सविता सिंह की कवितायें

प्रख्यात आलोचक मैनेजर पाण्डेय सविता सिंह की कविताओं के सन्दर्भ में लिखते हैं, ‘ सविता सिंह की कविताओं में गहरा आत्म संघर्ष है और आत्म मंथन भी उनमें स्त्री की स्वायतता का बोध है . उस बोध से ही स्त्री पराधीनता के परंपरा जनित शाप से मुक्त होती हैं . लेकिन सविता सिंह का स्वायतता का बोध व्यक्तिगत को ही राजनीतिक मानने वाली स्त्री दृष्टि का अनुकरण नहीं करता . उनके यहाँ स्त्री की व्यक्तिगत स्वायतता के बोध के साथ सामूहिक चेतना के महत्व की पहचान है .’ संपादक ) 

चाँद तीर और अनश्वर स्त्री

अपने ही सपनों का पीछा करते हुए
कितनी ही रातों के रहस्यों का पता चला
जिनमें मैं अकेली और बेचैन
ख़ुद से लड़ती करवटें बदलती रही
वर्षों तक मुझे पता नहीं था
मैं किससे लड़ रही थी
कौन था जो आखेट के लिए बुलाता था
कौन थे वे पशु जिनका अंत करने हर रात मैं निकलती थी
जिनकी आँखें अंधकार में हरी रोशनी सी चमकती थीं
जो मुझे ऐसे देखती थीं
जैसे उन्हें मेरा ही इंतज़ार हो


कई बार मुझे ऐसा लगता
वे मेरी ही आँखें थीं
जो मुझ तक हरे रंग में रँग कर आती
मुझमें लग जाने के लिए
अपनी आँखें मैं टटोलती तब
वहाँ रोशनी की जगह अंधकार होता
एक अंधापन
और मैं चीख़ने लगती
जाने किससे कहती
हटाओ यह पर्दा
अंधकार और प्रकाश के बीच जो पड़ा है
इस रात को हटाओ
जो धँसी है मेरी देह में
इन पशुओं को काबू में लाओ
मुझे घेर कर जो खड़े हैं

कोई फिर कहता...
यह सब स्वप्न है यथार्थ नहीं
यहाँ कोई पर्दा नहीं
नहीं कोई क्षमा
यहाँ जीवन और मृत्यु एक समान हैं
ईश्वर और मनुष्य एक दूसरे का हिस्सा
यहाँ प्रेम और संभोग की
कोई पवित्रता या अपवित्रता नहीं
यहाँ आनन्द निर्बाध है
और दुख स्वच्छन्द
आँखों की यहाँ ज़रूरत नहीं
न किसी रोशनी की
यहाँ सब कुछ दिखता है बिन आँखों के
अंधकार ही ब्रह्म है यहाँ
स्वप्न ही जीवन
चलचित्र समान
वही है आखि़री पर्दा
इसे हटाने को मत कहो
इसके बाद का इलाव़ पूर्णतया अज्ञात है
अपरिचित इतना कि किसी को कुछ नहीं पता
मृत्यु को भी नहीं
कोई नहीं जानता वहाँ क्या है जीवन या सिर्फ हवा
या महज़ कुछ और विस्तार
मैं फिर भी कहती
मुझे देखना है इस आखि़री पर्दे के पीछे का रहस्य
क्या स्वप्न का भी होता है कोई मुखौटा
उसका चेहरा भी कहीं वही तो नहीं
जिसे वह छिपाए हुए है
किसी कुष्ठग्रस्त राजा के दर्प सा

कभी-कभी यूँ ही चीख़ती परेशान
अँधेरे जंगलों में चलती जाती
देखती अपने ही पूर्वजों को
निरपेक्ष अपनी बेचैनियों से
अब भी उनके सरोकार होते उनके खेत आम के बाग़
हाथी घोड़े हीरे माणिक मोती
अब भी बटोरते दिखते वे शक्ति अपार
युद्ध और शांति के फैसले करते
गिनते मृत योद्धाओं के अनगिनत शव
मुझे पहचनवाया जाता
ये फलां राय हैं वे फलां राजा
ये तुम्हारे ये लगते हैं वे, वे
कितनी ही आदतें जो मुझमें हैं बची
होतीं उनमें से किसी की
मेरी आँखें मेरा रंग मिलता उनमें से किसी से
बनी रहती फिर भी दूरी
लौट सकने में जिससे आसानी होती

