पत्रों में झांकता बच्चन का व्यक्तित्व

रविता कुमारी
हिंदी विभाग, गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय हरिद्वार, उत्तराखण्ड ईमेल: ravita_kumari@yahoo.in

व्यक्ति का अन्तर्बाह्य समायोजन ही व्यक्तित्व की परिभाषा है। जो प्रत्येक व्यक्ति को उसके विशेष गुणों, रूचियों, कार्यों के आधार पर दूसरों से अलग करता है। डाॅ के. जी. कदम के अनुसार-“व्यक्तित्व का विभाजन-अन्तर्वर्ती पक्षों में इसलिए नही किया जा सकता है कि दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। व्यक्तित्व के बाह्य और आन्तरिक पक्ष की मन पर जो छाप समग्र रूप में पड़ती है, वह प्रायः अविभाज्य होती है। अतः किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व को उसके गुणों और महान कार्यों के आधार पर परखा जा सकता है।“1बच्चन का व्यक्तित्व बहुमुखी और विशाल है। बच्चन के व्यक्तित्व को उनके पत्रों के आधार पर आसानी से समझा जा सकता है, क्योंकि लेखक के पत्र उसके व्यक्तित्व का प्रतिबिम्ब होते है। उनके व्यक्तित्व में भावना और कर्म, स्वाभिमान और सेवा, विन्रमता और ओजस्विता, व्यक्ति और समाज, मानव और मांगल्य, प्राचीन और नवीन, जीवन और जगत की अनेकानेक भाव-धाराओं और चिन्तन प्रक्रियाओं का सुन्दर सामंजस्य दिखाई देता है। मानवीय भावभूमि और संवेदना की दृष्टि से उनका व्यक्तित्व राष्ट्रीय होकर भी अन्तर्राष्ट्रीय है। उनका व्यक्तित्व निर्मल, सारगर्भित और सामंजस्यवादी व्यक्तित्व है। जिसे उनके जीवन के प्रत्येक क्षेत्र साथ उनके काव्य और गद्य में भी देखा जा सकता है।

 बच्चन ने डायरी साहित्य, पत्र-लेखन और आत्मकथा के माध्यम से जीवन जगत और साहित्य के बारे में जो टिप्पणियां की हैैं। उनमें साहित्य के प्रतिमान, जीवन का भाव बोध और समाज की मर्यादा निरूपित हुई है। साथ ही उनकी डायरी और आत्मकथाओं में व्यापक जीवन-दर्शन, जीवन सौन्दर्य की अभिव्यक्ति, सामाजिक जीवन मूल्यों की प्रतिष्ठा तथा मानवतावादी दृष्टिकोण भी अभिव्यंजित हुआ है। जिस प्रकार कहानी, उपन्यास, निबन्ध, संस्मरण, गद्यगीत आदि लिखना एक कला है, उसी प्रकार पत्र-लेखन भी एक कला है। लेखक का हृदय जितनी स्वाभाविकता के साथ उसके पत्रों में व्यक्त हो सकता है। उतनी स्वाभाविकता से अन्य किसी विधा में नहीं। बच्चन का कथन है-“किसी हालत में पत्र वह दर्पण तो है ही जिसमें किसी लेखक का सच्चा प्रतिबिम्ब देखा जा सकता है।“2 सत्यतः निजी पत्रों में व्यक्ति अपनी बातें दिल खोलकर लिखता है और इस कारण किसी लेखक या कवि के चरित्र-चित्रण के लिए उसके पत्र अत्यन्त सहायक सिद्ध होते हैं। इस दृष्टि से बच्चन के पत्रों को पढ़ने पर उनमें बच्चन का व्यक्तित्व अपने सहज-प्रकृत-रूप में प्रकट हो गया है।

