फूटते पेट वाली औरत और मर्दवाद

रति सक्सेना
डा रति सक्सेना संस्कृत की विदुषी हैं, कवयित्री हैं, आलोचक हैं.  साहित्य और संस्कृति की संस्था कृत्या की मैनेजिंग ट्रस्टी हैं.  इनकी हिन्दी में चार ( माया महा ठगिनी, अजन्मी कविता की कोख से जन्मी कविता, और सपने देखतासमुद्र, एक खिड़की आठ सलाखें), अंग्रेजी में दो और मलयालम में एक (अनूदित) एक द्विभाषी कविता पुस्तक , झील में मसालों की खुशबू कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं । इतालवी भाषा में भी एक कविता संग्रह और अथर्ववेद की प्रेम कविता का अनुवाद प्रकाशित हो के  हैं। (हिन्दी में दो और कविता संग्रह तथा अंग्रेजी में एक कविता संग्रह शीघ्र प्रकाशित होने वाले हैं ) वेदों को आधार बना कर लिखे गए लेख अपने विशेष दृष्टिकोण के कारण पठनीय रहें हैं . रति सक्सेना www.kritya.in नामक द्विभाषी कविता की पत्रिका की संपादिका है जो पिछले 10 वर्षों से चली आ रही है। कृत्या नामक संस्था द्वारा पिछले 8 वर्षों से स्तरीय कवितोत्सव मनाए जा रहे हैं, जो अपने स्तरीय प्रदर्शन के कारण वैश्विक स्तर पर प्रसिद्ध हैं। इनसे इनके ई मेल आइ डी : saksena.rati@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है
( रति सकेसना के ये दो संस्मरण   औरत की दुनिया , औरत बनने की कथा , मर्दवाद के प्रयोगशाला , पीढियों के फर्क और मर्द्वाद की पीढीवार निरंतरता , आदि को बेहद संजीदा ढंग से अभिव्यक्त करते हैं.)

1. फूटते पेट वाली औरत

दुखते जोड़ों को घसीटते घसीटते दिन भर तो कम में मशगूल रहती थी वह, लेकिन जरूर कुछ ना कुछ सोचा करती होगी, प्लाट बुनती होगी फिल्मी लेखकों की तरह, मन ही मन आवाज भी दुहराया करती होगीं, तभी तो साँझ ढलते ही वह भी ढल जाती आँगन में बिछी चोड़ी सी चारपाई पर लगे बिछे पर , और हाथ पैरों पर तेल चुपड़ते हुए जोर जोर से नवासे नवासियों को पुकारने लगती,, अरे भई, जिसे कहानी सुननी हो, सुन लो, मेरा तो पेट फूल रहा है, कहीं फट ही नहीं जाये कहानी के मारे...


बस फिर क्या गर्मियों की छुट्तियों में नानी के घर आये बच्चों में होड़ लगती कि कौन कितना चिपट कर कहानी सुने, जिसे जहाँ जगह मिलती घुस जाता, कोई पेट पर लदता तो कोई बाये कंधे को सिहाना लगाता, तो कोई पैताने उड़ंगा बैठ जाता।

नानी के भी तो १२ नवासे नावसियाँ थीं. और नानी के पास हर बार नई कहानी, ना जाने किस कारखाने से लाती थीं वे, हालांकि कुछ बेहद देसी कहानियाँ थीं, जो बार बार दुहराई जाने पर भी उबाऊ नहीं होती, लेकिन इन दो चार कहानियों के बल पर बच्चों को कितने दिन बाँध पाती , तो बस उसने अपना कारखाना शुरु कर दिया, उसके पात्र महाभारत से उतर कर वर्तमान में आते फिर कही भी चल देते, चाचा चौधरी तक खोज ना पायें, ऐसी थी उसकी कहानियाँ...

उसके नवासी नवासे बढ़े हो गये कब के, बड़े बड़े पदों पर हैं, लेकिन नानी का पेट फूलना और उसमें से कहानियों का निकलना उनकी सबसे खुबसूरत यादे हैं,..

अब मेरा पेट फूलता है,

मेरी खाट खाली है,

मेरे नवासे नवासियों को वक्त ही कहां इस बेहूदगी के लिये

2. मर्दवाद

उस पीढ़ी की हूँ जब औरत को कमजोर बनाना सामाजिक भूमिका का अंग हुआ करता था, भोजन से लेकर कामकाज तक, घर में कोई भाई ना होने के कारण मुझे व्यक्तिगत रूप से कभी यह अन्तर महसूस नहीं हुआ, लेकिन घोर बचपने में भी चकित रह गई थी, जब एक सखी ने आकर खुशी खुशी बताया था कि आज उसे करछी भर दूध मिला, जिसमें रोटी भिगो कर खाने का स्वाद वह स्कूल तक ले आई... मेरे लिये यह बात चकित करने वाली थी, क्यों कि मुझे रोजाना कप भर दूध पीने की बन्दिश खलती थी,,,, हमारे दूध के लिये आनाकानी करनेपर माँ कहती .. पी लो. पीलो... ससुराल में तो पीने को मिलेगा नहीं तब नखरे करना,,, उस वक्त तो बहुत गुस्सा आता लेकिन उनकी बात सोलह आने सच थी...


मैंने तो अपने बचपन में बीकानेर में सासों के मुँह से बीन्दनियों की बुराई कुछ इस तरह से सुनी थी कि .'.म्हारी बीन्दनी चुरा कर मट्ठा पीये है'.... मुझे उस वक्त भी आश्चर्य होता था  कि बीन्दनी चार चार गाय भेंसों को दुहे मट्ठा चलाये, घी निकाले लेकिन चुल्लू भर मट्ठे को होंठो से छुला ना पाये... जी यही समाज था...और इसे अच्छी बात मानी जाती थी.... माँ की ये बड़बड़ाहट कि पिता ने लड़कियों को सिर पर चढ़ा दिया है, ससुराल जायेंगी तो भुगतेंगी, सही प्रतीत हुआ...

