यौनिकता की विश्वसनीय दृश्यता: भाग 3


एल.जे. रूस्सुम/ अनुवाद डा अनुपमा गुप्ता

(एल .जे .रुस्सुम का यह आलेख स्त्रीकाल के प्रिंट एडिशन के लिए भेजा गया था , जिसे हम स्त्रीकाल के अनियतकालीन प्रकाशन और विशेषांकों के कारण प्रकाशित नहीं कर पाये थे . इस लम्बे आलेख को हम तीन किश्तों में प्रकाशित करेंगे . यह तीसरी किश्त है , पहली और दूसरी  किश्त के कुछ उद्धरण हम दे रहे है, ताकि पाठ्कों की निरंतरता बनी रहे. नीचे लिखे पहली किश्त ‌‌‌_अंश और दूसरी किश्त _अंश  पर  क्लिक करें , तो पीछे के दो भाग पढे जा सकते हैं. यह आलेख पश्चिमी इतिहास लेखन में व्याप्त पितृसत्तात्मक प्रवृत्तियों की पड्ताल करता है, जिसे भारतीय इतिहास लेखन के संदर्भ में भी पढा जाना चाहिए .  मूल आलेख का हिंदी अनुवाद स्त्रीकाल के संपादक मंडल की सदस्य डा अनुपमा गुप्ता ने किया है .  रुस्सुम फ्लोरिडा ,यू एस ए, के एक कालेज में दर्शन पढाते हैं और डा अनुपमा एम जी आई एम एस , वर्धा , में कार्यरत हैं   रुस्सुम से LRussum@polk.edu पर संपर्क किया जा सकता है)

पहली किश्त - अंश :
यदि कुछ पल के लिए मान भी लें कि इतिहास अतीत की पुनर्रचना का अभिलेख है, तो भी हमें इससे कोई
 लगाव महसूस नहीं होता, क्योंकि यह पश्चिमी अभिलेख दरअसल भौगोलिक रक्तस्नान के सिवा और कुछ नहीं है। इतिहास के नाम पर उपलब्ध ये रक्तस्नान- विवरण सत्य के अभिलेखन का प्रयास नहीं, बल्कि इस बात के चिह्न  हैं कि पश्चिम ने दुनिया की दूसरी ‘अमानुष’ संस्कृतियों पर विजय हासिल की है अथवा उनमें सेंध लगाई है। यह इस तरह प्रदर्शित किया जाता है ,जैसे यह रक्तपात है, पर फिर भी नहीं हैµयह तो भूमण्डल के शुद्धिकरण के लिए पश्चिम द्वारा मजबूरीवश उठाये ग्ये अतिवादी, लेकिन अतिआवश्यक कदम हैं।‘‘सतह पर दिखता नियतिवाद उन लोगों के लिए बढ़िया नकाब का काम करता है, जो अन्यथा इन हत्याओं, दासत्व और रक्तपात को लेकर चिंतित हो सकते थे।पिछले 350 वर्षों से यह अनवरत चल रहा है और इसके कम होने के कोई आसार नहीं दिखते। अंततोगत्वा इस दैवीय दलील ने एक ऐसे जनसमुदाय को जन्म दिया है, जिसके लिये हत्याएं और दासकरण स्वर्ग में पहुँचाने वाली सोने की सीढ़ी है।’’