कोई वैसा रोकता नहीं मुझे न कुछ कहता
बस एक हल्की सी हँसी ज़रूर दिखती
किसी के चेहरे पर एक आश्वस्ति ठहरी सी
भटकती ही सही मैं उन्हें मिली तो
लौटने पर फीकी-फीकी सी अनुभूति ही
मेरे भीतर बची मिलती
कुछ भी ऐसा नहीं कि उनके बीच फिर लौटूँ



एक बार मिली मुझे एक सुंदर स्त्री
जिसकी आँखों के नीचे था जमा सा अँधेरा
जो मुझसे लिपट-लिपट कहती वह मेरी है
बहुत अपनी
जिसके ऐसा कहने में थी एक परिचित पीड़ा
लगता जिससे वह जो कुछ भी चाहती है कहना
वह सत्य होगा
वह बस एक ही बात कहती
ले चलो सपनों के रास्ते ही है संभव अब मेरा लौटना
ले चलो मुझे अपने घर
वही है मेरा भी घर जो तुम्हारा
जहाँ से मुझे निर्वासित किया गया
मैं थी उस घर की बाल विधवा बहू
जिसके साथ प्रेम और अभिसार का
क्रूरतम खेल खेला गया
मैं एक बच्ची ही थी नासमझ
मुझे एक रात नष्ट किया गया
मेरे बच्चे की हत्या की गयी
और छोड़ दिया गया मुझे किसी जंगल में
जिसमें तुम आज तक भटकती हो
शायद मुझे खोजती
और जहाँ के ख़ूंखार जानवर भी
अभिशप्त हैं दया करने के लिए मुझ पर

मैं मरी नहीं, मैं बची हुई हूँ अब तक
घुमड़ती एक आवाज़ की तरह
जिसे तुम्हीं अकेली सुनती हो
मैं भटकती रही जंगलों जंगलों
खेतों से होती हुई
पार करती अनगिनत आम और जामुन के बाग़

मैं गयी शहरों तक गयी
नहीं बता पाया कोई मुझे मेरा गाँव
मैं अब भी पालना चाहती हूँ अपने बच्चे को
हासिल कर सके ताकि वह अपना संसार
समझ सके कस्तूरी की गंध
कितनी जोखिम भरी होती है खुद हिरण के लिए

अक्सर मैं इसी सपने का पीछा करती
ताकि मिलूँ अपनी इस पूर्वज से दोबारा
जानूँ उसके भटकाव और दुख के दूसरे करुण प्रसंग
महसूस करूँ वहाँ व्याप्त उन पशुओं की साँस की गंध
जिससे नृशंसता की बू आती थी
जिनकी आँखों की हरी रोशनी
शायद मुझे डराने के लिए थी

लेकिन नहीं लौट पाती उस सपने में आसानी से
बदले में दिखता कोई और चरित्र
नृत्य करता हुआ जो आता मुझ तक
और डाल देता मेरे गले में एक हार
मुझे यह अभद्रता लगती
मैं निकाल फेंकती उसका यह बंधन
और वह रोता हुआ
मिट्टी में धँसता चला जाता
मैं चिल्लाती पूरी रात प्रयत्न करती उसे बचाने का
रोती हुई फिर बाहर आती इस हादसे से किसी तरह
पश्चाताप के पाताल में डूबी
कौन था वह कौन था कहती हुई

तभी दिखता हिरणों का एक झुंड स्वच्छन्द कुलाँचें भरता
मैं भूल जाती सब कुछ सारी हताशा पश्चाताप सारा
हो जाती उन्हीं के पीछे-पीछे होने शामिल उन्हीं के उल्लास में
तभी दिखता झाड़ी में तीर साधे कोई खड़ा
फिर अनन्त स्वप्न भर मैं उससे विनती करती
मत करो नष्ट इस सौंदर्य को
इस स्वच्छन्दता को बाधित मत करो
वह तीर नीचे रखता मुझे घसीटता हुआ ले जाता एक तरफ
और आश्चर्य कि वह होता कितना अपना
मैं सोचती क्यों बना यह शिकारी
फिर सशंकित हो उठती
शायद यह है कोई और
जीवन से अधिक मृत्यु चाहने वाला