जीवन में आयी मुसीबतों, कठिनाईयों से परेशान होकरकिसी के सहारे की अपेक्षा करना मनुष्य की यह स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है। इस कारण वह अपने कार्य को कराने के लिए दूसरों का सहारा ढूंढने और इधर उधर हाथ मारने लगता है। किन्तु बच्चन ऐसा करना स्वयं को धोखा देना मानते है। वे बचपन से ही बड़े स्वालंबी रहें हैं।स्वालंबन उनके व्यक्तित्व का मूलकेन्द्र है। प्रफुल्ल ओझा ‘मुक्त‘ को 12.09.1939 के पत्र में उन्होंने माना है कि-“जीवन में जो काम अपने केवल अपने बल पर किया जाता है, वही सबसे अधिक सफल होता है।“3निराला की तरह ही बच्चन भी निर्भीकता के साथ जैसा अनुभव करते है, वैसा अपने पत्रों, आत्मकथाओं, डायरी, संस्मरण, कहानी सहित सम्पूर्ण साहित्य में व्यक्त कर देते हैैं। उन पर वासनावादी होने का आरोप लगाया गया तो वे बड़ी निर्भीकता के साथ मनोवैज्ञानिक रूप को स्वीकार कर लेते हैं-“कल छिड़ी, होगी खत्म कल/प्रेम की मेरी कहानी/कौन हूं मैं जो रहेगी/विश्व में मेरी निशानी/क्या किया मैंने नहीं जो/कर चुका संसार अब तक?“4 बच्चन का व्यक्तित्व जीवन की समग्र एवं संपूर्ण चेतनाओं, मानसिक क्षमताओं और व्यवहारों का संकलन है। डाॅ जीवन प्रकाश जोशी उनके विषय में ठीक ही लिखते हैं-“जग-जीवन से जूझने वाला और सैल्फमेड व्यक्तित्व कभी साधारण नही हुआ करता। उसमें एक सहज अक्खड़ता आ ही जाती है जो आलोचना की चीज नही घटाने की चीज है।“5


बच्चन का जीवन सदैव संघर्षमय रहा किन्तु जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियों में, आशा-निराशा के मध्य झूलते हुए भी उन्होंने रचनात्मक दिशा की ओर कार्य किया, क्योंकि इनका विश्वास है कि-“प्रतिकूल परिस्थितियों में काम कर लेना कोई साधारण क्षमता नही इस पर गर्व करना चाहिए।“6बच्चन जिस प्रकार सेे आजीवन आर्थिक आभावों से जूझते रहे, उस प्रकार ही वे अपने विकास के लिए भी निरन्तर संघर्षरत रहें हैं।विश्वनाथ प्रसाद बटुक को 10.01.1939 को प्रेषित पत्र में वे जीवन में आये संघर्षों से भागना नही बल्कि उनका डटकर सामना करने के लिए प्रेरित करते हुए कहते हैं-“जीवन संघर्ष की जगह है। उसमें दृढ़ता से लगे रहना चाहिए। इस संघर्ष में अपने को भूल सको तो वही सुख है। सफलता नाम की किसी वस्तु से मेरा भी परिचय नही।“7बच्चन ने आत्म प्रवचनापूर्ण अनुभवों को अपने साहित्य में स्थान दिया है। उनका व्यक्तित्व सरल और सहज है। वे जीवन जगत के बाह्य आड़म्बरों से दूर रहना चाहते हैं। उनके जीवन में भी सामाजिक संघर्षों का योग है और विसंगतियों का भी, किन्तु उन्होंने सामाजिकता को भी इतने सहज और नरम आवरण के रूप में ओढ़ा है कि उनकी भीतर की अनुभूति पर दाग नही लगा। बच्चन मित्रों में रहते हैं। मित्रों के बीच में सुख और दुखों के क्षणों का भी बंटवारा करते हैं, किन्तु वे मित्रों की जिन्दगी और जीवन में दखलअंदाजी नही करते। यादवेन्द्र सिंह को लिखे 06.03.1936 का पत्र इस तथ्य का द्योतक है कि बच्चन यादवेन्द्र की प्रेयसी के समक्ष तटस्थ भाव से अपने को प्रस्तुत करते हंै। यही उनकी जीवन मर्यादा है और यही उनकी नैतिकता भी है। जब यादवेन्द्र सिंह बच्चन को ऊषा जी के पास भेजते हैं, तब बच्चन का तटस्थ भाव इन पंक्तियों में प्रस्फुटित होता है-“खर्चीली आदत तो उनकी जरूर है। मैं ही जब सोचता हूं तो मेरा ख्याल है, मेरी खातिर में एक दो रूपये तो उठ जाते होंगे मिठाई, नमकीन, फल और क्या-क्या लाकर सामने रख देती है। मैं कितनी बार समझा चुका हूं कि मेरे साथ इस थ्वतउंसपजल की क्या जरूरत, पर वह नही मानती खाना किसे बुरा लगता है?“8
     