दूसरी किश्त - अंश

पुरुष- इतिहास स्वयं को उस मूल संदर्भ की तरह लेता है, जिसे खुद से अलग रह गये भाग को अर्थ प्रदान करने की जिम्मेदारी निभानी है (जो भोगा हुआ नहीं, बल्कि रचा गया यथार्थ है)µतस्वीर में औरतें हैं, लेकिन उनकी लैंगिकता कहीं दिखाई नहीं देती। लिपिबद्ध भाषा में निहित वर्गभेद के जरिये अपना नियंत्रण बनाये रखना ही इस इतिहास को रचने की विधि है। अब विखंडन की अवधारणा दावा करती है कि इसकी भाषा का सहज झुकाव समानताओं की ओर अधिक रहा है, यानी सहमति की ‘आवाजों’ को ही ग्रहण करने की ओर। इसका अर्थ यह हुआ कि मुख्यधारा का पश्चिमी इतिहास ‘हाशिये’ पर नियंत्रण द्वारा कृत्रिम रूप में सत्यापित की गई समानता प्राप्त करने के बारे में है। यहां ‘समानता’ कभी ‘समता’ के द्वारा प्राप्त नहीं की गई, अर्थात् पितृसत्तात्मक इतिहास के लिए द्वैत का अर्थ कभी दो समान ढांचों से नहीं रहा, बल्कि पहले भाव को विशेष बनाने के लिए दूसरे भाव को बहिष्कार का दंड भोगना पड़ा हैµकेन्द्र को दृश्यमान बनाये रखने के लिए इतर को दुर्लक्षित करने का यही अर्थ है। इससे एक समतापूर्ण नहीं, बल्कि श्रेणीबद्ध संरचना बनती है, जिसमें दूसरे स्थान के भाव को वर्गीकरण में हमेशा नकारात्मक माना जाता है। विलोम शब्दों के इस प्रकार के युग्मों के उदाहरण हमें भाषा में और भी मिलेंगे जैसे वाणी/ लेखन, अवधारणा/ रूपक, आंतरिक /बाहरी, उपस्थिति/ अनुपस्थिति, प्रकाश/ अंधकार, अमीर/ गरीब, इतरलैंगिक/ समलैंगिक और पुरुष/ स्त्री। विलोमों के वर्गभेद में वाणी लेखन को बहिष्कृत कर देती है, प्रकाश अंधकार को और उसी तरह पुरुष स्त्री को। यह बहिष्कार इतिहास में ऐसी पितृसत्ता की रचना करता है, जिसमें युग्म के दोनों शब्द एक-दूसरे के खिलाफ खड़े होते हैं, क्योंकि यह व्यवस्था पहले शब्द के केन्द्र में स्थापित होने की मंशा पूरी करती है और इस दौरान दूसरे शब्द को हाशिये पर कथ्यहीन/ वाचाहीन/ अलैंगिक कोरी जमीन बना कर पृष्ठ के मुख्य भाग के बाहर कर दिया जाता है।

तीसरा और अंतिम किश्त ;

और इसके लिये ‘दुर्लक्ष्यता’ की अवधारणा की बजाय कु-लक्ष्यता (Dis -visiblity) की धारणा पर कार्य करना अधिक कारगर होगा ताकि इतिहास के कथानक में स्त्री यौनिकता की वैकल्पिक दृश्यता की पूर्ण निर्मिति हो सके। उपसर्ग कु-का अर्थ एक नितांत भिन्न विलोमीकरण से है। ‘दुः’ से भिन्न ‘कु’ दृश्यता  अर्थ को ही उलट देता हैµयह पुरुष- इतिहास को स्त्री- इतिहास में बदलने की क्षमता रखता हैµहाशियेकरण के प्रयास को पहचानते हुए, लेकिन अपने लेखन से इसे वैध न बनाते हुए और दैहिक लैंगिकता के स्थायी स्वरूप की तरह इसे स्वीकार न करके।और इस तरह शोषितों का यौनिकता पर लेखन उनके प्रतिरोध का प्रतीक बन जाता हैµये कुदर्शित देहें पश्चिमी इतिहास में दृश्यमान यौनिकता के संदर्भ को एकदम बदल देती हैं। यह एक प्रामाणिक लौकिक यौनिकता की अवधारणा इतिहास निर्माण की नींव को बदल सकती है; यह शोषित स्त्रियों की दैहिकता की नई स्त्रीवादी कहानियाँ रच सकती है। ‘कुदर्शिता’ शब्द का मतलब होगा (आत्मकथात्मक) जीवनियों के द्वारा शोषित यौनिकता को दृश्यमान कर देना, भुक्तभोगी द्वारा अपनी स्वयं की दृश्यता रचना।

