बेहाल गाँव, बेहाल बेटियां , गायब पौधे... धरहरा , जहाँ बेटी पैदा होने पर नहीं लग पाते हैं पेड़ : सुशासन का सच

 संजीव चंदन        
                        
यह गाँव अचानक से देश -विदेश में चर्चित हो गया, जब 2010 में सूबे के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने गाँव की बेटी 'लवी' के जन्मदिन पर गाँव में जाकर वृक्षारोपण किया. तब जाकर लोगों को पता चला कि इस गाँव के लोग एक बेटी के जन्म पर दस पेड़ लगाते  हैं. इसके बाद 2011 से 2012-हर साल नीतीश कुमार ने क्रमशः 'रिमु राज' और अंजलि कुमारी के जन्म पर पौधे लगाए. गाँव भ्रूणहत्या के खिलाफ तथा पर्यावरण संरक्षण के पक्ष में एक स्टेटमेंट बन चुका है. यह मुख्यमंत्री के विकास कार्यक्रम और राजनीतिक दर्शन का प्रतीक बन चुका है. इसीलिए यह आदर्श गाँव है उनके विकास कार्यक्रम और राजनीतिक दर्शन को समझने के लिए भी. पाठक यहाँ किसी राय या निष्कर्ष पर नहीं पहुंचे. आइये हमारे साथ गाँव चलते हैं.


भागलपुर जीरो माइल से गंगा पार करने के बाद ८ से १० किलोमीटर की दूरी तय करनी होती है 'धरहरा' पहुँचने के लिए. इस बीच सड़क के दोनों किनारों पर लगाये गये पौधों की कतार में आप कोई पौधा खोजने की कोशिश नहीं करें , निराश होंगे. वहां लकड़ी के बाड़ और थोड़े-थोड़े अंतराल पर चापानल देख कर आप आश्वस्त हो सकते हैं कि सरकार वृक्षारोपण के प्रति गंभीर है और वह मनरेगा के पैसों का सही इस्तेमाल कर रही है. इसके डिटेल में न जाना उचित है और न धरहरा जाते हुए डिटेल में जाया जा सकता है कि कितनी राशि के गायब पौधे इन बाड़ों में लगाये गये हैं या कितनी राशि के गायब पौधों को  जीवित रखने की अंतिम कोशिश इन चापानलों के माध्यम से की गई है या फिर कितने मजदूरों को इस योजना में काम मिला है. ध्यान रहे हमलोग उस गाँव में जा रहे हैं, जो बेटियों के जन्म से जोड़कर वृक्षारोपण करता है , एक साथ पर्यावरण संरक्षा के लिए तथा भ्रूण हत्या के खिलाफ कटिबद्ध गाँव. वहां पहुँचने के पूर्व इन गायब या जल गये पौधों से कोई राय बना लेना ठीक नहीं होगा.

धरहरा, यानी मकंदपुर पंचायत का एक गाँव . मकंदपुर रास्ते में ही है. मैंने दारू पीनी छोड़ दी है. यदि आपको तलब है तो आप आश्वस्त रहें बिहार सरकार ने हर तीन पंचायत में एक ब्रांडेड  दारू की दूकान को लायसेंस दे रखा है, मकंदपुर एरिया में भी एक ठेका है. ग्रामीणों की माने तो लायसेंसधारी दुकानदारों ने कई गांवों में किराना दुकानदारों के माध्यम से मनपसंद ब्रांड उपलब्ध करा रखा है - 'सर्विस ऐट डोर स्टेप'!  धरहरा के ग्रामीणों के अनुसार यह व्यवस्था उनके गांव में नहीं है.


1900 दर्ज मतदाताओं और चार से पांच हजार आबादी वाले इस गाँव में १२०० मतदाता कुशवाहा ( पिछड़ी) जाति के हैं १७५ मतदाता राजपूत जाति के शेष ५२५ मतदाता अति पिछड़ी जाति , दलित , अति दलित जाति  तथा पश्मान्दा मुसलमान आदि में बटें हैं. गाँव की ७५% जमीनों पर राजपूत जाति के लोगों का मालिकाना है, शेष अधिकांश पर मालिकाना है  कुछ कुशवाहा किसानों का  लगभग ६० से ७० प्रतिशत आबादी भूमिहीन है. खबरों और दावों को मानें तो इस गाँव में बेटी के जन्म पर १० से १५ पेड़ लगाने की परम्परा की शुरुआत ' निर्मला देवी ' के परिवार से हुई. नीतीश कुमार ने इन्हें बुलाकर पुरष्कृत किया और नीव डाली बेटी के जन्म पर वृक्षारोपण के मॉडल गाँव के रूप में धरहरा को विकसित करने की.

