जब ‘दुल्हन’ घर छोड़ कर चल देती है...

 असीमा भट्ट
( असीमा भट्ट चेखव की कहानी दुल्हन' की नायिका की तरह पहले तो प्रेम  और विवाह के प्रचलित फ्रेम में स्वप्न देखती और जीती युवती रही हैं , जो उसी नायिका की तरह इन सब को छोड निकल पडती हैं जिंदगी के दूसरे मायनों की खोज में ,उनके प्रति आशक्त. इस आलेख में असीमा अपनी प्रिय नायिका और अपने प्रिय लेखक को याद कर रही हैं. असीमा पट्ना में पत्रकारिता के बाद  दिल्ली में एन एस डी में प्रशिक्षण प्राप्त कर थिएटर करते हुए आजकल मुम्बई में रह रही हैं, फिल्म , थियेटर और लेखन को समर्पित होकर )

१९९३ में मैंने चेखव की कुछ कहानियाँ पढ़ी थी, बल्कि यह कहूं कि चेखव से मेरा पहला साक्षात्कार हुआ. उनकी वन्या, तितली, क्लर्क की मौत और दुल्हन आदि कहानियों में सबसे अधिक प्रभावित मैं ‘दुल्हन’ कहानी से हुई थी. यही वजह है कि ‘दुल्हन’ याद भी रह गयी. 

‘दुल्हन’ एक ऐसी लड़की (नाद॒या) की कहानी है, जो कुछ ही दिनों में दुल्हन बनने वाली है. दुल्हन के जो सपने होते हैं, उमंगे होती हैं, वो सब ‘नाद॒या’  में भी है. सगाई के बाद घर में शादी का माहौल है. शादी की होने वाली तैयारियों को लेकर वह बेहद खुश है लेकिन कहानी जहाँ ख़त्म होती है, वह दिलचस्प है कि ‘नाद॒या’ बिना व्याह किये घर छोड़कर चल देती है जिंदगी के एक नये सफर पर...जीवन के किसी और ही उद्देश्य के लिए. उस होने वाली ‘दुल्हन’ में ‘दुल्हन’ बनने की रूचि ही ख़त्म हो चुकी होती है.  इस कहानी को एक बार में समझना कठिन है. एक बार में पढ़कर कोई भी यह सोच सकता है कि आखिर इसमें पागलपन के सिवा है क्या ? जिस लड़की की अच्छी–खासी शादी होने वाली थी. वह अचानक घर छोड़कर चली जाती है वो भी कहाँ और किसलिए .... कोई नहीं जानता. वह खुद भी नहीं जानती .

दरअसल कमोवेश  ‘चेखव’ के सभी पात्र करीब करीब ऐसे ही होते हैं. चेखव समाज के यथार्थ से गहरे जुड़े थे. जैसे तालस्ताय, गोर्की और हमारे, ‘सबके’ प्रेमचंद .चेखव के बारे में कम शब्दों में कहा जाये तो चेखव के दादा मिखायल लोविच, गुलाम (एक बंधुआ) थे, उन्होंने ३५०० रूबल देकर अपनी आज़ादी खरीदी थी. पिता एगोरोविच चेखव जनरल स्टोर की दुकान चलाते थे. चेखव के चार भाई और एक बहन थी. चेखव पेशे से डाक्टर अवश्य थे ,लेकिन साहित्य और नाटक में दिलचस्पी होने की वजह से उन्होंने अपना अधिक समय दिया नाटक और साहित्य को. उन्होंने रुसी समाज को बेहद करीब से देखा था, उस समाज के अंदर जो क्रूरता और बर्बरता थी उसे उन्होंने अपनी कहानियों और नाटकों के पात्रों के माध्यम से दर्शाया.