मुख्य कथानक के प्रति इस कुदृश्यता से यह संभावना ही समाप्त हो जाएगी कि इतिहास निर्मिति के बाद हाशिये द्वारा कभी भविष्य में केन्द्र की सत्ता को चोट पहुँचाई जाए, बल्कि निर्माण के समय ही मुख्य कथानक में नवकथ्य का भी स्थान हो। यही वह जमीन है, जिसे कवि Alexis De Veaux ‘शोषित आवाजों की प्रतिभा’ करार देते हैं, जहां शोषित अर्थों को बदल देते हैं, जहां पश्चिमी इतिहास विस्थापित हो जाता है।2 अपनी इसी प्रतिभा से ये शोषित संस्कृतियां स्त्री -यौनता को नागरिक असहयोग अभियान की तरह लिख रही हैंµअ-सहयोग के द्वारा कथ्य में दृश्यता को जबरन डाल रही हैं। कुदर्शित बन कर ये शोषित एक इतर इतिहास को जन्म दे रहे हैंµऐसा अतीत, जो पुरुष- इतिहास के साथ ही मौजूदगी दर्ज कराता है और वह भी उसकी शर्तों पर नहीं। यहां कुदृश्य देह इस दृश्यता को संदिग्ध मान कर उसे न देखने को नीतिसंगत बनाने के पश्चिम के सारे प्रयासों को धता बना रही है। पश्चिमी कथानक इसे अपनी अवमानना मानता है।
मुख्य कथानक के साथ सह-अस्तित्व में उपस्थित यह इतिहास केन्द्र-परिध के शब्द युग्म से नहीं बंधा  है। ये ‘जहीन स्त्री  कथाएं’ एक भिन्न स्रोत  से जन्म लेती हैं, ये शोषित स्त्रिायों के यौनिक अतीत का ‘रचा गया’ नहीं, बल्कि ‘भोगा गया’ यथार्थ विकल्प प्रस्तुत करती हैं। ये कथाएं अलक्षित और दुर्लक्षित के भाव को बदल कर कुदर्शित के संदर्भ में ले आती हैं, जहां दृश्यता को ढीठ, अभद्र, भौतिक देहों की जरूरत होती है।
कुदृश्यता की इस जमीन पर शोषित स्त्री की यौनता हमेशा पहले से ही दृश्यमान है। यहां स्त्री  इतिहास की ‘तलछट’ ने यूरोपकेन्द्रित पुरुष- इतिहास की महान ‘कलाकृतियों को नामंजूर कर दिया है। पुरुष- इतिहास में पुंसत्व प्रधान कलाकृतियां दरअसल शोषण की पराकाष्ठाएं हैं, जिन्हें कप्तानों, प्रधानों, पोपों, पुरोहितों, अयातुल्लाओं, इमामों, पादरियों, संतों, उद्धारकों देवों, कारपोरेट पदाधिकारियों, स्वयंसेवी संस्थाओं, जनकल्याण प्रतिनिधियों, पिताओं, बेटों, चाचाओं, भाइयों, न्यायधीशों, वकीलों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, पुलिस अधिकारियों, राष्ट्राध्यक्षों, राष्ट्रपतियों, तानाशाहों, प्रधानमंत्रियों और सरकारों ने अपने छद्म कथानक को विखंडित होने से बचाने के लिये निर्मित किया है।
कुदृश्यता’ का एक और पहलू है, जो स्त्री  यौनता- लेखन के लिए इसे अधिक प्रासंगिक बनाता है। Dis (कु) उपसर्ग (Disablot) यानी मद्यपान और किस्सागोई की प्रथा की दैवीय सत्ता को इंगित करता है। साथ ही मतभेद या कलह की रोमनदीवी भी डिसकॉर्डिया है। नोर्स मिथकों में क्पेंइसवज की प्रथा वालकाइरी और बल पशु को चुनने के उनके अधिकार को दिये गये समान की ओर संकेत करती है। शोषित यौनिकता ने आपबीती वाली किस्सागोई के जरिये ताकत हासिल की है, मतभेद दिखाने की ताकत, यथास्थिति बरकरार रखने के पुरुषीय इतिहास के चलने को बाधित करने की ताकत, स्वयं की तबाही का ब्यौरा किस स्वरूप में लिखा जाए, इसे चुनने की ताकत। कुदृश्यता किस्सागोई के द्वारा मतभेद दिखाती है। यह कथाकारी की विभिन्न शैलियों को पश्चिमी इतिहास के अभिलिखित तथ्यों के विरुद्ध खड़ा कर देती है। वह इन तथ्यों की प्रकृति और मुख्य कथानक के ‘सत्यता’ के दावों पर सवाल खड़े करती है। यदि इतिहास ‘सभी’ तथ्यों का दस्तावेजीकरण है तो फिर क्यों स्त्रिायों के खिलाफ इतने अधिक दर्जन किये गये अत्याचारों की भरमार है? हमारे पास दर्ज ये ब्यौरे और पुरुषीय इतिहास की किताबों में दमनकारियों की तस्वीरें और आत्मकथ्य (कबूलनामे?) कब से हमारी आंखों में आंखें डालकर खड़े हैं और फिर भी सदियों से स्त्रिायों के खिलाफ गुनाहों के लिए किसी ने सजा नहीं पाई, क्योंकि इन शोषित स्त्रिायों को ही अनदेखा बना दिया गया, लेकिन यह अब और नहीं चल पायेगा, क्योंकि शोषित लैंगिकता की कुदृश्यता अब स्वतंत्रता की मुखर जीवनी लिख रही है।