तभी अचानक जैसे वह बदल जाता किसी और व्यक्ति में
जाने क्यों परिचित लगता है वह
लम्बी काया पतली ऊँची नाक
गोरा सुन्दर चेहरा
सोचने लगी ऐसे व्यक्ति से कैसी अपेक्षा करूँ
कुछ अच्छा या फिर वही चिरपरिचित बुरा
तभी वह मेरी तरफ मुड़ता
एक विचित्र भाव चेहरे पर उसके
डराती सी आवाज़ में पूछता
कैसी है उसकी प्रिया वन-वन जो भटकती है

अचानक मुझमें एक रोष पैदा होता
‘‘तो आखि़र तुम हो वह काम रूप
वास्तव में कुरूप नृशंस कायर क्रूर
स्त्री की मृत्यु चाहने वाले
तुम जिसे कभी प्रेम नहीं मिलना चाहिए था
जिसे भटकना चाहिए जन्मों-जन्मों अकेला
भूखा-प्यासा...’’
‘‘तुम तुम तुम...’’ कहती हुई जैसे मैं नींद में लौटती
पीछे छोड़ती हुई सपने को
अपनी ही चीख़ से जागती आखि़र
भरी एक अफसोस से क्यों नहीं हिंसक हुई मैं
क्यों उसे और अपमानित नहीं किया
और अधिक अपमानित
मैं मिली ही क्यों उससे
कि तभी मुझे लगता शायद
वह खुद ही मिलना चाहता था मुझसे
तभी तो चीर कर अंधकार के कितने मैदान
वह आया मेरी नींद तक
शायद वह सचमुच जानना चाहता था
अपनी आत्मा के उस अंश के बारे में
जिसमें पीड़ा ही पीड़ा थी
थे जिस पर घाव ही घाव

मगर उसके चेहरे पर तो दिखी नहीं कोई ग्लानि
अभी भी वह उसे बलात ही पाना चाहता था
मैंने अपने हाथों से अपने चेहरे को ढँका
अपनी बेचैनी कम करने के लिए शायद
और लगा जैसे मेरा चेहरा मेरा नहीं
वहाँ महसूस नहीं हुई अपनी ही आत्मीयता
मुझमें ख़ुद से ही जैसे एक अलगाव पैदा हो गया था
मेरा अपना ही कुछ ग़ैर हो गया था
हिंसा पर उतारू अपने ही खि़लाफ
अगली रातों में क्या कुछ घटित होगा
सोचकर मैं आशंकित थी
कुछ मौतें कोई युद्ध लम्बा जैसे छिड़ सकता था
और फिर मैं कितनी कितनी रातें
कई नींदों तक उसमें शामिल रहूँगी
युद्ध करती ढूँढ़ती कितनी ही हरी रौशनियों को
बनाती उन्हें अपनी आँखों का प्रकाश

वैसे मैंने खुद को भी मरते हुए देखा है कई बार
कोई तीर मुझे ही भेद जाता है
और मैं नहीं देख पाती उसे
जो भेदता है मुझे
उसे देखने के लिए मैं लौटती हूँ
कितनी ही बार इस स्वप्न में
जानती हुई कुछ-कुछ वह कौन है
जानती हुई उसे मैं खोज लूँगी सपने के बाहर भी
कठोर रौशनियों के मैदानों में घोड़े पर सवार
वह मुझे धोखा न दे सकेगा
उसके पास बची हैं अनगिनत तितलियाँ मेरी
उसके भीतर अब भी उड़ती हुई