बच्चन बड़े स्वाभिमानी प्रकृति के व्यक्ति थे। उन्हें साहित्य सेवा के लिए सम्मान भी मिला है, परन्तु वे कभी भी सम्मान के पीछे नही चले। वे प्रचार-प्रसिद्धि से दूर भागते थे। इसीलिए वे ऐसी चाजें लिखना पसंद नही करते, जिनमें उनकी विज्ञापनबाजी का बोध हो वे ऐसे विषय पर लिखना चाहते थे, जो जनता के कण्ठहार और मानवता के भूषण हो। उनका स्वाभिमान इन पंक्तियों में मुखर हो उठा है-“दे मन का उपहार सभी को/ले चल मन का भार अकेले।“9बच्चन का जीवन के प्रति दृष्टिकोण बड़ा स्वस्थ रहा है। वे जीवन और जगत से बड़ी-बड़ी अपेक्षाएं लेकर नही चले, स्वाभिमान, कर्मठता और आत्मविश्वास का सम्बल लेकर चले। इसीलिए प्रतिकूल परिस्थितियों के थपेड़ों से वे हतोत्साहित नही हुए, उनके पुरूषार्थ ने हार नही मानी, आत्मश्रद्धा डगमगाई नही। क्योंकि उनका मानना है कि जीवन में चाहे कितनी भी कठिन परिस्थितियां क्यों न हो प्रत्येक कार्य को निष्ठा और लगन के साथ करते रहना चाहिए। डाॅ जीवन प्रकाश जोशी को लिखे एक पत्र में वे इसी का उल्लेख करते हुए लिखते हैं-“जिस काम के लिए लगन हो वह हर प्ररिस्थितियों में किया जा सकता है। परिस्थितियां हम कहां बदल पाएंगें, अपने को ही बदलना पड़ेगा।“10बच्चन एक भावुक व्यक्ति थे, अतः संवेदनशीलता व सहृदयता उनके व्यक्तित्व का अनिवार्य अंग है। उन्होंने अपने पत्रों में संवेदना के प्रकाशन हेतु व्यापक जीवन दर्शन रेखांकित किया है। संवेदना केवल निराशा में ही नही होती या जीवन सदा एक आंसुओं की धार बना रहे, तभी संवेदना जगे, ऐसा नही है। उनकी अनुभूति संवेदना के गहरे अतल-तल को खोज निकालती है। वे किसी की भी पीड़ा से द्रवित हो उसे उस पीड़ा से उबारने का प्रयास करते हैं। इसी भावना के वशीभूत वे डाॅ जीवन प्रकाश जोशी को 13.09.1953 के पत्र में लिखते हैं-“जब तुमने अपनी चिंता का भागीदार मुझे बना लिया है तो मुझे भी कुछ प्रयत्न करने दो। जब तक तुम्हारी चिंताएं दूर न होगी मैं निश्चिन्त नही बैठा हूं।“11


बच्चन के मन की निष्कपटता सराहनीय है। जिस प्रकार लोग कृत्रिम आवरण ओढ़कर दिखाऊ व्यवहार का प्रदर्शन करते हैं। व्यवहार की यही दिखाऊ शिष्टता न होने के कारण वे सामान्य लोगों में प्रिय नही है। यही बात उनके पत्रों में बड़े ही स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। बच्चन मन के बड़े निश्चल और निष्कपट वाले व्यक्ति हैं। उनका व्यक्तित्व अंतरंग की शिष्टता और आचरण की सभ्यता से पूर्ण है। उनमें एक तरह का परिष्कार है जो अन्यत्र मुश्किल से देखने को मिलता है। जो बड़ा साहित्यकार होता है वह बड़ा मनुष्य भी होता है-इसके साकार उदाहरण जीवन पर्यन्त रहें बच्चन। जो मन में वही जुबान पर, कोई मुखौटा नही, कोई आवरण नही। छोटे बड़े का भेदभाव नही। यदि कभी कोई कोंच भी दी तो मुस्कान के साथ यह बता दिया कि इसी से बात में धार और रोचकता आती है। विरोध उसे जीवंत बनाता है।इन्दु जैन को लिखे 28.01.1978 के पत्र में वे सरल उन्मुक्त और निश्छल हृदयगामी होने का परिचय मिलता है-“मुझे मालूम है कि तुम ‘बसेरे से दूर‘ को आलोचना की दृष्टि से पढ़ोगी क्योंकि शायद कभी तुम्हें मुझसे टी0 वी0 पर कुछ टेढ़े-मेढ़े सवाल पूछने पड़े, तुम मुझे नर्वस करना चाहोगी! मैं जानता हूं तुम्हें।“12 सामान्यतः भावुक एवं संवेदनशील व्यक्ति जीवन में अपेक्षित व्यावहारिकता के निर्वाह में अक्षम रहते हैं, किन्तु बच्चन की संवेदनशीलता उनकी व्यावहारिकता की सीख देते हुए वे उदभ्रान्त को 30.07.1965 के पत्र में लिखते हैं-“‘राष्ट्रधर्म‘ में प्रकाशित मेरे संदेश पर आपने जो उदगार प्रकट किये हैं, उसके लिए आभारी हूं। मैं भावुकता के विरूध नही, लेकिन अब व्यावहारिकता पर अधिक जोर देना चाहता हूं।“13
       