सिद्धांतकार जब स्त्री यौनिकता की बात करते हैं, तब वे ‘कु’ यानी अर्थ को उलट देने के बारे में कह रहे होते हैं। यह टोनी मॉरिसन को पुनर्स्मृति की अवधारणा, यानी इतिहास ने जिसे भुला दिया, उसके बारे में लिखना, वे अत्याचार जिन्हें स्त्रिायां भुलाना चाहती हैं, पर भुला नहीं पातीं, उसके बारे में लिखना। पश्चिमी ‘सत्य’ की छवि पर, कुलीनता की मढ़ी हुई ‘पारदर्शिता’ पर यह जैसे किसी पिशाच की कुदृष्टि पड़ गई है। स्त्री  देह को असल में इन डरावने घावों, उसके भूगोल पर बिखरी पड़ी चोटों पर ध्यान दिये बिना देखा ही नहीं जा सकता। (McKittric, 2006, p. xv) । कुदृश्यता की यह भूतिया उपस्थिति उस व्यवस्था की झलक दिखाती है, जिसे कैथरिन मॅककिट्रिक ‘अपूर्वनिश्चितता की व्यथा’ कहती हैंµवह व्यवस्था, जो शब्दों के पूर्वनिश्चित अर्थों से भिन्न अर्थ खोलने की संभावना जगाती है। ये नये अर्थ पुरुष की कथित श्रेष्ठता को विस्थापित या उस पर हावी नहीं होते, लेकिन उसके अधीनस्थ बनकर भी नहीं रहते, बल्कि उसके विधान और उसके मानवपन के मुख्य कथानक के बिल्कुल समान्तर चलते हैं।’’ (McKittric, 2006, पृ.-ग्ग्)।
डैमॉन (Daimon) शब्द का ग्रीक भाषा में अर्थ होता है ‘उच्चतर चेतना’ सचेत, उत्तेजित, उत्प्रेरित अवस्था। लेटिन में इसका अर्थ कुछ बदल कर अपवित्र, अनर्थित, अपश्चिमी, अ-दीक्षित और ‘निर्वाण में अक्षम’ हो गया है, जो इस ‘डेमन’  शब्द की ‘संक्रमित जैसी इरावती छवि प्रस्तुत करता है। कुदृश्यता शब्द भी शब्द-प्रधान पश्चिम को शब्द से ही घेर कर मात दे देता है। स्त्री  यौनिकता की समर्पित, अत्यंत निर्मल, निराकार पश्चिमी छवि के मुंह पर उग्र, बर्बर दास/ दैत्य की पश्चिमी कल्पना को बिम्बित कर देता है। इसी डरावनी मौजूदगी को Heather Bidellterms ‘पैशाचिक मानवता’ कहती हैं, उग्र मांसल बोध, भुक्तभोगी तथा समुदाय/ इतिहास के बीच दैहिक संवाद की चेतना। यह चेतना अब ‘पुरुष’ शब्द की पश्चिमी व्याख्या में अंतर्निहित ‘इतर’ अथवा ‘अमानुसी’ नहीं रह गई है, यह उस दुरात्मा को मानवों में शामिल करने वाली चेतना हैµपश्चिम के ‘पुरुष’ सिद्धांत का स्त्री प्रति-सिद्धांत। यह ‘दुरात्मा मानव’ अब अपनी पैशाचिक प्रवृत्ति के प्रतीकों को इस दैहिक भूगोल के अंतःस्थल में सहज भाव से मौजूद मानवता के बिना दिखाने की अनुमति नहीं देता
कुदर्शित नव-स्त्री  कथाएं गुलाम देह की यौनिकता को पराया कर देने के खिलाफ नागरिक असहयोग है। यह लेखन पश्चिमी छद्म कथानक के विरुद्ध राजनीतिक प्रतिक्रिया की जमीन/ संदर्भ/ मुजाहिरा बन गया है। सिद्धांतकार इस नागरिक असहयोग की जमीन से पश्चिमी इतिहास के खिलाफ जंग की ‘अराजकता’ का निर्माण कर रहे हैं।
नव- स्त्री-  इतिहास के रूप में अराजकता

