हिन्दू पराक्रम का कैसे हो प्रतिकार


( भगाणा में दलित लडकियों पर बलात्कार के पीछे की हिन्दू और द्विज मानसिकता  और उसके प्रतिकार की पडताल में एच एल दुसाध का यह आलेख मह्त्वपूर्ण है. एच एल दुसाध हिन्दुस्तान में डायवर्सिटी के प्रवक्ता और संस्थापक विचारक हैं. )  

वैसे तो दलित-उत्पीड़न राष्ट्र के जीवन के दैनंदिन जीवन का अंग बन चुका है.फिर भी रह-रहकर
एच एल दुसाध 
ऐसी कुछ घटनाएँ हो जाती हैं कि इस समस्या 
पर नए सिरे से विचार करना लाजिमी हो जाता है.हाल के दिनों में अल्प अन्तराल के मध्य दो ऐसी घटनाएँ सामने आईं हैं.पहली घटना हरियाणा के हिसार जिले के भगाणा गाँव की है जहाँ 2012 में जाटों  द्वारा वहां के तमाम दलित परिवारों का बहिष्कार कर दिया गया था जो अब भी जारी है.बहिष्कार के विरोध में सौ के करीब अपेक्षाकृत चमार,खाती इत्यादि जैसी मजबूत दलित जातियों के लोग अपने परिवार और जानवरों सहित हिसार के मिनी सचिवालय में खुले छत के नीचे आश्रय ले लिए और आज भी वहीँ रह रहे हैं .किन्तु धानुक जैसी कमजोर दलित जाति के लोगों ने गाँव में ही टिके रहने का निर्णय लिया.इन्ही धानुक जातियों  की चार लड़कियों को भगाणा के दबंगों ने 23 मार्च को अगवा कर दो दिनों तक सामूहिक बलात्कार किया.आठवीं और नौवीं क्लास में पढनेवाली इन लड़कियों का सिर्फ इतना था कि वे पढना चाहती थीं और उनके अभिभावकों ने उन्हें इसकी इजाजत दे रखी थी.वहां की दलित महिलाओं को अपने हरम में शामिल मानने  की मानसिकता से पुष्ट जाटों को यह मंजूर नहीं था.लिहाज़ा उन्होंने इन लड़कियों को सजा देकर दलितों को उनकी औकात बता दी.

   इस ह्रदय विदारक घटना के बाद जब किसी तरह लडकियां उनके परिवार वालों को मिली ,वे उनकी मेडिकल जांच  के लिए जिला अस्पताल पहुंचे जहाँ डाक्टरों ने जांच में अनावश्यक बिलम्ब कर घोर असंवेदनशीलता का परिचय दिया.उधर पुलिस वालों ने नाम के वास्ते एफ़आईआर  तो दर्ज कर ली किन्तु दोषियों का नाम दर्ज नहीं किया.स्थानीय प्रशासन से हताश निराश पीड़ित परिवार दो सप्ताह पहले दिल्ली पहुंचकर जंतर-मंतर पर  बैठकर इंसाफ की गुहार लगाने लगा.इनकी मांग है कि छुट्टा घूम रहे बलात्कारियों की  अबिलम्ब गिरफ्तारी हो;फास्ट ट्रैक कोर्ट गठित कर छः महीने के अन्दर मामले की सुनवाई हो तथा बलात्कार पीड़ितों एवं गाँव के समस्त बहिष्कृत परिवारों को गुडगाँव या फरीदाबाद में चार-चार सौ गज का आवासीय भूखंड और एक-एक करोड़ रूपये मुआवजे के तौर पर दिए जांय.इसके साथ ही उनकी उनकी मांग है कि पीड़ित लड़कियों के लिए शिक्षा की बेहतर व्यवस्था हो तथा शिक्षा पूरी करने के बाद उन्हें सरकारी नौकरी दी जाय.