जिस तरह गोर्की ‘मेरा बचपन’ में रूस की सामाजिक व्यवस्था की धज्जियाँ उघाड़ कर रख देते हैं उसी तरह चेखव बहुत ही खामोशी से व्यवस्था की परत दर परत उघाड़ते हैं. खुद चेखव ने एक जगह लिखा कि - ‘मेरे दिमाग में ऐसे लोगों, चरित्रों की पूरी पलटन  भरी है, जो दिन-रात अपनी मुक्ति के लिए प्रार्थना करती है.’ साथ ही उन्होंने लिखा है कि – ‘मैंने अभी तक जो कुछ भी लिखा है, पांच-दस साल में लोग सब भूल जायेंगे. लेकिन संतोष मुझे यही है कि जो रास्ता खोल दिया है, वह जीवित रहेगा. यही मेरी लेखक की दृष्टि से सबसे बड़ी सफलता होगी.’  एक लेखक अपनी लेखकीय कोशिश से अवगत है, यह बहुत बड़ी बात होती है, जो भविष्य की कोख में झांक सकता है और जानता है कि आने वाली नस्लें कैसी होगी. और उसके लिए उम्मीद छोड़ जाता है. ‘दुल्हन’ कहानी मुक्ति और भविष्य का सशक्त उदाहरण है. मुक्ति के कई मायने होते हैं. इंसान कई बार सामाजिक बन्धनों, ढकोसलों, रुढियों के बंधन से मुक्ति चाहता है तो कभी अपने अंदर के अज्ञान से, तो कभी कभी खुद से खुद की मुक्ति चाहता है.

नाद॒या तेइस साल की है. जो कि सोलह साल की उम्र से व्यग्रता से शादी के सपने देख रही थी, ‘आंद्रेइच’ से उसकी सगाई हो चुकी है. वह आंद्रेई को पसंद करती थी. शादी की तारीख सात जुलाई तय कर दी जाती है. 
कहानी का एक दिलचस्प पात्र है – ‘साशा’, जो नादया की दादी की दूर के गरीब रिश्तेदार का बेटा है. साशा की माँ मरते वक्त साशा को नादया की दादी के हवाले सौंप गयी थी. साशा देखने में रुग्न और साधारण है, लेकिन उसकी बातें असाधारण हैं. वह अख्खड़/अराजक किस्म का कलाकार है. छुट्टियों में बीमारी से आराम पाने के लिए नाद॒या के घर आता है. संभ्रांत परिवारों की त्रासदी पर रौशनी डालता हुआ नाद॒या से कहता है – ‘यहाँ की हर चीज़ बड़ी अजीब लगती है, निकम्मे कहीं के. कोई कभी काम नहीं करता. तुम्हारी माँ रानी की तरह टहलने के आलावा कुछ नहीं करती है. दादी भी कुछ नहीं करती है और न तुम. और तुम्हारा मंगेतर, वह भी कुछ नहीं करता है. साशा अक्सर ऐसी बातों की ओर इशारा करता है जो एक घिसी-पिटी जिंदगी होती है. वह खोखले समाज के रहन-सहन और उसकी कुरीतियों पर बेबाक राय देता है. नाद॒या उसकी बातों की आदी हो चुकी है फिर भी वह अपने मंगेतर का अपमान नहीं सह पाती.  वह चिढ जाती है और साशा से शिकायत करती है कि - ‘तुम मेरे मंगेतर से जलते हो, तुमने मेरे आंद्रेई के बारे में जाने क्या क्या कहा, लेकिन तुम उसे जरा भी नहीं जानते.’साशा कहता है – “तुम कभी थकती नहीं,  बोरियत नहीं होती तुम्हे अपनी जिंदगी से ?’”

‘नाद्या’ अपने मंगेतर के प्यार में गिरफ्त है, जो कि तगड़ा, खूबसूरत और घुंघराले बालों वाला नौजवान है, जिसे वह अभिनेता या कलाकार मानती है, हमेशा उसका पक्ष लेती है. वह अपने मंगेतर के बारे में कुछ भी सुनना नहीं चाहती लेकिन वही नादया बाद में साशा से कहती है – ‘पता नहीं, मैंने इस मूर्ख को कैसे प्यार किया?’     