अराजकता सत्ताधारियों को डांवाडोल करती है. ! अधिकांश पश्चिमी नागरिक जानते/ न जातने हुए भी दरअसल बौद्धिक जागरण ( ज्ञानोदय  ) की उपज हैं। वे स्वयं को तार्किकता के वंशज मानते आये हैं. ज्ञानोदय की मुख्य अवधारणा यह है कि  यदि मानवता  तर्क से काम लेगी तो ही सुख शांति से जी सकेगी.  जैसे कि Gelderloos का कहना है, ‘‘आज की दुनिया में सरकारें और कारपोरेट निगम सत्ता पर करीब-करीब एकाधिकार रखते हैं, जिसका एक बड़ा पहलू हिंसा है।’’ अब इन संस्थाओं को सबसे अधिक डर उनके एकाधिकार के खिलाफ हिंसक नागरिक विद्रोह से होता है (Gelderloos ,2007, पृ.-22)। यह निरंकुश सत्ता आत्मसमर्पण तभी करेगी, जब नागरिक समूह परिवर्तन के अस्त्र बनेंगे। सिद्धांतकारों को हिंसा की अवधारणा पर अब पुनर्विचार की जरूरत हैµएक विद्रोही होने का मतलब असल में क्या है? हमें अपनी राजनीतिक चेतना द्वारा यौनिकता की रक्षा के लिए नागरिक असहयोग अभियान छेड़ना चाहिए। यह अराजकताएं हमें मुफ्त में नहीं मिलेगी, लेकिन यदि हम इसे नहीं अपनाएंगे, क्योंकि हमें सजा मिलने, आर्थिक नुकसान और वर्गभेद का शिकार बनने का डर है तो अंततः यह डर, हिंसा के इस रूप से बहुत महंगा पड़ेगा, जो हमें एक नागरिक के रूप में सच्ची आजादी दिलवा सकता है।

वे सिद्धांतकार, जो स्त्री यौनिकता - लेखन को अराजकता लाने के औजार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं और वे नागरिक, जो हिंसक अराजकता फैला रहे हैं, समान हिंसक हैं। हम चाहते हैं कि आक्रामक  यौनिकता का यह लेखन और भी हिंसक हो, इस आक्रामक यौनिकता को अब बहुत समय तक आलमारी में या पितृसत्ता के बिस्तर में छुपा कर नहीं रखा जा सकता. वह क्षण, जब स्त्री  नागरिक अपनी यौनिकता को राजनीतिक वकतव्य बना ले , इस आराजकता को चुन ले , तो वह उसके सार्वजनिक रूप से प्रकट होने का पल होगा.
यौनिकता के बारे में लिखना शून्य में झांकने का वह क्षण है , ठीक वही चीज चुन लेने का क्षण , जिससे सभी पश्चिमी राजनीतिक संस्थायें बचती रही हैं- अराजकता का क्षण . यह आराजकता , जो , यौनिकता –लेखन को उसका स्थान प्रदान करती है , उतनी ही हिंसक प्रक्रिया है , जितना की यथास्थिति को अस्त व्यस्त करने वाला कोई भी हिंसक व्यवहार होगा. यह उस राजनीतिक नेतृत्व तंत्र का अस्वीकार होगा , जो दैहिक द्मन के माध्यम से नागरिकों पर नियंत्रण करना चाहता है.

पश्चिमी इतिहास ही एक मात्र सच्चाई नहीं है .  पश्चिम की मुख्यधारा का ऐतिहासिक विवरण ही इतिहास का एकलौता पाठ्यांतर नहीं है. ‘ यदि एक समुदाय किसी एकलौते व्यक्ति या कुछ व्यक्तियों द्वारा शासित होता है , तो इसका साफ अर्थ है कि उसमें खुद को शासित करने का हुनर या सहस नहीं है,’ ( वाल्तेयर , 1994, पृ 195) . प्रत्येक दिन इस धरती पर कहीं कोई एक होना चाहिए , जो यौनिकता की अपनी नवकथा को राजनीतिक असहमति के रूप में लिख रहा हो.
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