     देखते ही देखते भगाणा बलात्कार कांड के पीड़ितों इंसाफ दिलाने की मुहिम में दिल्ली के ढेरों छात्र-शिक्षक,लेखक-एक्टिविस्ट जुड़ गए.किन्तु मीडिया की उदासीनता के कारण उसका असर 2012 के 16 दिसंबर को घटित निर्भया कांड जैसा नहीं हुआ.तब निर्भया को इन्साफ दिलानेवालों के सुर में सुर मिलाते हुए मीडिया ने घटना को इतना हाईलाईट किया कि रायसीना हिल्स से लेकर राजघाट,कोलकाता से कोयम्बटूर,कश्मीर से चेन्नई तक के लोग उस मुहिम  में शामिल हो गए.उसके फलस्वरूप महिलाओं के खिलाफ यौन अपराध की रोकथाम के लिए जहाँ कानून में कई संशोधन हुए बही ‘निर्भया’ के नाम पर महिलाओं की सुरक्षा के लिए बजट में हजार करोड़ का प्रावधान भी हुआ.किन्तु मीडिया को भगाणा की घटना पर ज्यादा जोर इसलिए देना चाहिए था क्योंकि यह ‘निर्भया कांड’ से ज्यादा गुरुतर मामला है.निर्भया काण्ड के पीछे जहां मुख्य रूप से ‘यौन –कुंठा’ की क्रियाशीलता रही,वहीँ  भगाणा कांड के पीछे यौन कुंठा के साथ एक उभरते समाज के मनोबल को तोड़ने तथा अपने  प्रभुत्व को नए सिरे से स्थापित करने का मनोवैज्ञानिक सुख लूटने का सुचिंतित प्लान था.ऐसी ही घटनाओं के कारण 21वीं सदी में भी अन्तरराष्ट्रीय जगत में भारत की छवि बर्बर व असभ्य राष्ट्र के रूप में पुख्ता  होती है.

   राष्ट्रीय राजधानी के छात्र-शिक्षक,बुद्धिजीवी इत्यादि भगाणा पीड़ितों को न्याय दिलाने की चिंता में व्यस्त थे कि दिल्ली बॉर्डर पर नोएडा के कनावनी गाँव में 29 अप्रैल को एक और बड़ी बारदात हो गयी.वहां दबंगों ने दलितों की बस्ती में जमकर उत्पात मचाया और उनके घरों को तहस-नहस कर दिया.साथ ही गाँव के स्कूल और ऑफिसों को भी जेसीबी  से ढहा दिया.इतना ही नहीं दबंगों ने कई राउंड फायरिंग भी किया जिसमें  एक युवक की मौत हो गयी.छावनी में तब्दील उस गाँव में पुलिस की उपस्थिति के बावजूद दलित प्राण-भय से   पलायन कर गए हैं.



     बहरहाल जब-जब भगाणा या कनावनी जैसे कांड होते हैं तो दलितों के साथ-साथ राष्ट्रप्रेम व मानवाताबोध संपन्न हिन्दुओं के खेमे में भी चिंता की लहर दौड़ जाती है.वे सभा संगोष्ठियाँ आयोजित एवं घटनास्थल का मुयायना कर असहिष्णु हिन्दुओं के बर्बरोचित कार्य की निंदा करने एवं उनके विवेक को झकझोरने का अभियान चलाते हैं.लेकिन नतीजा शिफर निकलता है.एक अन्तराल के बाद परवर्तित स्थान पर उनकी दलित-विरोधी भावना का पुनः प्रकटीकरण हो ही जाता है.हिन्दू विवेक को झकझोरने का अभियान इसलिए निष्प्रभावी होते रहता है क्योंकि दलितों की मानवीय सत्ता हिन्दू धर्म-शास्त्रों द्वारा अस्वीकृत है.इसलिये शास्त्रों द्वारा मानवेतर रूप में चिन्हित किया गया मानव समुदाय जब आम लोगों की भांति अपने मानवीय अधिकारों के प्रदर्शन की हिमाकत करता है,धर्मनिष्ठ हिन्दू उन्हें उनकी औकात बताने के लिए कुम्हेर,चकवाडा ,एकलेरा ,नवलपुर,पिन्ट्री  देशमुख,सीखरा ,बेलछी,पिपरा,भगाणा,कनावनी जैसे कांड अंजाम दे देते हैं.दलित-उत्पीडन में हिन्दू धर्म की क्रियाशीलता को देखते हुए डॉ.आंबेडकर को कहना पड़ा था-‘हिन्दू जातिभेद इसलिए नहीं मानते कि वस्तुतः वे क्रूर हैं या उनके मस्तिष्क में कुछ विकार है.वे जाति-भेद इसलिए मानते हैं कि उनका धर्म जो प्राणों से भी प्यारा है ,उन्हें जाति-भेद मानने के लिए विवश करता है.अतः कसूर उन धर्मशास्त्रों का है ,जिन्होंने उनकी ऐसी मनोवृति कर दी है.’लेकिन हिन्दुओं के शास्त्र ही जब दलित उत्पीड़न  के लिए प्रधान रूप से जिम्मेवार तब तो यह क्रम अनंतकाल तक चलता रहेगा ,क्योंकि तमाम कमियों के बावजूद ऐसा नहीं लगता कि हिन्दू आगामी कुछ सौ वर्षो में अपने धर्म-शास्त्रों के प्रति पूरी तरह अनास्थाशील हो जाएँगे.ऐसे में दलित-उत्पीड़न का प्रतिकार कैसे हो?
    जहां तक प्रतिकार का प्रश्न है ,डॉ.आंबेडकर ने वर्षों पहले उसका मार्गदर्शन कर दिया था.उन्होंने बताया था-‘ये अत्याचार एक समाज पर दूसरे समर्थ समाज द्वारा हो रहे अन्याय और अत्याचार का प्रश्न हैं.एक मनुष्य पर हो रहे अन्याय या अत्याचार का प्रश्न नहीं है,बल्कि एक वर्ग द्वारा दूसरे वर्ग पर जबरदस्ती से किये जा रहे आक्रमण और जुल्म,शोषण तथा उत्पीडन का प्रश्न है’.किस तरह से इस वर्ग कलह से अपना बचाव किया जा सकता है,उसका एकमेव उपाय उन्होंने दलित वर्ग को अपने हाथ में सामर्थ्य और शक्ति इकठ्ठा करना बताया था.वास्तव में डॉ.आंबेडकर ने दलितों को अपने अत्याचारी वर्ग से निजात दिलाने का जो नुस्खा बाताया था वह सार्वदेशिक है.सारी दुनिया में ही जो अशक्त रहे उनपर ही सशक्त वर्ग का अत्याचार व उत्पीड़न  होता रहा.सर्वत्र ही ऐसे लोगों को सशक्त बनाकर सबल वर्गों के शोषण-उत्पीड़न से निजात दिलाई गयी.अतः दलितों को भी हिन्दुओं के बर्बर अत्याचार से निजात दिलाने के लिए उनकी सशक्तीकरण पर जोर देना होगा.अब जहाँ तक दलितों के सशक्तिकरण का सवाल है आजाद भारत में तमाम सरकारें ही इस काम में लगे रहने का दावा करती रही हैं.पर बात इसलिए नहीं बनी की देश के योजनाकारों ने दलित अशक्तिकरण की पहचान का बुनियादी काम ही नहीं किया.