बच्चन के पत्रों से ज्ञात होता है कि उनके व्यक्तित्व में अदभुत गतिशीलता है। वे सागर में जितने गहरे डूब जाना जितनी अच्छी तरह से जानते हैं, उतना ही ऊपर उठकर लहरों पर तैरना भी। यह विशेषता यदि उनमें न होती तो जीवन में आये संघर्षों के बवंड़रों से हारकर वे जीवन के किसी भी मोड़ पर पीछे रह जाते।बच्चन के व्यक्तित्व में गतिशीलता के साथ-साथ दृढ़ता भी मौजूद है। वे किसी एक सूत्र में बंधकर नही रहें। उनमें गजब की सृजन शक्ति थी। बच्चन परम आस्तिकतावादी भी है। परम आस्तिक और आस्थावान उनका चेहरा पत्रों के आइने से झांक रहा है। ईश्वर की सत्ता में मनुष्य का अविश्वास जब नास्तिकता की चरम सीमा तक पहुंच जाता है कि उसकी नास्तिकता ईश्वर के प्रति आस्था में बदल जाती है। बच्चन श्रीराम के साथ-साथ हनुमान जी के भी उपासक एवं परम भक्त हैं। हनुमान के विषय में उनका मत है-“वे इच्छाशक्ति के देवता हैं, जो संकल्प कर लेते हैं, उसे पूरा करके ही छोड़ते हैं। तुलसीदास ने उनके लिए ‘विनय-पत्रिका‘ में ‘हठीले‘ शब्द का प्रयोग किया है-‘ऐसी न कीजिए हनुमान हठीले‘“14बच्चन एक कृतज्ञ एवं विवकेशील व्यक्तित्व है। कृतज्ञता उनके व्यक्तित्व की प्रबल प्रवृत्ति है। अपनी इसी प्रवृत्ति के सम्बन्ध में वे लिखते हैं-“एक शब्द में आप मेरी सबसे प्रबल प्रवृत्ति पूछना चाहें तो मैं बड़ी विनम्रता से कहूंगा-कृतज्ञता, एक बहुतव्यापक अर्थ में।“15 इसी प्रवृत्ति की प्रबलता के कारण वे अपने मित्रों, परिचितों, शुभेच्छुओंके प्रति कृतज्ञता का भाव रखते हैं।

बहुत कम लोग होते हैं जो दूरदर्शी होते हैं। बच्चन ऐसी ही दृष्टि के धनी थे। कोई भी संभावनाशील व्यक्ति उनकी दृष्टि से बचकर नही रह सकता था। ‘आओ मर जायें‘ लिखने वाले बच्चन पत्रों में एक आशावादी व्यक्तित्व दिखलाई पड़ते हैं। ऐसा आशावादी व्यक्ति जो सदैव अपने कार्य व संघर्ष से निराशाओं को सदैव आशाओं में परिवर्तित करता रहा और वही आशा वे अपने संपर्क में आने वाले व्यक्तियों से भी करते हैं।बच्चन मानते हैं कि मनुष्य को जीवन में निराशा को कभी स्थान नही देना चाहिए। बल्कि भविष्य के प्रति आशावादी होना चाहिए। 23.06.1965 को प्रेषित पत्र में वे उदभ्रांत को निराशा को छोड़कर जीवन में आशावादी बनने के लिए प्रेरित करते हुए लिखते हैं-“निराशा कोे जीवन में स्थान न दें। अगर आप कुछ नही हैं तो कुछ बनने के लिए संघर्ष करें। खाली मत बैठे। अच्छे लोगों के साथ रहें। बहुत श्रम साधना के पश्चात् ही मनुष्य को थोड़ी सी उपलब्धि होती है।“16 समाज की जटिल परंपराओं और रूढ़ियों में न बंधकर रहने वाले व्यक्ति हैं बच्चन। उन्होंने प्राचीन परम्पराओं को तोड़ते हुए विजातीय, विधर्मी और विभाषी तेजी से विवाह कर यह बता दिया था कि वे समाज की प्राचीन रूढ़ियों, परंपराओं में विश्वाास नही करते। उन्हें हिन्दू-समाज का सारा ढ़ांचा रूग्ण, सड़ा-गला, दुर्गन्धित प्रतीत होता था। हिन्दू समाज में हो रहें छुआछूत के भेदभाव को वे स्वीकार नही करते थे-‘मानव का मानव से लेकिन अलग न अन्तर प्राण‘। शारीरिक रूप से कमजोर व मजबूर लागों के लिए भी उनके मन में श्रद्धा एवं सेवा का भाव है। विकलांगों के लिए उनकी सहानुभूति उदभ्रांत को प्रेषित पत्र में वे लिखते हैं-“विकलांगों के प्रति के प्रति करूणा की भावना रखनी चाहिए। विज्ञान ने आज बहुत से साधन संभवकर दिये हैं कि विकलांग समाजोपयोगी कार्य करके अपनी जीविका कमा सकें और स्वाभिमान से रह सकें। समाज विकलांगों की समस्याओं का यथासंभव निराकरण करके उनकी कुंठाएं कम कर सकता है। शासन-समाज दानों विकलांगों की कुठाओं से उपर उठने में सहायता कर सकते हैं-उन्हें शिक्षित करके, उनके अनुरूप काम सीखा करके, उनके अनुरूप काम दे कर के।“17