परिस्थियाँ बदलती हैं या जीवन के पक्ष बदलते हैं, तो अपने-आप हर बातों के मायने भी बदल जाते हैं. आम से आम इंसान की सोच बदल जाती है और वो खास हो जाता है. ‘नाद्या’ को साशा की जो बातें विचित्र और पागलपन भरी लगती थी, उन्हीं बातों ने उसके दृष्टिकोण और जीवन दोनों को बदल दिया कि – ‘सबसे बड़ी बात है जीवन को उलट-पुलट देना.’अपनी शादी के लिए बेचैन और उतावली ‘नाद्,या’ जब शादी के कुछ ही दिन रह गये थे,  बेहद उदास हो जाती है. शादी की होने वाली तैयारियों से उसे चिढ सी हो रही है. वह माँ से कहती है – ‘मैं बहुत उदास हूँ. मैं किसी ऐतिहासिक बात की कल्पना करने की कोशिश करती हूँ.’

वह चिडचिडी हो चुकी है . उसे लगता है कि उसे समझने में हर कोई असमर्थ और अयोग्य है और तब वह साशा से कहती है, - ‘क्या तुम मेरे रोजमर्रा की बातें सुनोगे? मेरा जीवन बहुत ही नीरस है” इस वाक्य में रोज़ के एक ढर्रे पर चलने वाली जिंदगी की एकरसता का आभास होता है. आदमी कितना भी खुश, सुखी और संतुष्ट क्यों न हो उसमें अगर कोई परिवर्तन न हो, साशा के शब्दों में ‘उलट-पुलट’ न हो तो वह जीवन नहीं है.
साशा नाद्या को ‘नयी राह’ दिखाता है, वह कहता है, - ‘तुम कहीं चली जाओ और पढो. केवल सुविज्ञ और संत व्यक्ति दिलचस्त होते हैं, और जितने भी ऐसे आदमी होंगे उतना ही शीघ्र पृथ्वी स्वर्ग होगा. गतिरुद्ध और नीरस जिंदगी से हर इंसान ऊब जाता है.‘

जब ‘नाद्या’ पहली बार साशा से कहती है - ‘मैं शादी करने जा रही हूँ." साशा कहता है – ‘उससे क्या होगा, सभी शादी करते हैं, मेरी प्यारी. तुम्हारी बेकार सी जिंदगी घृणात्मक और अनैतिक है.  तुम देखती नहीं तुम्हारे लिए दूसरे लोग काम करते हैं और तुम दूसरों की जिंदगी नष्ट कर रही हो. क्या यह गंदा और घिनौना नहीं है.
नाद्या को लगता है वह यह सब पहले कहीं पढ़ चुकी है. वह अपने मंगेतर के बारे में सोचती है. अपनी शादी के बारे में सोचती है. वह अपनी माँ की नीरस शादी को देख रही है उसमें ऊब और चिड़चिड़ाहट के अलावा कुछ भी अनुभव नहीं करती. इस कहानी में नाद्या  की दादी और उसकी माँ नीना भी अहम किरदार है. तीन पीढ़ियों का अंतराल साफ़ दिखाई देता है. उसकी माँ के वाक्यों से इस कहानी को गहराई से समझा जा सकता है.
“मैंने अपनी जिंदगी तबाह कर ली, मैं जिंदगी चाहती हूँ, जिंदगी .... मैं अभी जवान हूँ. मैं जिंदगी चाहती हूँ. जीना चाहती हूँ” ‘नाद्या’  को तब समझ में आता है कि उसकी जिंदगी भी उसकी माँ की तरह बेरंग और बेकार होने वाली है. साशा से कहती है – “मैं इस तरह नहीं रह सकती, पता नहीं, पहले यहाँ कैसे रहती थी. बिलकुल समझ नहीं पाती. मैं अपने मंगेतर से नफ़रत करती हूँ. अपने आप से नफ़रत करती हूँ.... मैं इस पूरी काहिल और खोखली जिंदगी से नफ़रत करती हूँ. साशा कहता है – “तुम चली जाओ और पढो. कहीं भी चली जाओ. अपने आप रास्ता निकल आएगा. जैसे ही तुम अपनी जिंदगी बदल दोगी. उलट-पलट दोगी. हर चीज़ बदल जायेगी,’  और वह चली जाती है. बाहर की दुनिया में, ठीक उस दिन, जिस दिन उसकी शादी होंने वाली है. उसे अपनी जिंदगी का मकसद समझ में आ जाता है. उसे महसूस होता है कि अब तक कितनी अवांक्षित, बेमानी और बेकार थी उसकी ज़िन्दगी. 
चेखव 
जब वह वापस शहर लौटती है, तब देखती है कि वहां की नौकरानियों के रहने का एक ही ढंग है. तहखाने में गंदगी वैसे ही भरे हैं. उसे लगता है शहर बूढा हो रहा है या फिर से ताजगी और जवानी का इंतजार कर रहा है. काश पाक और नई जिंदगी आ जाए, तब हम सिर ऊँचा कर आगे बढ़ सकें, किस्मत की आँखों में आँखे डाल सकें. खुश रह सकें. ऐसी जिंदगी देर, सवेर आकर रहेगी, जरूर आयेगी.’ अचानक दादी का रोना सुनाई देता है. दादी के पास एक ‘तार’ पड़ा है जिसमें लिखा है – “साशा क्षय (टीबी) रोग से मर गया.”‘नाद्या’  अब समझ गयी थी, अच्छी तरह ... “जीवन में उलट-पलट का मतलब”  ... और वह चल पड़ती है. उसकी कल्पना में नई, वृहत और विशाल जिंदगी थी, हालाँकि यह जिंदगी अस्पष्ट और रहस्यमय थी, फिर भी उसे बुला रही थी, खीच रही थी...