     सारी दुनिया में ही सभ्यता के हर काल में धरती की छाती पर अशक्त समुदायों का वजूद रहा और ऐसा इसलिए हुआ कि जिनके हाथ में सत्ता की बागडोर रही उन्होंने जाति,नस्ल,धर्म इत्यादि के आधार बंटे विभिन्न सामाजिक समूहों और उनकी महिलाओं के मध्य शक्ति के स्रोतों-आर्थिक,राजनीतिक और धार्मिक- का असमान बंटवारा कराकर ही अशक्त समूहों को जन्म दिया.परिष्कृत भाषा में शक्ति के स्रोतों में सामाजिक  और लैंगिक विविधता का असमान प्रतिबिम्बन कराकर ही अशक्त सामाजिक समूहों को जन्म  दिया.जो समूह शक्ति के स्रोतों पर जितना कब्ज़ा जमा सका वह उतना ही सशक्त और जो जितना ही इससे वंचित रहा वह उतना ही अशक्त.सारी दुनिया में अश्वेतों ,महिलाओं व अन्य अल्पसंख्यक अशक्त समूहों की समस्या पर ध्यान दे तो पाएंगे कि उनको शक्ति के स्रोतों से दूर रखकर ही अशक्त बनाया गया.सारी दुनिया की पराधीन कौमों के साथ यही समस्या रही कि विजेताओं ने उन्हें शक्ति स्रोतों से वंचित कर उन्हें कष्ट में डाला.यदि सारी दुनिया के विजेता गुलाम बनाए गए  लोगों को शक्ति के स्रोतों में वाजिब शेयर दिए होते, दुनिया में कही भी स्वतंत्रता संग्राम ही सगठित नहीं होता.अमेरिका का स्वाधीनता संग्राम,फ़्रांस की राज क्रांति;गांधी,मार्टिन लूथर किंग(जू.)मंडेला का संघर्ष और कुछ शक्ति के स्रोतों के असमान बंटवारे के विरुद्ध रहा.शक्ति के स्रोतों में सभी तबकों को न्यायोचित हिस्सेदारी दिलाने के लिए ही ब्रितानी अवाम  ने 500 सालों के सुदीर्घ संग्राम के बाद संसदीय प्रणाली की ईमारत खड़ी की.सदियों से सार्री दुनिया में सामाजिक परिवर्तन की लड़ाई और कुछ नहीं शक्ति के स्रोतों में अशक्त लोगों को हिस्सेदारी दिलाने की लड़ाई मात्र है.