बच्चन ने अपने ऊपर आये हर दायित्व को बड़ी निष्ठा एवं ईमानदारी से पूर्ण किया है। पत्रों के आधार पर वात्सल्य की प्रतिमूर्ति उनके व्यक्तित्व की एक अनूठी विशेषता है। जिसके माध्यम से उनकी देश-प्रेम, मानव-प्रेम, विश्व-प्रेम की भावना सदा प्रवाहित होती रही है।बच्चन हिन्दी के काव्यशास्त्र, अलंकार शास्त्र, छन्द, भाषा-शास्त्र, रसादि के साथ-साथ अंग्रेजी के मर्मज्ञ तो हैं ही साथ ही और कई विषयों के भी ज्ञाता हैं।हर विषय में वे अपनी दखल रखते हैं। वे इतिहास, भूगोल, पुराण, धर्मशास्त्र, संस्कृति के मर्मज्ञ हैं। बच्चन इन विषयों के अध्ययनकर्ताओं का मार्गदर्शन भी करते हैं। उनका प्रिय विषय अध्यात्मिकता है। हिन्दी और अंग्रेजी के साहित्यकारों के अतिरिक्त उन्होंने संसार के देशों की अनेक भाषाओं के साहित्य को भी पढ़ा है। बच्चन की ज्ञानार्जन की जिज्ञासा ही उनकी बहुज्ञता का प्रमाण है। बच्चन के पत्र उनके व्यक्तित्व के आन्तरिक पक्ष की विशेषताओं को पर्त-दर-पर्त उद्घाटित करते चलते हैं।
       
निःसन्देह ही बच्चन के पत्र स्वाभाविकता व आत्मीयता से पूर्ण होने के साथ-साथ स्पष्टता के गुुणों का भी निर्वाह करते हैं। उन्हें जो कुछ कहना होता है उसे दो टूक शैली में कहते हैं। फिर चाहे किसी को बुरा लगे या भला। पत्रों की इन्हीं विशेषताओं से बच्चन के व्यक्त्वि की अनेक विशेषताओं-स्वाभिमानी, समाजसेवी, कर्मठ, आशावादी, संवेदनशीलता, विनम्रता आदि का परिचय मिलता है।

संदर्भ सूची
1.-कवि श्री बच्चनः व्यक्ति और दर्शन, डाॅ. के0 जी0 कदम, पृ0-40
2.- पाती फिर आई, डाॅ. जीवन प्रकाश जोशी, पृ0-36
3.- लोकप्रिय बच्चन, प्रो0 दीनानाथ शरण, पृ0-38
4.- दो चट्टानें, डाॅ. हरिवंशराय बच्चन, पृ0-193
5.- बच्चनः व्यक्ति और कवित्व, डाॅ. जीवन प्रकाश जोशी, पृ0-10
6.-बच्चनः पत्रों में, डाॅ जीवन प्रकाश जोशी, पृ0-61
7.- बच्चन रचनावली भाग-9, अजित कुमार, पृ0-320
8.-वही, पृ0-320-321
9.-बच्चनः निकष पर, रमेश गुप्ता, पृ0-242
10.-बच्चनः पत्रों में, डाॅ. जीवन प्रकाश जोशी, पृ0-63
11.-वही, पृ0-36
12.- बच्चन रचनावली भाग-9, अजित कुमार, पृ0-86
13.-पत्र ही नही बच्चन मित्र है, उदभ्रांत, पृ0-75
14.- कविवर बच्चन के साथ, अजित कुमार, पृ0-75
15.-नीड़ का निर्माण फिर, डाॅ हरिवंशराय बच्चन, पृ0-198
16.- पत्र ही नही बच्चन मित्र है, उदभ्रांत, पृ0-71
17.- वही, पृ0-199


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