कितनी ही रातों का रहस्य इस तरह मैं जानती गयी
जिनसे यह जीवन सपनों की तरह खुलता गया
इस दौरान मैंने सीख लिया था आखेट में जीतना
पहचान लिया था हरी रोशनी वाली चमकती आँखों को
मृत अपनी देह से अलग कर लिया था खुद को
मुझे भी आ गया था तीर चलाना
मैं आ-जा सकती थी सपनों के बाहर-भीतर
अंधकार को समझ चुकी थी मैं
उसकी मुक्ति में ही अब मेरा विहार था
मैं जान रही थी अब

आखेट के लिए बुलाता है अगर कोई मुझे
नहीं है भागना
शामिल होना है इस खेल में
आखेटक से डरना नहीं
यदि बचे रहना है

मुझे मालूम है अब ख़ूब
रात और स्वप्न के मैदान में
तीर और चाँद मुझे देखा करेंगे
और मैं रहूँगी हिरणों के झुण्ड में शामिल
उनकी छलांगों के मुक्ति विलास में
लाँघती-फाँदती जंगल के जंगल


अब न तीर चल सकेंगे
न रात होगी और गहरी
एक दूधिया रोशनी में स्वप्न चलता रहेगा
भले चाँद देखता रहे मुझे एकटक
करता रहे अपनी कामना से मेरा शिकार
मैं उससे कहूंगी जैसे मैं कहूँगी हर आखेटक से
या फिर उस स्त्राी से जो भटकती है
किन्हीं बियाबानों जंगलों में अब तक
मैं स्वयं काम हूँ स्वयं रति
अनश्वर स्त्री
संभव नहीं, नहीं मृत्यु मेरी


ईश्वर और स्त्री

जागी हुई देह और आसमान एक दर्पण
देखता होगा ईश्वर भी स्त्री के हाहाकार को
बदलने के लिए होगा उत्सुक अपनी ही कल्पना को
कि बनाये नहीं उसने वे पुरुष अब तक
ले सकें जो उसे बाँहों में
उनींदी आँखें बंद होने-होने को
खुलने के लिए तैयार मगर वे दरवाज़े
जिन्हें बचा रखा है अब तक रात ने
लहराता अंधकार मिल जाने देता है
अपने तम में एक और तम को
सारी वासना को जैसे स्त्री हो
चंद्रमा खिला रहता है आसमान में रात भर
सिमटा एक कोने में सब कुछ देखता सोचता
बदलेगा यह संसार अब स्त्री की कामना से ही
ईश्वर की नहीं इसमें अब कोई भूमिका

जैसे खुद वीरानी

आखि़र मैं बढ़ी झिझकती हुई
उस स्वीकार की तरफ
जिसमें आहट थी प्रेम की
और एक दीर्घ प्रतीक्षा टकटकी लगाये
एक हाॅलनुमा कमरा
पर्दे बिस्तर तकिये ताकते ज्यों शून्य में
गुन-धुन में थिराई एक देह
प्रेम घटित होने की उत्सुकता में
थरथराता एक संसार था
उसी स्वीकार पर टिका
गुलाब का कोई पौधा इंतज़ार करता
ज्यों अपनी मधुमक्खियों का
और हवा थी कि बार-बार
धूल उड़ाती हुई गुज़रती
पहले से अधिक वेगवती
सब कुछ अस्त-व्यस्त कर देने को आतुर
एक आहट फिर भी भीतर सुनायी पड़ती थी
मंद-मंद एक स्थिति जैसे अपनी ही धड़कन की
एक स्पंदन भीतर तक तरंगित
तभी एक दरवाज़ा खुला
दिखी वीरान-सी एक घाटी
एक रात जिस पर झुकी थी
अकेली हवा जिसमें टहलती थी
अनायास मैं उसमें दाखि़ल हो गयी
सोचती हुई क्या कोई हृदय ऐसा भी होता है
घाटियों पठारों वाला
जहाँ रात झन-झन बजती है
जैसे खुद वीरानी
सविता सिंह 

अपनी भाषा में हूँ सुकून से /मुझे खोजने आ सकते हैं प्रेमी ,  सविता सिंह की खुद की इस पंक्ति से बेहतर और कोई परिचय नहीं हो सकता है हिन्दी के इस मह्त्वपूर्ण कवयित्री का . 


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