     जिन मानव समुदायों को शक्ति के स्रोतों से वंचित कर अशक्त मानव समुदाय में तब्दील किया गया उनमें किसी की भी स्थिति दलितों जैसी नहीं रही.मानव जाति के सम्पूर्ण इतिहास में किसी भी कौम को शक्ति के तीनों प्रमुख स्रोतों-आर्थिक,राजनीतिक और धार्मिक-से पूरी तरह वंचित नहीं किया गया.मार्क्स के सर्वहाराओं सहित दुनिया के अधिकांश वंचित  कौमों को आर्थिक गतिविधियों से वंचित कर अशक्त बनाया गया पर राजनीतिक और विशेषकर धार्मिक क्रियाकलाप तो उनके लिए पूरी तरह मुक्त रहे.अमेरिका के नीग्रो स्लेवरी में जिन कालों का दलितों की भांति ही पशुवत इस्तेमाल हुआ,उनके लिए पूजा-पाठ अब्राहम लिंकन के उदय पूर्व भी कभी निषिद्ध नहीं रहा.यही कारण है जिस मार्टिन लूथर किंग (जू.)के मूवमेंट ने अश्वेतों की तकदीर बदल दी वे बड़े धर्माधिकारी थे जिससे उनकी आवाज़ बड़ी आसानी से लोगों तक पहुँच गयी.आर्थिक और राजनीति के क्षेत्र से हजारों साल से बहिष्कृत भारत के दलितों के लिए मार्टिन लिथर की भांति धर्माधिकारी बनना तो दूर देवालयों में पहुँच कर सर्वशक्तिमान ईश्वर के सामने अपने कष्टों के निवारण के लिए प्रार्थना करने तक का कोई अवसर नहीं रहा.धार्मिक शक्ति के केंद्र से दलितों का बहिष्कार ही उन्हें अस्पृश्यता की खाई में धकेलने के लिए मुख्य रूप से जिम्मेवार है.हिन्दुओं ने देख लिया कि जब दलित परमपिता परमेश्वर के घर से ही बहिष्कृत हैं तो हम उन्हें अपने करीब क्यों आने दें.


                मध्ययुग संतों और भारतीय रेनेसां के असंख्य महानायकों सहित ढेरों अन्य आधुनिक चिंतकों ने दलितों की समस्या पर मगजपच्ची की पर आंबेडकर की भांति कोई भी उनके अशक्तिकरण के कारणों को सम्पूर्णता में नहीं समझ पाया.इसलिए वे मानवेतरों को शक्ति के स्रोतों में मुक्कमल हिस्सेदारी दिलाने की लड़ाई नहीं लड़ सके.गुलाम भारत में जहां तमाम स्वतंत्रता संग्रामी अंग्रेजों के कब्जे में पड़ी आर्थिक और राजनीतिक शक्ति हिन्दुओं के लिए छीनने में व्यस्त थे वहीँ आंबेडकर बड़ी मुश्किल हालात में मानव जाति के सबसे अशक्त समूहों को शक्ति से लैस करने व्यस्त थे.उनके प्रयासों से  सदियों से बंद पड़े शक्ति के कुछ स्रोत दलितों के लिए मुक्त हुए,पर सारे नहीं.स्मरण रहे डॉ.आंबेडकर अपने ज़माने में भारत के सबसे असहयाय स्टेट्समैन रहे.यदि वे असहाय नहीं होते,शक्ति के सभी स्रोतों में दलितों की हिस्सेदारी सुनिश्चित कर देते.लेकिन आजाद भारत में उनके बड़े से बड़े अनुसरणकारी क्या दलितों की समस्या समझ पाए?मुझे लगता है नहीं.यदि वे दलितों की समस्या समझे होते तो शक्ति के शेष स्रोतों में उनको हिस्सेदारी दिलाने का प्रयास करते.पर आजाद भारत में तो शक्ति के सभी स्रोतों की बजाय टुकड़ों-टुकड़ों में हिस्सेदारी की लड़ाई लड़ी जा रही है.कोई निजी क्षेत्र में आरक्षण की लड़ाई लड़ रहा है तो प्रमोशन में आरक्षण की लड़ाई में अपनी उर्जा खपा रहा है.यही कारण है दलित शक्ति के स्रोतों में मुक्कमल हिस्सेदारी से वंचित हैं.परिणामस्वरूप वे भगाणा और कनावनी में हिन्दू पराक्रम के सामने असहाय व लाचार नजर आ रहे हैं.बहरहाल  दलित ही नहीं पिछड़े,अल्पसंख्यक और महिलाओं  के शक्ति समस्त स्रोतों में वाजिब शेयर दिलाने के लिए डाइवर्सिटी से बेहतर कोई विचार तो शायद भारत भूमि पर आया नहीं.किन्तु अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है कि डाइवर्सिटी जैसे अचूक हथियार का इस्तेमाल करने में दलित समाज  अभी भी खुलकर सामने नहीं आ रहा है.  
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