुई है. ‘फारवर्ड प्रेस’ से जुड़ने के बाद प्रमोद रंजन की पत्रकारिता और निखरी. इसके अंकों में वे लगातार लिख रहे हैं. वे नए लिख रहे हैं,  मौलिक लिख रहे हैं और विचारोत्तेजक लिख रहे हैं. बिहार के फारबिसगंज में पिछड़े मुसलमानों पर गाज गिरने के बाद जो चुप्पी थी, उसे प्रमोद रंजन ने तोड़ी (फारवर्ड प्रेस, जुलाई 2011). ‘गीता’ को लेकर जनवरी-फरवरी 2012 में भारतीय राजनीति में जो उबाल आया था, उसे लेकर रंजन ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण लेख लिखा है- ‘गए राम, आए कृष्ण’ (फारवर्ड प्रेस, फरवरी 2012). ‘बहुजन साहित्य’ पर उनका लेख ‘बहुजन आलोचना: हिंदी समाज का साहित्य इस कोण से’ अत्यंत महत्वपूर्ण है. इस लेख में उन्होंने लिखा है कि ''बहुजन आलोचना कई प्रकार के आवरणों, छद्मों और भाषाई पाखंडों का उच्छेदन करते हुए वास्तविक जनोन्मुख साहित्य की तलाश करती है.''  

एक दूसरे लेख ‘बहुजन साहित्य और आलोचना’ (फारवर्ड प्रेस, अप्रैल 2013) में उन्होंने यह स्थापना दी है कि ''जैसे-जैसे हम बहुजन साहित्य को चिन्हित करते जाएंगे, द्विज साहित्य स्वतः हाशिए का साहित्य बनता जाएगा, क्योंकि हिंदी साहित्य का अधिकांश हिस्सा बहुजन साहित्य ही है.''  सचमुच पत्रकार प्रमोद रंजन का कार्य बहुजन समाज, साहित्य, संस्कृति और राजनीति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है. वे शोषित, दलित तथा पिछड़ों की बुलन्द आवाज हैं तथा भारत की बेजुबान वंचित जनता की जुबान हैं. 
Blogger द्वारा संचालित.