घर परिवार में हर जगह औरत को कमजोर बनाने का अभियान इस कदर चलता था कि औरत भी उसी षडयन्त्र का हिस्सा थी. हमारी पीढ़ी ने कोशिश की लड़कियों को कम से कम भोजन तो अच्छा दिया जाये, उनकी शिक्षा भी उनकी रुचि के अनुसार ठीक ठाक हो.... लेकिन बेटियों के लिये एक कशमकश सामने रख दी कि जो उन्होंने अपने घर में देखा,वह सच है या जो वे दूसरे घर में देख  रही हैं वह?

अब घर से बाहर की बात... माँ ने साइकिल दिलाई,पिता ने साइकिल पर कालेज जाने की छूट दी... लेकिन बहुत कम उम्र में ही समझ आ गया था कि यदि साइकिल पर जाना है तो लड़कों के कालेज निकलने से काफी पहले के समयपर निकलों या लड़कियों के झुण्ड में चलो... नहीं तो साइकिल से ही डुप्पट्टा उड़ा लिया जायेगा या किसी अंग पर हाथ मार दिया जायेगा.... घिन आती थी, लेकिन किसी से शिकायत की हिम्मत भी नहीं होती थी, नहीं तो साइकिल छुड़वा कर घर पर बैठा नहीं दिया जाये...

जब राजस्थान यूनिवर्सिटी बस से जाना शुरु किया तो घर से बहुत जल्दी चल देते थे, दफ्तरी बाबुओ की शिफ्ट से कहीं पहले, क्यों कि उन दिनों युवा लड़के बस आवाजें कसते थे, लेकिन बाबुओं की मानसिकता चुपचाप हाथ मारनेकी होती थी....अकसर बसों की सीट को एक एक युवक हथिया लेता, लड़कियाँ या तो आधा घण्टे खड़ी रहें या किसी लड़के की बगल में बैठ बकवास सुने...मजा तब आता था कि जब कोई ग्रामीण औरत घाघरा लपेट कर किसी युवक के बगल में बैठ जाती थी, ग्रामीण महिलाऔं की जबान और कद काठी दोनो ही मजबूत हुआ करती थी...और हम पढ़ी लिखी  लड़कियाँ उनकी छत्रछाया में आश्रय लेती थी.

भाग्य से बेहद अच्छे प्रोफेसर मिले थे, मेरे गाइड यूनिवर्सिटी के भीतर अपने बंगले में ही पी एच डी की तैयारी करवाते थे, और जब तक वे देखते पढ़ते उनकी पत्नी बगल में ही जमीन में बैठी तरकारी काटती रहती, जब कभी उनकी पत्नी मैके जाती तो सुधीर कुमार गुप्त जी के घर के बाहर नोटिस लग जाता ,, कृपया शोधार्थी फलां तारीख के बाद ही आये, फला तारीख तक शोध कार्य नही चलेगा.... फोन आदि का जमाना ही नहीं था...अब जाकर महसूस होता है कि कितने सजग और महान गुरु थे हमारे, नहीं तो उस वक्त हम उनकी डाँट के कारण हिटलर ही समझते थे....

केरल में इस तरह की घटनायें काफी सुनी, सच कहा जाये तो मैंने यहाँ घर चल कर आई पोस्ट डाक्टरेट को इस लिये नहीं स्वीकारा कि यह ज्ञात हुआ कि वेदान्त विभाग के हेड आफ डिपार्टमेन्ट हद दर्जे के कमीने हैं, लड़कियों को बहुत छेड़ते छाड़ते हैं, यहाँ तक कि बस में चुकोटी भी काटते हैं.... इतनी हिम्मत ही नहीं थी कि ऐसे बदनाम व्यक्ति के विभाग में काम करूं.. और इसलिये जिन्दगी का बड़ा मौका जानबूझ कर  खोया....
फिर तो यहाँ की पर्ते भी खुलने लगी कि किस तरह स्कूल की लडकियाँ अपने साथ कम्पास या पिन लेकर चलती है, जिससे छेड़ छाड़ करने वालों से बच सकें,

< div> अय्यप्पा पणिक्कर ने इन महारथियों पर कविता भी लिख दी... जो हास्य में व्यंग्य के विद्रूप को दिखाती हैं....
बाहर की दुनिया बेहद जटिल है, और हर जगह अपने को बचाना औरत की मजबूरी होती है,,,,सच पूछो तो अपने को कठोर करने की कोशिश में कभी वह कर्कश भी हो जाती है, इसे भी समझा....अकेले यात्रा करना, रात को देर से लौटना बेहद कठिन है, कम से कम अपने देश में.... यह अच्छी तरह से समझ में आ गया...
यही नहीं यह भी समझ में आया कि साधारण कामगारों से काम करवाने में भी उसे अपने घर के पुरुषों की मदद लेनी पड़ती है,,, जैसे यदि किसी कामगार से घर की औरत ये कहे कि यह ठीक नहीं हुआ तो वो भड़क उठेगा , लेकिन यदि यदि वही बात घर का मर्द कहे तो वो चुपचाप कर लेगा...

मर्दवाद हर कदम में दिखा, कभी मर्द के रूप में तो कभी औरत के रूप में  मैं यह भी सोचती हूँ कि औरत को कमजोर बनाना एक सोची समझी चाल है, और औरत का मजबूत बनने का दिखावा करना अपने स्वत्व को खोने की कोशिश है...और औरत का वास्तब में मजबूत बनाने में औरत और मर्द दोनों की सार्थक भूमिका की मंग रखती है...

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