 निर्मला देवी सहित कई ग्रामीणों के यहाँ आपको मिलेंगी  अख़बारों के वे कतरनें, जिसमें सूबे के मुख्यमंत्री पौधा लगा रहे हैं और साथ में कैप्शन : ' बेटियों का मान बढ़ने वाले धरहरा को सलाम ' 'सी.एम ने भी सराहा धरहरा के जज्बे को' आदि. आदि . उत्साहित ग्रामीण आपको घुमायेंगे उन विशेष जगहों पर जहाँ सी.एम ने पौधे लगाये हैं, इस घोषणा के साथ शिलापट्ट भी लगे हैं वहां. नीतीश कुमार के ब्रांड अम्बेसडर गाँव की ब्रांड अम्बेसडर निर्मला देवी से मिलने पर आपको यकीन हो जाएगा कि इस गाँव के हर घर में बेटी पैदा होने पर १० पौधे लगाये जाते हैं. निर्मला देवी कहती हैं कि ' किसी भी जाति धर्म के लोग अपनी बेटी के जन्म पर पौधे लगाकर उत्सव मानते हैं. गाँव में बड़े बगीचों -दर्जनों एकड़ जमीन में फैले बगीचों और वीकीपीडिया पर इस गाँव में आम और लीची के पेड़ों की बताई गई संख्या ( १ लाख ) के प्रभाव में बेटी और पर्यावरण के प्रति संवेदनशील गाँव और सरकार के प्रति आप श्रद्धा से भर जायेंगे .


लेकिन जरा ठहरिये, आपको उत्सुकता और गर्व से गाँव घुमा रहे लोगों को थोड़ा और कुरेदिए , उन्हें आश्वस्त करिए कि आप हकीकत जानने आये हैं और हकीकत ही लिखेंगे तो आपसे वे खुलेंगे . तब आपको पता चलेगा कि आम और लीची के पेड़ों वाले भागलपुर के दर्जनों गाँव में से एक धरहरा में बड़े-बड़े बगीचों पर बमुश्किल एक दर्जन परिवार का मालिकाना है, उसमें से ८० % बगीचे का आकार राजपूत जाति के लोगों के अधिकार में है. आपको पता चलेगा कि तीन सालों से मुख्यमंत्री ने  दो बार राजपूत परिवार की बेटियों और एक बार कुशवाहा परिवार की बेटी के जन्म पर पेड़ लगाये हैं. आपको यह भी पता चलेगा कि लगभग सौ एकड़ में फैले जिस बगीचे से होकर आप निर्मला देवी के घर पहुंचे हैं, वह किसी राजपूत परिवार की मिलकियत है और निर्मला देवी के खुद के बगीचे भी आकर -प्रकार में कमतर नहीं हैं.