‘नाद्या’  मात्र इस कहानी की नायिका नहीं है बल्कि समाज और उसके अंदर स्त्रियों को लेकर जो उदासीनता है. उसकी एक प्रतिनिधि है. स्त्री के  व्यक्तित्व और उसके तलाश की बात जब उठती है तो अक्सर लोगों को ऐसा लगता है कि वह मात्र प्रेम कर सकती है और एक प्रेमी से दूसरे प्रेमी बदल सकती है जबकि नाद्या अपने अस्तित्व की तलाश अपने अंदर करती हुई. बाहर की दुनिया में बेझिझक शामिल होती है.

दरअसल यह कहानी इस तरफ भी इशारा करती है कि लड़कियों को बचपन से ही मानसिक और मनोवैज्ञानिक रूप से इस तरह से तैयार किया जाता है कि शादी जिंदगी की सबसे बड़ी उपलब्धि है. जैसे लडकियाँ बनी ही हैं सिर्फ शादी करने के लिए... जिंदगी में इसके अलावा जैसे और कोई दूसरा काम नहीं, उद्देश्य नहीं, जैसे कि वह पैदा ही हुई है,  शादी करने के लिए.  इस तरह से उन्हें जिंदगी के यथार्थ और और बाहर की दुनिया से बिलकुल अनजान रखा जाता है, पूरी साजिश के तहत....


चेखव की महिला पात्रों के बारे में उनकी प्रेमिका ‘लीडिया एविलोव’ ने लिखा है कि कात्या (एक नीरस कहानी) ओल्गा इवानोवना (दुल्हन) या कुत्ते वाली महिला की विन्रम महिला पात्र चेखव की विश्वप्रसिद्ध स्त्री चरित्र है. यह प्रेम करती है, भावुक है और जिज्ञासापूर्ण खोज के माध्यम भविष्य के अन्तर में झांक कर कुछ पाना चाहती है. चेखव की ऐसी अनगिनत महिला पात्र पूरे विश्व में जिज्ञासापूर्ण खोज में शामिल हैं और यही वजह है कि आज की तारीख में पूरे विश्व में ‘नोरा’ और ‘नाद् या’ जैसी स्त्रियों की संख्या लगातार बढ़ रही है. कुछ की अपनी वजूद है तो कुछ अपनी वजूद की तलाश के लिए संघर्षरत हैं....जहाँ जीवन का मकसद खोखली शादी से इतर और भी बहुत कुछ है, ‘खोज जीवन है....जिंदगी को उलट–पलट कर देना जीवन है.’  बिना किसी डर के,  बिना किसी चिंता के... 

असीमा भट्ट से उनके ई मेल asimabhatt@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है .
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