विष्णु नागर की कवितायें

 ( विष्णु नागर के लिए  और उनकी कविताओं के लिए आलोचक विजय कुमार से बढिया नहीं कहा जा सकता : आप क्या हैं? कोई पीर , कोई दरवेश  , कोई साधु या पडोस में रहने वाला कोई अनासक्त योगी? या किसी दूसरी दुनिया से इस जन्म का स्वप्न देखता हुआ कोई अकिंचन जीवधारी ? आपको एक साथ पढना कठिन काम है , यह इतना जबरदस्त नुकीलापन आपके भीतर कहां से आता है? ............. ये साहित्यिक हाट में नहीं, जिंदगी की गहराइयों में समाने वाली कवितायें हैं.
आज पहला डा शिवकुमार मिश्र स्मृति सम्मान कविता के लिए विष्णु  नागर , आलोचना के लिए  वैभव सिंह  तथा कथा के लिए प्रकाश कांत को दिया जा रहा है. विष्णू नागर की 5 स्त्रीवादी कवितायें स्त्रीकाल के पाठ्कों के लिए .  )

1. किसी दिन उनकी स्त्री बन कर रहना

हां मुझे स्त्रियां अच्छी लगती हैं
उनकी सुन्दरता, उनका यौवन, उनका उत्साह ,उनका आग्रह
उनकी मुस्कुराहट , उनकी बातें , उनका संग –साथ 
 उनका पास से गुजर जाना, उनका स्पर्श पा जाना
उनका सपने में चला आना , उनकी यादों में खो जाना
उन्हें कनखियों से देखना , आड से छिप कर देखना
कभी उनके साथ चलना , कभी उनके पीछे-पीछे
उनके नेतृत्व में चलने में गौरव महसूस करना

कभी उनके साथ चाय पीना, कभी उनकी शिकायतें सुनना
उनके साथ गाना , उनके देर तक संगीत की तरह सुनते चले जाना
उनके क्रोध , उनकी निराशाओं में साझा करना
उनके मौन में , उनकी मुखरता में उनका साथ देना

उनकी बातों में छिपे अर्थ खोजने में
कभी –कभी बहुत दूर चले जाना, कभी जल्दी हार जाना
कभी उन्हें समझकर न समझना , कभी उनसे उलझना –लडना और हारना
कभी उनका पहल करना , कभी उनका भ्रम में रखना
कभी उनके साथ भावुक हो जाना , कभी रोने लग जाना
उनके लिए इंतजार करना , उनसे कभी इंतजार करवाना
उनके संघर्षों में साथ देना , उनके लिए जगह बनाने के लिए खडे हो जाना
उनकी आजादियों पर खुश होना ,
उनकी गुलामियों के खिलाफ खुलकर बोलना
उनके कन्धे पर हाथ रखना, उन्हें अपने में समेट लेना , उनमें सिमट जाना
और कभी –कभी उनके साथ खुद भी
स्त्री की तरह सोचने-देखने लग जाना
किसी दिन खुद भी उनकी स्त्री बनकर , उनके साथ रहना

2. विगत प्रेम

वह सुबह ऐसे उठता है जैसे अगर सूरज पर नहीं तो
अपनी पत्नी पर तो जरूर एहसान कर रहा है

वह चाय ऐसे मांगता है जैसे किसी से पुराना कर्ज मांग रहा हो
वह अखबार ऐसे पढता है जैसे जांघ खुजलाने के साथ
किया जानेवाला कोई अनिवार्य कर्म हो
वह फोन ऐसे करता है , जैसे इस दुनिया पर
आजकल उसी का राज चल रहा है
वह मुस्कियाता ऐसे है जैसे पाद अटक गया हो बीच में
वह रोटी ऐसे खाता है जैसे समय की बर्बादी हो रही है
मानवीयता के नाते ही वह इतना सब सह रहा है
लेकिन उसकी पत्नी को उसके इस वर्णन पर सख्त ऐतराज है
वह कहती है वह जैसा भी है, उसका सुहाग है .

3. तुम मेरे प्रेमी होते

तुम मेरे प्रेमी होते
तो तुम्हें सपने देखने की जरूरत ही नहीं पडती
तुम मेरे प्रेमी होते
तो तुम्हारे सामने रास्ते ही रास्ते
मंजिलें ही मंजिलें होतीं
हर मंजिल एक रास्ता होती
हर रास्ता एक मंजिल हो जाता
बल्कि तुम रास्तों और मंजिलों की भाषा भूल जाते
तुम दूरियों को मीलों मे नापना भूल जाते
तुम दूरियों को दूरियों की तरह देखना भूल जाते

तुम आग हो जाते
तो मैं पानी
तुम पानी हो जाते तो मैं आग

पानी और आग इतने एक हो जाते
कि लोग आग से पूछते कि पानी को कहां छोड आये
यही पानी के साथ भी होता
बल्कि लोग दोनों को एक ही समझते

लेकिन तुम मेरे पति होना चाहते थे
आग को पानी से बुझा देना चाहते थे
हवा को आग के करीब आने से रोक देना चाहते थे
तुम प्यार को मन्दिर और मस्जिद में बदल देना चाहते थे
मंत्र और नमाज में बदल देना चाहते थे
तुम मुझे खा –पीकर खर्च कर देना चाहते थे
और तुमने खो दिया
मगर मैंने अपने को अब फिर से पा लिया है.

4, वह समझती थी
मैं उसे धमकाता था
और वह समझती थी
यह भी प्यार करने का मेरा एक तरीका है

5. आलोचक
पत्नी से बडा कोई आलोचक नहीं होता
उसके आगे नामवर सिंह तो क्या
रामचन्द्र शुक्ल भी पानी भरते हैं
अब ये उनका सौभाग्य है
कि पत्नियों के ग्रंथ मौखिक होते हैं , कहीं छपते नहीं.



विष्णु नागर से उनके मोबाइल नम्बर 9810892198 पर सम्पर्क किया जा सकता है.
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