 मेरे साथ पहली बार गाँव के ही कुशवाहा जाति के युवा संजय सिंह घूम रहे थे. उनकी मानें तो गाँव के 60 से 70 % लोग भूमिहीन हैं और उनके द्वारा बेटी के जन्म पर पेड़ लगाना संभव ही नहीं है. ' कहाँ लगायेंगे वे पेड़ रहने को तो उनके पास बमुश्कील से कुछ एक  धूर जमीन है?' संजय पूछते हैं. संजय का  सवाल नीतीश कुमार की राजनीति को कठघरे में खड़ा करता है. सवाल है कि मुख्यमंत्री बनने के बाद भू सुधार का वायदा करने वाले नीतीश ने आखिर क्यों बंदोपाध्याय कमिटी की संस्तुतियों को ठंढे बक्से में डाल दिया ! संजय जैसे लोग इससे ही जुड़े सवाल करते हैं कि क्या भूमिहीनों के बीच जमीन की बन्दोवस्ती जैसे महत्वपूर्ण कार्यक्रम नीतीश कुमार उन्हीं लोगों के दवाब में नजरअंदाज करते हैं, जिनके दवाब में उन्होंने कई हत्याओं के अभियुक्त की हत्या की जांच सी.बी.आई को सौप दी, उसके समर्थकों को पटना और आरा  में खुलेआम तांडव    की छूट दे दी और कुशवाहा जाति के जनप्रतिनिधियों की औरंगाबाद में हत्या की जांच की मांग कर रहे लोगों पर लाठी बरसवाकर दर्जनों लोगों के हाथ-पैड तुडवा डाले ! मेरे साथ घूम रहे सामजिक कार्यकर्ता डा. मुकेश  सवाल करते हैं कि 'क्या सूबे के नेता के पास इतनी दृष्टि भी नहीं है या उनके सलाहकार उन्हें सलाह नहीं देते हैं कि भूमिहीनों के लिए कोई एक -डेढ़ एकड़ जमीन गाँव में मुहैया करा दें जहाँ वे भी अपनी बेटियों के जन्म पर पेड़ लगा सकें !'  मुकेश अपने प्रश्नों के साथ सही सवाल उठा रहे हैं कि आखिर जब तक पूरे गाँव के लोग अपनी बेटियों के लिए पेड़ नहीं लगा पायेंगे तो प्रतीक बने इस गाँव में उनकी बेटियां कैसे बराबरी और सम्मान का दर्जा पा सकेंगी ! फिर पूरे गाँव के द्वारा बेटी के जन्म पर वृक्षारोपण की खोखले  अफवाह का क्या सन्दर्भ हो सकता है, जिस गाँव में बमुश्किल १० से १५ प्रतिशत लोग ऐसी हैसियत में हैं, जो इस सरकारी कर्मकांड में शामिल हो सकें .

इसके पहले कि बेटी के जन्मोत्सव से जुड़े पर्यावरण संरक्षण के इस अभियान के प्रभावों को धरहरा की जेंडर स्थिति की कसौटी पर कसा जाय जरा उन भूमिहीन घरों से घूम आते हैं, जिनमें से अधिकांश या तो नीतीश कुमार के नायाब सोशल  इंजीनिअरिंग के तहत चिह्नित ' महादलित' परिवार के घर हैं या फिर मुसलमान परिवार के, जिनके वोट बैंक को टार्गेट कर नीतीश कुमार अपनी धर्मनिरपेक्षता की राजनीति को नरेन्द्र मोदी के इर्द -गिर्द घुमाते हैं. महादलित परिवार के कच्चे पक्के मकानों के सामने धरहरा की बेटियां खेलती नजर आ सकती हैं, या छोटी उम्र में अपने भाई -बहनों को खेलाती ताकि उनके माँ-बाप अपने काम निपटा सकें. वे अपने घर के सामने के बगीचे में तब तक ही खेल सकती हैं, जब तक उनपर फलों के मौसम नहीं आये हों, अन्यथा पहरेदार उन्हें उन बगीचों में घुसने नहीं देते, जो उनके नहीं हैं, या जो उन बेटियों के हैं जिनके पिताओं के पास कई एकड़ में फैले बगीचे हैं.


बमुश्किल पोषाहार के लिए स्कूल का समय निकल पाती इन बेटियों को अपने गाँव से जुड़े 'शोर ' का पता नहीं है. महादलित परिवार के कुछ सदस्य उत्सुकता बस हमलोगों के पास चले आते हैं. उनसे पता चलता है कि गाँव में मुख्यमंत्री के आने के बाद वे भीड़ के तौर पर कार्यक्रम स्थल पर उपस्थित होते हैं. उनमें से कोई मुख्यमंत्री से व्यक्तिगत तौर पर पास जाकर नहीं मिला है और न ही मुख्यमंत्री ने अपने इस 'मॉडल गाँव ' के अपने प्रिय लोगों ' महादलितों' के टोले में आकर उनका हाल-चाल पूछना उचित समझा है. उन्हें जरूरी नहीं लगता कि वे इनके पास आकर इनकी 'बेटियों' के लिए वृक्षारोपण की इनकी चिंता में शामिल हों या इन्हें अपने मुहीम में शामिल करें. क्या नीतीश कुमार जिन्हें अपना चिर प्रतिद्वंद्वी मानते हैं, लालू प्रसाद यादव, कभी किसी गाँव में हर साल आते और अपने प्रिय लोगों ( वोट बैंक ही सही ) से नहीं मिलते या उनके टोले में नहीं जाते, ऐसा संभव था ! गाँव के ही  प्रमोद पोद्दार नीतीश और लालू की राजनीति के इस फर्क को चिह्नित करते हैं. 
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